आख़िरी समय में जनता का विश्वास खो बैठे थे जनरल परवेज़ मुशर्रफ़

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ का निधन हो गया है.
पाकिस्तानी सेना ने बीबीसी संवाददाता शुमायला जाफ़री से उनके निधन की पुष्टि की है और कहा है कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के निधन पर दुख है.
1998 में वो पाकिस्तानी सेना के चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ बने और 1999 में हुए एक तख्तापलट के बाद वो देश के चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव बने थे.
12 अक्तूबर, 1999 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने घोषणा की कि वो अपने सेनाध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्ऱफ़ को रिटायर कर रहे हैं लेकिन शाम होने तक ख़ुद शरीफ़ सत्ता से बेदख़ल हो गए.
कोलंबो से कराची आने वाले पीआईए के विमान पर सवार मुशर्रफ़ को ये अंदाज़ा नहीं था कि ज़मीन पर क्या ड्रामा हो रहा है, लेकिन विमान के ज़मीन पर उतरने के कुछ घंटों के अंदर ही मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के मुख्य कार्यकारी का पद संभाल लिया.
मुशर्ऱफ़ का जन्म 11 अगस्त, 1943 को अविभाजित भारत में दिल्ली में हुआ था. उनके बारे में कहा जाता है कि 1947 में दिल्ली से कराची जाने वाली आख़िरी ट्रेन पर सवार होकर उनका परिवार पाकिस्तान गया था. कुछ सालों बाद जब उनके पिता को तुर्की में तैनात किया गया तो वो भी उनके साथ तुर्की गए. वहां उन्होंने रवानगी से तुर्की भाषा बोलनी सीखी.
पाकिस्तान के शासकों पर बहुचर्चित किताब 'पाकिस्तान एट द हेल्म' लिखने वाले तिलक देवेश्वर लिखते हैं, "मुशर्ऱफ़ के पूरे करियर के दौरान उनके दिल में तुर्की के लिए ख़ास जगह रही. जब उन्हें अपने करियर के मध्य में एक ट्रेनिग कोर्स करने का मौक़ा मिला तो उन्होंने तुर्की को चुना हांलाकि उसके लिए अमेरिका भी एक विकल्प था."
"वो ज़िंदगी भर तुर्की के नेता मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क को अपना आदर्श मानते रहे. एक बार तुर्की की सैनिक अकादमी का मुआयना करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि जब 1974 में तुर्की ने साइप्रस पर हमला किया था तो वो तुर्की की तरफ़ से एक वॉलंटियर के तौर पर लड़ना चाहते थे."

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एक लापरवाह और अनुशासनहीन सैनिक
मुशर्रफ़ ने अपनी आत्मकथा 'ऑन द लाइन ऑफ़ फ़ायर' में स्वीकार किया कि वो अपने फ़ौजी करियर के दौरान एक अनुशासनहीन, बात-बात पर लड़ जाने वाले, ग़ैर-ज़िम्मेदार और लापरवाह सैनिक थे. 1965 के युद्ध से तुरंत पहले भारत के ख़िलाफ़ युद्ध के बादल घिर आने के बावजूद वो ज़बरदस्ती छह दिन की छुट्टी पर चले गए थे जिसे उनके कमांडिग अफ़सर ने नामंज़ूर कर दिया था.
उनके ख़िलाफ़ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी लेकिन 1965 की लड़ाई शुरू होने की वजह से वो बच निकले थे. अपने पूरे करियर को दौरान अपने साथियों से लड़ने, अफ़सरों का आदेश न मानने और अनुशासनहीनता के लिए कई बार सज़ा दी गई. उनके सैनिक करियर में कई बार उनकी जान जाते-जाते भी बची.
वर्ष 1988 में उन्हें जनरल ज़िया का सैनिक सचिव बनाया गया लेकिन उन्होंने वो पद स्वीकार नहीं किया. अगर वो ज़िया के सैनिक सचिव बन जाते तो वो ज़िया के साथ उस सी-130 विमान में ज़रूर होते जो बहावलपुर में क्रैश हो गया था और जिसमें ज़िया और अमेरिकी राजदूत समेत सभी लोग मारे गए थे.

