पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने में दिक़्क़त क्या है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक में आज कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई लेकिन पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने को लेकर कोई फ़ैसला नहीं हो सका.
बैठक के बाद वित्त मंत्री ने बताया कि पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी में शामिल करने को लेकर बैठक में कोई फ़ैसला नहीं हुआ है.
इससे पहले केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के वित्त मंत्री ने कहा कि पेट्रोल और डीज़ल की को जीएसटी के दायरे में लाने का ये सही वक्त नहीं है क्योंकि इसका असर राजस्व पर पड़ सकता है, जिसके बारे में सोचना ज़रूरी है.
वहीं बैठक से पहले महाराष्ट्र और केरल सरकार ने कहा था कि वो पेट्रोल और डीज़ल को उत्पाद एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने का विरोध करेंगी.
शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल की बैठक होनी तय थी जिससे ठीक पहले दोनों राज्य सरकारों के वित्त मंत्री का ये बयान सामने आया था.
महाराष्ट्र के वित्त मंत्री अजित पवार ने कहा, "इस बात की चर्चा है कि केंद्र सरकार पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाना चाहती है. वैसे इस बारे में अभी कोई सूचना नहीं मिली है. जीएसटी के 30-32 हज़ार करोड़ रुपए अभी तक महाराष्ट्र सरकार को नहीं मिले हैं. पेट्रोल-डीज़ल पर केंद्र सरकार ने जो टैक्स लगाया है, वो कम कर सकते हैं. राज्यों को जो अधिकार दिए गए हैं, उस पर किसी तरह की कोई आँच नहीं आनी चाहिए."
महाराष्ट्र के बाद केरल सरकार ने भी इस मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया. केरल के वित्त मंत्री एन बालागोपाल ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि अगर पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने पर कोई फ़ैसला आता है, तो राज्य सरकार उसका विरोध करेगी.
भारत में जीएसटी व्यवस्था एक जुलाई 2017 से लागू हुई थी.
उस वक़्त पाँच पेट्रोलियम उत्पादों को इससे बाहर रखा गया था, जिनमें डीज़ल और पेट्रोल भी शामिल थे. दलील दी गई थी कि इन दोनों से होने वाली कमाई पर केंद्र और राज्य बहुत ज़्यादा निर्भर हैं.

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केंद्र सरकार की कमाई का ज़रिया
हाल के दिनों में पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दामों के मद्देनज़र ग़ैर बीजेपी शासित राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार से इन उत्पादों पर लगे एक्साइज़ ड्यूटी को कम करने की गुहार लगाई थी.
इस लिस्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हैं, जिन्होंने जुलाई में इस बारे में चिट्ठी भी लिखी थी.
उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा, "2014-15 के बाद से ऑयल और पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स वसूली के ज़रिए जमा होने वाली राशि में 370 फ़ीसदी का इज़ाफा हुआ है. वित्त वर्ष 2020-21 में ही 3.71 लाख करोड़ की कमाई केंद्र सरकार को इससे हुई है."
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केंद्र सरकार इस बात को स्वीकार भी करती है.
इसी कमाई को आधार बनाते हुए राज्यों की दलील है कि केंद्र सरकार अपने टैक्स कम करें.
अब चर्चा है कि केंद्र सरकार पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार कर रही है.
अगर ऐसा होता है तो आम जनता का बहुत फ़ायदा होगा. पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में 25 से 30 फ़ीसदी तक गिरावट आ सकती है.
लेकिन नुक़सान केंद्र और राज्य दोनों सरकारों का होगा.
तो फिर नुक़सान के बाद भी इस प्रस्ताव पर चर्चा और बहस क्यों हो रही है?
दरअसल केरल हाई कोर्ट में पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने को लेकर जून महीने में एक याचिका डाली गई थी, जिस पर कोर्ट ने जीएसटी काउंसिल को फ़ैसला लेने के लिए कहा था.
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केंद्र-राज्य को कितना होता है फ़ायदा?
इसके लिए ये जानना ज़रूरी है कि केंद्र और राज्य सरकार की जेब में पेट्रोल-डीज़ल के दाम का कितना हिस्सा जाता है.
16 सितंबर 2021 को इंडियन ऑयल के पेट्रोल का दाम राजधानी दिल्ली में 101.19 रुपए प्रति लीटर था.
अगर पेट्रोल का प्राइस बिल्डअप देखा जाए तो :
- डीलरों को पेट्रोल 41.10 रुपए प्रति लीटर की दर पर मुहैया कराया जा रहा है
- इस पर 32.90 रुपए प्रति लीटर की एक्साइज़ ड्यूटी और
- 23.35 रुपए प्रति लीटर का वैट जोड़ा गया
- साथ में 3.84 रुपए प्रति लीटर का डीलर कमीशन
- तो दाम 101.19 रुपए प्रति लीटर पहुँच जाता है.

