क्या इराक़ में गृहयुद्ध छिड़ सकता है? - दुनिया जहान

मुक़्तदा अल सद्र के समर्थक

इमेज स्रोत, Reuters

शिया धर्मगुरु काज़िम अल हाएरी का एक बयान इराक़ में टकराव की वजह बन गया. वहां हुई हिंसा में 30 लोगों की मौत हो गई.

शिया धर्मगुरू हाएरी ने कहा कि उनके समर्थकों को 'ईरान के सुप्रीम लीडर का प्रभुत्व मान लेना चाहिए.'

इराक़ में बीते साल हुए चुनाव में शिया नेता मुक़्तदा अल-सद्र के गठबंधन को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं लेकिन सत्ता उनकी पहुंच से दूर रही और देश में राजनीतिक गतिरोध बन गया.

मुक़्तदा अल-सद्र और उनके समर्थकों के लिए ईरान की सर्वोच्चता मंजूर करने की बात दूर की कौड़ी थी.

हाएरी की सलाह के बाद शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हिंसक विद्रोह में बदल गया. बगदाद में एक बार फिर गोलियों की आवाज़ गूंजने लगी. इसके बाद सवाल उठा कि क्या इराक़ में गृह युद्ध छिड़ सकता है?

बीबीसी ने इसका जवाब तलाशने के लिए चार एक्सपर्ट से बात की.

बीबीसी हिंदी

इराक़ में 'विरोध की आग'

बीबीसी हिंदी

इराक़ की कुल आबादी का करीब 90 प्रतिशत लोग मुसलमान हैं लेकिन ये कई समुदायों में बंटे हैं.

शिया अरब बहुसंख्यक हैं. इनकी संख्या 50 प्रतिशत से ज़्यादा है. सुन्नी अरब कुल आबादी का पांचवां हिस्सा हैं. कुर्दों की संख्या भी क़रीब इतनी ही है.

शिया और सुन्नियों के बीच तनाव रहता है. साल 1979 से 2003 तक इराक़ की सत्ता पर काबिज़ रहे तानाशाह सद्दाम हुसैन के दौर में ये तनाव बढ़ा. सद्दाम हुसैन सुन्नी थे.

साल 2003 में अमेरिका ने हमला किया और सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया.

सद्दाम हुसैन

इमेज स्रोत, Getty Images

देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू होने के बाद ये राय बनी कि सरकार में प्रमुख समूहों के बीच संतुलन होना चाहिए.

उनके बाद जो ढांचा बना, उसमें सभी की भूमिका तय की गई. इराक़ में जो अलिखित समझौता है, उसके मुताबिक़ राष्ट्रपति कुर्द, प्रधानमंत्री शिया और संसद के स्पीकर सुन्नी समुदाय से आते हैं.

केनेडी स्कूल के हार्वर्ड मिडिल ईस्ट इनिशिएटिव में रिसर्च फ़ेलो मारसीन अलशमैरी कहती हैं, "इराक़ के आम लोग इसे दिक्कत की वजह मानते हैं क्योंकि इसमें व्यक्तिगत ख़ूबियों और क्षमताओं के बजाए धार्मिक समुदाय के आधार पर सरकार में जगह मिलती है. फिलहाल इराक़ के लोग भ्रष्टाचार की समस्या से जूझ रहे हैं. सत्ता के बंटवारे का मौजूदा तरीका भ्रष्टाचार दूर करने में बाधा बन रहा है. क्योंकि आप सही व्यक्ति को सही जगह तैनात नहीं कर पा रहे हैं."

वीडियो कैप्शन, मुक्तदा अल-सद्र क्या इराक़ को गृहयुद्ध के करीब ले आए?

शिकायतें और भी हैं. इराक़ के पास तेल का बड़ा भंडार है लेकिन फिर भी यहां ग़रीबों और बेरोज़गार युवाओं की बड़ी संख्या है.

साल 2019 में इराक़ के युवाओं ने भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और सरकारी सेवाओं में मौजूद ख़ामियों को लेकर विरोध शुरू कर दिया.

