परवेज़ मुशर्रफ़ ने जब सत्ता पर किया था कब्ज़ा: दबी ज़ुबान में बातें और नज़रबंद होते मंत्री

परवेज मुशर्रफ

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद

जनरल परवेज मुशर्रफ़ की सत्ता का सूरज और मेरे पत्रकारीय करियर का सितारा लगभग एक साथ ऊपर चढ़े थे. जब पूर्व राष्ट्रपति ने 12 अक्टूबर 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का तख़्ता पलटा, इस्लामाबाद में सूचना मंत्रालय के एक नए नए बने इंटरनेट विंग में मैंने बस इंटर्नशिप शुरू ही की थी.

इस इंटरनेट विंग का ऑफ़िस उसी बिल्डिंग में था जिसे कैबिनेट ब्लॉक कहा जाता था और जहां 1998 में परमाणु विस्फ़ोट के बाद नवाज़ शरीफ़ ने प्रधानमंत्री कार्यालय को स्थानांतरित किया था.

मुझे याद है कि 12 अक्टूबर 1999 को इस इमारत का माहौल कितना तनावपूर्ण था. कर्मचारी पहले के मुक़ाबले अधिक चुपचाप थे और कभी कभार इमारत के गलियारे में लोगों को दबी ज़बान में बातें करते हुए मैंने महसूस किया था.

इसके बाद हमें बताया गया कि सैन्य प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को प्रधानमंत्री ने बर्ख़ास्त कर दिया, जब वो एक आधिकारिक यात्रा पर श्रीलंका गए थे.

इंटरनेट विंग पर पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक वेबसाइट को चलाने और अपडेट करने की ज़िम्मेदारी थी. उन दिनों पाकिस्तान सरकार की यही एकमात्र वेबसाइट थी.

इंटरनेट विंग के इंचार्ज को आदेश दिया गया कि वो मुशर्रफ़ को बर्ख़ास्त किए जाने की ख़बर प्रकाशित कर दें, ताकि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित किया जा सके.

इस घटना के बाद, मैं दोपहर को ही ऑफ़िस से लौट आई लेकिन अंदर बेचैन थी क्योंकि मंत्रालय में लोगों के बीच तनाव और असहजता महसूस कर पा रही थी. मुझे लगा कि ये किसी चीज़ का पटाक्षेप नहीं है बल्कि इसके बाद भी कुछ होने वाला है.

और उसी दिन शाम को आखिरकार सत्ता पर सेना के कब्ज़े की ख़बर आ गई. पाकिस्तान के पास एकमात्र सरकारी चैनल पीटीवी था और इससे ख़बरों का प्रसार बहुत सीमित था.

नवाज़ शरीफ़ और परवेज़ मुशर्रफ़

इमेज स्रोत, Getty Images

हर जगह सेना के जवान

मुझे याद है कि मेरे एक सहकर्मी ने मुझे कॉल करके बताया कि हमारा ऑफ़िस सील कर दिया गया था और तत्कालीन सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद को हाउस अरेस्ट कर लिया गया था जो इंटरनेट विंग के फ़ाउंडर और बॉस थे और मंत्री के सारे कम्प्यूटर सेना उठा ले गई.

चूंकि मुशाहिद हुसैन सैयद नवाज़ शरीफ़ के क़रीबी थे, इसलिए सेना के पहले निशाने पर वही आए.

मैंने महसूस किया कि मेरी इंटर्नशिप अधर में लटक गई और मैंने अपने शहर लाहौर वापस जाने की योजना बनानी शुरू कर दी. तभी इंटेलिजेंस ब्यूरो से मुझे एक कॉल आया और मुझे ऑफ़िस आने को कहा गया. ये बहुत अनपेक्षित और सपने जैसा था.

मुझे और मेरे कुछ सहकर्मियों को मुख्य दरवाजे से लाने की बजाय, कैबिनेट ब्लॉक में तीसरे माले से हमें अंदर लाया गया जहां प्रधानमंत्री का कार्यालय था.

