रूस-यूक्रेन युद्ध: क्या युद्ध अपराधों के लिए पुतिन पर चल सकता है केस?– दुनिया जहान

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25 मार्च 2022, रूस-यूक्रेन युद्ध को क़रीब एक महीना हो चुका था. यूक्रेन से जान बचाकर आए शरणार्थियों और अमेरिकी सैनिकों से मुलाक़ात करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन यूक्रेन के पड़ोसी देश पोलैंड पहुंचे.
पोलैंड के ज़ेशूफ़ में उन्होंने वही बात दोहराई जो दो दिन पहले अमेरिकी प्रशासन ने कहा था. उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर यूक्रेन के मारियुपोल में युद्ध अपराध करने का आरोप लगाया. क़रीब दो सप्ताह पहले भी बाइडन ने व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम में कहा था कि वो पुतिन को युद्ध अपराधी मानते हैं.
कुछ इसी वक़्त नीदरलैंड्स के द हेग में 38 देशों के प्रतिनिधियों की मुलाक़ात हुई. इन देशों ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट से रूस के ख़िलाफ़ कथित युद्ध अपराधों की जांच करने की गुज़ारिश की.
तो दुनिया जहान में इस सप्ताह पड़ताल इस बात की कि क्या यूक्रेन में कथित युद्ध अपराधों के लिए व्लादिमीर पुतिन को अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में खड़ा किया जा सकता है.

जंग के मैदान में मानवाधिकार
1862 में स्विस मानवाधिकार कार्यकर्ता हेनरी डूनो की लिखी किताब 'अ मेमोरी ऑफ़ सोल्फ़रीनो' प्रकाशित हुई थी. इस किताब में 1859 के इटली युद्ध के घायल सैनिकों का मार्मिक चित्रण था. इसने दुनिया को झकझोर कर रख दिया.
क्लाउस रैकवित्ज़ जर्मनी के इंटरनेशनल न्यूरमबर्ग प्रिंसिपल्स एकेडमी में निदेशक हैं. हेनरी डूनो की किताब के छपने के सालभर बाद स्विट्ज़रलैंड में 12 यूरोपीय देशों ने जेनेवा कन्वेंशन नाम के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.
वो कहते हैं, "ये युद्ध के दौरान क्रूरता और अमानवीय अत्याचार रोकने की कोशिश थी. इस समझौते में कई तरह के नियम थे. जैसे, घायल सैनिक को जंग के मैदान में इसलिए मरने के लिए छोड़ा नहीं जा सकता कि वो दुश्मन सेना से है. युद्धबंदियों को अमानवीय हालात में नहीं रखा जा सकता. जानकारी निकालने के लिए किसी को टॉर्चर नहीं किया जा सकता. अस्पतालों या घायलों का इलाज करने वाली जगहों पर हमला अस्वीकार्य है."
उस वक़्त जंग के मैदान में मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में ये बड़ी पहल थी. बाद में कई और समझौतों को साथ लेकर जेनेवा कन्वेंशन्स बनाया गया. लेकिन, इनका पालन करने को लेकर मुल्कों पर क़ानूनी प्रतिबद्धता नहीं थी, इसलिए उम्मीद के अनुरूप नतीजा भी नहीं मिला.
क्लाउस रैकवित्ज़ कहते हैं, "जेनेवा और हेग कन्वेंशन्स में युद्ध के कुछ तरीकों पर रोक लगाई गई थी. लेकिन न तो सज़ा का प्रावधान था और न ही प्रतिबंधों की व्यवस्था. ये कमी इन कन्वेंशन्स के मूल सिद्धांत में थी. जैसे जेनेवा कन्वेंशन में युद्धबंदियों पर अत्याचार पर मनाही है लेकिन ऐसा करने पर क्या होगा ये स्पष्ट नहीं है."

