हिजाब विवाद: सुप्रीम कोर्ट के जजों ने किन मुद्दों पर रखी अलग-अलग राय?

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    • Author, सुचित्रा मोहंती
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सुप्रीम कोर्ट में हिजाब विवाद पर सुनवाई कर रही दो जजों की बेंच ने अब इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की सिफ़ारिश की है.

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धुलिया ने गुरुवार को इस मामले पर बंटा हुआ फ़ैसला दिया. अंतिम निर्णय पर एकमत न होने के कारण उन्होंने ये केस चीफ़ जस्टिस यूयू ललित के पास भेजा है जो अब इस पर सुनवाई के लिए बड़ी बेंच का गठन करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का मतलब है कि जब तक ये अदालत अपना फ़ैसला नहीं सुनाती, कर्नाटक हाई कोर्ट का फ़ैसला मान्य रहेगा. यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच इस पर निर्णय नहीं करती, तब तक स्कूल-कॉलेज में हिजाब न पहनने की यथास्थिति बनी रहेगी.

हिजाब मामले पर आए इस विभाजित फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच, नए सिरे से इसकी सुनवाई करेगी.

गुरुवार को अदालत में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा, "हमारी राय अलग है, मेरे इस मुद्दे पर 11 सवाल हैं."

जस्टिस गुप्ता ने छात्रों की याचिकाओं को ख़ारिज किया और कर्नाटक हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा, " ये मामला हम चीफ़ जस्टिस को भेज रहे हैं ताकि इसकी सुनवाई के लिए बड़ी बेंच का गठन किया जाए."

लेकिन बेंच के दूसरे जज जस्टिस सुधांशु धुलिया ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फ़ैसले को खारिज करते हुए कहा, "हिजाब पहनना व्यक्तिगत पसंद का मुद्दा है. मेरे दिमाग में सबसे ज़्यादा ये बात आ रही है कि क्या हम इस तरह के प्रतिबंध लगाकर एक छात्रा के जीवन को बेहतर बना रहे हैं?"

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10 दिन की सुनवाई और बंटा हुआ फ़ैसला

हिजाब मामले में एक याचिकाकर्ता के वकील निज़ामुद्दीन पाशा ने बीबीसी को बताया, "हमें देखना होगा कि अब ये मामला कैसे आगे बढ़ेगा."

उन्होंने कहा, "चीफ़ जस्टिस अब तय करेंगे और मामले का फ़ैसला करने के लिए एक बड़ी बेंच का गठन करेंगे. हिजाब मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का एक नया दौर शुरू होगा."

उन्होंने कहा कि संभव है कि चीफ़ जस्टिस इस मामले की सुनवाई के लिए तीन या फिर पांच जजों की बेंच गठित करें क्योंकि ये मामला बेहद संजीदा है.

आज के फ़ैसले में बड़े बेंच के गठन को लेकर कोई तय समय सीमा नहीं निर्धारित की गई है.

जस्टिस हेमंत गुप्ता की अध्यक्षता वाली बेंच ने 26 सितंबर को सभी पक्षों यानी 23 याचिकाकर्ताओं के वकीलों और कर्नाटक सरकार की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था. दस दिन तक इस मामले पर सुनवाई चली थी.

कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि उसके पास शैक्षणिक संस्थानों के लिए स्कूल यूनिफॉर्म तय करने और अनुशासन का पालन करने का आदेश जारी करने का अधिकार है.

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मौलिक अधिकार क्लासरूम में कम नहीं हो जाते- दवे

याचिकाकर्ता छात्रों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने तर्क दिया कि मौलिक अधिकार यानी क्या पहनना है, ये चुनने की स्वतंत्रता और आस्था की स्वतंत्रता, एक क्लास के भीतर कम नहीं हो जाते.

छात्रों का कोर्ट में पक्ष रख रहे देवदत्त कामत, डॉ राजीव धवन और दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कर्नाटक सरकार ने अपने दावे का समर्थन करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया.

वकीलों का कहना था कि राज्य सरकार ये नहीं बता पाई कि कैसे कुछ छात्रों के कक्षाओं में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने से सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन हुआ?

इन वकीलों ने आगे कहा कि कर्नाटक सरकार ने अपने इस दावे के पक्ष में 'कि कुछ छात्रों के हिजाब पहनने से अन्य छात्रों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन' हुआ, कोई सबूत नहीं दिया.

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कर्नाटक हाईकोर्ट की चीफ़ जस्टिस रितु राज अवस्थी, जस्टिस कृष्णा दीक्षित और जस्टिस जे एम खाजी की बेंच ने इस साल 15 मार्च को अपने फ़ैसले में कहा था कि महिलाओं का हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य प्रथा नहीं है.

इसलिए ये संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक मान्यताओं को मानने की आज़ादी) के अंतर्गत नहीं आता.

कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में ये भी कहा था कि स्कूल की यूनिफॉर्म एक उचित व्यवस्था है जो संविधान सम्मत है. इस पर छात्र आपत्ति नहीं कर सकते हैं. साथ ही राज्य सरकार के पास ऐसी अधिसूचना जारी करने की शक्ति है और सरकारी अधिसूचना के ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं बनता.

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