पाकिस्तान: मुल्क, सियासत, समाज और अर्थव्यवस्था पर फौज कैसे रखती है लगाम

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सैयदा अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला,ढाका
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के अध्यक्ष शहबाज़ शरीफ़ कुछ दिनों के नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के बाद मुल्क के प्रधानमंत्री बन गए.
इससे पहले अविश्वास मत का प्रस्ताव पारित होने की वजह से इमरान ख़ान को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था.
पाकिस्तान में इमरान ख़ान से पहले किसी भी प्रधानमंत्री को अविश्वास मत हारने की वजह से सत्ता से बेदखल नहीं होना पड़ा था.
इमरान ख़ान की हुकूमत के पतन के साथ ही पाकिस्तान की सियासत में सेना की भूमिका पर एक बार फिर से सवाल उठे.
कुछ हलकों में ये कहा गया कि इमरान ख़ान की कुर्सी फौज की वजह से ही गई. कुछ विश्लेषकों का ये मानना है कि इमरान ख़ान को सेना के साथ मतभेदों का खामियाजा भुगतना पड़ा.
हालांकि पाकिस्तान के सियासी फलक पर पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, उसमें फौज का जिक्र तो आया पर ऐसा लगा कि इस घटनाक्रम से फासला बनाकर रखने में फौज कामयाब रही.
ऐसे में ये सवाल पूछा जा सकता है कि मुल्क की सियासत में फौज ये रसूख कैसे बना पाई और उसने कैसे इसे बरकरार रखा हुआ है?
केवल इस बार ही नहीं पाकिस्तान की राजनीति में किसी भी बदलाव में सेना की भूमिका अपरिहार्य हो गई है.
सुरक्षा के मुद्दे
1947 में जब पाकिस्तान एक नए राष्ट्र के तौर पर उभरा तब इसकी कमान इसके राजनीतिक नेतृत्व के पास थी. लेकिन थोड़े ही समय में देश की राजनीति में सेना घुस आई.
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की राजनीति में सेना शुरू से ही शामिल रही है.
किंग्स कॉलेज लंदन में डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री स्टडीज की सीनियर फेलो और पाकिस्तानी मामलों की विश्लेषक आयशा सिद्दिकी का कहना है पाकिस्तान के लिए सुरक्षा का मुद्दा सबसे अहम रहा है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पाकिस्तान अस्तित्व में आया था और तभी से यह मुद्दा इसके लिए यह अहम बन गया था.
वह कहती हैं, "यही वजह है कि सेना को यहां शुरू से ही अहमियत मिल गई. फिर धीरे-धीरे यह उस स्थिति में आ गई जहां वह राजनीति को प्रभावित कर सके."
वह कहती हैं, "दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सेना काफी महत्वपूर्ण हो गई क्योंकि वहां राष्ट्र की सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा बन गई थी. इसके बाद सेना एक स्वायत्त संस्थान बन गई."
वह कहती हैं, "सेना शुरू से ही राजनीतिक नेताओं के नियंत्रण से दूर रही. उसने अपने लगाम उन्हें नहीं दी."
आयशा सिद्दिकी कहती हैं, "सेना ने अपने फैसले खुद किए. रक्षा मामलों से जुड़े सभी फैसले सेना से प्रभावित रहे. सेना ने कभी भी राजनीतिक नेताओं को सेना से जुड़े मुद्दों पर बहस या हस्तक्षेप नहीं करने दिया और न ही इस बारे में कोई फैसला लेने दिया. सेना एक स्वायत्त संस्था बन गई. और धीरे-धीरे यह काफी ताकतवर संस्था बन गई."

इमेज स्रोत, Getty Images
राजनीतिक नेतृत्व की नाकामी
पाकिस्तान में सेना की हैसियत अब इतनी मजबूत हो गई है कि वहां कोई भी राजनीतिक पार्टी उससे समझौता किए बगैर टिक नहीं सकती. पाकिस्तान में अभी तक कोई प्रधानमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है.
लेकिन सेना के सत्ता संरचना के काफी करीब होने के बावजूद पाकिस्तान में पहला सैनिक तख्तापलट 1956 में जनरल अयूब खान के नेतृत्व में हुआ.
इससे पहले देश का शासन चलाने के लिए सेना और राजनीतिक नेताओं के गठबंधन वाली व्यवस्था बनी. विश्लेषकों का कहना है कि यह स्थिति राजनीतिक नेताओं की अक्षमता की वजह से आई.
