ईरान में प्रदर्शन: 'बिलकिस बानो के साथ एकजुटता कहां है?'

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ईरान की 'मॉरैलिटी पुलिस' की हिरासत में 22 वर्षीय महिला महसा अमीनी की मौत के बाद वहां प्रदर्शन जारी हैं.
ये प्रदर्शन क़रीब एक महीने पहले उस वक़्त शुरू हुए जब कुर्दिश महिला महसा को कड़े हिजाब क़ानून के कथित उल्लंघन के लिए 'मॉरैलिटी पुलिस' ने हिरासत में लिया जहां वो कोमा में चली गईं. माहसा के परिवार का आरोप है कि उनकी पिटाई हुई. पुलिस इन आरोपों से इनकार करती है.
एक मानवाधिकार संस्था के मुताबिक़, सुरक्षा बलों की कार्रवाई में अभी तक कम से कम 201 लोगों की मौत हो चुकी है.
इन प्रदर्शनों में महिलाएं, स्कूल की लड़कियां अपने हिजाब को हटाकर, बाल दिखाकर, हिजाब को आग के हवाले करके विरोध दर्ज करवा रही हैं. पूरी दुनिया में महिलाओं ने अपने बाल काटकर इन प्रदर्शनों का समर्थन किया है. अभिनेता प्रियंका चोपड़ा ने प्रदर्शनों के समर्थन में इंस्टाग्राम पोस्ट किया.
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ये प्रदर्शन ऐसे वक्त हो रहे हैं जब भारत में कर्नाटक के उडुपी ज़िले में एक सरकारी कॉलेज में छह लड़कियों को हिजाब पहन कर क्लासरूम में दाखिल होने से मना कर दिया गया.
कर्नाटक हाईकोर्ट ने सरकारी फ़ैसले को बरकरार रखा. मामला सुप्रीम कोर्ट में है जहां सभी पक्षों को फ़ैसले का इंतज़ार है. गुरुवार को हिजाब विवाद पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की सिफ़ारिश की है.
भारतीय सोशल और मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ हलकों में ईरान में प्रदर्शन और भारत में हिजाब पर बहस को जोड़कर देखा जा रहा है.
एक हिंदी दैनिक ने एक लेख में पूछा, "कहां छिप गए भारत के नारीवादी, ईरान की महिलाओं के पक्ष में किसी का बोलना शर्म की बात."
एक ट्विटर यूज़र अनामिका पांडे ने लिखा, ईरान में लड़कियां और महिलाएं प्रदर्शनों में हिजाब को जला रही हैं और भारत में कुछ लोग इसे पहनना चाहते हैं.
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भारत में रहने वाली मुस्लिम महिलाएं ईरान में प्रदर्शनों और भारत में हिजाब पर बहस को कैसे देख रही हैं? हमने इस विषय पर भारतीय और भारत में रह रही ईरानी महिलाओं से बात की.
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भारत में रहने वाली ईरानी महिलाओं की सोच
महाराष्ट्र के पुणे में बड़ी संख्या में ईरान से आने वाले छात्र और छात्राएं पढ़ते हैं.
सुरक्षा की वजह से सनम (बदल हुआ नाम) अपना असली नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहतीं. वो तेहरान की रहने वाली हैं.
सनम याद करती हैं कि कैसे दूसरी महिलाओं की तरह उन्हें भी ईरान की 'मॉरैलिटी पुलिस' के लोग दो से तीन बार पकड़ कर ले गए.
उनका दोष- उन्होंने स्कार्फ़ तो पहना हुआ था, लेकिन सामने से कुछ बाल स्कार्फ़ के बाहर आ गए थे.
ईरानी क़ानून के मुताबिक़, सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं का हिजाब पहनना अनिवार्य है, वो भी इस तरह से कि सिर का एक बाल भी न दिखे. साल 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब पहनना ज़रूरी कर दिया गया था.
