जीडीपी पर IMF के ताज़ा अनुमान से भारतीयों को क्यों चिंतित होना चाहिए?

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतवासियों को एक सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखाया था. साल 2024-25 तक भारत की अर्थव्यवस्था 5 लाख करोड़ अमरीकी डॉलर यानी 5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी.

भारतवासियों को एक सच्चाई मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानीआईएमएफ़ ने बता. भारत की जीडीपी इस साल -10.3 प्रतिशत जा सकती है. मंगलवार को इसका एलान करते हुए आईएमएफ़ ने इस भारी गिरावट की वजह कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन को बताया है.

इससे पहले जून में आईएमएफ़ ने भारत की जीडीपी के -4.5 प्रतिशत तक जाने का अनुमान लगाया था. लेकिन उनकी ताज़ा रिपोर्ट में जून के आँकड़े को संशोधित करके इसे -10.3 फ़ीसदी कर दिया गया है.

दुनिया भर की उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत की स्थिति सबसे ख़राब बताई गई है. इससे पहले भारत सरकार की तरफ़ से जारी आँकड़ों के मुताबिक़ 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी -23.9 प्रतिशत तक पहुँच गई थी.

भारत से ज़्यादा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अमरीका के बारे में अनुमान है कि 2020 में यहाँ की जीडीपी -4.3 प्रतिशत तक जा सकती है. आईएमएफ़ की रिपोर्ट में चीन की जीडीपी के बारे में पॉज़िटिव अनुमान लगाया गया है. कहा जा रहा है कि चीन की जीडीपी 2020 में 1.9 प्रतिशत रह सकती है.

एक अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पर चुटकी लेते हुए एक ग्राफ़ ट्वीट कर लिखा है, "बीजेपी सरकार के पिछले छह साल के नफ़रत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है: बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ने वाला है."

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आम लोगों पर इसका असर

जाहिर है, जीडीपी पर आईएमएफ़ के ताज़ा अनुमान के बाद भारत सरकार के सपने और हक़ीक़त के बीच अब एक नई और बहुत ऊँची दीवार खड़ी हो गई है. स्पष्ट है कि सपना को पूरा होने में अब ज़्यादा वक़्त लगेगा.

लेकिन क्या इन आँकड़ों का हमारे और आपके जीवन पर असर पड़ता है? क्या ये आँकड़े आम जनता को जो परेशानी हो रही है, उसे दर्शाते हैं?

आईएमएफ़

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देश के जाने माने सांख्यिकीविद हैं प्रणव सेन. इन आँकड़ों को आसान भाषा में समझाते हुए वे कहते हैं, "इसका मतलब ये है कि पिछले साल के मुक़ाबले इस साल आम जनता की आमदनी तकरीबन 20 लाख करोड़ कम होगी. ज़ाहिर है जब आमदनी कम होगी, तो ख़र्च भी आप कम करेंगे."

प्रणव सेन, केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय में मुख्य सांख्यिकीविद रह चुके हैं.

20 लाख करोड़ रुपये की रक़म कोई छोटी रक़म नहीं है. कई छोटे देशों की पूरी अर्थव्यवस्था का आकार है ये रक़म. जब आमदनी और ख़र्च कम होगा, तो आपके रहन-सहन पर इसका असर पड़ेगा. लोग अपने बचत खाते से पैसे निकालने के लिए मजबूर होंगे.

लेकिन असली दिक़्क़त उन लोगों को होगी, जो रोज़ कमाते है और रोज़ ख़र्च करते हैं. यानी जिनके पास बचत खाता के नाम पर कुछ नहीं होता. आमदनी और ख़र्च के अलावा इसका असर निवेश पर भी पड़ेगा.

