डर्टी फ़्यूल कहा जाने वाला कोयला एक बार फिर इतनी डिमांड में क्यों है?

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    • Author, अलेक्सी काल्मीलोव
    • पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा

लगता है कि ईंधन के रूप में कोयले का पुनर्जन्म होने जा रहा है.

भले ही दुनिया भर के तमाम देशों ने ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने का वादा कर रखा है, लेकिन इसके बावजूद धरती का सबसे गंदा ईंधन कहा जाने वाला कोयला, जो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का प्रमुख स्रोत रहा है, एक बार फिर से बहुत डिमांड में है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि सब कुछ बुरा ही हो रहा है, ग्रीन एनर्जी और कोयले की खपत को लेकर कुछ अच्छी ख़बरें भी हैं.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) ने अनुमान लगाया है कि अगले तीन सालों तक कोयले की खपत में कमी नहीं होने वाली है और कोयले की खपत के लिहाज से 2021 एक रिकॉर्ड वाला साल रहा.

इसकी वजह भी थी. दुनिया कोरोना महामारी के कारण बने हालात के बाद तेज़ी से उबर रही थी. ऊर्जा की ज़्यादा खपत होना लाज़िमी ही था.

गैस, पवन और सौर ऊर्जा बिजली की बेतहाशा बढ़ी मांग को पूरा कर पाने के लिए काफी नहीं थे. इसलिए दुनिया ने पर्यावरणविदों के विरोध के बावजूद फिर से कोयले को जलाना शुरू कर दिया.

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इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट

कोयले की खपत को लेकर आईईए ने अपने हिसाब-किताब में बताया, "साल 2019 और 2020 में कोयले की खपत में आई कमी के बाद ऐसा लगा था कि साल 2018 ही मांग के लिहाज से रिकॉर्ड साल रहा था. लेकिन 2021 ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया. साल 2021 में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों में उत्पादन 9 फ़ीसद बढ़ गया."

यूरोप में ख़राब मौसम ने हालात और बिगाड़ दिए. हाल के महीनों में वहां सर्दी ज़्यादा महसूस की गई. नैचुरल गैस की सप्लाई उम्मीद से कम मिली. यूरोप की गैस की ज़रूरत का एक तिहाई रूस सप्लाई करता है. फ्रांस ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर मरम्मती का काम चल रहा था.

इन हालात में कोयले की ज़रूरत एक बार फिर से बढ़ गई. चीन ने अपने उन कोयला खदानों पर काम एक बार फिर शुरू कर दिया, जहां पहले माइनिंग बंद कर दी गई थी. सिर्फ़ इतना ही नहीं, उसने उत्पादन को अधिकतम क्षमता तक बढ़ा दिया.

चीन ने ऑस्ट्रेलिया से कूटनीतिक तनाव के बीच उससे कोयले की ख़रीद रोक दी थी. लेकिन विश्व बाज़ार में ऊंची कीमतों और सामानों के वैश्विक परिवहन में आई अड़चनों के कारण चीन अपनी कोयला ज़रूरत की भरपाई जल्दी नहीं कर पाया.

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एक नया चलन

ऐसा नहीं है कि कोविड के बाद बने हालात में कोयले की खपत में आया ये इजाफ़ा अस्थाई किस्म का है. ये एक नया चलन है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने चेतावनी देते हुए कहा है कि कोयले पर निर्भरता इतनी जल्दी कम होने वाली नहीं है. साल 2022 में दुनिया पिछले साल की तुलना में 1.5 फीसदी ज़्यादा कोयले की खपत करने वाली है.

आईईए ने अपनी सालाना कोयला रिपोर्ट में लिखा है, "जिस तरह से हालात बन रहे हैं, उससे ये संकेत मिलते हैं कि साल 2022 में दुनिया कोयले का इस्तेमाल अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ जाएगा और ये हालात साल 2024 के आख़िर तक बने रहेंगे."

