रूस के लिए भारत का ये अहम फ़ैसला, क्या होगा असर

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से पश्चिमी देशों और बाज़ारों में आर्थिक प्रतिबंध झेल रहे रूस के निवेशकों की नज़र अब भारतीय शेयर बाज़ार पर है.
एक तरफ़ जहाँ रूस का अमेरिकी डॉलर में कारोबार निरंतर कम होता जा रहा है, वहीं रूस ने चीन जैसे नए बाज़ारों के साथ उन्हीं की करेंसी में व्यापार करने की शुरुआत कर दी है.
इधर भारत की नेशनल सिक्यूरिटीज़ डिपॉज़िटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के मुताबिक़ रूस की राजधानी मॉस्को में मौजूद तीन संस्थाओं को विदेशी संस्थागत निवेशकों या एफ़पीआई के तौर पर रजिस्टर किया गया है.
एफ़पीआई निवेशक वे होते हैं, जो न तो सीधे स्थानीय कंपनियों के साथ गठजोड़ करते हैं और न ही सीधे तौर पर दूसरे देशों में कारोबार शुरू करते हैं.
दरअसल, एफ़पीआई वे बड़े निवेशक होते हैं, जो कंपनियों के शेयरों में या बॉन्ड्स में पैसा लगाते हैं और इनका सीधा वास्ता शेयर बाज़ार से होता है.
सिक्यूरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (सेबी) की भारत में रजिस्टर्ड एफ़पीआई सूची में दो नई रूसी संस्थाओं और एक कारोबारी का नाम पहली बार आया है, जिससे भविष्य में दूसरे रूसी निवेशकों की भी भारतीय बाज़ारों में दिलचस्पी बढ़ सकेगी.
रूस की अल्फ़ा कैपिटल मैनेजमेंट कंपनी ने एफ़पीआई के दो लाइसेंस लिए हैं, जबकि एक लाइसेंस निजी निवेशक वसेवोलोद रोज़नोव के नाम पर लिया गया है.
बीबीसी ने वसेवोलोद रोज़नोव के बारे में जानकारी जुटाई, तो इस बात का पता चला कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेन्स्की ने मॉस्को स्टॉक एक्सचेंज समेत जिन 333 रूसी नागरिकों के विदेशी निवेश के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाया है, उनमें से एक नाम वसेवोलोद रोज़नोव का भी है.
हालाँकि उनके दफ़्तर ने इस बारे में 'नो कमेंट्स' ही कहा है.
रूस से ज़्यादा एफ़पीआई आने की संभावना

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रूस में पिछले 30 सालों से कपड़ों का व्यापार करने वाले भारतीय मूल के मनोज लालवानी ने मॉस्को से बताया, "रूस में न तो काम की कमी है और न ही अवसरों की. व्यापारियों को या बड़े बिज़नेस हाउस को मार्केट चाहिए निवेश के लिए. भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, तो सभी वहाँ पैसा लगाना ही चाहेंगे".
जानकर इस क़दम को अहम इसलिए भी बता रहे हैं, क्योंकि अभी तक रूस से भारत में होने वाले निवेश फ़ॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट यानी एफ़डीआई के ज़रिए ही होते रहे हैं न कि एफ़पीआई के ज़रिए, जिसमें विदेशी कंपनियाँ भारतीय शेयर बाज़ार में सीधे निवेश कर सकती हैं.
आर्थिक निवेश के क़ानूनी पहलुओं के जानकार प्रखर दुआ ने इकॉनॉमिक टाइम्स अख़बार में लिखा है, "सेबी ने इस तरह के बाहरी निवेश के मामलों पर कड़े क़ानून बना रखे हैं, लेकिन रूस की मौजूदा भू-राजनैतिक स्थिति को देखते हुए हम वहाँ से भारत में ज़्यादा एफ़पीआई आता देख सकेंगे. जो तीन लाइसेंस दिए गए हैं, वे 2026 तक चालू रहेंगे."
क़रीब डेढ़ साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो कई देशों ने रूस की आमदनी को कम करने और उसकी युद्ध की कोशिशों को कमज़ोर करने के लिए उसके तेल और गैस के आयात को नियंत्रित करने के लिए फ़ैसले किए थे.
रूस के सरकारी ख़ज़ाने को कथित तौर पर कमज़ोर और निष्क्रिय करने के लिए नेटो समूह वाले पश्चिमी देशों ने रशियन सेंट्रल बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार का 324 अरब डॉलर भी फ़्रीज़ कर दिया था.
पश्चिमी देशों से रूस को निर्यात होने वाली टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र, उच्च गुणवत्ता वाली वस्तुएँ और सेवाओं की बिक्री पर बैन लगने से रूस तक इनकी पहुँच लगभग ख़त्म हो गई है और रूस न सिर्फ़ निर्यात के लिए, बल्कि आयात के लिए भी नए और परिचित बाज़ारों की तलाश में रहा है.
परमाणु शक्ति संपन्न और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य के तौर पर रूस जैसे एक महत्वपूर्ण देश के ख़िलाफ़ इससे पहले इतने कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए गए थे.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर एके पटनायक मानते हैं, "आज की दुनिया वॉरफ़ेयर से ज़्यादा आर्थिक मज़बूती पर चलती है."
उन्होंने बताया, "सामरिक और आर्थिक, दोनों ही सूरतों में भारत के लिए रूसी निवेश बेहतर और सुरक्षित कहे जा सकते हैं, अगर इसकी तुलना चीन से हो. चीन की कंपनियों और निवेशकों ने भी विदेशी बाज़ारों और स्टॉक मार्केट्स वग़ैरह में तगड़े निवेश कर रखे हैं. तुलना की जाए, तो भारत तो रूस को ही प्राथमिकता देगा क्योंकि दोनों देशों के संबंध आज के नहीं, बहुत पुराने और मज़बूत रहे हैं. लेकिन साथ ही ये भी देखते रहना पड़ेगा कि इन संबंधों का भारत के पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों पर क्या असर पड़ता है."
बाज़ार की तलाश

