मोदी सरकार भारत को केवल नारों के दम पर आत्मनिर्भर कैसे बनाएगी?- नज़रिया

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- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
उदारीकरण के बाद यानी 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद देश में तरक़्क़ी की रफ़्तार तेज़ हुई. इस पर तो कोई विवाद नहीं है. मगर इस तरक़्क़ी का फ़ायदा किसे मिला इस पर लगातार विवाद रहा है.
सबसे बड़ा सवाल यही उठता रहा कि ग़रीबी मिटाने में या आर्थिक विषमता कम करने में सुधारों ने क्या योगदान किया? क्या ग़रीबी ख़त्म हो गई?
इस सवाल का जवाब देने में तो सुधारों के बड़े से बड़े पैरोकार को भी नज़रें चुरानी ही पड़ती हैं. ग़रीबी हटाओ की अपार सफलता के पचास साल बाद भी ग़रीबी तो नहीं हटी.
हाँ, सबका साथ सबका विकास के नाम से उसी फ़िल्म का एक ब्लॉकबस्टर रीमेक ज़रूर देखने को मिला है. अब कुछ पूछने का वक़्त तो है नहीं, पहले साठ साल का हिसाब दो फिर सवाल पूछना.
लेकिन आर्थिक सुधारों या बाज़ार के खुल जाने से एक चीज़ जो पूरी तरह ग़ायब हो गई वो थी स्मगलिंग. जी हाँ, तस्करी. नशीली दवाओं या आतंकवादियों के हथियारों की तस्करी तो बंद नहीं हुई.
लेकिन रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ें, इलेक्ट्रॉनिक्स और ख़ासकर सोने और हीरों की तस्करी के तो शटर डाउन हो ही चुके थे. वजह साफ़ थी, जब सब कुछ सीधे रास्ते से लाया जा सकता है, उसी दाम पर बेचा जा सकता है, तो मामूली टैक्स या ड्यूटी चुकाने के बजाय चोर रास्ते से आने का जोखिम कोई क्यों उठाएगा?

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ठोस नीति न कि लोकप्रिय नारा
लेकिन इन दिनों ये आशंका बढ़ रही है कि कहीं फिर तस्करी का धंधा तेज़ तो नहीं हो जाएगा. और इसके साथ ही सवाल ये है कि क्या फिर ऐसे हालात बनेंगे जिसमें ईमानदारी से टैक्स चुकाकर सामान ख़रीदने वाले लोग नुक़सान में रहेंगे और तस्करों के हाथों वही सामान सस्ता ख़रीदने वाले पड़ोसी उन्हें मुँह चिढ़ाते दिखेंगे. आप पूछ सकते हैं कि अचानक ये तस्करी का भूत कहां से जाग उठा.
तो ध्यान दीजिए. भारत के सबसे तेज़-तर्रार उद्योगपतियों के संगठन सीआईआई के सालाना जलसे में ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चमड़ा, जूते-चप्पल और फ़र्नीचर के अलावा एसी यानी एयरकंडीशनर के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर होने की ज़रूरत है. उन्होंने ये गिनाया कि अभी देश में एसी की कुल ज़रूरत का 30 फ़ीसदी हिस्सा आयात होता है, जिसे रोकना ज़रूरी है.
ख़बरें हैं कि उद्योग मंत्रालय के अधिकारी दस ऐसे सेक्टरों पर काम में लगे हैं जिनमें आयात कम करके मेक इन इंडिया या आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर बढ़ाया जाएगा. इनमें कैपिटल गुड्स, मशीनरी, फ़ार्मा, सेलफ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, जूलरी और टेक्सटाइल के साथ ही एसी यानी एयर कंडिशनर का नाम भी शामिल हैं.

