मस्जिद खोलने पर क्या इमरान ख़ान को डर से करना पड़ा सरेंडर

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- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद (पाकिस्तान) से
रमज़ान की शुरुआत से कुछ दिन पहले दुनिया के अन्य देशों की तरह पाकिस्तान सरकार ने भी तय किया था कि कोविड-19 महामारी को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई लॉकडाउन पॉलिसी को एक बार रिव्यू किया जाएगा.
लेकिन रिव्यू के आधार पर सरकार कोई निर्णय ले पाती, उससे पहले ही दो मौलवियों ने घोषणा कर दी कि सरकार का चाहे जो फ़ैसला हो, रमज़ान के दौरान मस्जिदें खुली रहेंगी.
14 अप्रैल को कराची में हुई एक प्रेस वार्ता में दो नामी धर्म गुरुओं, मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान और मुफ़्ती तकी उस्मानी ने कहा कि 'मस्जिदें और मदरसे अनिश्चित काल के लिए बंद नहीं रह सकते, इसलिए रमज़ान के महीने में इन्हें खोला जाएगा और सामान्य दिनों की तरह मस्जिदों में नमाज़ पढ़ी जाएगी.'
लॉकडाउन के दौरान भी, पाकिस्तान में स्थानीय प्रशासन को मस्जिदों पर प्रतिबंध लगाने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा.
देखा गया कि जिन मस्जिदों में भारी भीड़ जमा हो रही थी और पुलिस ने ऐसी मस्जिदों को बंद कराने की कोशिश की, तो रूढ़िवादी लोगों के समूह ने उन्हें दौड़ाया, उनके साथ हाथापाई की गई. सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हुए जिनमें पुलिस के साथ भीड़ बदसलूकी कर रही है.
प्रेस वार्ता के दौरान मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान और मुफ़्ती तकी उस्मानी ने अपने बयान से यह ज़ाहिर कर दिया था कि सरकार अगर लॉकडाउन को बढ़ाती है, तो वे लॉकडाउन में मस्जिदों को बंद रखने के सरकार के फ़ैसले को नहीं मानने वाले.
पाकिस्तान में राजनीतिक और सामाजिक तौर पर धर्म गुरुओं का जो बोलबाला है, उसे देखते हुए सरकार के लिए संदेश एकदम स्पष्ट था.
इमरान ख़ान भले ही इस बात को समझ रहे थे कि मस्जिदें कोरोना वायरस फ़ैलने का सेंटर साबित हो सकती हैं और सोशल डिस्टेन्सिंग को मस्जिदों के भीतर निभा पाना वाक़ई असंभव होगा, उन्होंने दबाव में आकर मस्जिदें खोलने की अनुमति दे दी.
हालांकि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के आलोचकों का ये भी दावा है कि इमरान इस बात को जानते थे कि अगर उन्होंने रमज़ान के दौरान मस्जिदों में एंट्री पर रोक लगाई तो उनके लिए नई मुसीबत खड़ी हो सकती है. उन्हें डर था कि हज़ारों लोग इससे नाराज़ हो सकते हैं और अगर ऐसा हुआ, तो प्रदर्शनों के रूप में उनके ग़ुस्से का सामना करना, मस्जिदों में भीड़ जमा होने के बराबर ही ख़तरनाक होगा.
बहुत से लोग मानते हैं कि इमरान ख़ान सरकार का मस्जिदें खोल देने का फ़ैसला बेवकूफ़ी से भरा है जो ख़तरनाक साबित हो सकता है.
वामपंथी आलोचक
पाकिस्तान में वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि सरकार में हिम्मत की भारी कमी है जो इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी खड़े होने की बजाय सरेंडर कर दिया.
वामपंथी कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार के इस फ़ैसले से हज़ारों लोगों की जान को ख़तरा हो सकता है और डॉक्टरों की परेशानियाँ बहुत ज़्यादा बढ़ सकती हैं.
सरकार के इस निर्णय की आलोचना कर रहे लोग ये भी कह रहे हैं कि जब सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों ने लॉकडाउन में मुसलमानों की सबसे पवित्र समझे जाने वाली मस्जिदों को बंद कर दिया, तो पाकिस्तान ऐसा क्यों नहीं कर सका.