ये रूस के लिए अच्छी ख़बर है. वो विश्व बाज़ार में फॉसिल फ़्यूल (जीवाश्म ईंधन यानी तेल और गैस) का सबसे बड़ा सप्लायर है और अब वो कोयले का उत्पादन और निर्यात दोनों ही बढ़ा रहा है.

आईईए की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 तक रूस अपना कोयला उत्पादन 2.8 फीसदी तक बढ़ाएगा जबकि पुतिन प्रशासन के अधिकारियों ने ये संकेत दिया है कि रूस अगले 15 सालों में कोयले का निर्यात दोगुना तक बढ़ाना चाहता है.

लेकिन कोयले की बढ़ती वैश्विक खपत हमारी आबोहवा के लिए बुरी ख़बर है.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस बीते कई सालों से वैश्विक बिरादरी से कोयले का इस्तेमाल रोकने को लेकर प्रतिबद्धता जताने का आह्वान कर रहे हैं. लेकिन उनकी अपील का ज़मीन पर कोई असर होता हुआ नहीं दिख रहा है.

नवंबर महीने में ग्लासगो में हुए जलवायु शिखर सम्मेलन में उम्मीद की जा रही थी कि इस संबंध में किसी समझौते तक बात पहुंचेगी लेकिन कोविड महामारी की स्थिति के आगे सबकुछ धरा का धरा रह गया.

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कैसे कोयला ख़ुद का ही भविष्य जला रहा है

हालांकि निराश नहीं होने के लिए हमारे पास कम से कम एक कारण तो है. अब इसे विडंबना समझिए या फिर कुछ और लेकिन कोयले के पुनर्जन्म और रिकॉर्ड प्राकृतिक गैस क़ीमतें आख़िर में ग्रीन एनर्जी को ही बढ़ावा देने का जोखिम उठाती हैं.

और यही वजह है कि कोयले से चलने वाले एक बिजली के संयंत्र को चलाने के लिए, एक यूरोपीय ऊर्जा कंपनी को ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए कोटा ख़रीदना होता है. जितना अधिक उत्सर्जन, उतना ही महंगा.

इस तरह से यूरोपीय संघ इंडस्ट्री और ऊर्जा को ग्रीन इंडस्ट्री और ग्रीन एनर्जी की ओर ले जा रहा है. इस कोटे की क़ीमत इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि यूरोपीय संघ के 27 देशों ने अपने अंतिम शिखर सम्मेलन में सट्टेबाज़ों पर अंकुश लगाने की मांग तक की थी. उन्हें यह भरोसा है कि फ़ाइनेंसर्स के हस्तक्षेप के बिना, प्रति टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन के कोटे की क़ीमत बढ़ नहीं सकती. साल के शुरुआती समय में जहां यह क़ीमत 31 यूरो थी वहीं दिसंबर होते-होते तक 90 यूरो पहुंच गयी. और अकेले नवंबर के बाद से यह पचास फ़ीसद बढ़ा.

यह सब कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स को एक महंगा साधन बनाता है लेकिन मौजूदा समय में नेचुरल गैस की क़ीमत के लिए, कोयला अभी भी क्लीन गैस की तुलना में ज़्यादा फ़ायदेमंद है.

