जीडीपी के ताज़ा आंकड़े लॉकडाउन के असर की सिर्फ़ झांकी भर हैं?

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- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
मंदी दरवाज़े पर खड़ी नहीं है, घर के भीतर पहुँच चुकी है. बस दिखाई नहीं दे रही, ऐलान नहीं हुआ है. जीडीपी के आँकड़े भी आ गए हैं और कोर सेक्टर के भी. दोनों को मिलाकर तस्वीर बहुत ख़तरनाक दिख रही है.
चौथी तिमाही में भारत की ग्रोथ 3.1% रही. और पिछले पूरे साल यानी 2019-20 में ये आँकड़ा रहा 4.2%. देखना क्या है, सबको पता है कि आँकड़े ख़राब आनेवाले हैं? फिर भी भारत की जीडीपी के आँकड़ों का इंतज़ार हो रहा था और सबकी नज़र इसी पर थी, क्या वजह है?
वजह हैं. वजह यह है कि यहाँ पिछले पूरे वित्त वर्ष की तरक़्क़ी यानी जीडीपी ग्रोथ का आँकड़ा भी सामने आ रहा है. इससे दिखेगा कि कोरोना का संकट आने से पहले भी हम कितने पानी में थे और कोरोना के बाद कहां तक गोता लगने की आशंका होनी चाहिए.
हालाँकि कोरोना की बीमारी देश में आ चुकी थी. जनता कर्फ़्यू भी हो चुका था और कुछ राज्यों ने लॉकडाउन भी शुरू कर दिए थे लेकिन देश में पहला लॉकडाउन 24 मार्च को ही लगा था. यानी जीडीपी के ये आँकड़े उस दौर के हैं जिनमें से सिर्फ़ सात दिन कारोबार ठप रहा.
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने जो जीडीपी के आँकड़े जारी किए हैं उनमें चौथी तिमाही यानी जनवरी से मार्च तक का और पूरा वित्त वर्ष यानी 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 तक का अनुमान सामने रखा जा रहा है. दोनों ही आँकड़े आगे का हिसाब लगाने के लिए महत्वपूर्ण हैं. मगर ख़ास ध्यान किन चीज़ों पर देना है?

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सबसे पहले ये देखिए कि चौथी तिमाही और पूरे साल के लिए जीडीपी ग्रोथ का जो आँकड़ा सामने आया, उसमें ग्रोथ यानी बढ़त है कितनी. आसान शब्दों में ये देखिए कि यह ज़ीरो के कितना नज़दीक है.
आँकड़ा आते ही कुछ लोगों ने उत्साह के साथ टिप्पणी की कि चौथी तिमाही में भारत की जीडीपी में 3.1 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई. और कुछ ही देर में पूरे साल का अनुमान भी आ गया, यहाँ यह बढ़त 4.2 प्रतिशत की रही. ज़ाहिर है कि जहां चारों ओर मंदी की आशंका जताई जा रही थी वहाँ यह कहना भी अच्छा ही लगेगा कि बढ़त हुई तो है.
लेकिन इसके साथ यह देखना भी ज़रूरी है कि इसके पहले साल भारत की अर्थव्यवस्था 6.1 परसेंट की रफ़्तार से बढ़ी थी. और क़रीब दस बारह साल से यह देश डबल डिजिट ग्रोथ यानी जीडीपी के दस परसेंट रफ़्तार से बढ़ने का सपना देख रहा है. बीते साल का जो अनुमानित आँकड़ा सामने आया है वो इस मोर्चे पर पिछले ग्यारह साल का सबसे ख़राब आँकड़ा है.
हालाँकि आप चाहें तो इसी दौर के दुनिया के दूसरे देशों के आँकड़े देखकर राहत पा सकते हैं जहां ग्रोथ बंद होकर इकोनॉमी सिकुड़नी शुरू हो चुकी हैं. लेकिन अगर अपने ही गिरेबान में झांककर देखना है तो यह चिंता की शुरुआत ही है. यह सिर्फ़ एक झांकी है कि आगे कैसी तबाही आने वाली है, या जो आ चुकी है मगर आँकड़ों की किताब तक नहीं पहुँची है.

