पाकिस्तान: मुशर्रफ़ पर फ़ैसले के बाद फौज और न्यायपालिका में टकराव?

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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
जब भारत में एक तरफ़ नागरिकता क़ानून को लेकर मीडिया में बहस जारी थी तभी पड़ोसी देश पाकिस्तान से आई एक ख़बर ने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा.
पाकिस्तान के सेना प्रमुख और राष्ट्रपति रहे जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को देशद्रोह के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई.
साल 2007 में पाकिस्तान के संविधान को निलंबित कर देश में आपातकाल लागू करने के इलज़ाम में जनरल मुशर्रफ़ को कसूरवार ठहराया गया था.
इस्लामाबाद के स्पेशल कोर्ट ने पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 6 के तहत पूर्व सैनिक तानाशाह को मौत की सज़ा सुनाई.
इस प्रावधान के अनुसार जो कोई भी देश के संविधान को निष्प्रभावी करता है, या पलट देता है, या फिर निलंबित करता है या थोड़े समय के लिए ही सही इसे रोक देता है तो उसे देशद्रोह के लिए कसूरवार माना जाएगा और इसके लिए अपराधी को सज़ा-ए-मौत या उम्र क़ैद की सज़ा दी जाएगी.

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ताक़तवर सैनिक प्रतिष्ठान
इस सिलसिले में 17 दिसंबर को आए एक छोटे से आदेश ने उस पाकिस्तान में हंगामा ही बरपा दिया जहां ताक़तवर सैनिक प्रतिष्ठान पर पर्दे के पीछे से हुकूमत करने का इलज़ाम लगता रहा है.
पाकिस्तान के ज़्यादातर सेना प्रमुखों ने तख़्तापलट के बाद सीधे शासन किया या फिर चुनी हुई सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश की.
जनरल मुशर्रफ़ ने तो बग़ावत के बाद मुल्क की कमान ही अपने हाथ में ले ली थी.
हालांकि इस दफा ये पहली बार हुआ है कि किसी पूर्व सेना प्रमुख को गद्दारी के आरोप में दोषी पाया गया और इसके लिए उन्हें मृत्यु दंड की सज़ा दी गई.
सोशल मीडिया पर जंग
फ़ैसला आने के बाद मुशर्रफ़ के चाहनेवालों और उनसे नफ़रत करने वालों के बीच सोशल मीडिया पर एक तरह से जंग ही छिड़ गई.
बलूचिस्तान से आने वाले राजनेता अख़्तर मेंगाल ने ट्विटर पर लिखा, "जिस शख़्स ने हमें हमें गद्दार कहा था, उसे अदालत ने देशद्रोही घोषित कर दिया. ये बलूचिस्तान के लोगों के लिए एक ऐतिहासिक फ़ैसला है. उनकी बर्बरता के भुक्तभोगी रहे हज़ारों लोगों के लिए ये उम्मीद की किरण भी है."
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फेरीहा नाम की एक जर्नलिस्ट ने पूछा, "संविधान के साथ खेलने वाले क्या मुशर्रफ़ ही अकेले थे? उन जजों का क्या जिन्होंने उनकी हर फ़ैसले पर मुहर लगाई थी? क्या आप उनमें से कुछ का नाम ले सकते हैं और हमें ये याद दिला सकते हैं कि वे कौन थे?"
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रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय में मुशर्रफ़ के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देने के लिए आला फौजी अफ़सरों को एक ख़ास बैठक बुलानी पड़ी.
इस बैठक के कुछ ही घंटों के भीतर आईएसपीआर (सेना के जनसंपर्क विभाग) ने एक बयान जारी कर कहा, "जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के बारे में स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले से पाकिस्तान के सशस्त्र बलों से जुड़े हर शख़्स को तकलीफ़ पहुंची हैं."
इस बयान में कहा गया कि देश की सुरक्षा के लिए युद्ध लड़ चुके पूर्व सेना प्रमुख यकीनन गद्दार नहीं हो सकते हैं.
संवैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा
फ़ैसले की आलोचना करते हुए सेना ने अपने बयान में आगे कहा, "ऐसा लगता है कि वाजिब क़ानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. पूर्व सेना प्रमुख को अपने बचाव के बुनियादी अधिकार के इस्तेमाल का मौका नहीं दिया गया."