ढाका यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग की लेक्चरर अमीना मोहसिन का कहना है कि पाकिस्तान में राजनीतिक नेतृत्व लगातार सेना पर निर्भर रहा है. सेना और राजनीतिक नेतृत्व अलग नहीं हो पाए. इसीलिए सेना का इतना वर्चस्व हो गया है.
अमीना मोहसिन ने कहा, "चूंकि पाकिस्तान में एक राजनीतिक निर्वात था इसलिए सिविल-मिलिट्री गठजोड़ अस्तित्व में आया, जिसमें नौकरशाहों के हाथ में काफी ताकत थी. लिहाजा नौकरशाह, सेना और खुफिया एजेंसियां ताकतवर बन कर उभरीं."
वह कहती हैं, "ऐसे हालात में खुफिया सेवाएं काफी मजबूत हो गईं. पाकिस्तान में जिस तरह से आईएसआई मजबूत है, उससे यह साफ पता चलता है. एक वक्त में यह भी देखा गया कि राजनीतिक नेताओं ने उनसे मिले मौके का काफी फायदा लिया. इस वजह से वे उन पर आश्रित हो गए. सेना की ताकत काफी बढ़ गई."
"अगर आप लोकतंत्र के दूसरे संस्थान नहीं तैयार करते तो सेना काफी मजबूत हो जाती है. और पाकिस्तान में भी यही हुआ."
अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत
पहले सैनिक तख्तापलट के बाद सेना बैरकों में नहीं लौटी. देश चलाने का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व के पास लौट आया लेकिन सेना सत्ता में बनी रही.
पाकिस्तान के 65 साल के इतिहास में सेना ने 33 साल तक शासन किया. सेना जब सत्ता में नहीं रही तो भी हर चीज में उसका वर्चस्व बना रहा.
यही वजह है कि सेना ने सुरक्षा के सवाल का इस्तेमाल किया है. चूंकि एक देश के तौर पर उभरने के साथ ही पाकिस्तान भारत के साथ युद्ध में उतर पड़ा इसलिए उसके लिए सुरक्षा के मुद्दे को स्थापित करना आसान हो गया.
लेकिन आयशा सिद्दिकी कहती है कि इसमें आर्थिक वजहें भी अहम हैं. पाकिस्तान का एक तिहाई खर्च सेना चलाती है. सेना कई तरह के कारोबार में लगी है. वह खेती और औद्योगिक उत्पादन के कारोबार में भी है.
वह कहती हैं, "सेना पाकिस्तान में सबसे बड़ी आर्थिक ताकत में से एक है. खेती से लेकर औद्योगिक उत्पादन तक, ऐसे सैकड़ों कारोबार है, जिनमें सेना लगी हुई है. केंद्र सरकार का 30 फीसदी खर्च सेना वहन करती है. इसमें रक्षा बजट और पेंशन भी शामिल है."
आयशा सिद्दिकी बताती हैं, "सेना खेती, शिक्षा और फर्टिलाइजर फैक्टरियों के कारोबार में है. वो समाज को इसके जरिये नियंत्रित करती है, सैन्य शिक्षा के जरिये इस बात को प्रचारित करती है कि सेना ही एक मात्र ताकत है जो इस देश को घरेलू और बाहरी दुश्मनों को बचाती है. लोग इस बात पर भरोसा करते हैं."

इमेज स्रोत, Anadolu Agency
विदेश नीति पर काबू
पाकिस्तान की सेना का इसकी विदेश नीति से काफी नजदीकी रिश्ता है. कहा जाता है कि पाकिस्तान का दुश्मन हो या दोस्त, बाहरी दुनिया में उसके संबंध सेना मुख्यालय से ही तय होते हैं.
यहां तक पाकिस्तान की सेना भी बाहरी दुनिया से अपने रिश्ते बारे में खुलेआम बात करती रही है. पाकिस्तान के आर्मी चीफ क़मर जावेद बाजवा ने यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन नहीं किया था.
लेकिन उस दौरान रूस पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि वह इस युद्ध पर टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं.
तमाम आलोचनाओं के बावजूद पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी पाकिस्तान विदेश नीति पर सेना का असर का सही ठहराते हैं.
पाकिस्तान के एक पूर्व सैन्य अधिकारी और कराची काउंसिल ऑन फॉरन रिलेशन्स के चेयरमैन इकराम सहगल का कहना है कि पाकिस्तान की विदेश नीति को सेना हमेशा प्रभावित करती रही है. इसमें कोई नई बात नहीं है. जब पाकिस्तान और बांग्लादेश अलग-अलग नहीं थी तब भी सेना का प्रभाव था.
