डॉलर के सामने गिरता रुपया, आम लोगों की जेब पर क्या होगा असर

डॉलर (सांकेतिक तस्वीर)

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

9 मई को शुरुआती कारोबार में भारत की मुद्रा रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 51 पैसे गिरकर 77.41 रुपये के अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गया.

पिछले कुछ दिनों में इस बात पर भी चिंता जताई जा रही है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी लगातार कम होता जा रहा और कई हफ़्तों से चल रही गिरावट की वजह से ये 600 अरब डॉलर से नीचे पहुंच चुका है.

सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, "मोदी जी जब रुपया गिरता था तो आप मनमोहन जी की आलोचना करते थे. अब रुपया अपने अब तक के सबसे कम मूल्य पर है. लेकिन मैं आंख मूंदकर आपकी आलोचना नहीं करूंगा. गिरता हुआ रुपया निर्यात के लिए अच्छा है बशर्ते हम निर्यातकों को पूंजी के साथ समर्थन दें और रोज़गार सृजित करने में मदद करें. हमारी अर्थव्यवस्था के प्रबंधन पर ध्यान दें, न कि मीडिया की सुर्खियों पर."

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक ट्वीट में कहा, "भारत के इतिहास में आज - रूपया ICU में है, - ₹ मार्गदर्शक मंडल की उम्र कब की पार कर चुका, - NPA 75 साल में सबसे ज़्यादा है, - सर्वाधिक बेरोज़गारी है, - महंगाई की मार ने कमर तोड़ दी है, - सर्वाधिक महँगा पेट्रोल और डीज़ल है, मोदी है तो मुमकिन है."

2014 के लोक सभा चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की लगातार आलोचना की थी. सोमवार को रुपये में आई भरी गिरावट के बाद कांग्रेस ने एक पुराना वीडियो भी ट्वीट किया जिसमें मोदी रूपए में आ रही गिरावट के लिए केंद्र सरकार की आलोचना करते दिख रहे हैं.

कैसे गिरा रूपया?

पिछले हफ्ते अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 50-आधार-बिंदु दर वृद्धि और आने वाले महीनों में और अधिक दरों में बढ़ोतरी के संकेत के बाद वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर में उछाल को रुपये में गिरावट का एक बड़ा कारण माना जा रहा है.

साथ ही विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से अपने निवेशों को खींच लेना भी रूपए के गिरने के कई कारणों में से एक माना जा रहा है.

ये भी कहा जा रहा है कि दुनिया के प्रमुख देशों में मौद्रिक नीति के सख्त होना, आर्थिक मंदी और रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से बना भू-राजनीतिक तनाव भी निवेशकों में चिंता बढ़ा रहा है और ये रुपये में आई गिरावट का एक कारण हो सकता है.

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प्रोफेसर मुनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में वित्त अध्ययन विभाग के प्रमुख हैं.

वे कहते हैं, "जैसे ही अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजारों में कोई दहशत होती है, लोग डॉलर की तरफ भागते हैं और डॉलर की मांग बढ़ती है. उसका भी एक असर होता है. कुछ विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारत से विनिवेश किया जिस वजह से स्टॉक मार्केट गिरा. और इस वजह से काफी पैसा बाहर चला गया."

प्रोफेसर मुनीश कुमार का मानना है कि रुपयेए का गिरना एक अस्थायी बात है और आने वाले दिनों में ये स्थिर हो जायेगा. वे कहते हैं, "एफडीआई का निवेश आने की वजह से भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार हैं."

रुपया

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क्या हैं मायने?

गिरते रुपये का सबसे बड़ा असर यह है कि आयात अधिक महंगा हो जाता है और निर्यात सस्ता हो जाता है. इसकी वजह ये है कि आयात की समान मात्रा का भुगतान करने में अधिक रुपये लगते हैं और निर्यात की समान मात्रा का भुगतान करने के लिए खरीददार को कम डॉलर लगते हैं.

तो रुपये में गिरावट का अधिक असर उन आयातकों पर पड़ता है जो रुपये की कीमत प्रति डॉलर बढ़ जाने से बुरी तरह प्रभावित होते हैं. हालांकि रुपये का गिरना निर्यातकों के लिए सकारात्मक साबित होता है क्योंकि उन्हें डॉलर के बदले अधिक रुपया मिलता है.

भारत के लिए चिंता

भारत अपने कुल तेल का करीब 80 फीसदी तेल आयात करता है. जैसे-जैसे रुपया गिरेगा कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ेगा और इस वजह से पेट्रोल और डीज़ल दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी होगी. इसका सीधा असर परिवहन की लागत पर पड़ेगा और माल की कीमतों में वृद्धि होने से महंगाई बढ़ने की संभावना है.