बयान के आख़िर में ये कहा गया कि पाकिस्तान के सशस्त्र बलों को ये उम्मीद है कि इंसाफ़ किया जाएगा.
अतीत में पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक मुद्दों पर बयान जारी करते रहे हैं, भले ही ये बातें उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा न रही हों.
लेकिन इस बार बयान देने के लिए जो शब्द चुने गए, वो बेहद तल्ख़ थे.
संदेश जोरदार और स्पष्ट था कि पाकिस्तान के मिलिट्री इस्टैबलिशमेंट ने पूर्व सेना प्रमुख के पीछे अपनी ताक़त लगा दी है.
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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर विवाद
परवेज़ मुशर्रफ़ पर आए फ़ैसले का विस्तृत ब्योरा दो दिनों बाद सार्वजनिक किया गया. इससे एक नए विवाद को हवा मिली और इस मुद्दे को लेकर पहले से बंटी हुई लोगों की राय में और ध्रुवीकरण देखा गया.
तीन सदस्यों वाली बेंच के प्रमुख जस्टिस वक़ार सेठ ने जजमेंट के पैरा 66 में लिखा, "अगर मुशर्रफ़ अपनी गिरफ़्तारी से पहले मर जाते हैं तो उनके शव को मुल्क लाया जाए. उस शव को इस्लामाबाद के डी चौक पर तीन दिनों तक लटकाकर रखा जाए."
ये डी चौक पाकिस्तान की संसद के सामने का मशहूर गोलंबर है. पाकिस्तान की फौज ने इस पर एक बार फिर प्रतिक्रिया दी. इस बार सेना के बयान में फ़ैसले को इंसानियत और इस्लाम के ख़िलाफ़ बताया गया.
पाकिस्तान की सरकार ने कहा कि जुडिशल काउंसिल के सामने जस्टिस वक़ार सेठ के ख़िलाफ़ शिकायत की जाएगी. इतना ही नहीं सरकार ने परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ फ़ैसले को ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक करार दिया.
केंद्रीय मंत्री फवाद चौधरी ने कहा, "मुद्दा मुशर्रफ का नहीं है. पाकिस्तान की फौज और आईएसआई को सुनियोजित तरीके से टारगेट किया गया है. लबैक केस में पहले तो सेना को फंसाया गया, उसके बाद सेना प्रमुख के कार्यकाल विस्तार पर विवाद पैदा किया गया और अब एक लोकप्रिय पूर्व सेना प्रमुख को जलील किया जा रहा है."
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उन्होंने ये भी कहा कि अगर सेना कमज़ोर हुई तो मुल्क में अराजकता का माहौल हो जाएगा.
जैसे को तैसा
पाकिस्तान का बार काउंसिल भी इस मुद्दे पर खामोश नहीं रहा. उसने सेना और सरकार की प्रतिक्रिया को खारिज कर दिया.
बार काउंसिल की तरफ़ से जारी किए गए बयान में सेना की प्रतिक्रिया को अदालत की अवमानना करार दिया गया, "स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले की जिस तरह के सेना अधिकार आलोचना कर रहे हैं, उससे ये लगता है कि न्यायपालिका समेत दूसरी संस्थाओं के लिए उनके मन में कोई आदर नहीं है."
बार काउंसिल ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार, उनके मंत्रियों, क़ानून विभाग के अधिकारियों और ख़ासकर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल का रवैया इस बात की तस्दीक करता है कि सरकार चला रही पार्टी को सेना ने सत्ता सौंपी और इसकी कमान भी सेना के हाथ में है.
दिलचस्प बात ये थी कि पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों भी इमरान ख़ान की पीटीआई पार्टी पर सेना की मदद से सत्ता में आने का आरोप लगाती रही हैं.
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फ़ैसले का असर
पेशे से वकील हैदर इम्तियाज़ कहते हैं कि मुशर्रफ़ पर फ़ैसला अभूतपूर्व था और इसके दूरगामी परिणाम होंगे.
