जीएसटी पर मोदी सरकार का यू-टर्न, राज्यों से टकराव क्या हो गया ख़त्म?

इमेज स्रोत, Mohd Zakir/Hindustan Times via Getty Images
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में कोरोना लॉकडाउन के दौरान गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी से राज्यों को मिलने वाले राजस्व में भारी कमी आई थी. पिछले कई महीनों से इसकी भरपाई के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तकरार चल रही है.
विवाद का विषय ये था कि राजस्व में आई कमी की भरपाई के लिए क़र्ज़ कौन लेगा? केंद्र सरकार या फिर राज्य सरकार?
13 अक्तूबर को केंद्र सरकार ने कहा कि राज्य सरकारें ये क़र्ज़ लें. जिसके बाद केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही. उन्होंने ये भी कहा कि उनके साथ नौ और राज्य भी शामिल होंगे.
बस फिर क्या था. 15 अक्तूबर आते-आते केंद्र सरकार को अपना रुख़ नरम करना पड़ा.
केंद्र सरकार ने गुरुवार को यू-टर्न लेते हुए कहा कि राजस्व में आई कमी की भरपाई के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ अब केंद्र सरकार लेगी और राज्य सरकारों को लोन के रूप में देगी.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 1
केंद्र सरकार के इस नए यू-टर्न वाले फ़ैसले से दो सवाल उठते हैं. पहला ये कि दो दिन में ऐसा क्या हुआ, जो केंद्र ने अपना फ़ैसला बदल लिया? दूसरा ये कि इससे भारत के ख़ज़ाने पर क्या असर पड़ेगा?
इस रिपोर्ट में आपको दोनों सवालों के जवाब मिलेंगे. लेकिन पहले जान लीजिए, पूरा विवाद क्या है.

इमेज स्रोत, Getty Images
जीएसटी पर विवाद क्यों?
जीएसटी क़ानून के तहत राज्यों को जीएसटी लागू करने के बाद पाँच साल तक राजस्व में होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए वित्तीय मदद देने का प्रावधान है.
केंद्र और राज्य सरकारें चालू वित्त वर्ष में जीएसटी राजस्व में होने वाले क़रीब 2.35 लाख करोड़ रुपये के नुक़सान की भरपाई को लेकर एक दूसरे के आमने सामने हैं.
केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक के मुताबिक़ केंद्र सरकार चाहती है कि 2.35 लाख करोड़ रुपये में से 1.1 लाख करोड़ रुपये राज्य सरकारें बाज़ार से उधार ले लें.
केंद्र सरकार के हिसाब से जीएसटी नुक़सान के जो आँकड़े पेश किए जा रहे हैं, उनमें से एक बड़ा हिस्सा कोविड 19 की वजह से पूरा नहीं हो पाया है.
केंद्र सरकार ने जीएसटी राजस्व की भरपाई के लिए राज्यों के सामने पिछले महीने दो विकल्प रखे थे. एक विकल्प यह दिया था कि राज्य भरपाई की कुछ रक़म रिजर्व बैंक की स्पेशल विंडो फ़ैसिलिटी से उधार लेकर पूरा कर लें और दूसरा विकल्प ये था कि राज्य रक़म बाज़ार से जुटा लें.
लेकिन इस प्रस्ताव के लिए 10 राज्यों ने असहमति जताई, जिनमें ज़्यादातर पश्चिम बंगाल और केरल जैसे ग़ैर बीजेपी शासित राज्य थे.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 2
राज्यों और केंद्र की दलील
पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव एस सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं कि राज्य सरकारों की दलील थी कि राज्यों को बाज़ार से क़र्ज़ लेने में दो तरह की दिक़्क़त आएगी. पहला, हर राज्य के लिए क़र्ज़ पर ब्याज दर अलग होगा.
दूसरा, राज्यों की ओर से क़र्ज़ लेने का समय, क़र्ज़ की क्षमता और उसे चुकाने के तरीक़े में भी फ़र्क होगा. इसलिए ये क़र्ज़, केंद्र को लेना चाहिए.
जबकि केंद्र का तर्क था कि क़र्ज़ लेने से सरकार का राजस्व घाटा बढ़ जाएगा. साथ ही वो नहीं चाहती थी कि कोविड19 की वजह से जीएसटी कलेक्शन में जो कमी आई है, उसे अपने खाते से राज्यों को दे.
और यही थी दोनों के बीच तकरार की असली वजह.

इमेज स्रोत, PTI
नए फ़ैसले का ख़ज़ाने पर असर
दोनों के तर्क अपनी जगह सही थे, तो फिर रातों-रात ऐसा क्या हुआ कि केंद्र सरकार यू-टर्न लेने को मजबूर हो गई.
इस सवाल के जवाब में सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं कि केंद्र सरकार को समय रहते सदबुद्धि आ गई. अगर केंद्र सरकार क़र्ज़ को क़र्ज़ के तौर पर राज्य सरकारों को देती है, तो उसके राजस्व घाटे पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
वे कहते हैं, "अकाउंटिग की एक प्रक्रिया है, जिसे 'माइनस एंट्री' कहते हैं. कुछ समय पहले भारत सरकार में इसका चलन शुरू हुआ है. इसके तहत भारत सरकार जो क़र्ज़ लेती है और जो क़र्ज़ दूसरों को देती है, उसको एक दूसरे से घटा दिया जाता है. तो उसका असर बही खाते पर शून्य ही दिखता है. इस अकाउंटिंग सिस्टम के ज़रिए केंद्र सरकार अगर कर्ज़ लेगी भी, तो राजस्व घाटे पर असर नहीं पड़ेगा और सरकार का ख़ज़ाना जस का तस ही रहेगा."