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राष्ट्रपति बनने पर हत्या के कई प्रयास
बाद में जब वो राष्ट्रपति बन गए तो उनकी हत्या के कई प्रयास किए गए. 14 दिसंबर, 2003 को जब वो हवाई अड्डे से अपने निवास स्थान जा रहे थे उनकी कार के पीछे एक धमाका हुआ.
जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैं अपने दाएं बैठे हुए सैनिक सचिव मेजर जनरल नदीम ताज से बात कर रहा था कि मैंने अपने पीछे ज़ोरदार धमाका सुना. मेरी कार के चारों पहिये हवा में थे. मैं समझ गया था कि ये एक बड़े बम का धमाका है क्योंकि उसने तीन टन की मर्सिडीज़ कार को हवा में उछाल दिया था.' इसके 11 दिन बाद यानि 25 दिसंबर को जनरल मुशर्रफ़ की हत्या का एक और प्रयास किया गया."
मुशर्ऱफ़ ने लिखा, "जब मैं इस्लामाबाद कनवेंशन सेंटर में भाषण देने के बाद अपने घर लौट रहा था तो करीब सवा बजे एक कान फाड़ देने वाला धमाका हुआ. मैंने तुरंत अपनी ग्लौक पिस्टल निकाल ली जो हमेशा मेरे पास रहती थी और ड्राइवर जान मोहम्मद से चिल्ला कर कहा, 'दबा, दबा.' मेरी कार के चारों पहिए फट गए थे. मेरा ड्राइवर किसी तरह रिम के सहारे कार को चलाता हुआ मुझे मेरे घर तक ले आया. जब कार घर में घुसी तो उसमें से धुँआ निकल रहा था और उसके बोनट पर मारे गए लोगों के मांस के टुकड़े चिपके हुए थे. इस विस्फोट में 14 लोगों की जान गई थी."
बिना सोचे-समझे फ़ैसला लेने वाले कमांडो
सेना में तैनाती के दौरान मुशर्रफ़ की छवि एक बातूनी और स्वच्छंद व्यक्ति की रही. उन्हें एक ऐसा सैनिक माना जाता था जो ज़रूरत से ज़्यादा जोखिम उठाने के लिए हमेशा तैयार रहता था.
पाकिस्तान की राजनयिक और मंत्री रही आबिदा हुसैन अपनी क़िताब 'पावर फ़ेल्योर : द पॉलिटिकल ओडीसी ऑफ़ अ पाकिस्तानी वुमैन' में लिखती हैं, "मुशर्रफ़ एक गर्म दिमाग के कमांडो के रूप में कुख्यात थे. वो अक्सर बिना सोचे समझे ग़ैर ज़िम्मेदारी वाले फ़ैसले लेते थे.' लेकिन दूसरी तरफ़ बेनज़ीर भुट्टो उनके बारे में अच्छी राय रखती थीं."
श्याम भाटिया अपनी किताब 'गुडबाई शहज़ादी : अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ बेनज़ीर भुट्टो' में लिखते हैं, "तुर्की से आए प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात के दौरान बेनज़ीर की मुलाकात मुशर्रफ़ से हुई थी. मुशर्रफ़ उस समय ब्रिगेडियर हुआ करते थे और तुर्की भाषा के दुभाषिए के तौर पर काम कर रहे थे. बेनज़ीर ने उनको तीव्र बुद्धि और स्मार्ट अफ़सर पाया था.' मुशर्रफ़ को हमेशा इस बात का गर्व रहा कि वो कमांडो हैं. नब्बे के दशक के शुरू में वो डायरेक्टर जनरल, मिलिट्री ऑपरेशन के पद पर तैनात थे और वर्ष 1995 में उन्हें लेफ़्टिनेंट जनरल बनाया गया था."