वे कहते हैं, "जिन्हें ये लगता था कि संविधान को निष्प्रभावी कर या निलंबित करके और ताक़त के ज़ोर पर मुल्क चलाएंगे और बच जाएंगे, ये फ़ैसला उन्हें आगे ऐसी कोशिश करने से रोकेगा."
"देश किसी की मर्जी से नहीं चलाया जा सकता है. संविधान की पवित्रता मायने रखती है."
राजनीतिक विश्लेषक यासिर लतीफ़ हमदानी ये मानते हैं कि सेना संविधान की फरमाबरदारी की कसम से बंधी हुई लेकिन इसके बावजूद वे अपनी हद पार कर जाते हैं.
यासिर कहते हैं कि न्यायपालिका के ख़िलाफ़ सेना का बयान ग़ैरमुनासिब था और इससे अदालत की अवमानना भी हुई.
लेकिन यासिर को यकीन है कि सेना के जनसंपर्कविभाग के महानिदेशक पर अवमानना कोई मुक़दमा नहीं चलेगा क्योंकि मौजूदा केंद्र सरकार कमज़ोर है और लाहौर के एक अस्पताल पर हुए हमले के बाद बार काउंसिल भी अपनी साख गंवा चुकी है.
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न्यायपालिका बनाम फौज
एक छोटे से झगड़े को लेकर लाहौर के सबसे बड़े हृदय रोग अस्पताल में वकीलों के एक गुट ने जिस तरह से हंगामा किया था, उसमें सरकार के दावे के मुताबिक़ तीन मरीजों की मौत हो गई थी.
यासिर लतीफ़ हमदानी कहते हैं, "वकीलों की लोकप्रियता इस समय अपने सबसे निचले स्तर पर है. इसलिए मुझे नहीं लगता है कि मुशर्रफ़ के मुद्दे पर उनके रुख को लेकर आम लोगों के बीच किसी तरह के समर्थन की भावना होगी."
हालांकि यासिर नजदीकी भविष्य में देश की संस्थाओं के बीच किसी तरह का टकराव भी नहीं देखते हैं.
"जो चीफ़ जस्टिस एक तबके के लिए चिंता का सबब बन सकते थे, वो अब रिटायर हो चुके हैं."
मुशर्रफ़ पर फ़ैसले के एक दिन बाद ही चीफ़ जस्टिस आसिफ़ सईद खोसा अपना कार्यकाल पूरा करके 20 दिसंबर, 2019 को रिटायर हो गए.
नए चीफ़ जस्टिस गुलज़ार अहमद ने पदभार ग्रहण कर लिया है.
यासिर लतीफ़ हमदानी की राय में सरकार मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ आए फ़ैसले के विवादास्पद पैराग्राफ़ लिखने वाले जज के ख़िलाफ़ कोई शिकायत नहीं दर्ज कराएगी ताकि देश की प्रमुख संस्थाओं के बीच टकराव की तात्कालिक वजहों को टाला जा सके.
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मुशर्रफ़ कहां हैं...
पूर्व सैनिक तानाशाह पर फ़ैसला स्पेशल कोर्ट ने उनकी ग़ैरमौजूदगी में ही सुनाया. परवेज़ मुशर्रफ़ साल 2016 से ही इलाज के लिए दुबई में हैं. उनका कहना है कि वे अस्पताल में हैं. उसी साल उन्हें पाकिस्तान में अदालतों के समन के बावजूद हाजिरी नहीं देने पर भगोड़ा घोषित कर दिया गया था.
मुशर्रफ़ पर आए फ़ैसले में अल्पमत की राय रखने वाले जज ने कहा कि संविधान में 2010 के संशोधन देशद्रोह की परिभाषा बदली गई थी और इसे पुरानी तारीख से लागू नहीं किया जा सकता है. मुशर्रफ़ को 2007 में किए गए उनके कामों के लिए दोषी ठहराया गया है.
पूर्व राष्ट्रपति के पास फ़ैसले के 30 दिनों के भीतर अपील करने का समय है.
अस्पताल से एक वीडियो स्टेटमेंट में जनरल मुशर्रफ़ ने कहा कि ये फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ बदला है.
मुशर्रफ़ की राजनीतिक पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने कहा है कि पूर्व राष्ट्रपति इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर करेंगे.
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