कोरोना वायरस महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था स्वदेशी की तरफ़ जाएगी?

नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़ुद ऐसे संकेत दिए हैं कि बदलाव आने वाला है. उन्होंने पिछले दिनों देश के सरपंचों को वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से संबोधित करते हुए कहा कि कोरोना संकट ने एक नया संदेश दिया है और एक नई दिशा दिखाई है.

"एक प्रकार से उस रास्ते पर चलने के लिए हमारी दिशा-निर्देश कर दी है." और फिर वो ड्रामाई अंदाज़ में पूछते हैं, "और वो रास्ता क्या है, वो दिशा क्या है?" इसका जवाब वो तुरंत ख़ुद ही देते हैं, "इस कोरोना संकट से हमने पाया है कि हमें आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा."

आत्मनिर्भरता मामूली नहीं बल्कि बहुत ही अर्थपूर्ण शब्द है. उन्होंने आगे कहा, "भारत में ये विचार सदियों से रहा है लेकिन आज बदलती परिस्थितियों ने हमें फिर से याद दिलाया है कि आत्मनिर्भर बनो, आत्मनिर्भर बनो, आत्मनिर्भर बनो."

आत्मनिर्भरता पर जिस क़दर उनका ज़ोर था उससे उनके इरादे का अंदाज़ा खूब हो जाता है. इससे कुछ दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि कोरोना संकट के बाद वाली व्यवस्था कैसी हो इस पर विचार होना चाहिए.

उन्होंने इस पर अपनी राय दी, और ज़ोर देकर कहा कि भारत के लिए "शासन, प्रशासन और समाज" के सहयोग से आत्मनिर्भरता और स्वदेशी ज़रूरी है.

स्वदेशी के विचार को प्रोत्साहित करते हुए भागवत ने आगे कहा, "हमें इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि हमारे पास विदेश से क्या आता है, और यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें अपनी शर्तों पर करना चाहिए. हम अपने माल का उत्पादन ख़ुद करें और उनका उपयोग ख़ुद करें."

उन्होंने ये भी कहा, "स्वदेशी के विचार को व्यक्तिगत स्तर से लेकर परिवार तक आंतरिक रूप से अपनाना होगा."

महामारी के शुरू के दिनों में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने देश में 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को साकार करने के लिए घरेलू उद्योग को अधिक आत्मनिर्भर बनाने और राष्ट्रवाद की भावना को आत्मसात करने का आह्वान किया था. गोयल ने कहा था, "उद्योग को राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता बढ़ाने की भावना के साथ काम करना चाहिए."

कोरोना लॉकडाउन

इमेज स्रोत, Getty Images

सरकार, बीजेपी और आरएसएस की एक ही सोच

आत्मनिर्भरता और स्वदेशी के विचार को लेकर सरकार, सत्तारूढ़ दल बीजेपी और उनके वैचारिक संरक्षक आरएसएस एकमत दिखाई देते हैं. स्वदेशी दक्षिणपंथी विचारधारा का एक अहम उद्देश्य है और ऐसा लगता है कि कोरोना संकट ने इस उद्देश्य को हासिल करने का उन्हें एक अवसर दिया है.

कई आर्थिक विशेषज्ञ ये मानते हैं कि महामारी के बाद की दुनिया में सभी बड़े देश घरेलू उत्पादन को मज़बूत करने पर ध्यान देंगे और ग्लोबलाइज़ेशन की जगह अंदरूनी मार्केट को बढ़ावा देंगे. इसके अलावा बड़े देश अपनी कंपनियों को बाहर की कंपनियों के मुकाबले संरक्षण देंगे.

आरएसएस से जुड़े 'स्वदेशी जागरण मंच' के अरुण ओझा कहते हैं कि कोरोना महामारी के बाद "आर्थिक राष्ट्रवाद सभी देशों में आएगा". वो इस बात से ख़ुश हैं कि अर्थव्यवस्था की दिशा को लेकर पुनर्विचार हो रहा है. "हम तो सालों से आत्मनिर्भरता और स्वदेशी मॉडल की वकालत करते आ रहे हैं."

स्वदेशी भारत की एक झलक

आज के भारत के युवाओं को शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं होगा कि 70 और 80 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था आज की आधुनिक अर्थव्यवस्था से कितनी अलग थी, जिसमे नेहरू समाजवाद और इंदिरा गाँधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण का बड़ा असर था. 'स्वदेशी' देश की अर्थव्यवस्था का मन्त्र था, 'आत्मनिर्भरता' इसका अमल. घरेलू उत्पादन पर अधिक ज़ोर था, लेकिन इसकी क्वालिटी का स्तर कम और दाम ज़्यादा. बाहर से लौट कर आए विदेशी सामानों के मालिकों को बड़ी हसरत की निगाहों से देखा जाता था.