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केवल शुल्क बढ़ाना समाधान नहीं
सेलफ़ोन बनाने का ज़िक्र तो ख़ूब हुआ लेकिन पिछले बजट में सेलफ़ोन के भीतर लगने वाले प्रिंटेड सर्किट बोर्ड या पीसीबी पर ड्यूटी दस से बढ़ाकर 20 फ़ीसदी और चार्जर पर पंद्रह से बीस फ़ीसदी कर दी. तर्क वही कि इन चीज़ों के भारत में बनने को बढ़ावा दिया जाना है.
इससे पहले पिछले साल सरकार ने सोने पर आयात शुल्क दस फ़ीसदी से बढ़ाकर साढ़े बारह फ़ीसदी कर दिया था. ऊपर से सरचार्ज जोड़कर ये ड्यूटी पंद्रह फ़ीसदी के पार चली जाती है. यानी चोर रास्ते से सोना लाना फिर आकर्षक होने लगा है. तमाम जानकारों ने यह आशंका सामने रखी कि इससे सोने की तस्करी में फिर तेज़ी आ सकती है.
जवाहरात और ज़ेवरात का कारोबार करने वालों की संस्था जीजेईपीसी ने तो गणित जोड़कर भी बताया कि हीरे जवाहरात पर ड्यूटी पाँच से बढ़ाकर साढ़े सात फ़ीसदी होने के बाद पिछले साल डायमंड जूलरी का एक्सपोर्ट दस फ़ीसदी गिर गया और हीरे की पॉलिश के आर्डरों में भी ख़ासी गिरावट आई है.
सोने के बारे में तो एक से ज़्यादा विशेषज्ञ यह कह चुके हैं कि इस पर ड्यूटी बढ़ाना सीधे-सीधे तस्करी का रास्ता खोलना है. 2011 में सोने पर चार फ़ीसदी ड्यूटी लगती थी. 2013 में यह बढ़कर दस फ़ीसदी हो गई. तभी से तस्करी में तेज़ी आ रही थी. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार 2018 में ही देश में क़रीब सौ टन सोना तस्करी के रास्ते आया था.

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आयात कैसे कम होगा?
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में शामिल आर्थिक विशेषज्ञ नीलेश शाह लंबे समय से सोने के बेहतर इस्तेमाल और ऐसे तरीक़े अपनाने के सुझाव देते रहे हैं जिनसे सोने का बेवजह आयात कम हो सके और देश को उसके स्वर्ण भंडार का फ़ायदा भी मिले.
बजट के ठीक पहले तक यह माँग ज़ोरों पर थी कि सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाकर चार फ़ीसदी कर दी जाए. इसी तरह एप्पल जैसे महँगे सेलफ़ोन बनानेवाले माँग कर रहे थे कि महँगे फ़ोन पर जो बीस फ़ीसदी ड्यूटी लगती है उसे अधिकतम चार हज़ार रुपए पर सीमित कर दिया जाए. इंडियन सेलुलर एंड इलेक्ट्रॉनिक एसोसिएशन का कहना था कि अगर सरकार ड्यूटी घटा देती तो उसे सालाना ग्यारह सौ करोड़ रुपए की कमाई होती क्योंकि लोग तब ग्रे मार्केट से फ़ोन नहीं लेते.
यही तर्क सोने और जवाहरात के मामले में है. भारतीय व्यापारियों का कहना है कि अब बहुत से गहने और जवाहरात थाइलैंड जैसे उन देशों के रास्ते आ रहे हैं जिनके साथ आसियान के तहत भारत का मुक्त व्यापार समझौता है. इन पर सरकार को भी कुछ नहीं मिलता और घरेलू कारोबारियों के लिए उससे मुक़ाबला भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि ड्यूटी भरने के बाद वो उनसे दाम मैच नहीं कर सकते.

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एकदम यही बात एयर कंडीशनर बनानेवाले भी कहते हैं. उनका कहना है कि जापान की कंपनियाँ जिनके ब्रैंड मशहूर हैं वो अपने कंप्रेसर और ज़्यादातर पुर्ज़े थाईलैंड और वियतनाम के रास्ते इंपोर्ट कर रही हैं ताकि व्यापार समझौते का फ़ायदा ले सकें. हालाँकि भारत के एसी मार्केट में क़रीब पैंतालीस फ़ीसदी इंपोर्ट चीन से होता है लेकिन इसके अलावा भी देश हैं जहां से सामान आ रहा है. उनका ध्यान रखा जाना भी ज़रूरी है.
और उससे ज़्यादा ज़रूरी यह समझना है कि आज की दुनिया में अगर आगे बढ़ना है तो अपनी इंडस्ट्री को मुक़ाबले में खड़े होने लायक़ बनाना होगा, न कि ड्यूटी की बैसाखी लगाकर किसी तरह खड़े रखना. अगर आप एक रास्ता बंद करेंगे तो जुगाड़ू लोग दूसरा दरवाज़ा खोल लेंगे. यह डर बेबुनियाद नहीं है कि ऐसी नीतियाँ हमें वापस 1970 के दौर में ले जा सकती हैं जहां सिर्फ़ लाइसेंस, परमिट और पाबंदियों का राज था. उनके भरोसे आत्मनिर्भर होने का सपना खामख्याली के अलावा कुछ नहीं है.

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