पहले विश्व युद्ध के बाद अपराधों के लिए ज़िम्मेदारी तय करने और सज़ा देने पर बहस छिड़ी. 1919 में वर्साय की संधि हुई जिसमें जर्मनी के सम्राट काएज़र विल्हम द्वितीय के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में मामला चलाने को लेकर एक धारा जोड़ी गई थी.
क्लाउस रैकवित्ज़ कहते हैं, "इसमें एक आधारभूत समस्या थी. ये संधि जर्मनी और प्रथम विश्व युद्ध के विजेता मित्र देशों के बीच हुई थी. जर्मनी के सम्राट भागकर नीदरलैंड चले गए थे, जो संधि में शामिल नहीं था. ऐसे में उनपर मुकदमा चलाना असंभव था."
काएज़र विल्हम पर कभी मुकदमा नहीं चलाया जा सका. कई सालों तक नीदरलैंड्स में रहने के बाद 82 साल की उम्र में 1941 में वहीं पर उनका देहांत हुआ.
उस वक़्त एक ऐसे समझौते की ज़रूरत महसूस की गई जिसमें अधिक देश शामिल हों और जिसमें युद्ध अपराध की सज़ा देने के कारगर तरीके हों. इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उठाया गया.
क्लाउस रैकवित्ज़ कहते हैं, "उस वक़्त जो हुआ वो असल मायनों में बड़ा बदलाव था. अगस्त 1945 में लंदन में मित्र देशों के प्रतिनिधियों की मुलाक़ात हुई. इसमें नाज़ी जर्मनी में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए युद्ध अपराध करने वालों को कटघरे में खड़ा करने के लिए न्यूरमबर्ग में इंटरनेशनल मिलिटरी ट्राइब्यूनल बनाने पर सहमति बनी."
ट्राइब्यूनल में कार्रवाई क़रीब एक साल तक चली. 24 पूर्व नाज़ी सेना अधिकारियों और नेताओं पर मुकदमा चलाया गया. 12 लोगों को फांसी दी गई. इनमें नाज़ी ख़ुफ़िया पुलिस, गेस्टापो की स्थापना करने वाले हर्मन गोरिंग शामिल थे. बाकियों को जेल की सज़ा सुनाई गई.
वो कहते हैं, "एक महत्वपूर्ण फ़र्क ये था कि इसमें युद्ध अपराध के लिए किसी मुल्क़ को नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष को ज़िम्मेदार ठहराया गया था. मुकदमा जर्मनी के ख़िलाफ़ नहीं था, बल्कि नाज़ी नेताओं और अधिकारियों के ख़िलाफ़ था. पहले हुए जेनेवा कन्वेंशन में ऐसा नहीं था."
न्यूरमबर्ग ट्राइब्यूनल ने ये स्पष्ट कर दिया कि युद्ध अपराध के दोषियों को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है.
1949 में दुनिया के लगभग सभी देशों ने जेनेवा कन्वेंशन्स पर हस्ताक्षर कर दिए. लेकिन इसका मलतब ये नहीं था कि युद्ध अपराध के लिए ज़िम्मेदार लोगों को दोषी करार देने की समस्या सुलझ गई.

90 के दशक के संघर्ष
1991 में पूर्व यूगोस्लाविया के अलग-अलग नस्लीय समुदायों के बीच संघर्ष छिड़ गया. दो साल बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने युद्ध अपराध के दोषियों पर मुक़दमा चलाने के लिए एक इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्राइब्यूनल बनाया.
पेट्रिशिया ग्रिज़बैक यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉरसा में प्रोफ़ेसर हैं और 'क्रिमिनल रेस्पॉन्सिबिलिटी फ़ॉर द क्राइम ऑफ़ अग्रेशन' की लेखिका हैं. वो कहती हैं कि मुक़दमे के लिए पूर्व यूगोस्लाविया में शामिल सर्बिया, बोस्निया और क्रोएशिया को आरोपियों को कोर्ट को सौंपना था, यही सबसे बड़ी मुश्किल थी.
वो कहती हैं, "ये ट्राइब्यूनल सुरक्षा परिषद ने बनाया था इसलिए इसके साथ सहयोग करना देशों की प्रतिबद्धता थी लेकिन वो न तो किसी को गिरफ़्तार करना चाहते थे और न सबूत इकट्ठा करना चाहते थे. कारगर तरीके से मुक़दमा चलाने के लिए आरोपी चाहिए और सबूत और गवाह चाहिए. अगर मुल्क सहयोग न करें तो सबूत इकट्ठा करना, अभियोजकों को भेजना, गवाही लेना और गिरफ़्तारी करना असंभव होता है."
युद्ध ख़त्म होने के बाद ही कोर्ट सही तरीके से काम कर सकी. बाद में डेढ़ सौ से अधिक लोगों पर मुक़दमा चलाया गया. इनमें सर्बिया और यूगोस्लाविया के पूर्व राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच और बोस्नियाई सर्ब नेता राडोवान कैराडिच और राट्को म्लाडिच शामिल थे.
20 साल तक चले इस ट्राइब्यूनल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार क़ानूनों को नई दिशा दी.
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जिस वक़्त यूगोस्लाविया में संघर्ष चल रहा था, उस वक़्त अफ्ऱीका में भी स्थिति बेकाबू हो रही थी. रवांडा के दो मुख्य नस्लीय समुदाय हूतू और तुत्सी के बीच हिंसक संघर्ष छिड़ गया.
1994 में केवल सौ दिनों के भीतर हूतू विद्रोहियों ने क़रीब आठ लाख तुत्सियों की हत्या कर दी. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने रवांडा के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्राइब्यूनल बनाया.
पेट्रिशिया कहती हैं, "अभियोजकों को ये तय करना था कि इसके लिए ज़िम्मेदार किसे ठहराया जाए. रवांडा के मामले में उन्होंने उन लोगों को दोषी ठहराया जो सरकार में ऊंचे पदों बैठे पर थे. आरोपियों में कई नेताओं और मंत्रियों के नाम थे. हालांकि, उन्होंने दशकभर तक घटना की ज़िम्मेदारी नहीं ली."
ट्राइब्यूनल ने कुल 61 लोगों को सज़ा सुनाई. इनमें रवांडा के पूर्व प्रधानमंत्री शॉन केम्बैन्डा भी शामिल थे. वो पहले राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्हें नरसंहार के लिए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई. इसके आलावा रवांडा में भी कुछ लोगों पर मुक़दमा चलाया गया और कई लोगों को सज़ा दी गई.
रवांडा और यूगोस्लाविया के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्राइब्यूनल केवल दो देशों के मामलों में युद्ध अपराधियों को सज़ा देने के लिए बनाए गए थे.
इसके बाद 1998 में क़रीब सौ देशों ने रोम स्टैट्यूट यानी रोम क़ानून पर हस्ताक्षर किए जिससे युद्ध अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए एक स्थायी इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट बनाने का रास्ता साफ़ हुआ.
लेकिन कुछ देश कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं, इनमें अमेरिका, चीन और रूस अहम हैं.