मारसीन बताती हैं, "प्रदर्शनकारियों ने एक तरह से इराक़ का चक्का जाम कर दिया. सरकार इस प्रदर्शन को लेकर बहुत चिंतित थी. विरोध का असर ये हुआ कि एक प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा और यहां जल्दी चुनाव कराने पड़े."

चुनाव में मुक़्तदा अल सद्र के गठबंधन को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं.

इमेज स्रोत, EPA

मुक़्तदा अल-सद्र ने क्या किया

इस दौरान शिया नेता मुक़्तदा अल-सद्र असरदार तरीके से सामने आए. देश के युवाओं को उनमें नई उम्मीद दिखाई दी.

वो देश के इकलौते शिया नेता नहीं हैं लेकिन 2021 के चुनाव में उनकी पार्टी को सबसे ज़्यादा वोट मिले.

चुनाव नतीजों को लेकर अल-सद्र ने माना कि लोगों ने उन्हें सरकार पर दबदबा स्थापित करने का अधिकार दे दिया है. विरोधी दलों को उन्होंने विपक्ष में धकेल दिया.

मारसीन अलशमैरी कहती हैं, "शुरुआत में इसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. किसी ने सोचा नहीं था कि संसद में एक सरकार और एक विपक्ष हो सकता है. इसका बहुत विरोध हुआ. ख़ासकर उस पक्ष की ओर से जिसे लेकर माना जा रहा था कि वो विपक्ष में बैठेंगे. इराक़ में अब तक आम सहमति की सरकारें ही बनती रही थीं."

सुप्रीम कोर्ट ने भी अल-सद्र की मांग का समर्थन नहीं किया. नाराज़गी में उन्होंने अपने सभी प्रतिनिधियों को संसद से हटाने की बात कही.

अल-सद्र गठबंधन के सदस्यों के जाने से खाली हुई जगह को जब दूसरे दलों ने भरना शुरु किया तो विरोध होने लगा.

मारसीन कहती हैं, "मुक़्तदा अल-सद्र ने अपने समर्थकों को ग्रीन ज़ोन में भेज दिया. बगदाद में ये सबसे कड़ी सुरक्षा वाला इलाक़ा है. यहां उनके सरकारी दफ़्तर हैं. मंत्रालय हैं. विदेशी दूतावास हैं. ईराक़ के प्रमुख नेताओं के घर हैं. उन्होंने बहुत जल्दी सुरक्षा घेरे को तोड़ दिया और संसद भवन में दाखिल हो गए."

इस बीच शिया धर्मगुरु हाएरी ने मुक़्तदा अल सद्र के प्रभुत्व पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि तमाम शिया ईरान से दिशानिर्देश हासिल करें. सद्र को ये बात नागवार गुज़री. उन्हें लगा कि एक अहम मौक़े पर उन्हें कमतर करके दिखाने की कोशिश हो रही है.

मुक़्तदा अल-सद्र ने एलान किया कि वो राजनीति से दूर हो जाएंगे.

इसी के बाद प्रदर्शन हिंसक हो उठे. 24 घंटे बाद मुक़्तदा अल-सद्र ने शांति की अपील की और इराक़ की राजधानी बग़दाद में शांति छा गई.

मुक़्तदा अल-सद्र

इमेज स्रोत, EPA

इमेज कैप्शन, मुक़्तदा अल-सद्र
बीबीसी हिंदी

कौन हैं मुक़्तदा अल-सद्र?

बीबीसी हिंदी

इराक़ फाउंडेशन की प्रमुख रंद अल रहीम कहती हैं, "मुक़्तदा अल-सद्र उन लोगों में से हैं जिन पर महानता थोप दी गई. वो इत्तेफाक से महान बन गए."

मुक़्तदा अल सद्र का जन्म 1974 में हुआ. उनके पिता थे मोहम्मद अल-सद्र. वो करिश्माई और बहुत सम्मानित शिया धर्मगुरू थे.

उन्होंने अपने समर्थकों से सद्दाम हुसैन के शासन के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने को कहा था. 1999 में सद्दाम हुसैन ने उनकी और उनके दो बेटों की हत्या करा दी.

पिता की विरासत अचानक मुक़्तदा अल-सद्र के हाथ आ गई. उनकी उम्र कम थी और अनुभव भी नहीं था. कई लोगों की नज़र में वो इस विरासत लायक नहीं थे.