आईबी के डायरेक्टर (इनफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) हमें रास्ता दिखा रहे थे. पीएम ऑफ़िस में सेना के जवानों की भारी तैनाती थी. इसके बावजूद कई जगहों पर हमें रोका गया और आईबी के अधिकारी लगातार अपना पहचानपत्र दिखा रहे थे. और आखिरकार जब मैं इंटरनेट विंग में पहुंची तो देखा कि वहां हर गरियारे के अंत में हथियारबंद सेना के जवान खड़े हैं.

मेरा दरवाज़ा खुला था और मुझसे अंतरराष्ट्रीय प्रेस में छपी ख़बरों पर एक संक्षिप्त नोट बनाने को कहा गया, जोकि मेरा रोज़ाना का काम था.

इंटरनेट विंग के इंचार्ज को पाकिस्तान सरकार की वेबसाइट से नवाज़ शरीफ़ और उनकी नीतियों के सारे संदर्भ हटा लेने को कहा गया.

नवाज शरीफ

इमेज स्रोत, Getty Images

तख़्तापलट के बाद मीडिया का रवैया

बंदूक पकड़े एक सैनिक हम पर नज़र रखे हुए था, वो दरवाज़े पर खड़ा था और मुझे बताया गया कि मैं दरवाज़ा नहीं बंद कर सकती.

मैंने इंटरनेट खोला और इंटरनेशनल प्रेस खंगालने लगी. सत्ता पर मुशर्रफ़ के काबिज़ होने की ख़बर पूरी दुनिया में बड़ी प्रमुखता से प्रकाशित थी.

उनकी नवाज़ शरीफ़ के साथ तस्वीर भी. उनकी एक तस्वीर जिसमें वो सैन्य प्रमुख का हाथ थामे हुए हैं, उनकी एक तस्वीर जिसमें वो बंदूक से निशाना साध रहे हैं, मुशर्रफ़ उनके कुत्तों को पकड़े हुए हैं जबकि उनकी पत्नी उनके क़रीब ही खड़ी हैं.

ये तस्वीरें पूरी दुनिया में नुमाया थीं. पूरी दुनिया में ये पहले पेज की ख़बर थी.

उनकी प्रोफ़ाइल, तुर्की में उनकी पढ़ाई, उनके परिवार का तुर्क भाषा से मेलजोल, कारगिल शिकस्त में उनकी भूमिका, इन ख़बरों में इन सबका ज़िक्र था.

अधिकांश कवरेज सख़्त होने की बजाय नकारात्मक थीं.

मैंने अपने संक्षिप्त नोट में नकारात्मक ख़बरों को जगह दी, बिना ये बहुत सोचे कि यह काम नए शासक को नाराज़ कर सकता है.

कुछ दिनों बाद हालात धीरे धीरे अपनी पटरी पर लौट आए. मुशर्रफ़ को धीरे धीरे नई वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया गया और इंटरनेट विंग से सेना को हटा लिया गया.

मुशर्रफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जनरल मुशर्रफ़ और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी. साल 2001 में दिल्ली पहुंचे थे जनरल मुशर्रफ.

प्रेस की एक पुकार पर मुशर्रफ़ रुक जाते

सरकारी मीडिया का हिस्सा होने के नाते, मुझे भी परवेज़ मुशर्रफ़ के 2005 में भारत दौरे को कवर करने का मौका मिला.

इस दौरे में माहौल बहुत उत्साहजनक था. कुछ साल पहले तक कारगिल का मास्टरमाइंड समझे जाने वाले व्यक्ति को लेकर लोग पागल हो रहे थे.

चाहे वो दिल्ली में ताज़ मान होटल का मुख्य गेट हो या होटल की लॉबी, पत्रकारों से जगह पूरी तरह भरी होती थी.

अगर इस ग्रुप में कोई भी अगर ज़ोर से कह दे, "मिस्टर मुशर्रफ़" तो वो तुरंत रुक जाते और प्रेस से बात करने लगते. बिना कूटनीतिक बारीकियों पर बहुत अधिक ध्यान दिए उन्होंने अपने विचार खुल साझा किए और मुश्किल सवालों के जवाब देने से कभी पीछे नहीं हटे.