सनम बताती हैं, "उन्होंने हमें पकड़कर गाड़ियों में डाल दिया. हमें पता नहीं था कि वो हमें कहां ले जा रहे हैं. हमसे कागज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा गया. कहा गया कि स्कार्फ़ से जो थोड़े बाल बाहर निकले हैं, वो बाहर न निकलें. हमसे अच्छे कपड़े पहनने को कहा गया. हमें जेल में नहीं डाला गया, लेकिन दूसरे मामलों में महिलाओं को जेल में डाल दिया जाता है, उन्हें बहुत परेशान किया जाता है. उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है, उनके साथ बलात्कार तक किया जाता है."
सनम बताती हैं कि जब वो पुलिस स्टेशन में थीं तो उनकी मां उनका आईडी कार्ड लेकर पहुंचीं. उनके परिवार को पुलिस वालों को उन्हें छोड़ने के लिए ढेर सारे पैसे देने पड़े. साथ ही उन्हें एक सरकारी कागज़ पर लिख कर देना पड़ा कि "अगर ऐसा दोबारा हुआ और मैं पकड़ी गई तो मुझे जेल में डाल दिया जाएगा."
भारत में धार्मिक विविधता और हिजाब पर बहस पर वो कहती हैं, "यहां ईसाई मुसलमानों से कुछ करने को नहीं करते है और मुसलमान ईसाइयों से हिजाब पहनने को नहीं कहते. लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं है. ये मेरा शरीर है. ये मेरे कपड़े हैं."
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'ईरान से सीख ले भारत'
सनम की दोस्त शाज़िया (बदला हुआ नाम) कुछ साल पहले भारत में पढ़ाई के लिए ईरान से यहां आईं. उनके मां-बाप और बाकी का परिवार तेहरान में रहते हैं.
ईरान में महिलाओं के प्रदर्शन और सरकारी दमन पर वो कहती हैं, "ईरान में आधी आबादी महिलाओं की है. वो ज़्यादा पढ़ाई करती हैं. उनके पास बैचलर, मास्टर्स डिग्री है, लेकिन सरकार की बेवकूफ़ी भरी नीतियों की वजह से वो जज नहीं बन सकतीं, वो राष्ट्रपति नहीं बन सकतीं, वो जहाज़ नहीं उड़ा सकतीं."
शाज़िया कहती हैं, "यहां महिलाएं जो चाहे वो पहन सकती हैं. वो जो चाहे वो काम कर सकती हैं. आप अगर शराब पीना चाहें, तो शराब पी सकते हैं. आपके पीछे पुलिस नहीं आती. वो आपको जेल में नहीं डालती. वो आपको बेल्ट से नहीं मारती."
कर्नाटक के उडुपी में छह छात्राओं को हिजाब के बिना शैक्षणिक संस्था में नहीं घुसने और हिजाब पर बहस पर वो कहती हैं, "किसी भी धर्म को राजनीति में नहीं आना चाहिए नहीं तो उसका बहुत बुरा हाल होता है. ईरान में यही हो रहा है. भारत के लिए ये सीख है. भारत में आज़ादी है और लोग शांति से रह रहे हैं. 43 साल पहले जब ईरान में इस्लाम और राजनीति का मिलाव हुआ, लोग एक दूसरे के विरोधी हो गए."
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वो याद करती हैं कि जब भारत में उडुपी विवाद अपने चरम पर था, उस वक्त वो तेहरान में थीं.
शाज़िया कहती हैं, "उस वक्त सरकारी लोग ईरान में भारतीय दूतावास के सामने भारत और हिंदुओं को गालियां दे रहे थे और प्रदर्शन कर रहे थे. अब वो कह रहे हैं कि अगर आप हिजाब नहीं पहनेंगे, आप जन्नत नहीं जाएंगे. मैं जन्नत नहीं जाना चाहती. वहां जाने के लिए मुझ पर कौन ज़बर्दस्ती कर सकता है."
ईरान में प्रदर्शन ऐसे वक्त हो रहे हैं जब आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से अर्थव्यवस्था की बुरी हालत है.
