परवेज़ मुशर्रफ़: सेना प्रमुख बनने से लेकर तख़्तापलट और फिर पाकिस्तान छोड़ने तक का सफ़र

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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
पाकिस्तान में सैन्य तख़्तापलट के बाद सत्ता में आए पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व सैन्य प्रमुख (सेवानिवृत्त) परवेज़ मुशर्रफ़ का रविवार को दुबई में निधन हो गया. वो 79 साल के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे.
पिछले साल जब परवेज़ मुशर्रफ़ के निधन की अफ़वाह सोशल मीडिया पर फैली थी, तब उनके परिवार ने सेहत की जानकारी देते हुए बताया था कि परवेज़ मुशर्रफ़ के अंगों ने काम करना बंद कर दिया है और उनकी हालत में सुधार होना मुश्किल है.
परवेज़ मुशर्रफ़ का इलाज दुबई में चल रहा था. उन्हें एमीलॉयडोसिस नाम की एक जटिल बीमारी थी जिसमें इंसान के शरीर के अंग निष्क्रिय होने लगते हैं.
परवेज़ मुशर्रफ़ साल 2016 में इलाज़ के लिए ज़मानत मिलने के बाद से संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे थे.

ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव
परवेज़ मुशर्रफ़ की ज़िंदगी के पिछले दो दशक काफ़ी उतार-चढ़ाव वाले रहे.
साल 1999 में सत्ता में आने के बाद उन्हें मारने की कई कोशिशें हुईं. वो पाकिस्तान की सत्ता उस वक़्त संभाल रहे थे जब पश्चिमी देशों और इस्लामिक चरमपंथियों के टकराव के बीच पाकिस्तान फंस गया था.
लेकिन, उनकी पार्टी 2008 के चुनाव में जीत नहीं पाई और उन पर अवैध तरीक़े से देश के संविधान को निलंबित करने और आपातकाल लगाने का आरोप लगाया गया.
उनके सत्ता से हटने के 20 साल बाद अदालत ने उन्हें इन आरोपों के लिए उनकी ग़ैर-मौजूदगी में मौत की सज़ा सुनाई.
परवेज़ मुशर्रफ़ का जन्म 11 अगस्त 1943 को हुआ था. वो 1998 में नवाज़ शरीफ़ की सरकार में सेना प्रमुख बने थे. लेकिन, अगले ही साल उन्होंने देश की चुनी हुई सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया.
पाकिस्तान की बिगड़ती आर्थिक स्थिति, सुधारों को लेकर विवाद और कश्मीर संकट के कारण उस समय नवाज़ शरीफ़ की लोकप्रियता भी कम हो रही थी.

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1999 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में कश्मीर के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा करने की कोशिशें विफ़ल होने को लेकर पाकिस्तान में आलोचना हो रही थी और सेना सारा दोष अपने ऊपर नहीं लेना चाहती थी.
ऐसे में जब नवाज़ शरीफ़ मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख के पद से हटाना चाहते थे तो उन्होंने बेहद चालाकी से सैन्य तख़्तापलट ही कर दिया.
अमेरिका और चरमपंथियों के बीच संघर्ष
अमेरिका में 9/11 के चरमपंथी हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 'आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई' में पाकिस्तान से समर्थन मांगा था.
इसका सीधा मतलब था चरमपंथी संगठनों अल-क़ायदा और तालिबान के लड़ाकों से टकराव. ये वो संगठन हैं जिनके साथ संबंधों को लेकर पाकिस्तानी सेना पर आरोप लगते रहे हैं.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति होने के नाते परवेज़ मुशर्रफ़ के लिए वो समय किसी रस्सी पर चलने जैसा था. उन्हें चरमपंथियों पर हमले के लिए अमेरिकी दबाव और पाकिस्तान में अमेरिका विरोधी इस्लामिक आवाज़ों के बीच संतुलन बनाना था.
उस समय अफ़ग़ानिस्तान का मसला भी बना हुआ था.

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नेटो और अफ़ग़ानिस्तान सरकार मुशर्रफ़ पर बार-बार ये आरोप लगा रहे थे कि वो अल-क़ायदा और तालिबान समर्थकों को रोकने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं कर रहे हैं.
अमेरिका में 9/11 हमले की ज़िम्मेदारी लेने वाले चरमपंथी ओसामा बिन लादेन के साल 2011 में पाकिस्तान में पाए जाने के बाद मुशर्रफ़ पर और ज़्यादा उंगलियां उठने लगीं.
अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन सालों से पाकिस्तानी सैन्य अकादमी के आसपास रह रहा था और मुशर्रफ़ सालों से इसकी जानकारी ना होने की बात कह रहे थे.