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यूक्रेन में युद्ध अपराध
यूक्रेन से मिली कई ख़बरों के अनुसार रूसी सेना जानबूझकर वहां आम नागरिकों पर हमले कर रही है. मारियुपोल शहर के एक अस्पताल पर बम हमला इसका उदाहरण है. लेकिन क्या इसे युद्ध अपराध कह सकते हैं?
बेल्किस विले ह्यूमन राइट्स वॉच के क्राइसिस एंड कंफ्लिक्ट डिविज़न में सीनियर रिसर्चर हैं. ये उन चंद संगठनों में से एक है जो स्वतंत्र रूप से यूक्रेन में कथित युद्ध अपराधों के सबूत इकट्ठा कर रही है.
वो कहती हैं, "हम सबसे पहले ये तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि जहां हमला हुआ क्या वहां उस वक़्त वैध मिलिट्री टार्गेट थे. क्या वहां यूक्रेनी सैनिक तैनात थे, या वहां से गुज़र रहे थे. क्या वहां पास में कोई सैन्य अड्डा या मिलिट्री फैक्ट्री थी."
लेकिन हमले की जगह पर यूक्रेनी सैनिकों की मौजूदगी का पता लगाना पेचीदा मसला है.
वो कहती हैं, "यहां रूसी सैनिकों के ख़िलाफ़ आम नागरिक यूक्रेनी सैनिकों की मदद कर रहे हैं. और फिर यहां मार्शल लॉ लागू है जिसके तहत 18 से 60 साल की उम्र के सभी पुरुषों के लिए सेना में शामिल होना अनिवार्य है. ऐसे में वो आम नागरिक नहीं माने जाएंगे."
एक पहलू ये भी है कि यूगोस्लाविया और रवांडा हिंसा के दौर के मुक़ाबले आज जांचकर्ताओं के लिए सबूत इकट्ठे करना थोड़ा आसान है.
बेल्किस कहती हैं, "आज के वक़्त में वीडियो और तस्वीरें महत्वपूर्ण सबूत हैं. हमले वाली जगहों से लोग सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं. इनका इस्तेमाल सबूत के तौर पर हो सकता है. हालांकि, उससे पहले इनकी सत्यता की पुष्टि ज़रूरी है. आपको ये भी समझना होगा कि इनसे पूरी तस्वीर नहीं मिलती क्योंकि तस्वीर लेने वाला ये तय करता है कि वो क्या दिखाना चाहता है."
यानी तस्वीरों या वीडियो की पुष्टि होने के बाद सही तस्वीर देखने की कोशिश की जानी चाहिए. उदाहरण के तौर पर अगर यूक्रेनी सैनिकों ने अस्पताल में हथियार या उपकरण छिपाए हैं तो असल में युद्ध अपराध वो कर रहे हैं.
और फिर सवाल ये भी है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचा तो क्या युद्ध अपराध की संभावना बढ़ जाती है?
बेल्किस के अनुसार, "मुझे लगता है कि ये गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि अगर संघर्ष नहीं थमा तो वक़्त के साथ लोगों का बर्ताव और हिंसक हो सकता है. आप दूसरी तरह के युद्ध अपराध देख सकते हैं जैसे, कथित तौर पर लोगों को जबरन दूसरी जगहों पर ले जाना या पकड़े गए लोगों की हत्या करना."