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इनमें से 32.90 रुपए प्रति लीटर की एक्साइज़ ड्यूटी केंद्र सरकार की जेब में जाती है.
और 23.35 रुपए प्रति लीटर का वैट दिल्ली सरकार की जेब में जाता है.
यानी जितना बेस प्राइस से उससे दोगुने से अधिक दाम पर पेट्रोल दिल्ली में मिल रहा है. और वो पैसा राज्य और केंद्र सरकार के ख़ज़ाने में जा रहा है.

जीएसटी के दायरे में आने से कितना होगा नुक़सान?
बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और वर्तमान में बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुशील मोदी भी पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने के पक्ष में नहीं है.
बिहार में बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन की सरकार है.
सुशील मोदी का कहना है, "पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाने से केंद्र और राज्य को 4.10 लाख करोड़ का नुक़सान होगा. इस नुक़सान की भरपाई करना मुश्किल होगी. केंद्र सरकार को अभी मुफ़्त कोरोना टीकाकरण, मुफ़्त राशन और बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए काफ़ी रकम की ज़रूर है."
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पूर्व पेट्रोलियम सचिव सौरभ चंद्र कहते हैं, "एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में सालाना 10-11 हज़ार करोड़ लीटर डीज़ल बिकता है और 3-4 हज़ार करोड़ लीटर का पेट्रोल बिकता है. दोनों उत्पादों को मिला कर तकरीबन 14 हज़ार करोड़ लीटर का डीज़ल-पेट्रोल बिकता है. मान लीजिए इस पर एक रुपए ही राज्यों ने वैट लगाया, तो आसानी से आप होने वाले नुक़सान का अंदाज़ा लगा सकते हैं."
नुक़सान का आँकड़ा इन उत्पादों की बिक्री और टैक्स के आधार पर हर राज्य के लिए अलग होगा. जैसे केरल को अनुमान है कि उन्हें सालाना 8000 करोड़ का नुक़सान होगा.
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भरपाई कैसे हो?
सौरभ चंद्र आगे कहते हैं, "पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाना मुश्किल है. राज्य सरकार अपने कर लगाने की शक्ति को छोड़ना नहीं चाहती और ना ही केंद्र सरकार. दोनों सरकारों की आय का बड़ा हिस्सा यहीं से आता है. ऐसे में इसे जीएसटी के दायरे में लाने के लिए दोनों को अपनी अपनी कमाई का मोह छोड़ना होगा. तभी ये कड़ा फ़ैसला लिया जा सकेगा."
एक दिक़्क़त जीएसटी रेट का भी है. फ़िलहाल सरकारें पेट्रोल के बेस प्राइस के ऊपर 100 फ़ीसदी (एक अनुमान) टैक्स वसूलती है.
जीएसटी में 28 फ़ीसदी का टैक्स स्लैब सबसे ऊँचा स्लैब है. मान लीजिए अगर पेट्रोल-डीज़ल को उसी स्लैब में रखें, तो बाकी के 70-72 फ़ीसदी टैक्स से होने वाली कमाई की भरपाई कैसे होगी?
भरपाई के तरीक़ों के बारे में बात करते हुए पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं, "इस कमाई की भरपाई करने के लिए 28 फ़ीसदी जीएसटी के अलावा सरचार्ज लगा दिया जाए. जैसे लग्ज़री कारों पर केंद्र सरकार ने किया है."
"दूसरा तरीक़ा ये हो सकता है कि केंद्र सरकार जीएसटी के बाद भी एक्साइज ड्यूटी लगाए और उससे होने वाली आमदनी को केंद्र और राज्य सरकार बाँट ले. इसके लिए दोनों सरकारों को इस फ़ॉर्मूले पर राज़ी होना होगा."

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जीएसटी क़ानून को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच पहले से ही विवाद चल रहा है. इसके तहत राज्यों को जीएसटी लागू करने के बाद पाँच साल तक राजस्व में होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए वित्तीय मदद देने का प्रावधान है.
केंद्र और राज्य सरकारें चालू वित्त वर्ष में जीएसटी राजस्व में होने वाले क़रीब 2.35 लाख करोड़ रुपए के नुक़सान की भरपाई को लेकर भी एक दूसरे से लड़ती रही है.
ऐसे में एक नुक़सान और जुड़ जाएगा, तो दिक़्क़त बढ़ सकती है.
दरअसल राज्यों के पास आय के साधन सीमित है. शराब और पेट्रोलियम उत्पाद पर टैक्स दो सबसे बड़ा ज़रिया हैं. ऐसे में पेट्रोल-डीज़ल पर सरकार जो भी फ़ैसला ले, उसमें राज्यों और केंद्र दोनों के हितों का ख़्याल रखना ज़रूरी होगा. साथ ही ये भी तय करना होगा कि आम जनता की जेब भी ज़्यादा ढीली न हो.
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