जीडीपी का चक्का उल्टा घूमा तो क्या होगा असर

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    • Author, आलोक जोशी
    • पदनाम, पूर्व संपादक, सीएनबीसी-आवाज़

सवाल है कि नेगेटिव ग्रोथ क्या होती है और उसका असर क्या है, खासकर भारत के संदर्भ में? लेकिन उसपर चलें उससे पहले यह जानना ज़रुरी है कि जीडीपी ग्रोथ क्या होती है. यही बहुत बड़ा सवाल है. बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि इसके बढ़ने को लेकर इतना हल्ला क्यों मचा रहता है. और यह तब की बात थी जब कम से कम इतना तो तय था कि जीडीपी बढ़ती रहती है.

1990 के पहले तीन साढ़े तीन प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ती थी. इसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ कहा जाता था. प्रोफेसर राज कृष्णा ने यह नामकरण कर दिया था और तब किसी ने गंभीर सवाल भी नहीं उठाया. हालांकि अभी हाल में इतिहास और अर्थशास्त्र पर समान अधिकार रखनेवाले कुछ पुनरुत्थानवादी विद्वानों ने इस अवधारणा पर सवाल उठा दिए हैं.

लेकिन ये सवाल उठते और उनपर चर्चा होती इसके पहले ही हाल बिगड़ गया और जीडीपी बढ़ने की रफ्तार बढ़ने की बजाय कम होने लगी. रफ्तार थमने तक तो गनीमत होती लेकिन पिछले साल से ही अनेक लोग मंदी मंदी का हल्ला मचाने लगे थे. और दूसरी तरफ से विद्वानों की फौज जुटी हुई थी मोटे मोटे ग्रंथों से मंदी की परिभाषा निकालकर यह साबित करने में कि देश में मंदी नहीं स्लोडाउन है. तब दोनों में से किसे पता था कि इतनी जल्दी यह बहस बेमतलब हो जानेवाली है.

बहस को बर्बाद करने का काम उसी ने किया जिससे पूरी दुनिया परेशान है. कोरोना वायरस और उसके डर से हुए लॉकडाउन यानी देशबंदी.

लॉकडाउन के चक्कर में काम धंधा करीब करीब बंद हो गया और उसी का नतीजा है कि अब ग्रोथ की जगह नया शब्द आ गया है नेगेटिव ग्रोथ.

ग्रोथ का मतलब होता है तरक्की या आगे बढ़ना, ज़ाहिर है इसमें नेगेटिव लगते ही असर उल्टा होना है, मतलब नीचे गिरना या पीछे जाना. कारोबार के संदर्भ में देखें तो साफ मतलब है कि धंधा बढ़ने के बजाय कम हो रहा है, कम होगा तो बिक्री भी कम और मुनाफा भी कम.

क्या है जीडीपी

जीडीपी का अर्थ होता है सकल घरेलू उत्पाद. मतलब यह कि देश भर में कुल मिलाकर जितना भी कुछ बन रहा है, बिक रहा है, खरीदा जा रहा है या लिया दिया जा रहा है, उसका जोड़ है जीडीपी. इसमें बढ़त का आसान भाषा में मतलब है कि देश में कुल मिलाकर तरक्की हो रही है. कहीं कम कहीं ज्यादा. इसकी रफ्तार जितनी बढ़ेगी वो पूरे देश के लिए अच्छी खबर होगी क्योंकि ऐसे में जो कम से कम तरक्की करेंगे उनकी भी पहले से बेहतर तरक्की ही होगी. साथ ही सरकार को ज्यादा टैक्स मिलेगा, ज्यादा कमाई होगी और उसके पास तमाम कामों पर और उन लोगों पर खर्च करने के लिए ज्यादा रकम होगी जिन्हें मदद की ज़रूरत है.

लेकिन अगर कहीं ग्रोथ का चक्का रुक गया या उल्टा घूमने लगा, जैसा इस वक्त हो रहा है तो? सबसे पहले तो इसका मतलब समझना ज़रूरी है.

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किसी दुकान में महीने में एक लाख की बिक्री होती थी, पंद्रह हज़ार रुपए की बचत. तो इसे कहा जाएगा कि वो बिज़नेस पंद्रह प्रतिशत की मुनाफेदारी पर चलता है. यानी सौ रुपए में पंद्रह का मुनाफ़ा. अब अगर उसकी बिक्री तो इतनी ही रहे और मुनाफा कम हो जाए तो माना जाएगा कि काम में कुछ गड़बड़ है यानी मार्जिन कम हो रहा है. लेकिन बिक्री कम होकर नब्बे हजार रह जाए और मुनाफा पंद्रह हजार ही बना रहे तो इसका मतलब है कि दुकानदार अपना काम काफी समझदारी से कर रहा है और विपरीत परिस्थितियों में भी मुनाफे पर आंच नहीं आने देता.

