‘मोदी ने अर्थव्यवस्था को जर्जर किया’ - जीडीपी पर क्या बोले विदेशी अख़बार

प्रधानमंत्री मोदी

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    • Author, मोहम्मद शाहिद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय ने सोमवार को जीडीपी के आंकड़े जारी कर दिए, जिसमें यह नकारात्मक रूप से 23.9 फ़ीसदी रही है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में इसे 1996 के बाद ऐतिहासिक गिरावट माना गया है और इसका प्रमुख कारण कोरोना वायरस और उसके कारण लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को बताया जा रहा है.

दुनिया में एक समय सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था रहे भारत के इस नए जीडीपी आंकड़े से जुड़ी ख़बरों और लेख को दुनियाभर के तमाम अख़बारों और मीडिया हाउसेज़ ने अपने यहां जगह दी है.

अमरीकी मीडिया हाउस सीएनएन ने अपने यहां ‘भारतीय अर्थव्यवस्था रिकॉर्ड रूप से सबसे तेज़ी से सिकुड़ी’ शीर्षक से ख़बर लगाई है.

इस ख़बर में कैपिटल इकोनॉमिक्स के शीलन शाह कहते हैं कि इसके कारण अधिक बेरोज़गारी, कंपनियों की नाकामी और बिगड़ा हुआ बैंकिंग सेक्टर सामने आएगा जो कि निवेश और खपत पर भारी पड़ेगा.

पीएम मोदी निशाने पर

जापान के बिजनेस अख़बार निकेई एशियन रिव्यू में भारतीय वित्त आयोग के पूर्व सहायक निदेशक रितेश कुमार सिंह ने एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक है, ‘नरेंद्र मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को जर्जर बनाया.’

इसमें लिखा गया है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यापार समर्थित छवि होने के बावजूद वो अर्थव्यवस्था संभालने में अयोग्य साबित हो रहे हैं, 2025 तक अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन (खरब) डॉलर की इकोनॉमी बनाने का सपना अब पूरा होता नहीं दिख रहा है.

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निर्मला सीतारमण और प्रधानमंत्री मोदी

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“भारत के सबसे आधुनिक औद्योगिक शहर से आने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने वादा किया था कि वो अर्थव्यवस्था सुधारेंगे और हर साल 1.2 करोड़ नौकरियां पैदा करेंगे. छह साल तक दफ़्तर से आशावाद की लहर चलाने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था जर्जर हो गई है. जिसमें जीडीपी चार दशकों में पहली बार इतनी गिरी है और बेरोज़गारी अब तक के चरम पर है. विकास के बड़े इंजन, खपत, निजी निवेश या निर्यात ठप्प पड़े हैं. ऊपर से यह है कि सरकार के पास मंदी से बाहर निकलने और ख़र्च करने की क्षमता नहीं है.”

लेख में लिखा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी की इकलौती चूक सिर्फ़ अर्थव्यवस्था संभालना नहीं है बल्कि वो भ्रष्टाचार समाप्त करने के मामले में फ़ेल हुए हैं.

“मोदी ने विनाशकारी नोटबंदी की घोषणा की थी जिसका मक़सद काले धन को समाप्त करना था. इसने अराजकता का माहौल बनाया, इस योजना ने लाखों किसानों और मंझोले एवं छोटे उद्योगों के मालिकों को तबाह कर दिया. हालांकि, उनके समर्थकों का कहना था कि यह सब थोड़े समय के लिए है और भ्रष्टाचार से लड़ने में यह आगे फ़ायदा देगा.”

इस लेख में अर्थव्यवस्था के नीचे जाने की वजह जीएसटी के अलावा, एफ़डीआई, 3600 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाना और प्रधानमंत्री मोदी का सिर्फ़ कुछ ही नौकरशाहों पर यकीन करना बताया गया है.

अमरीकी अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी अपने यहां इस ख़बर को जगह दी है.

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बुरी तरह बिगड़ी है. अमरीका की अर्थव्यवस्था में जहां इसी तिमाही में 9.5 फ़ीसदी की गिरावट है, वहीं जापान की अर्थव्यवस्था में 7.6 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.

व्यक्ति

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अर्थव्यवस्था का नुक़सान इन आंकड़ों से अधिक?

अख़बार लिखता है कि अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के मामले में भारत की तस्वीर कुछ अलग है क्योंकि यहां अधिकतर लोग ‘अनियमित’ रोज़गार में लगे हैं जिसमें काम के लिए कोई लिखित क़रार नहीं होता और अकसर ये लोग सरकार के दायरे से बाहर होते हैं, इनमें रिक्शावाले, टेलर, दिहाड़ी मज़दूर और किसान शामिल हैं.

अर्थशास्त्री मानते हैं कि आधिकारिक आंकड़ों में अर्थव्यवस्था के इस हिस्से को नज़रअंदाज़ करना होता है जबकि पूरा नुक़सान तो और भी अधिक हो सकता है.

अख़बार आगे लिखता है कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश की अर्थव्यवस्था कुछ ही सालों पहले 8 फ़ीसदी की विकास दर से बढ़ रही थी जो दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी.

लेकिन कोरोना वायरस महामारी से पहले ही इसमें गिरावट शुरू हुई. उदाहरण के लिए पिछले साल अगस्त में कार बिक्री में 32 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई जो दो दशकों में सबसे अधिक थी.

सोमवार को आए आंकड़ों में उपभोक्ता ख़र्च, निजी निवेश और आयात बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

व्यापार, होटल और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में 47 फ़ीसदी की गिरावट आई है. एक समय भारत का सबसे मज़बूत रहा निर्माण उद्योग 39 फ़ीसदी तक सिकुड़ गया है.

अख़बार लिखता है कि सिर्फ़ कृषि क्षेत्र से ही अच्छी ख़बर आई है जो मानसून की अच्छी बारिश के कारण 3 फ़ीसदी से 3.4 फ़ीसदी के दर से विकसित हुआ है.

खेती

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मोदी बनाना चाहते हैं 5,000 करोड़ की अर्थव्यवस्था

“प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वो 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाना चाहते हैं. 2024 में आम चुनाव हैं और संभवतः वो तीसरी बार चुनाव लड़ें. 2019 में भारत की जीडीपी 2900 करोड़ की थी जो अमरीका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी. हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था 10 फ़ीसदी छोटी हो जाएगी.”

फ़ाइनेंशियल टाइम्स अख़बारका शीर्षक है ‘भारतीय अर्थव्यवस्था एक तिमाही के बराबर सिकुड़ी.’

अख़बार लिखता है कि भारत की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस की मार से पहले ही कमज़ोर हालत में थी लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लॉकडाउन में मैन्युफ़ैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योगों पर बड़ा असर डाला और व्यावसायिक गतिविधियां तकरीबन ठप्प पड़ गईं.

अख़बार ने लिखा है कि आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इंटरव्यू के दौरान बेहद विश्वास से कहा था कि आरबीआई कमज़ोर आर्थिक स्थिरता या बैंकिंग प्रणाली को महामारी के झटके से बचा सकता है, इसमें अगले स्तर का आर्थिक प्रोत्साहन दिए जाने का अनुमान लगाया गया है.

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