यूक्रेनः सेना में महिलाओं को जगह बनाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, हायलीन कोरबा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ यूक्रेनियन
पिछले पांच सालों से, यूक्रेन की सेना में महिलाओं की संख्या दोगुनी हो गई है. अब यूक्रेन की मिलिट्री में महिला स्नाइपर, गनर और टैंक क्रू का होना कोई अजूबा नहीं है. लेकिन आदमियों की इस दुनिया में महिलाओं को अपनी जगह बनाने के लिए अभी काफ़ी संघर्ष करना है.
"महिलाओं से सशंकित बर्ताव किया जाता है, जबकि युद्ध में तैनात आदमी को ख़ुद ब ख़ुद इज़्ज़त की नज़र से देखा जाता है."
मैरीना मोलोशना कहती हैं, "एक महिला पर लगातार इस बात का दबाव रहता है कि वो ख़ुद को साबित करे और पुरुषों की उम्मीदों पर ख़रा उतरे, कि उस पर भरोसा किया जा सके."
खारकीव इलाक़े में यूक्रेनी सेना के एक कॉम्बैट मिशन पर तैनात मोलोशना से बीबीसी ने बात की.
वो अपनी नई भूमिका को लेकर आत्मविश्वास से लबरेज़ हैं, हालांकि वो मानती हैं कि यूक्रेन की फौज में एक महिला सैनिक होना आसान नहीं है.
हमले के बाद, मोलोशना एक वॉलंटियर के रूप में मोर्चे पर भी गई थीं. उन्होंने कहा कि वो अपने देश की रक्षा के लिए कुछ और करना चाहती थीं और मारियुपोल को छोड़ते समय उन्हें अपराध भी महसूस हुआ. युद्ध से पहले उन्होंने मारियुपोल में पत्रकार के रूप में काम किया था.
रूसी कब्ज़े से पहले दक्षिण पूर्वी यूक्रेन के इस तटीय शहर में महीनों तक बहुत घमासान लड़ाई हुई थी.

इमेज स्रोत, Maryna Moloshna
सैन्य सूत्रों के अनुसार, पिछले पांच सालों से यूक्रेन की फौज में महिलाओं की संख्या दोगुनी होकर 40,000 हो गई है, जिनमें 5,000 से ज़्यादा फ्रंट लाइन पर हैं.
सेना में महिलाएं अभी काफ़ी समस्याओं कि शिकायत करती हैं, जैसे सिर्फ मर्दों को ध्यान में रख कर बनाए सैन्य हथियार से लेकर चलताऊ लैंगिक भेदभाव आदि.
लेकिन सेना में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है और यूक्रेनी समाज इसे स्वीकार करने लगा है.
लैंगिक मुद्दे पर यूक्रेनी थल सेना के कमांडर की सलाहकार ओकसाना ग्रिगोरियेवा कहती हैं, "सोवियत विघटन के तुरंत बाद ये बहुत रुढ़िवादी और मर्दवादी सेना हुआ करती थी. लेकिन अब सेना में बदलाव आ रहा है, यहां बराबरी आ रही है. वे अब वाक़ई ख़ुद को साबित कर सकती हैं."

इमेज स्रोत, Kostyantyn and Vlada Liberov
अफ़सर, टैंक क्रू और गनर
एक ग़ैर सरकारी यूक्रेनी थिंक टैंक राज़ुमकोव सेंटर की ओलेक्सी मेलनिक के अनुसार, 'पिछले 15 सालों में सेना में महिलाओं की भूमिका बहुत हद तक बदल चुकी है, केवल संख्या के मामले में ही नहीं, बल्कि गुणात्मक रूप से भी.'
पहले, महिलाओं को मुख्य तौर पर युद्ध के अलावा सैन्य गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाता था, जैसे- टेलीफ़ोन ऑपरेटर, टाइपिस्ट, कुक, मेडिकल आदि में.
लेकिन 2014 में जब डोनबास में युद्ध शुरू हो तो ये माहौल बदल गया. पहली बार बड़ी संख्या में महिलाएं वॉलंटियर बटालियनों में लड़ने के लिए मोर्चे पर गईं. वहां किसी ने भी नौकरशाही की खानापूरी पर ध्यान नहीं दिया.
वो याद करती हैं, "कुछ मामलों में महिलाओं ने स्नाइपर के रूप में लड़ाई की, जबकि हेडक्वार्टर में उनका नाम कुक या टाइपिस्ट के रूप में दर्ज था."
लेकिन साल 2018 में महिलाओं पर लगी कुछ पाबंदियों को क़ानूनी तौर पर हटा दिया गया. अब वे युद्ध के मोर्चे पर लड़ाई में भाग ले सकती हैं और पुरुष सैनिकों के बराबर ट्रेनिंग पा सकती हैं.
यूक्रेनी सेना में कमांडर, लेफ़्टिनेंट जनरल सेरही नाएव ने कहा, अब महिलाएं प्लाटून कमांडर के रूप में काम कर रही हैं, वो आर्टिलरी बैटरी और ड्रोन यूनिट में हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
उनके आंकड़ों के अनुसार, 2021 में देश की पहली महिला ब्रिगेडियर-जनरल तेतयाना ओस्टाशशेंको समेत, आधिकारिक पदों पर 8,000 से अधिक महिलाएं तैनात हैं. जनरल तेतयाना मेडिकल फ़ोर्सेज की कमांडर हैं.
ग्रिगोरियेवा कहती हैं, "अब तो कई पॉवरफ़ुल महिलाएं हैं. वे गन कमांडर हैं, प्लाटून कमांडर हैं, कई तो स्नाइपर हैं. यहां तक कि एक तो डीप सी डाइविंग इंस्ट्रक्टर है."
वो बताती हैं, "टैंक क्रू में कई महिलाएं हैं. वो पुरुषों के मुकाबले बहुत फुर्तीली और छोटी होती हैं और उनके लिए टैंक यूनिट में होना अधिक आसान है."
सैन्य अभियान की भूमिका में तैनात महिलाएं पुरुषों के मुकाबले मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिक शांत होती हैं और साथी सैनिक की मदद या टीम में एकजुटता बनाए रखने के मामले में वो अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं.