शाज़िया बताती हैं, "ईरान में आप रात में सोकर सुबह उठे तो सामान के दाम बढ़ जाते हैं. चार हफ़्तो से ज़्यादा हो चुके हैं, लेकिन मेरी ईरान में अपने परिवार से बात नहीं हो पाई है. वहां इंस्टाग्राम, स्काइप, व्हॉट्सऐप, टेलीग्राम बंद है. अगर आप सीधे कॉल करें तो कॉल दो-तीन सेकेंड में कट जाती है. ईरान की सरकार लोगों को बेरहमी से मार रही है. मुझे अपने परिवार की फ़िक्र है."
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"हमारी लड़ाई अलग है और उनकी लड़ाई अलग"
आइरीन अक़बर पूर्व पत्रकार हैं. आइरीन के मुताबिक़, मुस्लिम दुनिया में होने वाली किसी भी गतिविधि पर भारतीय मुसलमानों से प्रतिक्रिया की उम्मीद करना सही नहीं है.
उन्होंने बाल काटकर ईरानी महिलाओं के साथ खड़े होने के क़दम पर एक ट्वीट में कहा, "जो लोग ईरानी महिलाओं के साथ एकजुटता में बाल काट रहे हैं वो खुश होंगे, या फिर उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, अगर वही ईरानी महिलाएं अमेरिका या किसी पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़त के एक बम हमलों में मारी जाएं, अगर वो उनके देश पर कोई हमला कर दें (जिसकी संभावना नहीं है)."
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वो ट्विटर पर लिखती हैं, "हमने अफ़गानिस्तान में देखा है. तालिबान ने जब महिलाओं की स्वतंत्रता पर रोक लगाई तो दुनिया भर में नाराज़गी जताई गई, लेकिन जब उसी देश पर अमरीका के हमले में कई अफ़गान महिलाएं और बच्चियां मारी गईं तो उस पर खामोशी थी. किसी ने अमेरिकी क़ब्ज़े के दौरान अफ़गान महिलाओं की हत्या पर एक आंसू भी नहीं बहाया."
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बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "बिलकिस बानो के साथ एकजुटता कहां है? उस पर सवाल क्यों नहीं पूछे जा रहे हैं? पहले अपने आंगन को साफ़ कीजिए ना, फिर बाद में बाहर की बात करें. साल 2014 से भारतीय मुसलमानों को किसी न किसी बहाने कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है. हमारी ख़ुद की लड़ाई इतनी ज़्यादा है कि दूसरी बातों, जिसका हमसे कोई मतलब नहीं है, उसके बारे में प्रतिक्रिया देने की हमारी मानसिक शक्ति नहीं है."
वो कहती हैं, "हमारे लिए कुरान और हदीस में क्या है, वो मॉडल है. सऊदी अरब और ईरान को जो करना है वो करें. वो हमारा मॉडल नहीं हैं. जो हमारी किताब में लिखा है, हम उसका पालन करते हैं. वो हमारा मॉडल है. वो हिजाब को जलाएं, फेंके, इससे क्या फ़र्क पड़ता है. हमारी लड़ाई अलग है और उनकी लड़ाई अलग है. ये दो अलग-अलग स्थितियां हैं. उनका थियोक्रेटिक स्टेट है, हमारा सेक्युलर स्टेट है."

'भारतीय मुस्लिम महिलाओं की लड़ाई ज़्यादा कठिन'
सोशल ऐक्टिविस्ट रज़िया पटेल के मुताबिक़, हिजाब का आंदोलन पूरे भारत की महिलाओं ने नहीं किया है. वो सिर्फ़ कर्नाटक में हुआ है.
वो कहती हैं कि जहां ईरान की मुस्लिम महिलाएं, वहां की रूढ़िवादी ताक़त से लड़ रही हैं, भारतीय मुस्लिम महिलाएं हिंदू और मुस्लिम, दो रूढ़िवादी ताक़तों से लड़ रही हैं, इसलिए उनकी लड़ाई ज़्यादा कठिन है.