सेन आगे कहते हैं, "ऐसी परिस्थिति में जब लोगों के ख़र्च करने की क्षमता कम हो गई हो, तो नए निवेश आने में परेशानी होगी. निवेश करने वाला पहले ये पूछता है कि आख़िर उसके उत्पादन का ख़रीदार कौन होगा? और अगर पहले से पता हो कि ख़रीदार बाज़ार में नहीं है, तो निवेश करने का प्लान, निवेशक टाल देता है. इस वजह से नए रोज़गार के अवसर कम मिलेंगे और इसका सीधा असर युवाओं के रोज़गार पर पड़ेगा."

यानी कुल मिला कर आईएमएफ़ ने जो कहा है, इसका मतलब है कि आम जनता की आमदनी कम होगी, जिससे उनके ख़र्च करने की क्षमता कम होगी, जिससे निवेशक बाज़ार में कम पूँजी लगाएँगे. इस वजह से रोज़गार के अवसर कम पैदा होंगे. ये अपने आप में ऐसा चक्र है, जिससे निकलना किसी देश के लिए आसान नहीं होगा.

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भारत पर असर

'न्यू इंडिया', '5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी', 'आत्मनिर्भर भारत' बीते कुछ सालों में भारतवासियों को इन नए नारों के साथ कई तरह के सपने दिखाए गए थे. आईएमएफ़ के अनुमान के बाद ये सपने थोड़े समय के लिए कोल्ड स्टोरेज में जा सकते हैं.

यानी इनको साकार करने के लिए सरकार ने जो समयसीमा निर्धारित की थी, जो रोड मैप तैयार किया था, उसके रास्ते में कोरोना की वजह से रोड़े पैदा हो गए हैं.

भारत, अपने इस सपने से और कितने साल दूर हो गया है?

इस सवाल पर प्रणव सेन कहते हैं, "जब सपना भारतवासियों को प्रधानमंत्री मोदी ने दिखाया था, तब भारत की अर्थव्यवस्था की हालत काफ़ी बेहतर थी. निवेशक भारत में आ रहे थे. उस समय ऐसा सपना देखना उचित भी था. लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल गईं है. कोरोना की वजह से जो अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है, उसे रोकना भारत के लिए पहली चुनौती है. फिर उस स्थिति को पलटना दूसरी चुनौती होगी. इसलिए अब सरकार की पिछली डेडलाइन को कम से कम चार-पाँच साल और आगे बढ़ा दें."

'5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी' की डेडलाइन पहले साल 2024-25 थी. प्रणव सेन के मुताबिक़ अब वित्त वर्ष 2029-30 तक ही इस लक्ष्य को भारत पूरा कर पाएगा.

ये नई डेडलाइन हासिल करना दो बातों पर निर्भर है.

पहला- निवेशक कितनी जल्दी लौट कर भारत में निवेश करने का फ़ैसला करते हैं.

दूसरा - कोरोना महामारी देश-दुनिया से जल्द ख़त्म हो जाए या फिर उससे पहले वैक्सीन आ जाए.

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर आईएमएफ़ के अनुमान में एक और बात जो गंभीरता से लेने की ज़रूरत है, वो है पड़ोसी देशों के मुक़ाबले भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति.

पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश भले ही प्रति व्यक्ति जीडीपी में भारत से पीछे हों, लेकिन बांग्लादेश भी भारत को अब पीछे छोड़ने वाला है.

चीन इकलौता देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था के बारे में पॉज़िटिव प्रोजेक्शन किया गया है. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के मद्देनज़र एशिया में पड़ोसी देशों के आपसी समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं.

भारत को इस क्षेत्र में अपने दबदबे को बरकरार रखने के लिए अर्थव्यवस्था में इस अनुमानित गिरावट को ज़्यादा गंभीरता से लेना होगा और इसे सुधारने के नए कारगर उपाय करने होंगे.

ग्राफ़
इमेज कैप्शन, केंद्र सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार 2020-21 वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच विकास दर में 23.9 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है

आगे की राह

ऐसा नहीं है कि आईएमएफ़ ने अनुमान में भारत के लिए केवल निराशा की ही बात है. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आईएमएफ़ ने 2021 में 8.8 फ़ीसदी विकास दर का अनुमान भी लगाया है.

