सोवियत संघ का विघटन 30 साल पहले किन हालात में हुआ था

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सबसे ताक़तवर मुल्क अमेरिका को दशकों तक केवल एक ही देश चुनौती देने की ताक़त रखता था लेकिन उसका वजूद भी दुनिया के नक़्शे से 25 दिसंबर, 1991 को ख़त्म हो गया था.
उस दिन सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोफ़ ने क्रेमलिन से देश को संबोधित करते हुए कहा, "सोवियत संघ के राष्ट्रपति के तौर पर मैं अपना काम बंद कर रहा हूं."
उनका ये भाषण पूरी दुनिया ने सुना. बहुत से लोगों के लिए उन्हीं लम्हों में शीत युद्ध और एक कम्युनिस्ट ताक़त ख़त्म हो गए थे. लेकिन दूसरी तरफ़ ऐसे भी लोग थे, जिनका ये मानना था कि सोवियत संघ का वजूद बेलावेझा ट्रीटी के हफ़्तों पहले ख़त्म हो चुका था.
हालांकि एक बड़ा तबका उसी साल अगस्त में हुई तख़्तापलट की कोशिश के बाद ये समझ गया था कि सोवियत संघ के अब गिने-चुने दिन रह गए हैं.
उस बरस बसंत के मौसम से ही गोर्बाचोफ़ और संघीय सरकार में उनके सहयोगी एक नए समझौते के लिए बातचीत कर रहे थे. सोवियत संघ के घटक देशों के सामने अधिक लचीले संघ का प्रस्ताव रखा गया था. उनका मानना था कि सोवियत संघ को बचाने का यही आख़िरी तरीका रह गया है.

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अगस्त, 1991 में तख्तापलट की कोशिश
'मॉस्को, 25 दिसंबर, 1991: द लास्ट डे ऑफ़ द सोवियत यूनियन' के लेखकर कोनोर ओक्लेरी बीबीसी मुंडो से कहते हैं, "वे एक तरह का संघ बचाए रखना चाहते थे लेकिन गुजरते समय के साथ-साथ घटक देशों के नेताओं के लिए ये विचार आकर्षक नहीं रह गया था ख़ासकर बोरिस येल्तसिन को ये पसंद नहीं था."
कट्टरपंथी कम्युनिस्टों, आर्मी और खुफिया एजेंसी केजीबी ने भी इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. मिखाइल गोर्बाचोफ़ को उनके क्रीमिया वाले घर में नज़रबंद कर दिया गया. इस घर में वे अपनी छुट्टियां मनाया करते थे.
लेकिन तख्तापलट की ये कार्रवाई सुनियोजित नहीं थी और मॉस्को में बोरिस येल्तसिन की अगुवाई में आम नागरिकों के प्रदर्शन के बाद नाकाम हो गई. बोरिस येल्तसिन मिखाइल गोर्बाचोफ़ के सहयोगी भी थे और आलोचक भी.
तख्तापलट की ये कोशिश नाकाम रही लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि मिखाइल गोर्बाचोफ़ का असर खत्म हो गया और रूसियों के बीच बोरिस येल्तसिन अधिक स्वीकार्य नेता बनकर उभरे.
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में सोवियत संघ मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक कहते हैं, "गोर्बाचोफ़ की योजना थी कि न्यू यूनियन ट्रीटी पर 20 अगस्त को दस्तखत कर दिए जाएं लेकिन सेना और केजीबी का ये मानना था कि ऐसा करने पर एक राष्ट्र के तौर पर सोवियत संघ बर्बाद हो जाए और मैं इस बात से इत्तेफाक रखता हूं."

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न्यू यूनियन ट्रीटी
सोवियत संघ के इतिहास पर लिखी गई किताब 'अ फेल्ड एम्पायर: द सोवियत संघ इन द कोल्ड वार फ्रॉम स्टालिन टू गोर्बाचोफ़ के लेखक प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक याद करते हैं, "तख्तापलट की कोशिश हैरान कर देने वाली घटना थी क्योंकि उस वक्त हर कोई छुट्टियां मना रहा था. लोगों को उम्मीद तो थी कि ऐसा कुछ हो सकता है लेकिन ये अगस्त में ही हो जाएगा, ये किसी ने सोचा नहीं था."
प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक सोवियत संघ के ज़माने में मॉस्को में रह चुके हैं. उनका कहना है कि आम लोग इस बात पर यकीन करते हैं कि सोवियत संघ के इतिहास में 25 दिसंबर की तारीख एक अहम पड़ाव था.
"लेकिन मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता हूं. जब गोर्बाचोफ़ ने इस्तीफ़ा दिया था तो उनके पास कोई ताक़त नहीं था. उनका भाषण केवल टीवी पर दिखाए गए किसी शो की तरह था."
तख्तापलट की कोशिश में शामिल लोगों ने न्यू यूनियन ट्रीटी पर हकीकत में बदलने से अगस्त में ही रोक दिया था लेकिन वे सोवियत संघ के विघटन को रोक नहीं पाए. इसकी पटकथा कई सालों से लिखी जा रही थी और सच तो ये है कि उन्होंने इसे और तेज़ कर दिया.
तख्तापलट की कोशिश के बाद बहुत से लोगों को ये लगा कि सोवियत संघ का अंत करीब आ गया है लेकिन गोर्बाचोफ़ समेत कुछ लोग ये मानते थे कि संप्रभु राष्ट्रों के एक नए तरह के संघ के जरिए सोवियत संघ को बचाया जा सकता था.