इमेज स्रोत, Reuters
जनता में छवि
सेना में शामिल होने वाली महिलाओं के प्रति यूक्रेन के समाज के नज़रिये में भी बदलाव आया है. कीएव-मोयला एकेडमी में जेंडर रिसर्चर और सोशियोलॉजिस्ट तमारा मार्टसेन्यूक इस मुद्दे पर आए दो सर्वे की तुलना करती हैं.
साल 2018 में कीएव इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशियोलॉजी द्वारा कराए गए एक अध्ययन में पाया गया कि सेना में पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार और मौके दिए जाने का 53% यूक्रेनियों ने समर्थन किया था.
इसके चार साल बाद इनफ़ोसैपियंस नामक एक रिसर्च एजेंसी ने पाया कि अब इसका समर्थन 80 प्रतिशत लोग करने लगे हैं.
मार्टसेन्यूक मानती हैं कि यूक्रेन में आठ साल तक युद्ध के माहौल ने महिला सैनिकों की छवि को बेहतर बनाया है. और इस साल रूस के चौतरफ़ा हमले के कारण अधिक से अधिक लोगों को सेना में लाने की ज़रूरत ने इस छवि को और सुधारा ही है.

इमेज स्रोत, Getty Images
हालांकि सेना में बड़े पैमाने पर महिलाओं की भर्ती का विचार रूस के हमले से पहले शुरू हुआ था.
साल 2021 के आख़िर में रक्षा मंत्रालय ने पेशों की एक ऐसी सूची जारी की जिसमें महिलाओं को सैन्य सेवा के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य था.
इस सूची कि ज़बरदस्त आलोचना हुई क्योंकि इसमें सामान्य पेशों जैसे- आईटी-विशेषज्ञ, पत्रकार, संगीतकार, सर्विस और विज्ञापनकर्ता जैसे पदों पर अनिवार्य भर्ती की शर्त थी.
ऐसे भी तथ्य हैं कि इस कदम के चलते कुछ यूक्रेनी विदेश से वापस लौटे ही नहीं.
हमले के तुरंत बाद अपनी छोटी बेटी के साथ ऑस्ट्रिया में रहीं, कीएव की साइकोलॉजिस्ट एन्ना मानती हैं कि उन्होंने यूक्रेन में लौटने में देरी की क्योंकि उन्हें ज़बरदस्ती भर्ती कर लिए जाने की आशंका थी.
वो कहती हैं, "मुझे सेना में भर्ती होने से डर नहीं लगता, बल्कि मैं निश्चितता और स्पष्ट प्रक्रिया का पालन चाहती थी."
अन्ना को लगता है, "अगर छोटे बच्चों से उनकी माएं छीन लेंगे तो हम एक सामान्य पीढ़ी को बड़ा नहीं कर सकते. हमें लंबे समय तक रहना है, राष्ट्र की बुनियाद उन्हीं महिलाओं पर टिकी होती है जो अपनी संस्कृति बच्चों को देती हैं."
आलोचना के बाद रक्षा मंत्रालय ने एक अक्टूबर 2022 तक महिलाओं के रजिस्ट्रेशन को स्थगित कर दिया और सूची में पेशों की संख्या को काफी कम कर दिया.
इसके बाद इसे अगले एक साल तक के लिए टाल दिया गया और महिला डॉक्टरों के अलावा, इसे विशेष तौर पर ऐच्छिक बना दिया गया.
हालांकि कुछ नेता महिलाओं के लिए पुरुषों से अलग नियम क़ायदे बनाने पर असहमत हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और ख़ुफ़िया मामलों की कमेटी की उपाध्यक्ष मैरियाना बेज़ुग्ला का कहना है कि महिलाओं के लिए नए ऐच्छिक नियम से वो सहमत नहीं हैं.
उनके मुताबिक, "लैंगिक समानता का मामला केवल बराबरी का अधिकार और बराबर के मौकों से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि ज़िम्मेदारियों से भी जुड़ा है. नागरिकों में कोई भेद नहीं होना चाहिए. अगर ऐच्छिक पंजीकरण को लागू किया जाता है तो ये पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए होना चाहिए."