लेकिन आलोचकों को अंदाज़ा भी नहीं था कि आगे क्या होने वाला है. साल 2003 में सद्दाम हुसैन सत्ता से हटा दिए गए.

रंद अल रहीम कहती हैं, "मुक़्तदा अल-सद्र बड़े ही घाघ, कठोर और ढीठ थे. वो बगदाद के झुग्गी वाले इलाकों और दक्षिण में रहने वाले शियाओं पर भरोसा करते थे. अपने शहीद पिता और शियाओं की शिकायतें दूर करने के नाम पर उन्होंने समर्थकों को एकजुट किया.

युवा मुक़्तदा अल-सद्र को नए इराक़ में ऐसा मौका दिखा जहां वो बड़ी आबादी का समर्थन हासिल कर सकते थे.

रंद अल रहीम कहती हैं, "वो चाहते थे कि शियाओं का शासन स्थापित हो. वो ख़ुद को शियाओं की राजनीतिक प्रभुसत्ता के शीर्ष पर देखना चाहते थे. ये शुरुआत से ही बिल्कुल साफ़ था. मुक़्तदा अल सद्र समेत बाकी शियाओं ने लोकतंत्र को इराक़ में शिया शासन का सपना पूरा करने के जरिए के तौर पर देखा. ये सोच लोकतंत्र की दुनिया भर में मान्य परिभाषा से बहुत अलग थी."

मुक़्तदा अल सद्र की समर्थक

इमेज स्रोत, Reuters

मुक़्तदा अल सद्र की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बरसों तक परवान नहीं चढ़ पाई. इसकी वजह ये थी कि इराक़ की संसद का ढांचा सत्ता में साझेदारी के लिहाज से तय किया गया है. कोई एक समूह या कोई एक व्यक्ति देश पर नियंत्रण कर सके, ऐसी स्थिति नहीं बन सकती.

लेकिन साल 2019 के विरोध प्रदर्शनों में मुक़्तदा अल-सद्र को अपने लिए मौक़ा नज़र आया.

रंद अल रहीम कहती हैं, "मुक़्तदा अल-सद्र ने शुरुआत में विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया. प्रदर्शनकारी बेहतर सेवाओं, राजनीतिक सुधार और नस्लीय आधार पर तय प्रणाली को खत्म करने की मांग उठा रहे थे. इराक़ को ईरान के प्रभुत्व से आज़ाद कराने और देश की आवाज़ बुलंद करने की मांग भी उठाई गई."

अक्टूबर 2021 के चुनाव में मुक़्तदा अल-सद्र अपनी शर्तों पर सत्ता हासिल नहीं कर सके. इस बीच इराक़ और ईरान के रिश्तों को लेकर सवाल उठा.

रंद अल रहीम कहती हैं कि सद्र इराक़ के दूसरे शिया नेताओं से अलग हैं. वो ईरान का पिछलग्गू होने से इनकार करते रहे हैं. वो ईरान के राजनीतिक असर और आदेशों को मान्यता नहीं देते. रंद की राय में सद्र के साथ शियाओं का बड़ा समर्थन है जिसकी ईरान अनदेखी नहीं कर सकता.

अयातुल्लाह खुमैनी

इमेज स्रोत, AFP

बीबीसी हिंदी

ईरान और इराक़

बीबीसी हिंदी

करीब डेढ़ हज़ार किलोमीटर तक ईरान और इराक़ की सीमाएं आपस में मिलती हैं. ईरान में शिया मुसलमान बहुसंख्यक हैं.

1980 में ईरान के सर्वोच्च नेता अयतुल्लाह ख़ुमैनी ने एक भाषण दिया. उसकी गूंज पूरे इलाक़े में सुनाई दी. उन्होंने दावा किया कि ईरान सही मायने में मुस्लिम जगत का लीडर है.

न्यू लाइन्स मैगज़ीन की मिडिल ईस्ट की डिप्टी एडिटर रशा अल-अक़ीदी याद करती हैं, "उन्होंने बताया कि वो किस तरह ना सिर्फ़ शिया मुसलमानों बल्कि सभी मुसलमानों के नए धार्मिक नेता हैं. वो बहुत उग्र बयान दे रहे थे. वो इस्लामिक क्रांति के अपने संदेश को इराक़ और सऊदी अरब समेत पूरे मध्य पूर्व में फैलाने की बात कर रहे थे."