सहगल कहते हैं, "सेना की खुफिया एजेंसी एक संगठित व्यवस्था के तहत काम करती है. इसके जरिये ये खबरें इकट्ठा और विश्लेषित करती हैं. इसके बाद वह इसे विदेश विभाग को भेजती हैं.फिर वे विदेश विभाग से मिलकर काम करती हैं."
लोकतंत्र को क्या ख़तरा है?
विश्लेषकों का कहना है कि किसी समाज में लोकतांत्रिक माहौल सुनिश्चित करने के लिए जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वो ये है कि आम लोग किसी से डरे नहीं और उनके भीतर ज़िम्मेदारी की भावना हो. पाकिस्तान में हमेशा से इसकी कमी खलती रही है.
दरअसल, ये देश की राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा हुआ है. इसीलिए लोगों के बीच जिम्मेदारी का एहसास पैदा करने की ज़रूरत महसूस की जाती रही है. लेकिन ऐसा कभी देखा सुना नहीं गया है कि पाकिस्तानी समाज ने सेना के अधिकारों पर कभी सवाल खड़ा किया हो.
विश्लेषक आयशा सिद्दिकी इसकी वजह बताती हैं. उनकी राय में जब कभी भी लोगों की ओर से विरोध की संभावना बनती है, उसे कड़ाई से दबा दिया जाता है.
हालांकि इस दलील का एक दूसरा पहलू भी है. बहुत से लोग ये भी मानते हैं कि लगभग दो दशकों से पाकिस्तान का निज़ाम चुनी हुई सरकारों के हाथ में रहा है और सत्ता पर सेना का कोई सीधा असर नहीं महसूस किया गया. यही वजह है कि लोग अपनी समस्याओं के लिए सेना को दोष देने के बजाय राजनीतिक नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं.
पाकिस्तानी पत्रकार और रक्षा मामलों की जानकार नसीम ज़ेहरा इस सवाल का जवाब देती हैं कि पाकिस्तान में सेना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन क्यों नहीं होते हैं?
वो कहती हैं, "पिछले दो दशकों से मुल्क में चुनी हुई सरकारें हुकूमत में रही हैं. इसलिए आम जनता को सेना की ओर से किसी फ़ैसले का सीधे तौर पर सामना नहीं करना पड़ा है जो मार्शल लॉ (सैनिक तानाशाही) के दौर में उन्हें झेलना पड़ता था."
"लोगों के सामने अब एक चुनी हुई सरकार है. इसलिए जब कभी भी सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर सवाल खड़ा होता है तो लोग निर्वाचित सरकारों के ख़िलाफ़ अपनी स्पष्ट राय बनाते हैं. ऐसी सूरत में सेना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने का कोई मतलब नहीं रह जाता है."

इमेज स्रोत, AAMIR QURESHI
क्या बदलाव दस्तक दे रहा है?
ऐतिहासिक रूप से अस्सी के दशक में सेना एशिया और मध्य पूर्व के कई देशों में हुकूमत में थी. लेकिन जैसे-जैसे इन देशों में सामाजिक व्यवस्था में बदलाव हुए, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज में काफी बदलाव हुए. ठीक इसी तरह पाकिस्तानी समाज भी अब पहले जैसा नहीं रहा और राजनीति में फौज की दखल के तौर-तरीके भी बदले हैं.
पिछले दिनों जब पाकिस्तान में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी था तो सेना ने इमरान खान से दूरी बनाए रखते हुए भी यह संदेश दे दिया कि वह उनके समर्थन में नहीं है.
पिछले कुछ वर्षों से देश की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर कई सामाजिक मुद्दों पर काफी मुखर रही है. इनमें से कई इमरान खान के समर्थक हैं. ये लोग सेना की ईमानदारी पर सवाल कर रहे हैं. ये युवा 'चौकीदार चोर है' के नारे लगा रहे हैं. लेकिन विश्लेषक इस बात को लेकर निश्चित नहीं है कि ये विरोध कब तक चलेगा. विश्लेषक आयशा सिद्दीकी को तो नहीं लगता है कि निकट भविष्य में सत्ता पर सेना की पकड़ ढीली पड़ेगी या फिर उसका प्रभाव कम होगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)




