सरकार का दखल और कंट्रोल हर जगह नज़र आता था. यही वजह है कि उस दौर को 'लाइसेंस राज' और 'कोटा परमिट राज' कहा जाता था.

आम नागरिकों के लिए लंदन काफ़ी दूर था. विदेश यात्राएं पैसे वालों, देश के इलीट और सरकारी अफसरों के लिए थीं. विदेश आप केवल 500 डॉलर ले जा सकते थे. एम्बेसडर और फ़िएट कारें स्वदेशी गाड़ियां थीं, इसके बाद 1991 का वो ऐतिहासिक साल आया जब भारत ने अपना बाज़ार विदेश के लिए खोल दिया.

ये आधुनिक भारत के सबसे कठिन फैसलों में से एक था. लोगों के दिमाग़ में इस बात का ख़ौफ़ था कि कहीं ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह कोई विदेशी कंपनी देश को एक बार फिर से ग़ुलाम ना बना दे. इसके लिए एक पूरे माइंडसेट को बदलने की ज़रुरत थी.

माइंडसेट बदला, विदेशी टेक्नोलॉजी आई. विदेशी निवेश आया. आधुनिकीकरण हुआ, पुरानी नौकरियां गईं, नए अवसर पैदा हुए. मारुती-सुज़ुकी कारें बनने लगीं, चौड़े और चिकने हाइवे पर विदेशी कारें दनदनाती तेज़ रफ़्तार से चलने लगीं. नई फैक्टरियां लगीं. अलग-अलग क्षेत्रों में बाहर की चीज़ें आने लगीं जिनकी क्वालिटी स्वदेशी सामानों से बेहतर थीं और दाम भी कम, जिसके कारण स्थानीय कंपनियों को या तो खुद को बदलना पड़ा या अपना व्यसाय बंद करना पड़ा.

कोरोना लॉकडाउन, चीन

इमेज स्रोत, Getty Images

जो काम भारत ने 1991 में शुरू किया वही चीन ने 1978 में शुरू किया था लेकिन जहाँ चीनियों ने अपने देश को एक 'ग्लोबल प्रोडक्शन हब' में बदल दिया, दुनिया भर की बड़ी से बड़ी कंपनियों ने अपनी फैक्टरियां चीन में लगाईं. ग़रीबी में जी रहे करोड़ो लोगों को रोज़गार दिया, अर्थव्यवस्था की रफ़्तार इस तेज़ी से बढ़ी कि आज अमरीका के बाद चीन दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी बन गया है.

वहीं भारत का ये काम अधूरा रह गया. फैक्टरियां यहाँ भी बनीं और ग़रीबी रेखा से ऊपर यहाँ के लोग भी उठे लेकिन चीन की तुलना में भारत की कामयाबी फीकी नज़र आती है. इस अर्थव्यवस्था ने ग़रीब और अमीर के बीच अंतर और बढ़ा दिया, बड़े शहरों में झोपड़पट्टियों में रहने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ी और उनकी ग़रीबी भी. प्राथमिक स्वास्थ्य कल्याण के क्षेत्र में सरकारें नाकाम रहीं, आईटी क्षेत्र में प्रगति हुई और भारत इसका एक गढ़ बना लेकिन कुशल श्रमिकों की एक बड़ी संख्या अमरीका और यूरोप काम करने चली गई.

स्वदेशी हो मगर पहले की तरह नहीं

अगर स्वदेशी मॉडल वापस आया तो क्या हमें एक बार फिर से 70 और 80 के दशकों में ले जाएगा जब अर्थव्यवस्था की विकास दर दो या ढाई प्रतिशत हुआ करती थी? जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र प्रोफ़ेसर स्टीव हैंके कहते हैं कि ये भारत को पंचवर्षीय योजना वाली अर्थव्यवस्था की तरफ़ धकेल देगा जिससे देश की विकास दर आधी हो जाएगी.

अमरीका में सालों तक काम करके लौटने वाली मुंबई की रंजीता पराड़कर आधुनिक भारत में पैदा हुईं, वो कहती हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप की 'अमरीका फर्स्ट' वाली पॉलिसी विवादास्पद है. ये एक सियासी स्लोगन है. आत्मनिर्भरता एक सराहनीय क़दम है लेकिन अगर इसे सत्तारूढ़ पार्टी के सियासी अजेंडे से दूर रखा जाए तो".