उस दौरे पर उन्होंने हमेशा बहुत निर्भीकता और प्रमाणिकता के साथ जवाब दिया. उनका रवैया खुला था, शायद यही कारण था कि भारतीय मीडिया उनके साथ मोहब्बत से पेश आ रही थी.

दिल्ली में नहर वाली हवेली, जहां परवेज़ मुशर्रफ़ पैदा हुए थे और उनका पैतृक आवास था, वहां के आस पास के लोगों से बात करते हुए, मुझे ये बहुत अजीब लगा कि लोगों में उनके प्रति अपनापन और गर्व का भाव था.

आधिकारिक बैठक से पहले 17 अप्रैल 2005 को जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ का स्वागत करते तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह.

इमेज स्रोत, Getty Images

भारत के उलटे झंडे पर विवाद

लेकिन जब पाकिस्तान ने फ़िरोज़ शाह कोटला स्टेडियम में भारत को हराया, मेरा भारतीय ड्राईवर परेशान हो उठा. उनका मानना था कि मुशर्रफ़ को ख़ुश करने के लिए जानबूझ कर भारत हारा था. इस मैच को देखने के लिए कुछ देर मुशर्रफ़ भी गए थे.

ड्राईवर ने कहा, "ये मैच नहीं था, ये तो दोस्ती हो रही थी."

स्टेडियम की सिक्युरिटी में तैनात पुलिसकर्मियों ने मुझे बताया कि वहां कितनी अभूतपूर्व चाकचौबंद सुरक्षा व्यवस्था की गई थी. उन्होंने मुझे बताया कि मुशर्रफ़ की तरह किसी भी देश के प्रमुख के लिए इतनी सुरक्षा व्यवस्था नहीं मुहैया कराई गई.

उन दिनों मुशर्रफ़ चरंपंथियों की हिट लिस्ट में थे और हमले की कोशिशों में बाल बाल बचे थे.

दिल्ली के चांदनी चौक में मिर्ज़ा ग़ालिब के घर के बाहर मैं एक शख़्स से मिली जिसने कहा कि मुशर्रफ़ एक भले आदमी लगते हैं, लेकिन उन्होंने अपने विमान में भारतीय झंडे को उलटा रखने का काम ठीक नहीं किया.

प्रोटोकॉल के अनुसार, जब किसी देश के मुखिया का विमान किसी दूसरे देश जाता है तो उसपर मेज़बान देश का झंडा भी लगाया जाता है.

लेकिन जब मुशर्रफ़ का विमान अजमेर शरीफ़ में उतरा तो उस पर भारतीय झंडा उलटा टंगा था, जोकि किसी मक़सद से नहीं किया गया था.

मुशर्रफ़ का विमान

इमेज स्रोत, Getty Images

कश्मीरी नेताओं के साथ बैठक

लेकिन जिस तरह से इस दौरे पर मीडिया की आंख लगी हुई थी, ये बात उनसे छुपी नहीं रही और मुझे याद है कि इस मुद्दे पर काफ़ी हंगामा मचा. बाद में इसे दुरुस्त किया गया.

दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास, जिसे पाकिस्तान हाउस के नाम से भी जाना जाता है, वहां जनरल मुशर्रफ़ के साथ कश्मीरी नेताओं के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक भी काफ़ी यादगार रही. मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़, यासीन मलिक, शब्बीर शाह और सैयद अली गिलानी इस बैठक में मौजूद थे.

इस मौके पर एक भी पाकिस्तानी पत्रकार को अंदर आने की इजाज़त नहीं दी गई और हर किसी को सामने के लॉन में बिठा दिया गया था.

सरकारी मीडिया में होने के नाते मुझे इन ऐतिहासिक बैठकों का गवाह बनने का मौका मिला. मेरे हिसाब से, कश्मीरी नेतृत्व में मतभेद बहुत अधिक थे और अलग अलग लोग एक साथ बैठने को राज़ी नहीं थे.

इसलिए वे सभी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से अलग अलग मिले और प्रतीकात्मक रूप से बाद में एक संयुक्त मीटिंग आयोजित की गई.