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इस किस्म के सभी सवालों के जवाब देने और अपनी सरकार का पक्ष रखने के लिए इमरान ख़ान को मीडिया के सामने आना पड़ा.
उन्होंने कहा, "हम आज़ाद देश हैं. हम कैसे लोगों को मस्जिदों में जाने से रोक सकते हैं अगर वो वहाँ जाना ही चाहते हैं. कैसे सरकार उन्हें गिरफ़्तार कर सकती है. आज़ाद समाज इस तरह से नहीं चलता. सरकार को लोगों के साथ मिलकर एक आम राय बनानी पड़ती है ताकि लोग अपनी पसंद के अनुसार चीज़ों को चुन सकें, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि उनके देश के लिए क्या सही है, क्या नहीं."
हालांकि इमरान ख़ान के इस बयान पर विपक्ष ने कुछ आरोप लगाए हैं.
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने इस्लामाबाद में प्रेस से बात करते हुए कहा कि लॉकडाउन के प्रतिबंधों में ढील देने के लिए पीएम ख़ान ने जो तर्क दिया, वो समझ से परे था.
उन्होंने कहा, "ये लीडरशिप की नाकामी है. अन्य मुस्लिम देश कड़े क़दम उठा रहे हैं ताकि अपने लोगों की जान बचा सकें. ये कोई लोकप्रिय राजनीतिक निर्णय नहीं है जिसमें आप देखें कि लोग ख़ुश होंगे या नाराज़. ये समय डॉक्टरों और जानकारों से सलाह-मशविरा लेकर काम करने का है."

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भूख बनाम कोरोना
पूरे पाकिस्तान में हज़ारों ऐसी छोटी-बड़ी मस्जिदें हैं जिन्हें समुदायों से फंड मिलता है. इन मस्जिदों के मौलवी और इनके रखवाले ना सिर्फ़ भारी डोनेशन एकत्र कर पाते हैं, बल्कि समुदायों के इसी दान से इनका जीवन चलता है.
रमज़ान वो महीना है जब अधिकांश मुसलमान अपनी ओर से वार्षिक दान देते हैं जिसे ज़कात कहा जाता है. ज़कात ही इन मस्जिदों की फंडिंग का सबसे बड़ा स्रोत है. इसलिए रमज़ान के दौरान मस्जिदें बंद रखने का मतलब था, पाकिस्तान के हज़ारों मौलवियों की सालाना आय का मारा जाना.
पाकिस्तान सरकार को वैसे ही 'एहसास इमरजेंसी कैश प्रोग्राम' के तहत लाखों पाकिस्तानी लोगों को खाना-पानी बाँटने में परेशानी हो रही है. ऐसे में मस्जिदों को बंद करने का मतलब था, लाखों अन्य लोगों को भुखमरी के मुँह में ढकेलना. इसलिए सरकार ने यह बीच का रास्ता चुना.
हालांकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉक्टर आरिफ़ अल्वी ने अब इस मामले में कमान संभाली है. उन्होंने उलेमाओं और अलग-अलग धार्मिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले धर्म-गुरुओं से बातचीत शुरू की है. आरिफ़ अल्वी ने उनसे 20 पॉइंट के एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाए हैं जिसमें सोशल डिस्टेन्सिंग से जुड़ी कुछ हिदायतें लिखी हैं.
इस समझौते के अनुसार 50 वर्ष से अधिक उम्र को लोगों को मस्जिद में जाने की मनाही है. मौलवी और मस्जिद की रखवाली करने वाले इस बात को सुनिश्चित करेंगे, और अगर समझौते में लिखी शर्तों का पालन नहीं हुआ तो सरकार को अधिकार होगा कि वो मस्जिद को बंद कर दे.

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लाइन ऑफ़ ड्यूटी
मस्जिदों को लेकर पाकिस्तान सरकार ने जो रणनीति बनाई है, उससे सबसे ज़्यादा सताया हुआ डॉक्टर महसूस कर रहे हैं. पाकिस्तान में डॉक्टरों के समूह प्रेस से बात कर रहे हैं और वो सोशल मीडिया पर भी अपना ग़ुस्सा खुलकर ज़ाहिर कर रहे हैं.
कराची में एक प्रेस वार्ता के दौरान डॉक्टरों के एक समूह ने सरकार के मस्जिद खोलने के फ़ैसले पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा कि 'डॉक्टरों पर पहले ही बहुत बोझ है, महामारी के समय में कोई भी ग़लती स्थिति को इतना बिगाड़ सकती है कि इसे संभालना डॉक्टरों के बस में नहीं होगा.'
उन्होंने कहा कि जूनियर डॉक्टर और हेल्थ केयर वर्कर जांबाज़ लड़ाकों की तरह अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, उनके पास अपनी सुरक्षा के लिए ज़रूरी सामान तक नहीं हैं, पर उन्हें लोगों का सपोर्ट नहीं मिलेगा तो वो इस लड़ाई को आगे नहीं ले जा पाएंगे.
डॉक्टरों ने चेताया है कि पाकिस्तान में जब से लॉकडाउन में ढील दी गई है, तब से कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़ने की दर में उछाल आया है.
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान, राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी और अन्य नामी राजनेताओं ने घोषणा की है कि वे रमज़ान के दौरान अपने घरों में ही नमाज़ पढ़ेंगे. मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान और मुफ़्ती तकी उस्मानी ने भी अब कहा है कि वो घर में ही नमाज़ पढ़ेंगे. लेकिन पाकिस्तान के लाखों लोगों पर अभी इन बातों का असर होता दिखाई नहीं दे रहा. उन्हें लगता है कि उनका विश्वास उन्हें पूरी तरह महफ़ूज़ रखेगा.

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