सऊदी अरब ने तेल उत्पादन पर ऐसा क्या कह दिया कि भारत चिढ़ गया

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

पिछले तीन महीने से भारत और सऊदी अरब के बीच कच्चे तेल के दाम को लेकर आपसी रिश्ते में जो तनाव पैदा हुआ है, उसमें कोई कमी होती दिखाई नहीं दे रही है.

पिछले दिनों भारत के तेल और गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सऊदी अरब के तेल मंत्री अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान अल सऊद के उस बयान पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने भारत के कच्चे तेल के दाम को कम करने की अपील पर कहा था कि भारत अपने उस स्ट्रैटेजिक तेल रिज़र्व का इस्तेमाल करे, जो उसने पिछले साल तेल के गिरती क़ीमत के बीच ख़रीद कर जमा किया था.

धर्मेंद्र प्रधान ने सऊदी अरब के तेल मंत्री के इस बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ये बयान कूटनीतिक रूप से सही नहीं है. उन्होंने कहा, "मैं इस तरह के दृष्टिकोण से असहमत हूँ. निश्चित रूप से रिज़र्व तेल के इस्तेमाल के लिए भारत की अपनी रणनीति है. हम अपने हितों के प्रति सचेत हैं.''

इस तनाव का भारत-सऊदी अरब रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है इस पर नज़र डालेंगे बाद में, पहले इस बात पर निगाह डालते हैं कि भारत के पास कितनी मात्रा में तेल भंडार मौजूद है और रिज़र्व में रखे इस तेल भंडार का इस्तेमाल कब और कैसे किया जा सकता है?

भारत के तेल भंडार

तेल भंडार करने वाला टैंकर (फ़ाइल फोटो)

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पिछले महीने राज्य सभा में धर्मेंद्र प्रधान ने एक लिखित बयान में कहा था कि भारत सरकार ने पिछले साल अप्रैल/मई 2020 में (महामारी और लॉकडाउन शुरू होने के बाद) कच्चे तेल की कम क़ीमतों का फ़ायदा उठाते हुए स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व को पूरी क्षमता से भरा है, जिससे लगभग 5,000 करोड़ रुपए की बचत हुई है.

दरअसल भारत सरकार के एक विभाग इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व लिमिटेड (ISPRL) की ज़िम्मेदारी तेल भंडार को बढ़ाना है. इस विभाग ने अब तक तीन जगहों पर 5.33 मिलियन मीट्रिक टन के क़रीब भंडार खड़ा किया है. इसे रणनीतिक पेट्रोलियम रिज़र्व के अंतर्गत जमा किया गया है. ये रिज़र्व भंडार भारत की रोज़ाना खपत के हिसाब से लगभग 10 दिनों तक के लिए काफ़ी होगा. ये भंडार विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर में हैं.

मंत्री ने अपने बयान में ये भी कहा कि निजी कंपनियों के पास मौजूद स्ट्रेटेजिक रिज़र्व भंडार की मात्रा देश की ज़रूरत के हिसाब से 64.5 दिनों तक चलेगी. यानी अगर किसी कारण भारत तेल का आयात न कर सके, तो इसके पूरे भंडार को 74 दिनों तक इस्तेमाल किया जा सकता है.

धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि तेल के स्ट्रेटेजिक भंडार को और भी अधिक बढ़ाने के लिए दूसरे चरण में ओडिशा के चंडिखोल में 4 मिलियन मिट्रिक टन और कर्नाटक के पादुर में 2.5 मिलियन मीट्रिक टन का रणनीतिक भंडार तैयार किया जा रहा है, जिसे 12 दिनों तक इस्तेमाल किया जा सकता है

भारत में तेल के आसमान छूते दाम

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पिछले साल मार्च से अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल के तेज़ी से गिरते दाम को नियंत्रण में लाने के लिए चार महींने पहले तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक ने उत्पादन में कटौती कर दी. सऊदी अरब ने ख़ुद भी उत्पादन कम किया. इस वजह से पेट्रोल के दाम फिर से बढ़ने लगे.

भारत में पेट्रोल और डीज़ल का बढ़ता दाम एक विवादास्पद मुद्दा बन चुका है. बुधवार को जबलपुर में देश भर में सबसे महंगा पेट्रोल मिल रहा था और क़ीमत थी 98.57 रुपए प्रति लीटर.

भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की क़ीमतों से जुड़े हैं. इसका मतलब ये हुआ कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल का दाम घटे या बढ़े, तो भारत में भी इसी तरह का उतार-चढाव नज़र आना चाहिए. लेकिन पिछले साल आम उपभोक्ताओं को तेल के गिरते दामों का फ़ायदा नहीं हुआ, क्योंकि मोदी सरकार ने दो बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी.

ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी) के पूर्व अध्यक्ष आरएस शर्मा कहते हैं, "2014 में जब यह सरकार सत्ता में आई, तो तेल की क़ीमत 106 डॉलर प्रति बैरल थी. उसके बाद से क़ीमतों में कमी आ रही है. हमारे पीएम ने भी मज़ाक में कहा था कि मैं भाग्यशाली हूँ कि जबसे मैं सत्ता में आया हूँ, तेल की दरें कम हो रही हैं. उस समय पेट्रोल की क़ीमत 72 रुपये प्रति लीटर थी. सरकार ने भारत में क़ीमत कम नहीं होने दीं, इसके बजाय सरकार ने उत्पाद शुल्क में वृद्धि की."

तेल कैसे पहुँचता है आप तक

अब इस साल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ कर 71 डॉलर प्रति बैरेल तक पहुँच गई और अब ये 64.5 डॉलर प्रति बैरेल के क़रीब है. जनवरी में सऊदी अरब का एक अहम ग्राहक होने के नाते भारत सरकार ने उत्पादन को बढ़ाने की गुज़ारिश की थी, लेकिन इसका सऊदी अरब पर कोई असर नहीं हुआ.