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बेलावेझा समझौता
प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक कहते हैं, "लाखों लोगों के लिए सोवियत संघ का विचार पसंद था. ये वो लोग थे जिन्हें एक बड़े देश में रहने की आदत थी. उन्हें उम्मीद थी कि किसी नए नाम या दूसरे निज़ाम में ये शायद बच जाए."
लेकिन बोरिस येल्तसिन की कुछ और ही योजना था.
8 दिसंबर, 1991 को रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने सोवियत संघ के 15 घटक देशों में से तीन नेताओं के साथ मुलाकात की. येल्तसिन से मिलने वालों में यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति लियोनिड एम क्रावचुक, बेलारूस के नेता स्तानिस्लाव शुश्केविच शामिल थे. उन्होंने एक साझा बयान जारी किया जिसे बेलावेझा समझौता कहते हैं.
इस समझौते के अनुसार सोवियत संघ का विघटन होना था और इसकी जगह पर स्वतंत्र देशों के एक राष्ट्रमंडल का गठन किया जाना था जिसमें पूर्व सोवियत संघ के घटक देश शामिल होने वाले थे.
पत्रकार कोनोर ओक्लेरी इस घटना को सोवियत संघ की ताबूत पर आख़िरी कील मानते हैं. वो कहते हैं, "यहां से वापस लौटने के सभी दरवाज़े बंद हो गए. गोर्बाचोफ़ ने इसे स्वीकार नहीं किया और अगले दो-तीन हफ़्तों तक वे इस बात पर जोर देते रहे कि किसी न किसी स्वरूप में एक संघ बनाए रखना है जिसके वे राष्ट्रपति रहेंगे."

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अल्मा-अता प्रोटोकॉल
21 दिसंबर को बचे हुए 12 सोवियत देशों में 8 देश अल्मा-अता प्रोटोकॉल पर दस्तखत करके इस राष्ट्रमंडल में शामिल हो गए. इसके बाद सोवियत संघ के बचने की रही सही संभावना भी खत्म हो गई.
कोनोर ओक्लेरी की राय में ये वो घड़ी थी जिसके बाद गोर्बाचोफ़ को ये एहसास हो गया कि उनका दौर खत्म हो गया था और 25 दिसंबर को एक भाषण में अपने इस्तीफे के एलान का फ़ैसला कर लिया.
"बोरिस येल्तसिन ने उन्हें क्रेमलिन की सत्ता पर कुछ और दिन काबिज़ रहने की इजाजत दे दी और 31 दिसंबर को क्रेमलिन के ऊपर से लाल झंडा उतारने पर सहमति बन गई."
प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक इस बात पर जोर देते हैं कि अल्मा-अता प्रोटोकॉल पर किए गए दस्तखत सोवियत संघ के संविधान से परे थे. "उन्हें इस बात का कोई अधिकार नहीं था कि वे सोवियत संघ का विघटन कर सकें. लेकिन वे ऐसा करने में कामयाब रहे. उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई."
"उस वक़्त तक ये बात साफ़ हो गई थी कि संघी सरकार पूरी तरह से पंगु हो गई है लेकिन सेना ने अपनी वफादारी गोर्बाचोफ़ की जगह पर येल्तसिन के प्रति कर ली है."

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क्रेमलिन पर येल्तसिन का नियंत्रण
इसके बाद के दिन क्रेमलिन में खामोशी से गुजर रहे थे. इस्तीफे के एलान के दिन तक सत्ता के गलियारों में कोई ख़ास सुगबुगाहट सुनी नहीं जा रही थी.
25 दिसंबर को भी क्रेमिलन में खामोशी का आलम था. राष्ट्रपति भवन पर पूरी तरह से येल्तसिन का नियंत्रण था. येल्तसिन के वफादार रेजीमेंट को क्रेमलिन की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी और गोर्बाचोफ़ अपने दफ़्तर और कुछ कमरों में सिमट कर रह गए थे.
इन कमरों में भी न्यूज़ चैनल सीएनएन और एबीसी के पत्रकार इस्तीफे के प्रसारण की तैयारी कर रहे थे.
पत्रकार कोनोर ओक्लेरी बताते हैं कि भाषण से पहले गोर्बाचोफ़ की तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री जॉन मेजर से फोन पर बात हुई. इस बातचीत के बाद वे उदास लग रहे थे. उन्होंने क्रेमलिन के एक कमरे में जाकर थोड़ी देर अकेले में आराम किया.
"वो बेहद भावुक हो गए थे. उन्होंने एक-दो पेग शराब पी. उनके सहयोगी अलेक्ज़ेंडर याकोवलेव ने उन्हें अपने कमरे में रोता हुआ पाया. शायद वो गोर्बाचोफ़ की ज़िंदगी का सबसे उदास कर देने वाला पल रहा होगा. लेकिन वे जल्द ही उबर गए और खुद को भाषण देने के लिए संयत कर लिया."