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सत्ता से विदाई
परवेज़ मुशर्रफ़ का कार्यकाल न्यायपालिक के साथ टकराव को लेकर भी जाना जाता है. इसमें वो विवाद भी शामिल है जब मुशर्रफ़ सेना प्रमुख रहते हुए राष्ट्रपति भी बने रहना चाहते थे.
साल 2007 में, उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिखार मोहम्मद चौधरी को पद से हटा दिया, जिसके चलते देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे.
इसके कुछ महीनों बाद लाल मस्जिद की घटना हुई. इस्लामाबाद में एक सैन्य अभियान के तहत लाल मस्जिद और उसके आसपास के इलाक़े को कब्ज़े में ले लिया. इसमें करीब 100 लोगों की जान चली गई थी.
लाल मस्जिद के मौलवियों और छात्रों पर शरिया क़ानून लागू करने के लिए सरकार के ख़िलाफ़ एक आक्रामक अभियान चलाने के आरोप लगाए गए थे.
इस घटना के जवाब में पाकिस्तान तालिबान का गठन हुआ और देश में कई हमलों और बम धमाकों का दौर शुरू हो गया. इसमें हज़ारों लोगों की जान चली गई.
जब नवाज़ शरीफ़ निर्वासन के बाद साल 2007 में पाकिस्तान लौटे तो मुशर्रफ़ शासन के अंत की शुरुआत हो गई.
मुशर्रफ़ ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी लेकिन इसके बाद फरवरी 2008 में हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी हार गई. छह महीनों बाद उन्होंने महाभियोग से बचने के लिए पद से इस्तीफ़ा दे दिया और देश छोड़कर चले गए.
माना जाता है कि लंदन और दुबई में रहते हुए परवेज़ मुशर्रफ़ ने दुनियाभर में लेक्चर्स देकर लाखों डॉलर की कमाई की थी. उन्होंने पाकिस्तान की सत्ता में वापसी की उनकी इच्छा को कभी नहीं छुपाया.

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जब लौटे पाकिस्तान
मार्च 2013 में आम चुनाव के लिए वो नाटकीय तरीक़े से पाकिस्तान लौटे लेकिन वो गिरफ़्तार कर लिए गए.
उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया गया और उनकी पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (साल 2010 में मुशर्रफ़ ने ये पार्टी बनाई थी) की चुनाव में बुरी तरह हार हुई.
इसके तुरंत बाद उन पर कई मामले चलाए गए. उन पर पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को पर्याप्त सुरक्षा ना देने का आरोप भी लगा. भुट्टो की साल 2007 में तालिबानी हमले में हत्या कर दी गई थी. इस घटना ने पूरी दुनिया और पाकिस्तान को सकते में डाल दिया था.
साल 2010 में संयुक्त राष्ट्र की जांच में जनरल मुशर्रफ़ पर बेनज़ीर भुट्टो को पर्याप्त सुरक्षा देने में 'जानबूझकर विफ़ल' होने का आरोप लगाया गया.
इसी साल उन्हें साल 2007 में संविधान को निलंबित करने के लिए राजद्रोह के लिए दोषी ठहराया गया.
लेकिन, जिस देश में लंबे समय तक सैन्य शासन रहा हो वहां मुकदमा चलना इतना आसान नहीं होता. इसलिए, सरकार ने मुशर्रफ़ के मामले पर सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन किया.
ये सुनवाई पांच सालों तक चली और आख़िर में तीन न्यायाधीशों की बेंच ने उन्हें राजद्रोह का दोषी पाया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई.
लेकिन, जनवरी 2020 में लाहौर हाईकोर्ट ने उन्हें दी गई मौत की सज़ा रद्द कर दी थी. कोर्ट ने राजद्रोह केस में मौत की सज़ा सुनाने वाली विशेष अदालत को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दे दिया था. मुशर्रफ़ ने विशेष अदालत के फ़ैसले को चुनौती दी थी.
हाालांकि, अब परवेज़ मुशर्रफ़ बीमारी के चलते खुद ये दुनिया छोड़कर चले गए हैं.
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