वो कहती हैं कि नब्बे के दशक में आडवाणी की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद को गिरा दिया जाना, देश में दंगे जैसी घटनाएं हुईं जिसकी वजह से आइडेंटिटी राजनीति के तहत मुस्लिम रूढ़िवादी ताक़तें महिलाओं पर हिजाब थोप रही हैं.
वो कहती हैं, "मेरे पिताजी और मेरे दादा गांधी टोपी पहनते थे. अभी लोग स्कल कैप पहनते हैं. युवा वर्ग की मुस्लिम लड़कियां एकदम आक्रामक हैं. वो जिस तरह के शब्द इस्तेमाल कर रही हैं, वो शब्द रूढ़िवादी ताक़तों की ओर से आती हैं. वो शिक्षा के लिए लड़ने की बजाय, आइडेंटिटी सिंबल के लिए लड़ना शुरू कर देती हैं."
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श्रीनगर में कश्मीर विमेंस कलेक्टिव की संस्थापक मंटाशा बिंटी रशीद के मुताबिक़, ईरान में जो कुछ हो रहा है, उसे लेकर कश्मीर में महिलाएं ज़मीन पर इकट्ठा नहीं हुई हैं क्योंकि कश्मीर में लोगों की अपनी अलग समस्याएं हैं.
वे कहती हैं, "यहां महिलाएं देख रही हैं कि कैसे ऐक्टिविस्ट ईरान को लेकर तो बातें कर रहे हैं, लेकिन दूसरे मुद्दों को लेकर ख़ामोश हैं. हम लोगों की तो अपनी काफ़ी आपबीती है. तीन दशकों से जो लोग लड़ाई के माहौल में रह रहे हों, वो ईरान में घटनाक्रम को बेहतर समझते हैं. जो बाल काट रहे हैं वो उनका तरीक़ा है प्रदर्शन करने का."
वे कहती हैं, "ज़रूरी नहीं कि वही एक तरीक़ा है. दो साल पहले कश्मीर में चोटियां काटने की घटना हुई थी. कोई चुपचाप से आता था और महिलाओं के बाल काट देता था. भारत और दुनिया भर में किसी ने इस बारे में कोई बात की? तब किसी ने हमारे साथ सॉलिडैरिटी दिखाते हुए बाल नहीं काटे."
"महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा चाहे किसी भी तरह की हो, उसके पीछे राजनीतिक वजह भी होती है. कश्मीरी औरतें ईरानी औरतों का दर्द बख़ूबी समझती हैं."
तुर्की के शहर इस्तांबुल में इंटरनेशनल रिलेशंस की रिसर्च स्कॉलर अफ़शां ख़ान के मुताबिक़, उन्हें ईरान और भारत में हिजाब को लेकर औरतों की लड़ाई में काफ़ी समानता नज़र आती है. वो कहती हैं कि दोनों जगह औरतें अपने ऊपर हो रहे ज़ोर-ज़बर्दस्ती से लड़ रही हैं और दोनों की लड़ाई तानाशाही के ख़िलाफ़ है.
अफ़शां कहती हैं, "ईरान में लड़कियों की लड़ाई अपने अधिकारों की लड़ाई है, ठीक उसी तरह जैसे भारत में हिजाब पहन कर कुछ लड़कियां शिक्षा हासिल करना चाहती हैं, लेकिन एक ख़ास विचारधारा से संबंध रखने वाले लोग उन्हें रोक रहे हैं."
"जो लोग सोशल मीडिया पर ईरान की महिलाओं के साथ 'सहानुभूति' दिखा रहे हैं, उनकी हिपोक्रेसी इससे ज़ाहिर होती है कि वो उन औरतों के हक़ में खड़े होने के बजाए सिर्फ़ हिजाब हटाने के पक्ष में खड़े हैं.
ईरान में वो औरतें भी प्रदर्शन कर रही हैं जो ख़ुद हिजाब करती हैं. बुर्के वाली औरतें भी उन औरतों के समर्थन में खड़ी हैं, जो हिजाब लगाना नहीं चाहती और हुकूमत ज़ोर-ज़बर्दस्ती से उनसे लगवाना चाहती है."
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