इमेज स्रोत, Arm women now
'नियमों में अपवाद'
हालांकि यूक्रेन की सेना में महिलाओं की मौजूदगी अब कोई दुर्लभ घटना नहीं रही, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उनके साथ बराबरी का ही व्यवहार किया जाता है.
मैरीना मोलोशना स्वीकार करती हैं कि महिलाओं के प्रति उनके बटालियन कमांडर के बर्ताव से उन्हें बहुत खेदजनक हैरानी हुई.
वो कहती हैं, "हम कोई नैटो के मानकों की बात नहीं कर रहे हैं. हमें अक्सर लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और कभी कभी तो कुछ कमांडर महिलाओं को अपमानित भी करते हैं."
मोलोशना कहती हैं कि सेना में रोज़मर्रे की ज़िंदगी अभी भी पुरुष केंद्रित हैः महिलाएं पुरुषों जैसी ही वर्दी पहनती हैं, छोटे आकार का बूट पाना वाक़ई बड़ी चुनौती है. यही नहीं महिलाओं को फ़ीमेल या थर्मल अंडरवियर भी नहीं दिया जाता. उन्हें महिला हाईजीन से जुड़ी चीजें खुद खरीदनी पड़ती हैं जैसे कि पैड या टैंपून आदि.
सेना में महिलाओं की मदद करने वाले एक पब्लिक संगठन 'ज़ेमलाचकी' की सह संस्थापक सेनिया ड्रैगान्यूक कहती हैं, "हज़ारों महिला सैनिक इन समस्याओं को लेकर लगातार हमारे पास आती हैं."
वो कहती हैं, कि इस फंड से महिलाओं को मिलीट्री अंडरवियर, थर्मल अंडरवियर, वर्दी, हल्के सुरक्षा प्लेट, हेलमेट, हाइजीन प्रोडक्ट, महिलाओं के लिए ख़ासतौर पर बने फ़र्स्टएड किट उपलब्ध कराए जाते हैं.
वो बताती हैं, "जब आप जिम जाते हैं, आप हल्के कपड़े पहनना चाहते हैं ताकि दौड़ने और व्यायाम में आसानी हो. जब आप युद्ध के मोर्चे पर हैं और आपको लड़ाई जैसे काम अंजाम देने हों तो यहां सुरक्षा सबसे अहम हो जाता है."
संगठन मनोवैज्ञानिक मदद भी मुहैया कराता है, सिर्फ सक्रिय सैन्य कार्यवाही में तैनात महिलाओं को ही नहीं बल्कि उनको भी जो लैंगिक भेदभाव का सामना करती हैं.
अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इन समस्याओं की जानकारी है और वे सुधार का वायदा भी करते हैं.

इमेज स्रोत, Maryna Moloshna
बीते जुलाई में बीबीसी को पता चला कि महिलाओं के लिए एक स्पेशल सैन्य वर्दी दी जाएगी, लेकिन ये नहीं पता कि ये कब से दी जाएगी.
ओक्साना ग्रिगोरियेवा कहती हैं, "अभी तक सभी नैटो देशों के पास भी महिला वर्दी नहीं है. अमेरिका में उन्होंने महिला वर्दी बनाने की शुरुआत ही 2009 में की."
हालांकि ओक्साना मानती हैं कि इस मामले में यूक्रेन में तेज़ प्रगति हो रही है.
वो कहती हैं कि सैन्य बल, भेदभाव से निपटने और सैनिकों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं लेकिन महिलाओं को भी लैंगिक उत्पीड़न, भेदभाव जैसी समस्याओं को अपने सुपरवाइज़र जो कि जेंडर एडवाइज़र भी होता है, या रक्षा मंत्रालय के संज्ञान में लाना चाहिए.
ग्रिगोरियेवा बताती हैं कि एक फ़रवरी को अपना पद संभालने के बाद उन्हें सिर्फ दो शिकायतें मिली हैं, एक भेदभाव की और दूसरी उत्पीड़न की. दोनों की पूरी जांच की गई.
वो कहती हैं, "मैं महिलाओं को प्रोत्साहित करती हूं कि वो आगे आएं, हम उनकी मदद करेंगे. अगर कमांडरों को पता होगा कि उन्हें सज़ा मिलेगी तो वे उत्पीड़न या भेदभाव करने से डरेंगे. इसकी वजह से उनकी पदावनति हो सकती है या डांट पड़ सकती है."
मोलोशना कहती हैं कि सेना में जितनी अधिक महिलाएं होंगी उतनी ही तेज़ी से बदलाव भी आएंगे.
वो कहती हैं, "तब पहले से अधिक बराबरी और कम भेदभाव होगा. क्योंकि अभी तक हमारी संख्या कम है, ख़ासकर युद्ध अभियानों में. हालांकि कुछ साल पहले के मुकाबले अभी संख्या अधिक है लेकिन अभी भी सेना में महिलाओं की मौजूदगी को नियम का अपवाद ही माना जाता है."
ये भी पढ़ेंः-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