इमेज स्रोत, Getty Images
वो आगे कहते हैं, "रिजर्व बैंक चाहे तो आसानी से देश की मौद्रिक नीति को मैनेज करते हुए केंद्र सरकार के बॉन्ड्स को सबस्क्राइब कर सकता है."
"दरअसल रिजर्व बैंक एक ख़ास तरह का ऑपरेशन चलाता है, जिसे ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) कहते हैं. इस ऑपरेशन के तहत रिजर्व बैंक बाज़ार से केंद्र सरकार के बॉन्ड्स, जिस क़ीमत पर वो चाहता है, ख़रीद सकता है. रिर्जव बैंक के लिए केंद्र सरकार के क़र्ज़ को सबस्क्राइब कराना आसान होता है और रेट भी मेन्टेन किया जा सकता है."
लेकिन राज्य सरकारों के बॉन्ड्स को रिजर्व बैंक कभी नहीं ख़रीदता था. हालाँकि केंद्र सरकार हाल में इसकी शुरुआत करना चाहती थी, लेकिन रिजर्व बैंक को अहसास हो गया कि इस रास्ते जाने में अड़चनें और परेशानियाँ होंगी.
सुभाष गर्ग मानते हैं कि राज्यों को देने के लिए केंद्र का क़र्ज़ लेने का फ़ैसला बिल्कुल सही है.
अब भी केंद्र सरकार ने 2.35 लाख करोड़ रुपये की जगह केवल 1.1 लाख करोड़ रुपये ही क़र्ज़ लेने की बात कही है. केरल के वित्त मंत्री ने कहा है कि जब केंद्र सरकार क़र्ज़ ले ही रही है और अब उनके राजस्व घाटे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, तो पूरी रक़म क़र्ज़ के तौर पर क्यों नहीं ले लेती.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 3
इस पर सुभाष गर्ग कहते हैं, "2.35 लाख करोड़ रुपये के शॉर्टफ़ॉल का जो अनुमान लगाया गया है, हो सकता है वास्तव में ये रक़म थोड़ी कम हो. वित्त वर्ष ख़त्म होने में अब भी 5-6 महीने का वक़्त बचा है. ऐसे में एक बड़ी रक़म राज्य सरकारों को दे कर केंद्र सरकार एक जायजा ले सकती है कि आगे राज्यों को और कितनी रक़म की ज़रूरत पड़ेगी. उसके बाद बाक़ी बचे रक़म की भरपाई के लिए दिसंबर या जनवरी में केंद्र सरकार सोच सकती है."
केंद्र सरकार के फ़ैसले पर राज्य सरकारों की राय
ऐसा भी नहीं है कि 'क़र्ज़ कौन लेगा' इस मुद्दे के सुलझ जाने के बाद राज्य और सरकार के बीच सब कुछ अच्छा है.
केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने ट्विटर पर लिखा, "मैं केंद्र सरकार की इस नई घोषणा का स्वागत करता हूँ कि सरकार भरपाई के लिए स्पेशल विंडो के तहत क़र्ज़ लेकर राज्यों को क़र्ज़ देगी. लेकिन एक और मुद्दा बचा है, जिसे सुलझाने की ज़रूरत है. वो है- भरपाई की कितनी रक़म 2023 तक के लिए टाली जा सकती है. इस मुद्दे पर भी आम सहमति बनाने की ज़रूरत है."
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 4
दरअसल राज्यों को जीएसटी लागू करने के बाद पाँच साल तक राजस्व में होने वाले नुक़सान के बदले वित्तीय मदद देने का प्रावधान है, वो 2022 तक है.
केरल के वित्त मंत्री के इस बयान को समझाते हुए इंस्टिट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया के चाँद वाधवा कहते हैं, "अभी भरपाई की जिस रक़म के लिए क़र्ज़ की बात है, वो इस साल के लिए है. आने वाले दिनों में भी कोरोना की वजह से जीएसटी कलेक्शन में सुधार होगा, ऐसा राज्यों को नहीं लगता. इसलिए राज्य आगे तक के लिए सरकार से पारदर्शिता की माँग कर रहे हैं."
पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी ट्विटर पर केंद्र सरकार के फ़ैसले का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही ये भी कहा है, "सरकार ने पहला सही क़दम उठाया है, मैं प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से दूसरा क़दम उठाने और केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास को फिर से स्थापित करने का आग्रह करता हूँ."
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त, 5
जानकारों की राय है कि केंद्र की तरफ़ से शुरुआत हुई है. आगे जैसे-जैसे वक़्त गुज़रेगा, समस्या के साथ साथ समाधान ढूँढने का प्रयास दोनों तरफ़ से करना होगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.