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मुशर्ऱफ़ ने कारगिल के मामले में नवाज़ शरीफ़ को अंधेरे में रखा
जब नवाज़ शरीफ़ ने जनरल करामत को बर्ख़ास्त किया तो जनरल मुशर्रफ़ वरीयता सूची में तीसरे स्थान पर थे. लेकिन शरीफ़ ने उनसे सीनियर जनरल अली कुली ख़ाँ और ख़ालिद नवाज़ को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्हें सेनाध्यक्ष बना दिया था. इसके पीछे संभवत: नवाज़ शरीफ़ की सोच ये रही होगी कि मुहाजिर होने के नाते मुशर्ऱफ़ को पंजाबी लोगों से भरी सेना की वफ़ादारी मिलने में दिक्कत होगी. लेकिन नवाज़ शरीफ़ का फेंका पासा उल्टा पड़ा जब मुशर्ऱफ़ ने उन्हें विश्वास में लिए बग़ैर कारगिल पर हमला करने की योजना बना ली.
हांलाकि अपनी आत्मकथा 'इनमु द लाइन ऑफ़ फ़ायर' में मुशर्ऱफ़ ने इन आरोपों का खंडन करते हुए लिखा कि उन्होंने शरीफ़ को इस अभियान के बारे में 29 जनवरी को स्कर्डू में और 5 फ़रवरी को मेल में ब्रीफ़ किया था. इसके अलावा डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन ने उन्हें 17 मई, 2 जून और 22 जून को जानकारी दी थी.
लेकिन सुहैल वराइच अपनी क़िताब 'ग़द्दार कौन ? नवाज़ शरीफ़ की कहानी उनकी ज़ुबानी' में लिखते हैं, "नवाज़ शरीफ़ का कहना था कि 29 जनवरी को उनको सेना द्वारा दी गई ब्रीफ़िग पर्यटन के बारे में थी और 5 फ़रवरी की ब्रीफ़िग खुले आसमान के नीचे हुई थी जिसमें सड़क परियोजनाओं पर चर्चा हुई थी. वो ऐसी जगह नहीं थी जहां कारगिल जैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा हो सकती थी."
बाद में पूर्व विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ ने अपनी किताब 'बिटवीन ड्रीम्स एंड रियेलटीज़ सम माइलस्टोन्स इन पाकिस्तान्स हिस्ट्री' में लिखा, "उस बैठक में मैं भी मौजूद था, वहां कग़ान घाटी में वैकल्पिक सड़क बनाने का ज़िक्र ज़रूर हुआ था लेकिन कारगिल का तो नाम तक नहीं लिया गया था. पाकिस्तान के विदेश मंत्री के तौर पर मुझे 17 मई तक कारगिल ऑपरेशन की कोई जानकारी नहीं थी और न ही मुझसे इसके कूटनीतिक परिणामों के बारे में कोई राय ली गई थी."
न्यायपालिका से झगड़ा लेना भारी पड़ा
परवेज़ मुशर्ऱफ़ ने आठ वर्षों तक पाकिस्तान पर शासन किया. मुशर्रफ़ के एक जीवनीकार मुर्तज़ा राज़वी अपनी किताब 'मुशर्रफ़ द इयर्स इन पॉवर' में लिखा, 'मुशर्ऱफ़ का पतन 9 मार्च 2007 को हुआ जब उन्होंने पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिकार मौहम्मद चौधरी से झगड़ा मोल ले लिया. कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि उनके जीवन में ढलान तब शुरू हुआ जब उन्होंने 3 नवंबर, 2007 को इमरजेंसी लगाई जबकि कुछ और लोगों की राय है कि मुशर्रफ़ की सत्ता पर पकड़ तब ढीली हुई जब उन्होंने 15 नवंबर, 2007 को सेना की वर्दी उतारी.
कुछ लोग बलूच नेता नवाब अकबर बुग्ती की हत्या को मुशर्रफ़ के पतन की शुरुआत मानते हैं. मुशर्रफ़ के नज़दीकी दोस्त रहे कर्नल अकबर अली शरीफ़ का मानना है कि "अप्रैल 2002 में कराया गया बोगस जनमत संग्रह इसकी मुख्य वजह था. इस जनमत संग्रह के आधार पर ही उन्होंने अपनेआप को निर्वाचित राष्ट्रपति घोषित किया था. जिस किसी ने भी उनको इसकी सलाह दी वो उनका असली दोस्त नहीं था."