पराड़कर कहती हैं कि स्वदेशी का पुराना मॉडल नहीं चलेगा जो उनके अनुसार हमेशा से विदेशी निवेश के ख़िलाफ़ रहा है. वो कहती हैं, "देश के अंदर चीज़ों को बनाना अच्छा क़दम है. आज भारत टेक्नोलॉजी में काफ़ी आगे है, यहाँ चीज़ों की क्वालिटी और दाम कॉम्पिटिटिव है इसलिए स्वदेशी का नया रूप अलग होगा. मुझे डर इस बात का है कि कहीं इसे हिंदुत्व विचारधारा से तो नहीं जोड़ा जाएगा".

उनके विचार में देश में क्षमता है और स्किल्ड लेबर भी. "ज़रुरत है इसका सही ढंग से इस्तेमाल करने की." उनकी सलाह ये भी है कि "हमें विदेशी कंपनियों से मुक़ाबला करने से घबराना नहीं चाहिए और न ही विदेशी निवेश को लुभाने में कमी."

कोरोना लॉकडाउन

इमेज स्रोत, Getty Images

नए भारत में भारतीय कंपनियों की क्वालिटी और दाम

जो लोग स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की वकालत करते हैं वो कम खर्च, सरकारी नौकरियों में बढ़ोतरी और उपभोक्तावाद को घटाने पर भी ज़ोर देते हैं. स्वदेशी जागरण मंच के अरुण ओझा कहते हैं, "हमें सोचना पड़ेगा कि एक परिवार के पास एक की जगह पांच गाड़ियों की क्यों ज़रुरत है? अगर आप एक भारतीय साबुन इस्तेमाल करते हैं तो कई तरह के विदेशी साबुनों की क्या ज़रुरत है?"

वो स्थानीय कंपनियों की मिसालें देते हैं. इस श्रेणी में एक नाम काफ़ी ऊपर है और वो है कोयंबटूर, तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनांथम की कंपनी, वो कम लागत वाली सैनिटरी पैड बनाने वाली मशीन के आविष्कारक हैं. उन्होंने बीबीसी से बातें करते हुए कहा कि बड़ी विदेशी कंपनियों ने सालों में सैनिटरी पैड को केवल 10 प्रतिशत महिलाओं तक पहुँचाया था लेकिन उन्होंने इसे बड़ी महिला आबादी तक पंहुचा दिया है.

उनकी सफलता के डंके देश और विदेश में बजने लगे. अक्षय कुमार की फिल्म 'पैडमैन' इन्हीं के जीवन पर बनी है. उनका फ़ॉर्मूला है लोकल मटेरियल का इस्तेमाल करके सस्ता और टिकाऊ सामान बनाना, "थिंक लोकल एंड एक्ट ग्लोबल". इसे समझाते हुए वो कहते हैं, "मैंने पहले दिन से अपने व्यवसाय को एक छोटे धंधे की तरह से डिज़ाइन किया है. जितना छोटा उतना सुंदर."

अरुणाचलम मुरुगनांथम की विदेश में केवल चर्चा ही नहीं हो रही है बल्कि कई देशों में इनके प्रोडक्ट भी बिक रहे हैं. लेकिन उनके मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वो वहां यूनिट लगाते हैं जहाँ बड़ी या विदेशी कंपनियां नहीं जातीं यानी ग्रामीण इलाक़ों में.

प्रधानमंत्री ने भी सरपंचों से ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की बात कही थी. "मज़बूत पंचायतें आत्मनिर्भर गाँवों का भी आधार हैं और इस लिए पंचायत की व्यवस्था जितनी मज़बूत होगी उतना ही लोकतंत्र भी मज़बूती होगा और उतना ही विकास का लाभ उस आख़िरी छोर पर बैठे सामान्य व्यक्ति को भी होगा". उन्होंने कम क़ीमत वाले स्मार्टफोन्स का उदाहरण दिया जो गाँव-गांव तक पहुँच चुके हैं.

नक्शे पर

दुनिया भर में पुष्ट मामले

Group 4

पूरा इंटरैक्टिव देखने के लिए अपने ब्राउज़र को अपग्रेड करें

स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

चीन से करेंगी कंपनियां भारत का रुख़?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल में ये आशा जताई कि कोरोना संकट के बाद चीन से नाराज़ विदेशी कंपनियां वहां से अपनी फैक्टरियां हटाकर भारत में लगाना चाहेंगीं.

इस पर दिल्ली में फ़ोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में इंडो-पैसिफिक के विशेषज्ञ फ़ैसल अहमद इस दावे से असहमत हैं, वो कहते हैं, "मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि कंपनियां चीन से अपने कारख़ानों को हटाकर भारत में स्थापित करेंगीं. इसी तरह की अटकलें ट्रेड वार (चीन-अमरीका के बीच) लगाई जा रही थीं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ."