उस समय भी दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल बना था. मार्च में भारत ने ओपेक देशों और सऊदी अरब से कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने की मांग की. लेकिन एक बार फिर भारत की बात नहीं मानी गई और जब भारत ने इस पर अपनी मायूसी जताई, तो सऊदी अरब के मंत्री ने कहा कि भारत को चाहिए कि वो सस्ते दामों में ख़रीदे गए कच्चे तेल के स्ट्रेटेजिक भंडार का इस्तेमाल करे.

विशेषज्ञ कहते हैं कि सऊदी मंत्री के बयान से अगर भारत मायूस हुआ है, तो ये सही है क्योंकि कोई भी देश अपने स्ट्रेटेजिक तेल भंडार को कब और कैसे इस्तेमाल करे, वो उसका अपना अंदरूनी मामला है. दूसरे ये कि स्ट्रेटेजिक रिज़र्व के इस्तेमाल पर एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका भारत भी एक सदस्य है. सदस्य देश इस तरह के फ़ैसले इस संगठन के नियमों के अनुसार लेते हैं.

भारत में पेट्रोलियम और गैस ज़रूरत से बहुत कम मात्रा में उपलब्ध हैं, इसलिए इनका आयात होता है. देश को पिछले साल अपने ख़र्च का 85 प्रतिशत हिस्सा पेट्रोलियम उत्पाद को विदेश से आयात लिए इस्तेमाल करना पड़ा था, जिसकी लागत 120 अरब डॉलर थी.

भारत को अपनी विशाल अर्थयवस्था के विकास के लिए कच्चे तेल की बहुत मात्रा में ज़रूरत है. तेज़ी से हो रहे आर्थिक विकास के लिए भारत में तेल ईंधन की तरह काम करता है. इस समय भारत अपनी आयात का 25 प्रतिशत कच्चा तेल दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक सऊदी अरब समेत दूसरे अरब देशों से पूरी करता है.

अमेरिका और रूस भी उन बड़े देशों में शामिल हैं, जो भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल सप्लाई करते हैं

ऊर्जा नीति

सत्तारूढ़ बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल का तर्क है कि अब समय आ गया है कि भारत खाड़ी देशों पर अपनी निर्भरता कम करे और ईरान और वेनेज़ुएला से अपनी ज़रूरतें पूरी करे. दोनों देशों से अमेरिकी प्रतिबंध के कारण भारत ने तेल आयात करना बंद कर दिया है. दोनों देश एक समय भारत को भारी मात्रा में तेल बेचा करते थे.

सिंगापुर में भारतीय मूल की ऊर्जा मामलों की विशेषज्ञ वंदना हरी सलाह देती हैं कि भारत लंबे अरसे की नीतियों पर ध्यान दे और क्लीन एनर्जी और ऊर्जा में विविधता लाने पर ज़ोर दे.

वीडियो कैप्शन, नेपाल से भारत में हो रही पेट्रोल-डीज़ल की तस्करी, भारत की चिंताएं बढ़ी

मोदी सरकार लंबे अरसे के हल के लिए कई योजनाओं को शुरू करने का इरादा रखती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 फ़रवरी को तमिलनाडु में एक भाषण में ऊर्जा में विविधता और इस पर निर्भरता को कम करने पर काफ़ी ज़ोर भी दिया था.

कुछ विशेषज्ञ ये सलाह देते हैं कि भारत तेल के अपने स्ट्रेटेजिक रिज़र्व भंडार को बढ़ाए यानी 74 दिनों से बढ़ाकर 90 दिनों तक का भंडार तैयार करे. हालांकि स्ट्रैटेजिक रिज़र्व आपातकालीन समय के लिए होता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आपदा या युद्ध के कारण अगर तेल के दाम आसमान छूने लगे, तो भंडार में जमा किए गए तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस समय दुनिया में ऐसे सबसे बड़े भंडार अमेरिका ने बना रखे हैं.

भारत तेल का तीसरा सबसे बड़ा ख़रीदार

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी

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अमेरिका और चीन के बाद तेल का सबसे अधिक आयात भारत करता है. इसलिए विशेषज्ञ ज़ोर देकर रिज़र्व को बढ़ाने की बात करते हैं.

तेल के एक बड़े आयातक होने के नाते भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अहमियत है. लेकिन अगर सऊदी अरब भारत की बिलकुल ना सुने, तो विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे दोनों देशों के बीच हाल में स्थापित हुए घनिष्ठ संबधों पर फ़र्क़ पड़ सकता है.

पिछले छह सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सऊदी अरब का दो बार दौरा किया है, जिसके बाद से भारत की नज़रों में सऊदी अरब की हैसियत केवल एक तेल बेचने वाले देश की तरह से नहीं रह गई है.

सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था की तेल निर्यात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत में निवेश के अवसर ढूँढ रहा है. इसने भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई है. दिसंबर में सऊदी अरब ने भारत को आश्वासन दिया था कि भारत में उसकी निवेश योजनाएँ पटरी पर हैं. इसके अलावा सैन्य और सुरक्षा मामलों में दोनों देशों के बीच रिश्ते गहरे गए हैं.

विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों को एक दूसरे की सख़्त ज़रूरत है. भारत, चीन के बाद, सऊदी तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार है और सऊदी अरब, इराक़ के बाद, भारत को कच्चा तेल सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश है. इसके अलावा ऊर्जा उद्योग में सऊदी अरब की पूँजी और भारत की टेक्नोलॉजी आने वाले कई सालों तक एक दूसरे को मज़बूत धागों से बाँध कर रखेंगे.

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