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आगरा शिखर सम्मेलन हुआ नाकामयाब
भारत के खिलाफ़ कारगिल युद्ध की शुरुआत करने वाले मुशर्रफ़ ने 2001 में आगरा शिखर बैठक में भाग लेने से कोई गुरेज़ नहीं किया. लेकिन भारत आने से पहले उन्होंने राष्ट्रपति रफ़ीक तारड़ को अपने पद से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया. इसके बाद उन्होंने अपने खुद के राष्ट्रपति बनने की घोषणा कर दी, वो भी सेनाध्यक्ष का पद छोड़े बिना. लेकिन इस शिखर बैठक का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला क्योंकि भारत और पाकिस्तान कश्मीर और भारतीय सीमा के अंदर चरमपंथियों को पाकिस्तान के कथित समर्थन के मद्दे पर अपने मतभेद सुलझाने में असफल रहे.
मुर्तज़ा राज़वी लिखते हैं, "इस बैठक के दौरान नाश्ते पर भारतीय संपादकों से मुशर्ऱफ़ की दो टूक बातचीत को पाकिस्तान में तो बहुत पसंद किया गया लेकिन संभवत: इसकी वजह से ही भारत के शीर्ष नेताओं से उनकी बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई.' मुशर्ऱफ़ ने अपनी आत्मकथा में बातचीत असफल होने का ठीकरा बिना नाम लिए गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी पर फोड़ा."
आडवाणी ने अपनी आत्मकथा 'माई कंट्री, माई लाइफ़' में इसके लिए उल्टा जनरल मुशर्रफ़ को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने लिखा कि "भारतीय प्रतिनिधिमंडल को अजीब-सा दृश्य देखने को मिला जब पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने हमारी ही ज़मीन पर कश्मीर और सीमापार के आतंकवाद पर अपने जुझारू विचार भारतीय मीडिया के सामने रखे, वो भी उस समय जब वो बंद कमरे में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ बातचीत कर रहे थे."
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार ख़ालिद अहमद का मानना है कि "मुशर्ऱफ़ की सबसे बड़ी उपलब्धि है प्रेस को आज़ादी देना. उन्होंने प्रेस को जितनी आज़ादी दी उतनी उनसे पहले के तथाकथित लोकतांत्रिक शासकों ने भी नहीं दी. उन्होंने जनरल ज़िया के बनाए गए इस्लामी कानूनों को ख़त्म किया. एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए उनका शासनकाल सबसे अच्छा समय था. आप खड़े होकर उनके ख़िलाफ़ कुछ भी कह सकते थे और उनमें उसे बर्दाश्त करने की क्षमता थी."
भारत के मशहूर पत्रकार करण थापर को परवेज़ मुशर्रफ़ का कई बार इंटरव्यू करने का मौक़ा मिला था. अपनी आत्मकथा 'डेविल्स एडवोकेट' में करण थापर लिखते हैं, "एक इंटरव्यू में मैंने उनसे कई मुश्किल सवाल पूछे. मैंने उनसे पूछा आपने पाकिस्तानी सेना का सेनाध्यक्ष रहते हुए जनतांत्रिक तरीके से चुने हुए प्रधानमंत्री को उखाड़ फेंका और फिर भी आप कहते हैं कि आपके इरादे नेक हैं. इससे विचित्र बात और क्या हो सकती है?"