प्रोफेसर मुनीश कुमार कहते हैं, "आम आदमी के लिए बड़ी समस्या तेल को लेकर है. पेट्रोल की कीमत पहले ही डॉलर में बढ़ गई. और क्यूंकि भारतीय रूपए की कीमत गिर गई तो भारत के लिए रूपए के मामले में पेट्रोल और मंहगा हो गया. आम आदमी पर इसी बात का सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा."

पिछले कुछ हफ़्तों से लगातार बढ़ रही तेल की कीमतों की वजह से पहले ही मंहगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी. अब चूंकि भारत को तेल आयात करना और मंहगा पड़ेगा इसलिए बड़ी चिंता इसी बात को लेकर है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें और ऊपर चली जाएँगी जिसका सीधा असर आवश्यक चीज़ों के परिवहन की लागत पर पड़ेगा और मंहगाई और बढ़ेगी.

रूपए में आयी गिरावट का एक सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो पढाई के लिए विदेश जाने की योजना बना रहे हैं. डॉलर के मुक़ाबले रूपए के कमज़ोर होने से भारतीय छात्रों के लिए विदेशों में शिक्षा ले पाना मंहगा हो जायेगा.

निर्यातकों के लिए रुपये का गिरना फायदे का सौदा है क्यूंकि उन्हें विदेशी मुद्रा भुगतान को भारतीय रुपये में परिवर्तित करने पर ज़्यादा राशि प्राप्त होगी. माना जा रहा है कि रुपये में गिरावट से आईटी और फ़ार्मा कंपनियों की कमाई में तेज़ी आएगी.

रेत पर बनी रुपये की प्रतिकृति

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रूपए में गिरावट, क्या हैं वजहें?

आर्थिक मामलों के जानकार और जेएनयू के पूर्व प्राध्यापक प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि रुपये में आई गिरावट की मुख्य वजह ये है कि इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था काफी कमज़ोर है.

वे कहते हैं, "कोविड महामारी के बाद अमेरिका की अर्थव्यवस्था काफी मज़बूत हो गई थी. कहने के लिए तो भारत की अर्थव्यवस्था ठीक हो रही है लेकिन वो अभी भी 2019 के स्तर पर नहीं पहुँच पाई है और उसकी वजह है कि भारत की अर्थव्यवस्था में डिमांड कम है और सरकार उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रही है. सरकार का कहना है कि विकास दर अच्छी है और भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है लेकिन क्यूंकि इसमें असंगठित क्षेत्र के आंकड़े नहीं आते हैं इसलिए सरकार के दावे के मुताबिक विकास दर नहीं है. इसीलिए खपत की मांग कम है. जब तक डिमांड नहीं होगी तब तक विकास दर अच्छा हो नहीं सकता."

प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबिक मंहगाई बहुत तेज़ी से बढ़ रही है, मगर मंहगाई के आंकड़े भी पूरी तरह से सही नहीं होते क्योंकि इसमें सर्विस सेक्टर पूरी तरह रिफ्लेक्ट नहीं होता है. वे कहते हैं, "जैसे मेडिकल खर्चे और शिक्षा से जुड़े खर्चे बहुत बढ़ गए हैं लेकिन वो मंहगाई के आंकड़ों में पूरी तरफ रिफ्लेक्ट नहीं होते हैं. इस सब का असर लोगों की खरीदने की शक्ति पर पड़ा है और खपत कम हुई है. जब तक खपत कम रहेगी तब तक उद्योग पुनर्जीवित नहीं होगा. चूँकि कैपेसिटी यूटिलाइजेशन कम है तो निवेश कम हो जाता है और जब निवेश कम हो जाता है तो विकास दर कम हो जाती है."

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उनके अनुसार चूंकि अर्थव्यवस्था कमज़ोर है और मंहगाई तेज़ी से बढ़ रही है तो इसका असर इस बात पर पड़ेगा की भारत की अर्थव्यवस्था को किस नज़र से देखा जा रहा है.

प्रोफेसर अरुण कुमार दुनिया भर में अनिश्चितता की बात भी करते हैं. वे कहते हैं, "महामारी की वजह से और यूक्रेन में चल रहे युद्ध की वजह से आपूर्ति में बाधा आ गई है. ये सारी दुनिया में अव्यवस्था पैदा कर रहा है. जब अनिश्चितता का समय होता है तो लोग सुरक्षित ठिकाना खोजते हैं और डॉलर को एक सुरक्षित ठिकाना माना जाता है."

वे कहते हैं कि दुनिया भर में दाम बढ़ गए हैं और विश्व व्यापार अस्त व्यस्त हो गया है और भारत का चालू खाता घाटा बहुत बढ़ गया है.

वे कहते हैं, "विदेशी निवेशक देश से बाहर जा रहे हैं और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत गिरा है. डॉलर की मांग बढ़ गई है और रुपये की मांग कम हो गई है. इससे ये डर पैदा होता है कि अब रूपया गिरेगा. ऐसी अटकलों और अनिश्चितता से स्थिति और बिगड़ती है."

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