म्यांमार की सेना ने चार लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं को दी सज़ा-ए-मौत

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- Author, ज़ुबैदा अब्दुल जलील
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
म्यांमार की सेना ने देश के चार लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं को मौत की सज़ा दी है. दशकों बाद देश में मौत की सज़ा दी गई है.
पूर्व सांसद फ्यो ज़िया थॉ, लेखक और कार्यकर्ता को जिमी, ला म्यो आंग और आंग थुरा ज़ॉ पर 'आतंकी गतिविधियों' को अंजाम देने के आरोप थे.
मौत की सज़ा का एलान पहली बार सेना ने इसी साल जून महीने में किया था. उस समय इस निर्णय की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई थी.
ये मौत की सज़ा वर्ष 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के दौरान के मामलों में दी गई है.
उस समय सेना ने आंग सांग सू ची की अगुवाई वाली नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनी गई सरकार का तख्तापलट कर दिया था. इसके विरोध में भारी विरोध-प्रदर्शनों को भी सेना ने तेज़ी से दबा दिया.
तख्तापलट के विरोध में बनी म्यांमार की सांकेतिक नेशनल यूनिटी सरकार (एनयूजी) ने इन हत्याओं पर दुख और हैरानी जताते हुए निंदा की है.
एनयूजी ने कहा है कि मौत की सज़ा पाने वालों में लोकतंत्र के समर्थक, सशस्त्र नस्लीय समूहों के प्रतिनिधि और एनएलडी के सदस्य शामिल हैं.
एनयूजी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वो 'सत्ता में बैठी हत्यारी सेना को उनकी बर्बरता और हत्याओं के लिए सज़ा दे.'
चरमपंथी गतिविधियों को अंजाम देने का आरोप
सरकारी न्यूज़ आउटलेट- ग्लोबल न्यूज़ लाइट ऑफ़ म्यांमार ने कहा कि इन चार लोगों को इसलिए मौत की सज़ा दी गई क्योंकि उन्होंने 'अमानवीय और आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने का प्रबंध किया और साज़िश रची.'
ख़बर में ये भी बताया गया है कि इन पर आतंकवाद रोधी क़ानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया था. हालांकि, ये अभी तक स्पष्ट नहीं है कि चारों लोगों को कब और कैसे मौत की सज़ा दी गई है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्ष 1988 के बाद से ये पहली बार है, जब म्यांमार में लोगों को मौत की सज़ा दी गई है. इससे पहले म्यांमार में मौत की सज़ा के लिए फांसी दी जाती थी.

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बीबीसी बर्मीज़ को मिली जानकारी के अनुसार, इन चार लोगों के परिजन रंगून की जेल प्रशासन पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
परिवार को नहीं सौंपे गए शव
मौत की सज़ा पाने वालों में से एक को जिमी भी हैं. जिमी की बहन ने बीबीसी को बताया कि परिजन जेल के बाहर खड़े हैं और उन्हें अभी तक शव नहीं सौंपे गए हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, फ़्यो की पत्नी थाज़िन यंट आंग ने कहा कि उन्हें उनके पति को मौत की सज़ा दिए जाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई. अब चारों परिवारों ने मौत की सज़ा पर जानकारी मांगी है.
इसी साल जनवरी में बंद दरवाज़ों में हुई सुनवाई के बाद इन चारों लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी, जिसे अपारदर्शी बताते हुए मानवाधिकार गुटों ने इसकी आलोचना की थी. फ़्यो ज़ीया था और क्यॉ मिन यू (को जिमी) जून महीने में अपनी सज़ा के ख़िलाफ़ दायर किया केस हार गए थे.
53 वर्ष के को जिमी 1988 में सैन्य सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुए छात्रों के लोकतंत्र समर्थक आंदोलन '88 जनरेशन स्टूडेंट्स ग्रुप' के वरिष्ठ सदस्य थे. देश में लोकतंत्र समर्थक गतिविधियों में शामिल होने की वजह से उन्हें कई बार जेल की सज़ा दी गई. वर्ष 2012 में को जिम आख़िरकार रिहा हुए.
को जिम को बीते साल अक्टूबर में एक बार फिर से गिरफ़्तार किया गया. इस बार उन पर अपने रंगून स्थित घर में हथियार, गोला-बारूद छिपाने और नेशनल यूनिटी सरकार का 'सलाहकार' होने का आरोप था.
फ़्यो ज़ीया थॉ 21 वर्ष के पूर्व एनएलडी सांसद थे. उन्हें आंग सांग सू की का क़रीबी सहयोगी भी माना जाता था.
हिप-हॉप कलाकार रहे ज़ीया पर अक्सर सेना-विरोधी गाने लिखने का आरोप लगता था और इसके लिए वो सेना के निशाने पर भी रहते थे. उन्हें बीते साल आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.
अन्य दो कार्यकर्ताओं ला म्यो आंग और आंग थुरा ज़ॉ के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. इन दोनों को एक महिला की हत्या के आरोप में मौत की सज़ा दी गई है. ये महिला कथित तौर पर सेना की ख़बरी थी.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चारों एक्टिविस्ट को मौत की सज़ा दिए जाने को 'जीवन, आज़ादी और सुरक्षा के अधिकार' का घोर उल्लंघन बताया है.

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बीते साल से म्यांमार की सत्ता पर काबिज़ होने के बाद से सैन्य प्रशासन ने स्थानीय विद्रोही गुटों, विपक्षी कार्यकर्ताओं और सैन्य तख्तापलट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों पर कठोर कार्रवाई को तेज़ कर दिया है.
सैन्य प्रशासन ने म्यांमार के चुनावों में धांधली का दावा किया था. इस चुनाव में आंग सांग सू ची की पार्टी को जीत मिली थी. वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को ये कहते हुए ख़ारिज किया कि धांधली का कोई सबूत नहीं है.
सैन्य तख्तापलट के बाद से सू ची नज़रबंद हैं और उन पर भ्रष्टाचार से लेकर देश के गोपनीय सूचनाओं से जुड़े क़ानून का उल्लंघन करने तक कई आरोप लगाए गए हैं. इन आरोपों के साबित होने पर उन्हें 150 साल तक की क़ैद सुनाई जा सकती है.
सेना की ओर से जेल या हिरासत में भेजे गए और मारे जाने वाले लोगों का आंकड़ा दर्ज करने वाली संस्था असिस्टेंस असोसिएशन फ़ॉर पॉलिटिकल प्रिज़नर्स (एएपीपी) कहती है कि तख्तापलट के बाद से अब तक 14 हज़ार 847 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. वहीं, एक अनुमान के मुताबिक़ सैन्य बलों ने दो हज़ार से अधिक लोगों की हत्या की है.
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