वो कहती हैं कि ख़ुमैनी के विचार एक तरह से आग लगाने वाले थे. ईरान और इराक़ के बीच 1980 में शुरु हुई जंग के लिए इन्हें एक अहम वजह माना गया. ये लड़ाई आठ साल तक चली. इसकी वजह से हज़ारों लोगों की मौत हुई. तब इराक़ के अंदर शियाओं को जुल्म सहने पड़े.

रशा अल-अक़ीदी बताती हैं, "तब शिया समुदाय सवालों के घेरे में था. उन पर गद्दार होने के आरोप लगातार लगाए गए. शिया होने की वजह से उनकी धार्मिक मान्यताएं ईरान जैसी थीं. दरअसल, ईरान में शिया बहुसंख्यक हैं. इराक के शियाओं का उत्पीड़न सिर्फ़ आवाज़ दबाकर या धार्मिक अधिकार छीनकर ही नहीं किया गया बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों को मौत की सज़ा भी दी गई."

वीडियो कैप्शन, क्या सैकड़ों मौत रोकने का फॉर्मूला मिल गया? - दुनिया जहान

रशा कहती हैं कि कई साल बीत चुके हैं लेकिन उस संघर्ष का असर अब भी बरकरार है.

रशा अल-अक़ीदी कहती हैं, "ईरान ये गारंटी चाहता है कि इराक़ियों की ज़िंदगी का हर पहलू उनके नियंत्रण में हो. इसके लिए उन्होंने कई समूहों पर लाखों डॉलर का निवेश किया है. चाहे देश की सेना हो, शिक्षा तंत्र हो या स्वास्थ्य सेवाएं हों, आप इराक़ियों के जीवन के हर क्षेत्र में ईरान का असर पाएंगे."

ये असर मजहबी तौर पर भी है. जब प्रमुख मौलवी हाएरी ने एलान किया कि शियाओं को ईरान के सर्वोच्च नेता से दिशा निर्देश लेना चाहिए, तब उन्होंने कुछ और भी कहा, जो सीधे तौर पर मुक़्तदा अल-सद्र के लिए था.

रशा के मुताबिक हाएरी मुक़्तदा को सीधे तौर पर बता रहे थे कि उनके पास धार्मिक प्रभुसत्ता नहीं है. उनकी वैसी साख भी नहीं है.

और यहीं से बात बिगड़ गई. मुक़्तदा अल-सद्र का पहनावा मौलवियों जैसा है. उनके पिता धर्मगुरू थे और वो उनकी विरासत संभालते हैं. और अब उन्हें एक सीनियर शिया नेता बता रहा है कि मजहब के लिहाज से उनकी इतनी हैसियत नहीं है कि वो अपने देश की अगुवाई कर सकें.

रशा कहती हैं कि ऐसा लगता है कि ऐसे बयानों के पीछे ईरान है.

ईरान की भूमिका चाहे जो हो लेकिन इतना तय है कि इराक़ एक बार फिर तक़रार के मुहाने पर है.

मुक़्तदा अल-सद्र

इमेज स्रोत, Reuters

बीबीसी हिंदी

इराक़ का लोकतंत्र

बीबीसी हिंदी

'इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप' में इराक़ मामलों की विश्लेषक लहीब हिगेल कहती हैं, "अल-सद्र इस राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं. मुझे नहीं लगता कि वो इसे पूरी तरह ख़ारिज करना चाहते हैं. वो इस पर दबदबा चाहते हैं. राजनीति से उनके संन्यास को मैं गंभीरता से नहीं ले रही हूं. अगर ऐसा होता भी है तो ये ज़्यादा देर नहीं रहेगा."

वो कहती हैं कि मुक़्तदा अल-सद्र लुकाछुपी का खेल खेलते रहे हैं. वो कुछ महीनों या सालों के बाद दोबारा सामने आ जाते हैं.