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फ़िलहाल तो रूस-यूक्रेन युद्ध ख़त्म होते नहीं दिख रहा है और शायद यही वजह है कि रूस के बड़े निवेशक दुनिया में ऐसे बाज़ारों की तलाश में हैं, जहाँ उनका पैसा प्रतिबंधों और ज़ब्त किए जाने के ख़तरे में न हो.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 'यूनाइटेड रशा पार्टी' में कुर्स्क प्रांत के विधायक भारतीय मूल के अभय कुमार सिंह का मानना है, "वो समय आ चुका है, जब रूस-भारत संबंधों को बड़े स्तर पर पहुँचाया जाए."
उनके मुताबिक़, "रूस और भारत के संबंध भारत की स्वतंत्रता से जुड़े हुए हैं. दोनों देशों ने न सिर्फ़ एक दूसरे के अच्छे-बुरे समय में साथ दिया है, बल्कि जंग या आर्थिक बदलाव जैसी अहम घड़ियों में संयुक्त राष्ट्र तक में एकजुट रहे हैं. डिफ़ेंस के अलावा कच्चे तेल के कारोबार में दोनों आगे बढ़े हैं और अब दूसरे क्षेत्रों में भी यही देखने को मिलेगा."
ग़ौरतलब है कि, फ़रवरी, 2023 में अंतरराष्ट्रीय और अंतरसरकारी संस्था एफ़एटीएफ़ यानी वित्तीय कार्रवाई कार्यदल या फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स ने रूस की सदस्यता को सस्पेंड कर दिया था.
रूस और भारत के संबंध भारत की स्वतंत्रता से जुड़े हुए हैं. दोनों देशों ने एक दूसरे के अच्छे-बुरे समय में साथ दिया है.
एफ़एटीएफ़ एक ऐसी संस्था है, जिसका गठन काले धन को वैध बनाने या मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने से संबंधित नीतियाँ बनाने के लिए किया गया था.
हालाँकि रूस अभी भी एफ़एटीएफ़ की ग्रे या ब्लैक लिस्ट में नहीं है, इसलिए भारत में सेबी से इन रूसी कंपनियों को एफ़पीआई निवेश करने में कोई दिक़्क़त नहीं आएगी.
यानी भारत आने वाले रूसी निवेशकों को टैक्स बचाने के वही लाभ मिलेंगे, जो उन एफ़पीआई करने वाली विदेशी कंपनियों को मिलते हैं, जो मॉरीशस या सिंगापुर से होकर भारत आती हैं.
मॉस्को में तमिल संघ के उपाध्यक्ष के विजय कुमार इस बात से ख़ुश हैं कि भारतीय शेयर बाज़ार में अब रूसी निवेश शुरू हो सकेगा.
उन्होंने बताया, "जब भारत में चीन से एफ़पीआई निवेश आ सकता है, तो रूस से क्यों नहीं. मेरा तो मानना है कि रूस में इस बात की जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है कि भारतीय शेयर बाज़ार लगातार ऊपर की पायदान चढ़ रहे हैं और भविष्य वहीं है."
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