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कटघरे तक का रास्ता
चीन, भारत और ईरान समेत 35 देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध मामले में संयुक्त राष्ट्र के निंदा प्रस्ताव पर वोट करने से इनकार किया है. वहीं, क़रीब 40 देशों ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट से इस संघर्ष से जुड़े युद्ध अपराधों की जांच करने की गुज़ारिश की है .
गैरी सिंपसन लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पब्लिक इंटरनेशनल लॉ के प्रोफ़ेसर हैं. वो कहते हैं कि ये महत्वपूर्ण शुरूआत है, हालांकि मुश्किलें अभी भी हैं.
सबसे पहली मुश्किल तो यही है कि रूस इंटरनेशनल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, यानी जिस पर युद्ध अपराध का आरोप है, अगर वो रूस में है तो, रूस पर उसे सौंपने के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता.
वो कहते हैं, "इंटरनेशनल कोर्ट में जिस व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला चलाया जाता है उसे कोर्ट में पेश करना बेहद ज़रूरी होता है. युद्ध के बीच सेना के आला अधिकारियों की कस्टडी मिलना ही मुश्किल है, ऐसे में रूसी राष्ट्रपति को कोर्ट तक लेकर आना असंभव ही है."
लेकिन शायद उम्मीद ये होगी कि इंटरनेशनल कोर्ट में पुतिन के ख़िलाफ़ मामला चलाए जाने की आशंका को देखते हुए रूस यूक्रेन में मानवाधिकारों का उल्लंघन न करे. हालांकि, असर उल्टा भी हो सकता है.
गैरी सिंपसन कहते हैं, "हो सकता है, युद्ध अपराध के मुक़दमे की आशंका रूस को जीत के लिए प्रेरित करे. 1940 के दशक में जर्मनी युद्ध जीतना चाहता था क्योंकि वो जानता था कि हारे तो मुक़दमा चलेगा और उस वक़्त युद्ध अपराध के मामलों में मौत की सज़ा होती थी. मुझे लगता है कि कभी-कभी माफ़ी की नीति बेहतर होती है, ख़ासकर तब, जब बातचीत की गुंजाइश बाकी हो. मेरा मानना है कि हमें बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए."
लेकिन क्या ये संभव है कि युद्धविराम के समझौते में माफ़ी की बात को क़ानूनी तौर पर शामिल किया जाए?
वो कहते हैं, "बिल्कुल, ऐसा हो सकता है. कूटनीतिक प्रक्रिया के तहत पुतिन रूसी सैनिकों और नेताओं के लिए माफ़ी की मांग कर सकते हैं. हालांकि, ये पेचीदा मामला होगा क्योंकि इंटरनेशनल कोर्ट शांति कायम करने के लिए जांच नहीं रोकना चाहेगा."
हमें ये भी समझना होगा कि यूक्रेन रोम क़ानून पर हस्ताक्षर कर चुका है, लेकिन हो सकता है कि वो रूस के मामले में अपनी न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल करना चाहे.
गैरी सिंपसन समझाते हैं, "कई बार ऐसा होता है कि मुल्क युद्ध अपराधी को किसी दूसरे देश को सौंपने की बजाय खुद उस पर मुक़दमा चलाना चाहते हैं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पोलैंड, बुल्गारिया और फिनलैंड में न्यूरमबर्ग ट्रायल के साथ-साथ देश के भीतर भी मामले चलाए गए थे. मुल्क देश के भीतर सुनवाई करते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके लिए दबाव बनाते हैं."


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लौटते हैं अपने सवाल पर- क्या यूक्रेन में कथित युद्ध अपराधों के लिए पुतिन के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में मुक़दमा चलाया जा सकता है.
केवल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ही नहीं बल्कि रूसी सेना के आला अधिकारियों के ख़िलाफ़ कथित युद्ध अपराध से जुड़े सबूत इकट्ठा किए जा रहे हैं और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में उन्हें कटघरे में खड़ा करने को लेकर दबाव बढ़ रहा है.
लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि रूस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, और इस कारण पुतिन और दूसरे रूसी अधिकारी कोर्ट की पहुंच से दूर होंगे. हालांकि, अगर यूक्रेन किसी रूसी अधिकारी को पकड़ सका तो शायद तस्वीर अलग होगी.
हमारे चौथे एक्सपर्ट गैरी सिंपसन के शब्दों में "व्लादिमीर पुतिन या उनके जनरलों के ख़िलाफ़ मुक़दमा असंभव ही लगता है. लेकिन फिर, 77 साल पहले न्यूरमबर्ग ट्रायल्स भी असंभव ही लगे होंगे. अभी सीमित ही सही, कम से कम रास्ते बाक़ी तो हैं."
प्रोड्यूसर - मानसी दाश
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