बीते साल हुए चुनाव के पहले उन्होंने ऐसा ही किया था. उनके विरोधी इसे भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे.

लहीब हिगेल कहती हैं, "उनके विरोधी बहुत ज़्यादा पैसे खर्च करने का साहस नहीं पर पाए. वो सोच रहे थे कि क्या चुनाव होंगे? क्या सद्र ने जो कहा है, उसका मतलब वही है? उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर रखना ख़तरनाक़ साबित हो सकता है. और बाद में साफ़ हुआ कि सद्र कभी रेस से बाहर नहीं थे. वो लगातार खुद को तैयार कर रहे थे. उन्होंने अपने विरोधियों को मजबूर किया कि वो उन्हें वापस आने के लिए मनाने में व्यस्त रहें."

हमें याद रखना चाहिए कि सद्र क्या चाहते हैं? वो सिर्फ़ इराक़ के शियाओं के नेता नहीं बनना चाहते, वो पूरे देश की अगुवाई करना चाहते हैं.

वीडियो कैप्शन, फ्रांस को माली से वापस क्यों बुलाने पड़े सैनिक?

लहीब हिगेल कहती हैं, "मैं कहूंगी कि सद्र ने निजी तौर पर लंबे समय के लिए लक्ष्य तय किए हैं. वो इराक़ की राजनीति में दबदबा बनाए रखना चाहते हैं. वो प्रमुख राजनीतिक ताक़त बनना चाहते हैं. मुझे लगता है कि वो ये भी तय करना चाहते हैं कि शिया समुदाय में उनके विरोधी, ख़ासतौर पर वो पार्टियां जिनके अधीन सशस्त्र समूह हैं, वो उन्हें भविष्य में चुनौती नहीं दे सकें. कुछ लोग ये भी कहते हैं कि सद्र की महत्वाकांक्षाएं इससे भी बड़ी हैं. वो इराक़ के सुप्रीम लीडर बनना चाहते हैं."

क्या ऐसा नहीं लगता कि ये प्रमुख हस्तियों के बीच की तक़रार है और इराक के लोगों की भलाई से इसका कोई लेना देना नहीं है, इस सवाल पर लहीब कहती हैं, "इराक़ के राजनीतिक तंत्र के साथ यही दिक्कत है. कई मामलों में ये सड़ गया मालूम होता है. भले ही ये तंत्र काफी नया है. इसकी वजह ये है कि इसमें सभी मजहबी समूहों और उनके राजनीतिक नेताओं को शीर्ष स्तर पर पहुंचने की इजाज़त दी गई है. इराक़ के किसी भी हिस्से में लोगों को देश के संसाधनों का लाभ हासिल नहीं है."

वीडियो कैप्शन, सूरज की शक्ति का फॉर्मूला दूर करेगा ये मुश्किल?
बीबीसी हिंदी

लौटते हैं उसी सवाल पर कि क्या इराक़ में गृहयुद्ध छिड़ सकता है?

इराक़ के लोग भ्रष्टाचार और तरक्की नहीं होने की वजह से उकता चुके हैं.

सद्दाम हुसैन के दौर के बाद से सरकार में सभी मजहबी समूहों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई. लेकिन सरकार में ऐसे नेता नहीं हैं जो देश की तरक्की में दिलच़स्पी लें.

अब एक लोकप्रिय नेता सामने हैं. जिनका दावा है कि वो इराक़ के तमाम असंतुष्ट लोगों की अगुवाई करते हैं और देश को आगे ले जाने का वादा कर रहे हैं. लेकिन वो सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखना चाहते हैं. कई लोग उन पर संदेह भी करते हैं.

हमारी पहली एक्सपर्ट मारसीन अलशमैरी की राय में फिलहाल इराक़ एक ख़तरनाक़ मोड़ पर खड़ा है जहां 'सिविल वार' की संभावना सवालों के परे नहीं है.

वो कहती हैं कि अगर गृहयुद्ध टल भी जाए तो भी शिया समुदाय में एक दूसरे को चुनौती देने वाले दो शक्ति केंद्र हैं. ये भविष्य में दिक्कत की वजह बन सकते हैं और इन स्थितियों में देश के लोकतंत्र की जड़ें खोखली होती लगती हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)