लेकिन आम तौर पर यह दोनों चीजें साथ ही गिरती पाई जाती हैं. और अब सोचिए कि एक पूरा बाज़ार अगर महीने भर के लिए बंद कर दिया जाए तो वहां दुकानों में क्या बिक्री होगी और क्या मुनाफ़ा? यही हाल अप्रैल के बाद पूरे देश का हो गया था. हालांकि जून से सरकार ने अनलॉक शुरू कर दिया था, इसके बाद भी देश के ज्यादातर हिस्सों में अभी तक सब कुछ पटरी पर नहीं आया है. जल्दी ऐसा हो जाएगा इसके आसार भी नहीं दिख रहे हैं. इसी का नतीजा है कि अब जीडीपी बढ़ने की बजाय घटने की तरफ है. यानी पूरे देश में कुल मिलाकर जितना कारोबार हो रहा था, लेन देन हो रहा था, अब वो कम होने वाला है या हो रहा है.

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कितनी है नेगेटिव ग्रोथ

पिछली दो मॉनिटरी पॉलिसी में रिजर्व बैंक चेता चुका है कि जीडीपी ग्रोथ नेगेटिव टेरिटरी में रहने वाली है अर्थात भारत का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ने के बजाय घटने वाला है. ये कमी या गिरावट कितनी होगी, इस सवाल का जवाब रिजर्व बैंक गवर्नर ने नहीं दिया. उनका तर्क था कि आप अगर बता दें कि कोरोना का संकट कब खत्म होगा तो मैं बता दूंगा कि गिरावट कितनी होगी.

सीएमआइई के मुखिया महेश व्यास की राय है कि आरबीआई गवर्नर ने बिल्कुल सही काम किया है क्योंकि इस वक्त यह अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है कि कोरोना की वजह से इकोनॉमी को कितना नुकसान पहुंचने वाला है. इसके बावजूद उनकी संस्था सीएमआइई का अनुमान है कि भारत की जीडीपी कम से कम साढ़े पांच प्रतिशत और ज्यादा से ज्यादा चौदह प्रतिशत तक घट सकती है. अगर कोरोना का संकट और विकराल हुआ तो शायद यह गिरावट चौदह प्रतिशत से आगे भी चली जाए, लेकिन सब कुछ अच्छा होता रहा तब भी साढ़े पांच परसेंट की कमी तो उन्हें दिखती ही है.

अब तक का सबसे आशाजनक अनुमान विश्व बैंक की तरफ से आया है जो भारत की जीडीपी में 3.2 परसेंट की गिरावट का अंदाजा लगा रहा था, लेकिन आसार हैं कि विश्व बैंक अगले कुछ महीनों में भारत पर जो नई रिपोर्ट जारी करेगा उसमें गिरावट इससे कहीं ज्यादा बताई जाएगी.

भारत सरकार की तरफ से जीडीपी का आंकड़ा 31 अगस्त को जारी होना है. इसमें पता चलना चाहिए कि कोरोना के पहले झटके का भारत की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ा. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल तो चेतावनी दे चुकी है कि अप्रैल से जून के बीच देश की जीडीपी में 45 प्रतिशत की गिरावट दिखेगी. पूरे साल के लिए उसने भी पांच प्रतिशत गिरावट की भविष्यवाणी की हुई है.

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और भी बहुत सी एजेंसियों ने भारत की जीडीपी पर अलग अलग अनुमान जारी किए हुए हैं. लेकिन असली असर कितना होगा इसका फैसला तो तभी हो पाएगा जब नुकसान हो चुका होगा और उसका हिसाब सामने आएगा. इस बार जो जीडीपी आंकड़ा आएगा वो ऐसा पहला हिसाब सामने रखेगा.

जीडीपी गिरी तो क्या होगा असर

अब सवाल ये रहा कि अगर देश की जीडीपी में तेज़ गिरावट आई तो उसका आम इंसान की जिंदगी पर क्या फर्क पड़ेगा? भारत को फाइव ट्रिलियन डॉलर यानी पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के सपने का क्या होगा और इस हालत से उबरने का रास्ता क्या है?

आम आदमी की जिंदगी पर जीडीपी गिरने का कोई असर सीधे नहीं पड़ता. बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि आम आदमी की जिंदगी में आ चुकी दुश्वारियों को ही जीडीपी का आंकड़ा गिरावट के तौर पर सामने रखता है.

