एक भारतीय से रूस ने बनाया ख़तरनाक द्वीप!

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    • Author, ज़ारिया गोरवेट
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

मध्य एशिया में कज़ाख़स्तान-उज़्बेकिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा द्वीप है. ये चारों तरफ़ से ज़हरीले रेगिस्तान से घिरा हुआ है.

अब इसे द्वीप कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसके आस-पास की झील यानी अराल सागर अब कमोबेश सूख चुकी है.

इस द्वीप का नाम वोजरोझडेनीया है. किसी दौर में ये मछली मारने का बहुत बड़ा ठिकाना था. ये उस वक़्त की बात है जब अराल सागर दुनिया की चौथी बड़ी झील हुआ करती थी.

लेकिन सोवियत संघ ने इस झील का इतना दुरुपयोग किया कि आज ये झील सूख चुकी है. इस वजह से वोजरोझडेनीया से भी जज़ीरा होने का ख़िताब छिन गया है. इस झील तक पानी लाने वाली नदियों का रुख़ खेतों की सिंचाई के लिए मोड़ दिया गया था. इसी वजह से अराल सागर सूख गया.

आज ये जगह कीटनाशकों का ढेर है. यहां पर पारा अक्सर 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. ज़िंदगी के निशान के तौर पर यहां सिर्फ़ सूखे हुए दरख़्त दिखते हैं. कभी-कभार यहां पर सुस्ताते हुए ऊंट भी दिख जाते हैं, जो किसी ज़माने में यहां चलने वाले बड़े जहाज़ों की छांव में बैठते हैं.

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वोजरोझडेनीया द्वीप ने अराल सागर का पानी इतना सोख लिया है कि इसका आकार दस गुना तक बढ़ गया है.

आज की तारीख़ में वोजरोझडेनीया को दुनिया के सबसे ख़तरनाक इलाक़ों में गिना जाता है. एक दौर में यहां पर सोवियत संघ का जैवीय युद्ध की तैयारी का ठिकाना हुआ करता था.

सत्तर के दशक से यहां कई भयानक घटनाएं घट चुकी हैं. जैसे कि 1971 में एक वैज्ञानिक बीमार पड़ गई. उसे चेचक की बीमारी हुई थी. उसे चेचक का टीका लगा हुआ था, तब भी वो बीमार पड़ गई. बाद में वो ठीक हो गई. लेकिन चेचक की वजह से उसके भाई समेत तीन और लोगों की मौत हो गई.

इस घटना के ठीक एक साल बाद दो लापता लोग एक नाव में मरे हुए पाए गए. कहा जाता है कि उन्हें प्लेग की बीमारी ने मार डाला. इसके बाद पूरे इलाक़े में बड़ी तादाद में मरी हुई मछलियां पकड़ी जाने लगीं. मई 1988 में 50 हज़ार के आसपास बारहसिंघे रहस्यमय तरीक़े से मर गए. इन सब की मौत एक घंटे के अंदर हो गई थी.

सोवियत संघ के विघटन के बाद यानी 90 के दशक से वोजरोझडेनीया वीरान पड़ा है. इस द्वीप के बारे में ब्रिटिश पत्रकार निक मिडलटन ने 2005 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी. निक बताते हैं कि वो एक ब्रिटिश सैन्य जासूस की मदद से इस इलाक़े में पहुंचे थे.

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जैविक हथियार का परीक्षण

यहां के बारे में कहा जाता था कि सोवियत दौर में यहां जैविक युद्ध के बहुत से तजुर्बे किए गए थे. बहुत से जानलेवा बीमारियों की जड़ समझे जाने वाले बैक्टीरिया यहां पर जमा किए गए थे.

निक ने बताया कि वो मास्क, रबर बूट और ऑक्सिजन टैंक जैसे बहुत से एहतियात लेकर वोजरोझडेनीया द्वीप पहुंचे थे.

पश्चिमी देशों को यहां चल रहे रिसर्च के बारे में मालूम था. 1962 के दशक में सीआईए ने हवाई जहाज़ से इस इलाक़े की तस्वीरें ली थीं. इन तस्वीरों में इस वीरान इलाक़े में बने फ़ायरिंग रेंज से लेकर बहुमंज़िला इमारतें तक, साफ़ दिखती थीं.

वोजरोझडेनीया को सोवियत संघ ने सैन्य अड्डा बना लिया था. यहां जैविक हथियारों का परीक्षण किया जाता था.

हालांकि सोवियत संघ का ये प्रोजेक्ट बेहद ख़ुफ़िया था. सोवियत संघ के किसी भी नक़्शे में इसका ज़िक्र नहीं मिलता. जिन लोगों को इसके बारे में पता था, वो इसे इसके कोड नेम अर्लास्क-7 के नाम से जानते थे.

एक बार यहां पर एंथ्रैक्स बीमारी के कीटाणुओं की बड़ी खेप लाई गई थी. इसके अलावा चेचक और प्लेग के बैक्टीरिया भी यहां जमा किए गए थे. इसके अलावा कई बहुत सी भयंकर मगर बहुत कम होने वाली बीमारियों के विषाणु भी वोजरोझडेनीया में जमा किए गए थे. इन में से कई बीमारियों के तो लोगों ने नाम भी नहीं सुने होंगे. जैसे टुलारेमिया. ब्रूसेलोसिस और टाइफ़स.

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टनों एंथ्रेक्स बैक्टीरिया दफ़्न

इतनी बड़ी तादाद में ये विषाणु जमा होने की वजह से पूरा का पूरा वोजरोझडेनीया द्वीप ज़हरीला हो गया है.

एक दौर में ये द्वीप इतना छुपा हुआ था कि इसकी तलाश ही उन्नीसवीं सदी में हुई थी. इसी वजह से इसे सोवियत संघ ने ख़ुफ़िया रिसर्च का अड्डा बनाया.

