यूक्रेन में रूस के ख़िलाफ़ क्यों लड़ रहे हैं ताइवान के सैनिक?

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- Author, सोफ़ी विलियम्स
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
यूक्रेन के लवीव शहर में स्थित चर्च में एक ताइवानी सैनिक सेंग शेंग-ग्वांग की माँ आख़िरी बार उन्हें एक ताबूत में लेटा हुआ देख रही हैं.
शेंग-ग्वांग को श्रद्धांजलि देने वालों में उनकी माँ और तमाम यूक्रेनी नागरिकों के साथ-साथ यूक्रेन से हज़ार किलोमीटर दूर ताइवान में बैठे उनके परिजन और रिश्तेदार शामिल हैं.
शेंग-ग्वांग ने एक ऐसे मुल्क की हिफ़ाजत करते हुए अपनी जान दी है जहां वह इससे पहले कभी आए भी नहीं थे.
वह कहती हैं, "शेंग-ग्वांग मेरे बच्चे, तुम बहुत बहादुरी से लड़े...तुम हमेशा मेरे बच्चे रहोगे, मुझे तुम पर गर्व है."
शेंग यूक्रेन की सीमा सुरक्षा बलों की अंतरराष्ट्रीय टुकड़ी में शामिल थे. पिछले महीने उनकी यूक्रेन के लेमन शहर में मौत हो गई थी. वह यूक्रेन में मरने वाले पहले ताइवानी सैनिक थे.
ताइवान के विदेश मंत्रालय ने शेंग-ग्वांग की मौत के बाद बयान जारी करते हुए कहा है कि उन्होंने यूक्रेन को आज़ाद रखने के लिए अपनी जान दी है.
यूक्रेन और ताइवान की स्थिति एक जैसी?
इस साल फ़रवरी में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से दुनिया भर से हज़ारों सैनिक यूक्रेन की ओर से लड़ चुके हैं. इन तमाम विदेशी सैनिकों में ताइवानी सैनिकों की संख्या क़रीब दस थी.
यूक्रेन पर रूसी के हमले के बाद ताइवान में इसकी ख़ूब चर्चा हुई है. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. इसके साथ ही चीन ने कहा है कि वह ज़रूरत पड़ने पर ताक़त के दम पर उसे अपने साथ मिला लेगा. लेकिन ताइवान खुद को चीन से अलग मानता है.
अमेरिकी राजनेता नैंसी पेलोसी की इसी साल अगस्त में हुई ताइवान यात्रा के बाद इस क्षेत्र में तनाव तेज़ी से बढ़ा. इस यात्रा पर चीन ने नाराज़गी जताई. बाद में उसने ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास तेज़ कर दिए.
सोशल मीडिया के ज़रिए शेंग की दोस्त बने सैमी लिन कहते हैं कि शेंग-ग्वांग इस बात से चिंतित थे कि एक दिन ताइवान का हश्र भी यूक्रेन जैसा होगा.
उन्होंने कहा, "मुझे याद है कि वो अपने एक दोस्त से कह रहे थे कि वो रूसी सैनिकों के हाथों यूक्रेनी नागरिकों के उत्पीड़न और हत्याओं को देखकर चुप नहीं रह सकते."
लिन कहते हैं, "शेंग मेरे जीवन में मिले कुछ ईमानदार लोगों में से एक थे."
यूक्रेन की फ़ौज में कैसे शामिल हो रहे ताइवान के लोग?