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और भविष्य के लिए भी यह अच्छा संकेत नहीं है क्योंकि अगर अर्थव्यवस्था मंदी में जा रही हो तो बेरोज़गारी का खतरा बढ़ जाता है. जिस तरह आम आदमी कमाई कम होने की खबर सुनकर खर्च कम और बचत ज्यादा करने लगता है बिल्कुल ऐसा ही व्यवहार कंपनियां भी करने लगती हैं और किसी हद तक सरकारें भी. नई नौकरियां मिलनी भी कम हो जाती हैं और लोगों को निकाले जाने का सिलसिला भी तेज होता है. सीएमआइई के मुताबिक सिर्फ जुलाई में पचास लाख नौकरीपेशा लोग बेरोजगार हो गए हैं.

इससे एक दुष्चक्र शुरू होता है. घबराकर लोग ख़र्च कम करते हैं तो हर तरह के कारोबार पर असर पड़ता है. उद्योगों के उत्पाद की मांग कम होने लगती है और लोग बचत बढ़ाते हैं तो बैंकों में ब्याज़ भी कम मिलता है. दूसरी तरफ बैंकों से कर्ज़ की मांग भी गिरती है. उल्टे लोग अपने अपने कर्ज चुकाने पर ज़ोर देने लगते हैं.

सामान्य स्थिति में यह अच्छी बात है कि ज्यादातर लोग कर्ज़ मुक्त रहें. लेकिन अगर ऐसा घबराहट में हो रहा है तो यह इस बात का संकेत है कि देश में किसी को भी अपना भविष्य अच्छा नहीं दिख रहा है इसलिए लोग कर्ज़ लेने से कतरा रहे हैं क्योंकि उन्हें यकीन नहीं है कि वो भविष्य में अच्छा पैसा कमा कर यह कर्ज़ आसानी से चुका पाएंगे.

एकदम ऐसा ही हाल उन लोगों का भी है जो कंपनियां चला रहे हैं, पिछले कुछ समय में तमाम बड़ी कंपनियों ने बाज़ार से पैसा उठाकर या अपना हिस्सा बेचकर कर्ज़ चुकाए हैं.

देश की सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी रिलायंस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने इसी दौरान डेढ़ लाख करोड़ रुपए से ऊपर का कर्ज़ चुका कर खुद को कर्ज़मुक्त कर लिया है.

कैसे बनेगी पाँच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी

ऐसी हालत में पाँच ट्रिलियन डॉलर का सपना कैसे पूरा होगा? यह सवाल पूछना ही बेमानी लगता है. लेकिन इंसान अगर हार मानकर बैठ गया तो फिर किसी भी मुसीबत से पार नहीं पा सकता.

प्रधानमंत्री ने आपदा में अवसर की बात कही है. वो अवसर दिख भी रहा है. लेकिन यह अवसर तो पहले भी मौजूद था.

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चीन के साथ तुलना या चीन गए उद्योगों को भारत लाने की बात पहली बार नहीं हो रही है. सवाल यह है कि क्या भारत सरकार ऐसा कुछ कर पाएगी जिससे विदेशी निवेशकों को भारत में कारोबार करना सचमुच आसान और फायदे का सौदा लगने लगेगा. ऐसा हुआ और बड़े पैमाने पर रोज़गार के मौके पैदा हो पाए तब यकीनन इस मुश्किल का मुकाबला आसान होगा.

लेकिन किसी भी हालत में अभी ऊंचे सपने देखने का वक्त नहीं आया है. और यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि विदेशी निवेश को लुभाने के चक्कर में कहीं भारत के मज़दूरों या कर्मचारियों के अधिकार पूरी तरह कुर्बान न कर दिए जाएं.

रास्ते कम नहीं हैं, विद्वान सुझा भी रहे हैं, लेकिन चुनौती यह है कि कौन सा उपाय कब इस्तेमाल किया जाए ताकि वो कारगर भी हो सके.

सरकार की तरफ से इस बात के संकेत मिले हैं कि इकोनॉमी में जान फूंकने के लिए एक और स्टिमुलस या आर्थिक पैकेज लाने की तैयारी है, मगर सरकार इंतज़ार कर रही है कि कोरोना की बला टलने के संकेत मिलें तब ये पैकेज दिया जाए वरना यह दवा बेकार भी जा सकती है.

इसीलिए ज्यादातर सवालों के जवाब तो कोरोना संकट के साथ ही मिलेंगे.

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