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इसलिए यूरोप आगे भी अपनी कोयले की ख़पत को जारी रखेगा. साथ ही कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन के लिए प्रति टन की क़ीमत भी बढ़ेगी. इसके अलावा मांग में वृद्धि के साथ, सप्लाई कम हो जाती है. क्योंकि समय के साथ इन कोटा की मात्रा भी धीरे-धीरे कम हो जाती है और यूरोपीय संघ साल 2050 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने के लिए दृढ़ संकल्प है. और यही उन लोगों के लिए एक सांत्वना पुरस्कार है जिन्होंने कोयले को ईंधन के रूप में इस्तेमाल ना करने की लड़ाई लड़ी. जिन्होंने साफ़ हवा के लिए लड़ाई लड़ी लेकिन अस्थायी रूप से हार गए. एक टन कार्बन डाई ऑक्साइड कोटा की क़ीमत इस क़दर ऊंची हो चुकी है कि महंगी कही जाने वाली ग्रीन टेक्नोलॉजी अचानक से मुनाफ़े वाली हो गयी है. इस तरह की बहुत सी तकनीकें विकसित होने के चरण में हैं लेकिन दो मुख्य टेक्नोलॉजी अभी औद्योगिक स्तर पर विकसित हो रही हैं. पहला ऊर्जा और परिवहन के लिए हाइड्रोजन और दूसरा उत्सर्जित होने वाले कार्बन का भूमिगत भंडारण.

एफ़टी के एक इंटरव्यू में विश्लेषकों का कहना है कि इन तकनीकों की क़ीमत पहले से ही 75 से 120 पाउंड प्रति टन है लेकिन जो कंपनियां इस तरह के निवेश में रुचि रखती हैं, उनके लिए उत्सर्जन की क़ीमत कुछ सालों के लिए मौजूदा स्तर पर ही बनी रहनी चाहिए.

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कोयले का इस्तेमाल छोड़ने पर कौन, कब और कैसे करेगा भुगतान?

यह सच है कि कोयले का इस्तेमाल करना छोड़ने से केवल आंशिक तौर पर ही कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या का हल निकलेगा क्योंकि ना तो यूरोप और ना तो अमेरिका, दोनों ही कोयले का मुख्य तौर पर इस्तेमाल नहीं करते हैं.

भारत और चीन को यह ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे कोयले पर अपनी निर्भरता को कम करें. आईईए के मुताबिक़, चीन दुनिया के आधे कोयले की खपत करता हैं और आने वाले तीन सालों में इसकी खपत में प्रति वर्ष एक फ़ीसद की वृद्धि होगी. वहीं भारत की बात करें तो भारत में 2024 तक चार फ़ीसद की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान है.

आईईए के अनुसार, "ये दोनों देश दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश हैं और इन दोनों देशों की कुल आबादी क़रीब तीन बिलियन के आसपास है और यही दोनों देश भविष्य में कोयले से प्राप्त ऊर्जा का भविष्य तय करेंगे. बतौर ईंधन कोयले का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि ये देश अपनी घोषणा के मुताबिक़ अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कितनी तत्परता दिखाते हैं और किस तरह से उसे प्राप्त करते हैं."

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भारत और चीन दोनों ने वादा किया है और दोनों ही देशों ने इच्छा जतायी है कि वे कार्बन उत्सर्जन में कमी करना चाहते हैं और भविष्य में कोयले के इस्तेमाल को पूरी तरह ख़त्म करने का विचार रखते हैं. हालांकि इसके लिए कोई स्पष्ट शर्तें नहीं हैं, लेकिन हां इस संबंध में एक समझ ज़रूर है कि वे ऐसा किसी भी क़ीमत पर नहीं करने जा रहे हैं.

हालांकि भारत ने कहा है कि वो वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट ज़ीरो करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगा. नेट ज़ीरो का मतलब होता है कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को पूरी तरह से ख़त्म कर देना.

विकासशील देशों का मानना है कि विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों को ग्रीन-रेवोल्यूशन के लिए बिल भुगतान करना चाहिए क्योंकि उनकी विकास की प्रक्रिया के दौरान हुआ उत्सर्जन ही ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए ज़िम्मेदार है. साथ ही क्योंकि औद्योगिक क्रांति के दौरान इस तरह के कोई प्रतिबंध या शर्तें नहीं थी इसलिए वे आज विकसित हो सके हैं.

आईईए के अनुसार, यूरोप और अमेरिका में अगले साल की शुरुआत में कोयले का चलन लगभग ख़त्म हो जाएगा.

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