ख़मेर रूज: एक सनक, लाखों मौतें

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कंबोडिया में ख़मेर रूज का शासन चार साल चला. इस दौरान वहां हुई हत्याओं को 20वीं सदी के सबसे बड़े नरसंहारों में गिना जाता है.
मार्क्सवादी नेता पोल पॉट ने साम्यवादी विचारधारा को अपनी तरह से परिभाषित किया और इसके बाद कंबोडिया का समाज हमेशा के लिए बदल गया.
मार्क्सवादी नेता पोल पॉट कंबोडिया को ग्रामीण यूटोपिया बनाना चाहते थे. उन्होंने शहरों से हटाकर लोगों को गांवों में बसाना शुरू किया.
धन और निजी संपत्ति रखना बंद कर दिया गया. उनके शासन में धर्म और आस्था की इजाज़त नहीं थी.
लाखों लोग भुखमरी, बीमारी, बेगारी और मौत की सज़ा के कारण मारे गए.

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ख़मेर रूज की शुरुआत 1960 के दशक में कंपूचिया साम्यवादी पार्टी की सशस्त्र इकाई से हुई. मार्क्सवादी कंबोडिया को तब कंपूचिया के नाम से पुकारते थे.
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1970 में दक्षिणपंथी सैन्य इकाई ने राजकुमार नॉरदोम सिंहानुक का तख्तापलट किया और ख़मेर रूज राजनीति में उतरकर तेज़ी से जन समर्थन जुटाने लगे.
क़रीब पांच साल तक चले गृह युद्ध में ख़मेर रूज ने कंबोडिया के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण कर लिया.
1975 में ख़मेर रूज ने राजधानी नाम पेन्ह पर कब्ज़ा कर कंबोडिया को अपने अधीन ले लिया.
आदिवासियों का असर

दरअसल, पोल पॉट लंबे समय तक पूर्वोत्तर के जंगलों में पहाड़ी आदिवासियों के बीच रहे थे और उनके आत्मनिर्भर जीवन से प्रभावित थे.
आदिवासियों को पैसे की ज़रूरत नहीं होती और वे बौद्ध धर्म से भी दूर थे.
शासन संभालते ही पोल पॉट ने देश में नई शुरुआत के लिए 'शून्य वर्ष' घोषित कर दिया. उन्होंने अपने नागरिकों को दुनिया से अलग-थलग कर दिया और शहर खाली कराने शुरू कर दिए.
खुद को बुद्धिजीवी मानने वालों को मार दिया गया. चश्मा पहनने या विदेशी भाषा जानने वालों को अक्सर प्रताड़ित किया जाता था. मध्यवर्ग के लाखों पढ़े-लिखे लोगों को विशेष केंद्रों पर प्रताड़ित किया गया और मौत की सज़ा दी गई.

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इनमें सबसे कुख्यात थी नाम पेन्ह की एस-21 जेल, जहां ख़मेर रूज के चार साल के शासन के दौरान 17 हज़ार महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को क़ैद रखा गया था.
वियतनाम की सीमा पर संघर्ष के लंबे दौर के बाद वियतनामी सेना ने आखिरकार 1979 में ख़मेर रूज को सत्ता से बेदखल कर दिया.
लेकिन ख़मेर रूज ने जंगलों से अगले क़रीब 20 साल तक लड़ाई जारी रखी, जब तक कि उसके नेता पोल पॉट की मौत नहीं हो गई.
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