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अक्टूबर से दिसंबर के बीच जीडीपी में 4.48% की बढ़त हुई थी. हालाँकि यहाँ भी क़रीब दो साल से लगातार गिरावट दर्ज हो रही थी और यह तिमाही आँकड़ा भी पिछले सात साल का सबसे कमजोर आँकड़ा था.
लेकिन जनवरी से मार्च के बीच तो ये रफ़्तार डेढ़ परसेंट से भी ज़्यादा गिरकर 3.1 परसेंट पर पहुँच गई. यह सिर्फ़ एक हफ़्ते के लॉकडाउन का असर है कि पूरे तीन महीने का आँकड़ा बिगड़ गया.
अब सोच लीजिए कि जब अप्रैल, मई जून के आँकड़े आएँगे तो नज़ारा कितना लहूलुहान होगा. इन तीन में से दो महीने तो क़रीब-क़रीब सब कुछ ठप रह चुका है और अगले महीने भी कितना काम शुरू हो पाएगा इस पर सवालिया निशान लगा हुआ है. क्या हो सकता है कि इसकी एक झलक आज ही आए कोर सेक्टर के आँकड़ों में है.
कोर सेक्टर यानी वो आठ उद्योग जिन्हें अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है. अप्रैल के महीने में इनके इंडेक्स में 38.1 परसेंट की गिरावट दर्ज हुई है. मार्च में भी यहाँ नौ परसेंट की गिरावट थी. यानी दो महीनों में इनका कामकाज क़रीब आधा रह गया है. और आगे का हाल तो आपको पता ही है.

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हालाँकि सांख्यिकी कार्यालय ने भी इस बार अंदाज़ बदल दिया है. जीडीपी के आँकड़े के साथ ऐसी अनेक चीजें बताई गई हैं जिनका अब तक ज़िक्र नहीं होता था.
मसलन एयरपोर्ट पर कितने मुसाफ़िर आए गए, कितना सामान आया गया, एलआईसी के प्रीमियम, बैंकों का जमा और क़र्ज़, कमर्शियल वाहनों की बिक्री. ये और बहुत सी और चीज़ें हैं जिनका ब्योरा दिया गया है कि इनके आधार पर जीडीपी का हिसाब जोड़ा गया है.
ख़ैर, किसी और वक़्त इस पर चर्चा हो सकती थी कि हिसाब ऐसे लगाना चाहिए या वैसे. अभी तो इतनी बात साफ़ दिख रही है कि हालात बिगड़ चुके हैं और अब ज़रूरत है उन्हें वापस पटरी पर लाने का इंतज़ाम करने की.
अगली तिमाही का आँकड़ा तो अगस्त में आएगा लेकिन अनुमान यही है कि वो जीडीपी में भारी गिरावट दिखाने वाला है. जैसे इस बार सिर्फ़ एक हफ़्ते की बंदी का असर दिख रहा है, तब दो महीने या उससे ज़्यादा की बंदी का असर कितना भयावह होगा ये समझने के लिए किसी को अर्थशास्त्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं है.
लेकिन जो लोग पढ़ते और हिसाब जोड़ते रहते हैं उनका अनुमान है कि अगली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में 40 परसेंट तक की गिरावट आने की आशंका है.

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लेकिन अब ज़रूरत यही है कि वो ख़राब इबारत दीवार पर लिखी जाने से पहले ही उसे मिटाने की तैयारी शुरू हो जाए. इसके लिए सबसे ज़रूरी होगा बाज़ारों और कारख़ानों का खुलना. ताकि वो काम शुरू हो सकें जिनसे जीडीपी बनती है.
जैसे मेरा ख़र्च दुकानदार की कमाई, दुकानदार का ख़र्च उसे सामान बेचनेवाली बड़ी कंपनी की कमाई, बड़ी कंपनी का ख़र्च उसे सप्लाई देने वाली कंपनियों की कमाई, उसके कर्मचारियों का वेतन उनकी कमाई और टैक्स में मिलने वाली रक़म सरकार की कमाई. यही सब जोड़कर बनती है जीडीपी. और जीडीपी तभी बनेगी जब लेनदेन या कारोबार चलता रहे. इसीलिए अब सरकार को और समाज को वो रास्ता तो खोजना ही पड़ेगा जिससे कारोबार पटरी पर लौट सके.
उम्मीद करनी चाहिए कि रविवार को प्रधानमंत्री के मन की बात में इस बार इसका रास्ता देखने को मिलेगा.
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