कच्चा तेल रिज़र्व भंडार से निकालने पर भारत को क्या हासिल होगा?

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    • Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
    • पदनाम, नई दिल्ली

भारत सरकार ने पेट्रोलियम ईंधन की बढ़ती क़ीमतों पर काबू पाने के लिए अपने रणनीतिक रिज़र्व भंडार से कच्चा तेल निकालने का फ़ैसला लिया है. भारत पहली बार ऐसा कर रहा है.

भारत पेट्रोलियम ईंधन का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि भारत 3.8 करोड़ बैरल के अपने रणनीतिक रिज़र्व भंडार से 50 लाख बैरल कच्चा तेल निकालने जा रहा है.

भारत ने यह फ़ैसला अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया से विचार विमर्श के बाद उठाया है. पेट्रोलियम ईंधन की क़ीमत पर अंकुश लगाने के लिए ये देश तेल उत्पादक देशों पर ज़्यादा उत्पादन के लिए दबाव बना रहे हैं.

हालांकि अमेरिका अब तक ओपेक देशों को पेट्रोलियम उत्पादन बढ़ाने के लिए तैयार नहीं कर सका है. ऐसी स्थिति में रणनीतिक भंडार से कच्चा तेल निकालना भारत के लिए कितना कारगर होगा, इसको लेकर भारतीय मीडिया ने अनिश्चितता जताई है.

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अमेरिका और अन्य देशों के साथ तालमेल

भारतीय अधिकारियों ने कहा है कि वे रणनीतिक भंडार से पचास लाख बैरल कच्चा तेल निकालने की योजना बना रहे हैं. यह देश भर में एक दिन में होने वाले पेट्रोलियम ईंधन की खपत जितना भंडार है.

यह भंडार हिंदुस्तान पेट्रोलियम और मैंगलोर रिफ़ाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (एमआरपीएल) को मिलेगा, क्योंकि विशाखापत्तनम, मैंगलुरु और पादुर स्थित रणनीतिक रिज़र्व भंडार से सीधे भूमिगत पाइपलाइन के ज़रिए ये रिफ़ाइनरी से जुड़े हैं.

भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक बयान में कहा है, "दुनिया भर के प्रमुख उपभोक्ताओं, अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया से विमर्श करने के बाद ही कच्चा तेल निकाला जा रहा है."

कच्चा तेल

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ऐसा क्यों किया जा रहा है?

तेल की बढ़ती क़ीमत के बीच हाल ही में अधिकारियों ने पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स में कटौती की है, जिसकी वजह से भारत को 60 हज़ार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, "भारत का स्पष्ट तौर पर मानना है कि पेट्रोलियम ईंधन की क़ीमत का निर्धारण उचित ढंग से, ज़िम्मेदारी के साथ बाज़ार की ताक़तें करें. मांग की तुलना में तेल उत्पादक देश कम आपूर्ति कर रहे हैं, इसको लेकर भारत ने लगातार चिंता जताई है. इससे तेल की क़ीमतें बढ़ेंगी और नकारात्मक असर देखने को मिलेगा."

पेट्रोलियम तेल की बढ़ती क़ीमत से भारत को आयात के लिए कहीं ज़्यादा पैसों का भुगतान करना होगा. इससे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और व्यापार घाटा बढ़ सकता है.

अख़बार द टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि तेल की क़ीमतों में वृद्धि से भारत में मुद्रास्फीति बढ़ रही है और इस कारण कोविड-19 महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने में परेशानी होगी.

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द इंडियन एक्सप्रेस से नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर एक भारतीय अधिकारी ने कहा, "रूस और सऊदी अरब के प्रयासों के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं. अमेरिका ने रिज़र्व भंडार से तेल निकालने की घोषणा की है, तो हम इस क़दम से सहयोग कर रहे हैं ताकि कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण में रहें."

द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्टील और बुनियादी कच्चे माल की क़ीमतों को क़ाबू में करने के लिए इसी तरह के क़दम उठाए जा सकते हैं.

सांकेतिक है भारत का फ़ैसला

भारतीय मीडिया में सरकार के इस फ़ैसले को पेट्रोलियम क़ीमतों पर नियंत्रण के बदले एक सांकेतिक क़दम के रूप में भी देखा जा रहा है. इस फ़ैसले से तेल की क़ीमतों के कम होने की उम्मीद संबंधित अधिकारियों को भी नहीं है.

द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा गया, "हम मामूली मात्रा में कच्चा तेल रिज़र्व से निकाल रहे हैं. लेकिन उसका सांकेतिक महत्व बड़ा है. सभी बड़े उपभोक्ता देश यह ज़ाहिर कर रहे हैं कि ओपेक देशों से गुहार लगाने के अलावा भी वे अपने हितों की रक्षा के लिए क़दम उठा सकते हैं."

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हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह क़दम उल्टा पड़ सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर नियंत्रण की लड़ाई शुरू हो सकती है.

द इकोनॉमिक टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, "विश्लेषकों को उम्मीद है कि जब दिसंबर की शुरुआत में ओपेक देश मासिक समीक्षा बैठक के लिए मिलेंगे तो अपने उपभोक्ताओं की इस चुनौती का जवाब देंगे. ओपेक देशों के अधिकारियों ने कथित तौर पर चेतावनी दी है कि रणनीतिक भंडार से अतिरिक्त आपूर्ति को देखते हुए उत्पादन बढ़ाने की योजना को रद्द किया जा सकता है."

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