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़

इमेज स्रोत, Getty Images

"फ़िर वही दिल लाया हूं"

लेकिन मुशर्रफ़ की ओर से लाइन ऑफ़ कंट्रोल के पास कश्मीरियों के लिए ट्रेनिंग कैंप बंद करने और कश्मीर समस्या को हल करने के लिए चार बिंदु वाला फार्मूला पेश किए जाने से सैयद अली गिलानी इतने नाराज़ हुए वो रुके नहीं और हताशा में पाकिस्तानी दूतावास छोड़ कर चले गए.

मुशर्रफ़ की यात्रा के दौरान एक भारतीय टीवी टैनल ने मुशर्रफ़ के कवरेज का एक प्रोमो चलाया, जिसका टाइटिल बॉलीवुड फ़िल्म 'फिर वही दिल लाए हूं' से लिया गया था.

इस फ़िल्म में कश्मीर का संदर्भ था और इसका कुछ हिस्सा श्रीनगर में फ़िल्माया गया था. ये चैनल लगातार ये संदेश देने की कोशिश कर रहा था कि मुशर्रफ़ के पास कोई नई पेशकश नहीं थी और भारत पाकिस्तान के बीच मसलों को हल करने में 2001 में हुए आगरा शिखर सम्मेलन में जो विचार उन्होंने आगे बढ़ाया था, उसी को लेकर वो अडिग बने हुए थे.

मुझे याद है कि भारतीय संपादकों के साथ नाश्ते पर हुए एक मीटिंग में मुशर्रफ़ ने कश्मीर को लेकर अपनी नई पेशकश के बारे में उन्हें बताया था और कहा था, "मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि ये पुराना दिल नहीं है, अबकी बार मैं नया दिल लाया हूं."

15 जुलाई 2001 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ अपनी पत्नी सेहबा के साथ ताजहमल देखने गए थे.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 15 जुलाई 2001 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ अपनी पत्नी सेहबा के साथ ताजहमल देखने गए थे.

"डेमोक्रेट जनरल"

अप्रैल 2000 में एक 24X7 न्यूज़ चैनल शुरू किया गया था ताकि पाकिस्तान के सरकारी टीवी चैनल को वैश्विक मीडिया की प्रतिस्पर्द्धा में लाया जा सके और मुझे पीटीवी में काम करने का मौका मिला.

साल 2002 में जनरल मुशर्रफ़ ने प्राईवेट समाचार चैनलों को खोलने की मंज़ूरी दे दी और मीडिया की आज़ादी के एक नए दौर की शुरुआत हो गई.

इसने पाकिस्तान के पत्रकारिता के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा.

जनरल मुशर्रफ़ से पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीट्स बहुत जोख़िम वाले माने जाते थे और केवल सबसे वरिष्ठ रिपोर्टरों को ही सरकारी चैनलों पर उनकी कवरेज़ के लिए भेजा जाता था.

मैंने अपने वरिष्ठों से मामूली बातों पर रिपोर्टरों के निलंबन और पदावनति की कई कहानियां सुन रखी थीं. मसलन, सही एंगल से प्रधानमंत्री की तस्वीर न लेना.

लेकिन चैनल में सबसे जूनियर रिपोर्टर के रूप में मुझे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की बीट कवर करने का मौका मिला.

मुझे कभी भी उनकी ओर से या उनके टीम के सदस्यों की ओर से भेदभाव या दबाव का सामना नहीं करना पड़ा. ना ही कभी मुझे ये निर्देश दिए गए कि किस शॉट और साउंड बाइट को इस्तेमाल करना है, जोकि पिछले प्राधानमंत्रियों के दौर में आम बात हुआ करती थी.

मुशर्रफ़ के कवरेज में जो भी मैंने किया उसपर कभी मुझसे सवाल जवाब नहीं किया गया.

उन्होंने मीडिया को जो आज़ादी दी, बाद में सत्ता से उनकी विदाई का वही कारण बना.

लेकिन उनकी कमियों और विवादित नीतियों के बावजूद, इस बात पर सभी सहमत थे कि वो सहनशील और देश के सबसे लोकतांत्रिक जनरल थे.

Presentational grey line

ये भी पढ़ेंः-

Presentational grey line

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)