वरिष्ठ बिजनेस पत्रकार पूजा मेहरा कहती हैं, "लॉकडाउन की वजह से जब इकोनॉमी बंद पड़ी थी, प्रोडक्शन भी बंद था और खपत भी कम थी, तो जीडीपी में गिरावट का अनुमान सबको था. लेकिन जैसे ही लॉकडाउन के बाद सब कुछ धीरे-धीरे पुराने ढर्रे पर लौटेगा, तो ग्रोथ भी देखने को मिलेगा. यही वजह है कि अगले साल के लिए आईएमएफ़ ने ग्रोथ का अनुमान भी 8.8 फ़ीसदी लगाया है."

ऐसा नहीं कि भारत सरकार को लोगों की आमदनी कम होने और इस वजह से ख़र्च कम होने का अंदाज़ा नहीं है. सोमवार को ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकारी कर्मचारियों के लिए दो अहम सुविधाओं की घोषणा की है.

पहला ये कि उन्हें 10 हज़ार रुपए तक का ब्याज मुक्त लोन दिया जाएगा और दूसरा, छुट्टी लेकर घूमने के लिए मिलने वाली रक़म यानी उनके लीव ट्रैवल कंसेशन या एलटीसी का भुगतान इस बार बिना घूमे-फिरे ही कर दिया जाएगा.

इन दोनों का ही फ़ायदा उठाने की एक शर्त है. शर्त यह कि उन्हें 31 मार्च 2021 तक यह पैसा ख़र्च करना पड़ेगा और खर्च भी सिर्फ़ उन चीज़ों पर, जिन पर जीएसटी की दर 12 प्रतिशत या उससे अधिक है.

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इससे पहले भी कोरोना के दौर में वित्त मंत्री ने 'आत्मनिर्भर भारत' के नाम पर कई तरह के स्टिमुलस पैकेज की घोषणा की है. केंद्र सरकार ने मनरेगा स्कीम के तहत पैसा ज़्यादा देना, ग़रीबों को पीडीएस में ज़्यादा अनाज देना, लोन ना चुका पाने की सूरत में मोरेटोरियम का एलान जैसे कई क़दम उठाए हैं.

पूजा मेहरा के मुताबिक़, "चाहे त्योहारों के मौसम में छूट की बात हो या फिर बीते दिनों दिए गए स्टिमुलस पैकेज की बात, मुझे नहीं लगता कि इससे ज़्यादा फ़र्क पड़ने वाला है. ज़्यादातर लोगों की सैलरी में पहले से कटौती हो चुकी है. जो अभी सरकार छूट दे रही है, वो उसकी भरपाई में ही निकल जाएगा."

वो कहती हैं कि सरकार को स्टिमुलस पैकेज की जगह रिलीफ़ पैकेज की घोषणा करनी चाहिए, जैसे दुनिया की दूसरी बेहतर अर्थव्यवस्था वाले देश कर रहे हैं.

दोनों का अंतर समझाते हुए वो कहती हैं, "अमरीकी सरकार ने जो लोग किराया नहीं दे पा रहे हैं, उनके अकाउंट में पैसे डाले हैं, लोगों की नौकरी ना जाए उसके लिए कंपनियों को सैलरी देने के लिए पैसे दिए हैं. स्पेशल स्कीम डिजाइन की है. अलग-अलग देशों ने अपनी जनता की असुविधाओं को देखते हुए अलग-अलग पैकेज बनाए हैं. भारत को भी हर वर्ग के लिए अलग से सोचना होगा. केवल कैश देने से बात नहीं बनेगी. रिलीफ़ पैकेज देना ही बेहतर विकल्प है."

जीडीपी पर आईएमएफ़ के ताज़ा अनुमान से भारतीयों को डरने, चिंतित होने के साथ-साथ आशावादी होने की भी ज़रूरत है.

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