"उन पर इस तोहमत भरे सवाल का कोई असर नहीं हुआ. जनरल इस सवाल पर मुस्कुरा भर दिए. कॉमर्शियल ब्रेक के दौरान माहौल को ख़ुशनुमा बनाए रखने के लिए मैंने उनकी टाई की तारीफ़ कर दी. उन्होंने मुझसे पूछा क्या ये टाई वाकई आपको पसंद है ? मैंने कहा, बिल्कुल. ये बहुत आकर्षक है. जैसे ही इंटरव्यू ख़त्म हुआ जनरल मुशर्रफ़ ने वो टाई उतार कर मेरे हाथ में रख दी. मैं मना करता ही रह गया कि वो मैंने ऐसे ही कह दिया था. मेरा ये मतलब नहीं था कि आप अपनी टाई उतार कर मुझे दे दें. लेकिन मुशर्रफ़ नहीं माने. जब मैंने उनसे हंसते हुए मज़ाक किया, 'अगर मुझे पता होता कि आप हर मांगी हुई चीज़ दे देते हैं तो मैं आपका सोने का टाई पिन माँगता.' जनरल ने ठहाका लगाते हुए कहा, 'हां अगर आप को जूते पसंद आए तो वो भी आपको मिल जाते !' "

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मुशर्ऱफ़ के ख़िलाफ़ पांच मामले दर्ज
जनरल मुशर्रफ़ उदारवादी मूल्यों को मानने वाले थे. बाहरी दुनिया के नेताओं से उनका 'कनेक्ट' पाकिस्तान के पूर्व शासनाध्यक्षों से बेहतर था. ख़ालिद अहमद कहते हैं, "वो खुले विचारों वाले शख़्स थे. वो एक सैनिक के रूप में ठीक-ठाक थे लेकिन एक असैनिक शासक के रूप में वो ख़तरनाक व्यक्ति थे. न्यायपालिका से पंगा लेना उन्हें भारी पड़ा था. उसी तरह कारगिल में घुस कर भारत को हराने के सपने देखना भी व्यवहारिक नहीं था.' लेकिन आख़िर में ऐसी परस्थितियाँ बन गईं जिनकी वजह से उन्हें अपना देश छोड़ कर लंदन में शरण लेनी पड़ी."
उनके ख़िलाफ़ पांच मामले दर्ज किए गए, वर्ष 2007 में जजों की गिरफ़्तारी, इस्लामाबाद में लाल मस्जिद का आपरेशन, बेनज़ीर भुट्टो और अकबर बुग़ती की मौत और आपातकाल की घोषणा जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई, 2009 को अवैध घोषित कर दिया. लेकिन इसके बावजूद वो मई, 2013 में होने वाले चुनाव लड़ने पाकिस्तान पहुंचे. चार चुनाव क्षेत्रों से उनके पर्चे अस्वीकार कर दिए गए और 21 अप्रैल, 2013 को उन्हें गिरफ़्तार कर घर में ही नज़रबंद कर दिया गया. उनपर देश द्रोह का मुक़दमा भी चला. लेकिन सरकार की मदद से वो एक बार देश छोड़ने में कामयाब हो गए.
जनता का खोया समर्थन
लेकिन उनमें एक अच्छी बात ये थी कि वो भ्रष्ट नहीं थे. वो अपने बल पर सेना के ऊँचे पद पर पहुंचे थे. लेकिन उन्हें ये साफ़ नहीं था कि वो करना क्या चाहते हैं. पाकिस्तान की मशहूर रक्षा विश्लेषक और मिलिट्री इंक पुस्तक की लेखिका आयशा सिद्दीका से एक बार सवाल पूछा गया था, सत्ता में रहने के दौरान जनरल मुशर्रफ़ की सबसे बड़ी ग़लती क्या थी?
उनका जवाब था, सत्ता में बने रहना. सभी जनरल उन जैसी गलतियां करते हैं. वो ये गलती करने वाले पहले जनरल नहीं थे. जिस जगह वो पहुंचे थे वहां से बाहर निकलना किसी भी जनरल के लिए मुश्किल होता है. आख़िर में उनकी सारी राजनीतिक वैधता और विश्वस्नीयता समाप्त हो गई थी.
सेना को देश के हालात की रिपोर्ट अपने सैनिक से मिलती है. छुट्टी से आने के बाद वो अपने अफ़सरों को बताता है कि आम जनता सरकार के बारे में क्या सोच रही है. सैनिकों के रिपोर्ट मिलने के बाद सेना ने मुशर्रफ़ से अपनेआप को दूर करना शुरू कर दिया था. उसके अलावा सेना के नेतृत्व में परिवर्तन भी हुआ था जिसे उन्होंने खुद अंजाम दिया था और फिर अमेरिका की तरफ़ से भी सेना पर दबाव था जिसकी वजह से उन्हें जाना पड़ा.
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