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'अब हम एक नई दुनिया में रह रहे हैं'
तय कार्यक्रम के हिसाब से सोवियत संघ के अंतिम नेता मिखाइल गोर्बाचोफ़ का भाषण स्थानीय समयानुसार शाम सात बजे शुरू हुआ और ये दस मिनट तक चला. गोर्बाचोफ़ ने उस देश के नेता के तौर पर इस्तीफ़ा दिया था जिसका वजूद तब तक शायद खत्म हो चुका था.
अपने फ़ैसले को वाजिब ठहराते हुए गोर्बाचोफ़ ने कहा, "अब हम एक नई दुनिया में रह रहे हैं."
प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक बताते हैं कि उस दिन का गोर्बाचोफ़ का भाषण टीवी के लिए ही था. सीएनएन ने उस भाषण का अनुवाद किया और पूरी दुनिया में उसका प्रसारण किया गया.
विशेषज्ञों का कहना है कि गोर्बाचोफ़ के शब्द बाहरी दुनिया के लिए ज़्यादा मायने रखते थे. उनकी शोहरत सोवियत संघ से ज़्यादा बाक़ी दुनिया में रह गई थी.
ज़ुबोक कहते हैं, "सोवियत टेलीविजन पर उनका भाषण बेहद संक्षिप्त रहा. सोवियत संघ में तब तक वे बेहद अलोकप्रिय हो चुके थे. किसी को इस बात में दिलचस्पी नहीं थी कि उन्होंने क्या कहा. तब तक हर आदमी ये समझ चुका था कि सोवियत संघ खत्म हो गया है."

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गोर्बाचोफ़ का भाषण
प्रोफ़ेसर व्लादिस्लाव ज़ुबोक ये मानते हैं कि गोर्बाचोफ़ का भाषण बेहद गरिमापूर्ण था. लेकिन इस भाषण के बाद सत्ता के गलियारों में उनके समकक्ष लोगों में एक तरह का असंतोष का भाव भी देखा गया.
"गोर्बाचोफ़ अपनी नाकामियों पर खामोश रहे. उन्होंने इस पर कुछ नहीं कहा कि आर्थिक बदहाली के हालात क्यों पैदा हुए. वे येल्तसिन के सामने नैतिकता के ऊंचे पायदान पर खड़े रहना चाहते थे और यही वजह थी कि येल्तसिन ने उनके भाषण के बाद गोर्बाचोफ़ से मिलने से इनकार कर दिया था."
पत्रकार कोनोर ओक्लेरी का कहना है कि गोर्बाचोफ़ अपने भाषण में येल्तसिन की थोड़ी सराहना कर सकते थे.
"येल्तसिन ने उन्हें तख्तापलट की कोशिश के बाद बचाया था. अगर येल्तसिन न होते तो गोर्बाचोफ़ को जेल जाना पड़ सकता था या इससे भी बुरा कुछ हो सकता था.
कोनोर ओक्लेरी बताते हैं कि गोर्बाचोफ़ ने जब अपने भाषण में येल्तसिन का जिक्र नहीं किया तो इस बात से येल्तसिन भड़क गए. उन्होंने क्रेमलिन से फौरन लाल झंडा हटाने का हुक्म दिया जब कि ये तय था कि लाल झंडा साल के आख़िर तक रहेगा.
बोरिस येल्तसिन की नाराज़गी
येल्तसिन ने उसी रात ये भी हुक्म दिया कि गोर्बाचोफ़ और उनकी पत्नी का निजी सामान राष्ट्रपति भवन के परिसर से बाहर कर दिया जबकि इससे पहले उन्होंने कहा था कि गोर्बाचोफ़ कुछ दिनों तक राष्ट्रपति भवन में रह सकते हैं.
उस भाषण के बाद गोर्बाचोफ़ और येल्तसिन कभी एक दूसरे के आमने-सामने नहीं हुए. गोर्बाचोफ़ की रूस में अलोकप्रियता का ये आलम था कि क्रेमलिन से रेड फ्लैग हटाए जाते वक्त मॉस्को के रेड स्क्वेयर पर वीरानी छाई हुई थी.
उसी शाम 7:32 मिनट पर सोवियत संघ के रेड फ्लैग की जगह रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन की अगुवाई में रूसी संघ का झंडा लहरा दिया था.
और उसी लम्हे दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिस्ट देश के विघटन के साथ 15 स्वतंत्र गणराज्यों- आर्मीनिया, अज़रबैजान, बेलारूस, इस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाखस्तान, कीर्गिस्तान, लातिवा, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज़्बेकिस्तान का उदय हुआ.
उधर, दुनिया की दूसरी छोर पर मौजूद अमेरिका भी विश्व की एकमात्र महाशक्ति के मुकाम पर पहुंच गया था.
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