फ़ैसल के अनुसार भारत अभी बुनियादी ढांचों और हाइ टेक्नोलॉजी में चीन से बहुत पीछे है. वो कहते हैं कि चीन की विशेषता है बड़े पैमाने पर पैदावार करना और अपनी टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करते रहना, इसीलिए मल्टीनेशनल कंपनियां चीन से हटने वाली नहीं हैं.

लेकिन स्वदेशी जागरण मंच के ओझा का तर्क ये है कि कोरोना संकट ने सब कुछ बदल दिया है. "पिछले 15-20 सालों से वैश्विक अर्थव्यवस्था चीन पर निर्भर कर रही थी. अब बड़ी कंपनियों पर उनके देशों की सरकारों का दबाव होगा चीन से कारोबार हटाने का. भारत को ऐसे में दूसरे देशों की तुलना में अधिक मौके मिलेंगे."

अगर भारत ने अपनी आर्थिक नीतियां बदलीं और स्वदेशी की तरफ लौटने का फैसला किया तो ये बहस बेमानी है कि विदेशी कंपनियां चीन में रहेंगीं या इनमें से कुछ भारत आएंगीं.

एक बात तो तय है कि कोरोना संकट ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को जड़ से हिला दिया है. भारत भी इससे बचा नहीं है. परिवर्तन समय की ज़रुरत है. यथास्थिति कोई विकल्प नहीं है. अब परिवर्तन का जो भी रास्ता तय किया जाएगा उस पर टिका होगा देश के 135 करोड़ लोगों का आर्थिक भविष्य.

कोरोना लॉकडाउन

इमेज स्रोत, Getty Images

स्वदेशी भारत को किस मुक़ाम पर ले जाएगा?

अमरीका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर स्टीव एच. हैंके ने बीबीसी को अपनी राय ईमेल से भेजी है.

"एक आर्थिक सुधारक के रूप में, प्रधानमंत्री मोदी बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते नहीं दिखे हैं. उनके संरक्षण में, न्यायिक प्रणाली और नागरिक सेवा में कोई सुधार नहीं हुआ है. नतीजतन, भारत भ्रष्टाचार की परतों में दबा हुआ है, आर्थिक क्षेत्र में, एनपीए, डूबे हुए कर्ज़ों के पहाड़ खड़े करने के अलावा कुछ भी पूरा नहीं हुआ है. और कुख्यात नोटबंदी को कौन भूल सकता है?

भारत में सुधार की ग़ैर-मौजूदगी में, मोदी ने उपमहाद्वीप को एक कमज़ोर क्षेत्र के रूप में छोड़ दिया है जो अपनी क्षमता से कम काम कर रहा है. सत्ता में बने रहने और बड़े पैमाने पर अपने हिंदू आधार को प्रेरित करने के लिए, प्रधानमंत्री और भाजपा ने पुरानी जातीय और धार्मिक लपटों को हवा दी है. अब उन्होंने ज़ेनोफ़ोबिया (विदेशी विरोध) का सहारा लेने का फैसला किया है जो लंबे समय से भारत की एक स्थानिक विशेषता है, एक ऐसी विशेषता जो हमेशा सतह से ज़रा ही नीचे दबी रहती है.

जब मोदी ने विदेश विरोध का सहारा लिया तो उन्होंने क्या पाया? एक पुरानी और बदनाम स्वदेशी आर्थिक परियोजना. याद रहे कि स्वदेशी विचार भारत की विनाशकारी पंचवर्षीय योजनाओं का हिस्सा था. स्वदेशी भारत को किस मुक़ाम पर ले जाएगा? उपमहाद्वीप की आर्थिक विकास की क्षमता में आधी कटौती हो जाएगी. सरकारी दमन को बढ़ावा मिलेगा. राजनीतिक वर्ग और भ्रष्ट भारतीय नौकरशाहों को और ताक़त मिलेगी. स्वदेशी विचार मोदी-भाजपा की सत्ता हथियाने के हिसाब से पूरी तरह से फिट है. इस 'पावर ग्रैब' के साथ, सभी सवाल राजनीतिक होंगे, सभी मुद्दे राजनीतिक होंगे, सभी मूल्य राजनीतिक होंगे और सभी निर्णय राजनीतिक होंगे.

और, जो भारतीय स्वदेशी के आदेशों का पालन नहीं करेंगे, उनके लिए लाठी होगी".

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी
लाइन
हेल्पलाइन
कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)