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ताइवान के नागरिकों के लिए सेना में सेवाएं देना अनिवार्य है. इसलिए वो यूक्रेन की सेना के विदेशी लड़ाकों के बेड़े में शामिल होने के लिए योग्य हो जाते हैं.
28 वर्षीय जैक याओ भी उन लोगों में से एक हैं जिन्होंने जंग में जाने का फ़ैसला लिया. राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की विदेशी वॉलंटिअर्स से यूक्रेन की जंग में शामिल होने की अपील करने के तीन दिन बाद वो जैक याओ यूक्रेन पहुंच गए.
वो ताइवान से पोलैंड होते हुए यूक्रेन की राजधानी कीएव पहुंचे.
जैक ने बीबीसी से कहा, "मैं पिछले साल से ही स्थिति पर नज़र रख रहा था. ख़ासतौर पर यूक्रेन से सटी सीमाओं पर रूसी सैनिकों और टैंकों पर. किसी को यक़ीन नहीं था कि ये युद्ध होगा."
"ताइवान और वहां की स्थिति एक जैसी है. मैं सोच रहा था कि यूक्रेन की मदद के लिए क्या कर सकता हूं."
जैक जॉर्जिया की सेना में विदेशी लड़ाकों की टुकड़ी में शामिल हो गए और वहां उन्हें युद्ध मोर्चे के आसपास जासूसी अभियान से जुड़ा काम सौंपा गया. जब वो पहुंचे तो उस समय भी रूस कीएव पर कब्ज़े की कोशिशें जारी रखे हुए था.
राजधानी कीएव के उत्तर में स्थित शहर का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "यहां हर दिन ताबड़तोड़ बम और रॉकेट हमले हो रहे थे क्योंकि रूसी बूचा शहर में मौजूद थे."
"मैं एक मिशन का हिस्सा था और मैंने देखा कि हमारे लोग एक धमाके में मारे गए. बम उनके 50 मीटर पीछे फटा."
खाली समय में जैक अपनी यूनिट के बाकी सदस्यों के साथ ताइवान पर भी चर्चा करते थे.
जैक ने कहा, "एक युवक दो साल तक ताइवान में रहा था और वो वहां की परिस्थितियों से वाकिफ़ था. ताइवान और यूक्रेन दो भाइयों की तरह हैं. ये 100 फ़ीसदी एक से हैं. वो मुझे कहते थे कि तुम यहां नहीं मर सकते क्योंकि तुम्हें वापस जाकर अपनी मातृभूमि की रक्षा करनी है."

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याओ ने ताइवान लौटकर अपना कॉफ़ी का कारोबार संभाल लिया है लेकिन कुछ लोग अभी भी यूक्रेन में ही हैं. यूक्रेन की एक चैरिटी के लिए हाल ही में बनाए एक वीडियो में दो ताइवानी नागरिकों ने अपनी मंशा के बारे में ख़ुलकर बताया है.
ताइवान के लोगों को सता रहा ये डर
हाथों में ताइवान का झंडा लिए ये लोग कहते हैं, "हमारे यूक्रेन आने की सबसे बड़ी वजह यूक्रेनी नागरिकों को सुरक्षित रखना है."
"हमें ये भी डर है कि अगर रूस जीता, तो चीन भी ताइवान के साथ ऐसा ही करेगा. इसलिए हम यूक्रेन आना चाहते हैं और यहां के लोगों की सुरक्षा, आज़ादी के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं."
लेकिन यूक्रेन आए सभी ताइवानी भू-राजनीतिक पहलू पर नहीं सोच रहे हैं. जून महीने में ली चेनलिंग ने बीबीसी चाइनीज़ को बताया था कि वो यहां एक 'यादगार' जीवन जीने के लिए आए हैं.
उन्होंने कहा कि अगर ताइवान पर हमला हुआ तो उनके जंग में शामिल होने का फ़ैसला ताइवान सरकार और अमेरिका की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा.
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन बार-बार इस बात पर ज़ोर देते आए हैं कि अगर चीन हमला करता है तो अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा. हालांकि, अमेरिका की औपचारिक नीति रणनीतिक तौर पर अस्पष्ट है. इसमें ताइवान की रक्षा के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं है लेकिन ये नीति इस विकल्प को ख़ारिज भी नहीं करती है.
बीते महीने जो बाइडन ने कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि ताइवान पर चीन तुरंत हमला करने जा रहा है. इसके बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जो बाइडन के बीच बाली में जी-20 समिट से पहले मुलाक़ात भी हुई.
ताइवान पब्लिक ओपिनियन फ़ोरम के पॉल हुआंग कहते हैं कि संघर्ष की आशंका पर ताइवान की आम जनता की राय मिली-जुली है.
हुआंग ने बीबीसी से कहा, "दिलचस्प ये है कि अधिकांश लोगों से ये संकेत मिलता है कि वो चिंतित नहीं हैं."
उन्होंने ये भी कहा कि ताइवान अधिकतर लोगों को नहीं लगता कि वे उतने दिनों तक चीन का सामना कर सकेंहे जितने दिन तक रूस के सामने यूक्रेन टिका हुआ है.
शेंग ग्वांग की मां कहती हैं कि भले ही वो दुख में हैं लेकिन यूक्रेन के लिए जंग में शामिल होने के उनके बेटे के फ़ैसले से उनमें राहत की भावना भी पैदा हुई.
उन्होंने कहा, "भले ही मैं तकलीफ़ में हूं लेकिन ये जानकर कि अपने जीवन के आख़िरी पलों में, शेंग-ग्वांग बहादुर लड़ाकों के साथ जंग में शामिल था, वो एक-दूसरे के साथ थे और एक साथ जिए-मरे, मुझे बहुत राहत महसूस होती है."
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