आसपास आसानी से उपलब्ध पानी की वजह से वोजरोझडेनीया द्वीप ख़तरनाक रिसर्च के लिए बेहद मुफ़ीद था. आबादी कम होने से इंसानों को नुक़सान होने का डर भी कम था.

इसी वजह से एक बार सोवियत संघ ने एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया की सबसे बड़ी खेप को यहां ज़मीन में दबाने का फ़ैसला किया. ये खेप रूस के शहर येकाटेरिनबर्ग में तैयार की गई थी. बाद में इसे वोजरोझडेनीया लाया गया

वोजरोझडेनीया पर एक वक़्त में 50 हज़ार से ज़्यादा लोग काम किया करते थे. इन का काम ख़तरनाक जैविक हथियार तैयार करना था.

1998 में एंथ्रैक्स लीक होने से 105 लोग मारे गए थे. इसके बाद सोवियत सरकार ने एंथ्रैक्स के सारे बैक्टीरिया के ख़ात्मे का फ़ैसला किया. इन्हें वोजरोझडेनीया के पास ज़मीन में बहुत नीचे दफ़्न कर दिया गया. ये तादाद 100 से 200 टन के आस-पास थी.

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75 साल पुराने कंकाल से बीमारी

इन्हें गड्ढों में दबाकर लोग भूल गए. मगर दिक़्क़त ये है कि एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया स्पोर के तौर पर ज़िंदा रहते हैं और मौक़ा पाते ही वार करते हैं. तो इनसे इंसानियत को ख़तरा मंडरा रहा था. ज़मीन में दबे होने के बावजूद ये सैकड़ों साल तक ज़िंदा रह सकते हैं. कहीं ग़लती से भी इन्हें खोल दिया जाए, तो ये भयंकर तबाही मचा सकते हैं.

हाल ही में रूस में 12 साल के एक बच्चे की एंथ्रैक्स से मौत हो गई थी. रूस के नेनेत्स नाम के आदिवासी भी इसके शिकार हुए थे. 41 बच्चों समेत कुल 72 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. कहा जाता है कि एंथ्रैक्स का ये हमला 75 साल पुराने रेंडियर के कंकाल से हुआ था.

इसीलिए अमरीकी सरकार ने 60 लाख डॉलर की रक़म ख़र्च करके वोजरोझडेनीया के पास दफ़्न एंथ्रैक्स के ऊपर एक और परत चढ़ाकर उसे सील कराया. ऐसा करने से पहले पूरे इलाक़े को बहुत गर्म किया गया, ताकि एंथ्रैक्स के कीटाणु मर जाएं.

ब्रिटेन के वैज्ञानिक लेस बेली कहते हैं कि अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में एंथ्रैक्स के कीटाणु हो सकते हैं. इनमें से एक ठिकाना तो ब्रिटेन का पोर्टन डाउन भी हो सकता है. यहां पर ब्रिटेन अपने जैविक हथियारों का निर्माण किया करता था.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने स्कॉटलैंड के द्वीप ग्रुइनार्ड पर एंथ्रैक्स बम गिराकर इनका परीक्षण किया था. हालांकि 1943 के बाद ब्रिटेन ने ये कार्यक्रम बंद कर दिया था. लेकिन, 1979 में जांच के दौरान पता चला कि पूरे ग्रुइनार्ड द्वीप पर तीन से 45 हज़ार बैक्टीरिया स्पोर हर एक ग्राम मिट्टी में मौजूद थे.

इससे निपटने के लिए कभी तो एक कंक्रीट की दीवार, द्वीप के चारों तरफ़ बनाने की बात हुई, तो कभी इसकी मिट्टी की ऊपरी परत निकालकर समंदर में फेंक देने का प्रस्ताव रखा गया. आख़िर में इस द्वीप पर 280 टन फॉर्मेल्डिहाइड नाम का केमिकल छिड़क कर एंथ्रैक्स के स्पोर को ख़त्म किया गया. आज ग्रुइनार्ड द्वीप पर जाने की किसी को मनाही नहीं है. फिर भी वहां कोई नहीं जाता.

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लोग जाने से कतराते हैं

अच्छी बात ये है कि वोजरोझडेनीया द्वीप पर जाना इतना आसान नहीं. वहां जाने के लिए आप को पहले कज़ाखिस्तान जाना होगा. फिर नाव किराए पर लेकर अराल सागर पार करना होगा. साथ में कोई स्थानीय गाइड ले जाना भी ज़रूरी है. स्थानीय लोग वोजरोझडेनीया द्वीप जाने से कतराते हैं. उन्हें वहां जाने के ख़तरों के बारे में पता है.

ब्रिटिश पत्रकार निक मिडिलटन भी बमुश्किल इस द्वीप तक पहुंच पाए थे. ये ठिकाना दो हिस्सों में बंटा है. पहला है कांटुबेक नाम का क़स्बा, जो वैज्ञानिकों और उनके परिजनों के रहने के लिए बसाया गया था. वहां से क़रीब सवा तीन किलोमीटर दूर वो जगह है जहां पर तमाम प्रयोगशालाएं बनाई गई थीं.

जो लोग निक मिडिलटन और उनके ब्रिटिश जासूस साथी बटलर को लेकर आए थे, वो इस जगह को लूटने के इरादे से आए थे. तांबे के तार, बिजली का सामान वग़ैरह. वो पहले भी ये सामान यहां से चुरा ले जा चुके थे. वहीं निक और उनके साथी पूरी तरह से सुरक्षा के लबादे में क़ैद थे.

आज कांटुबेक क़स्बा पूरी तरह से भुतहे शहर में तब्दील हो गया है. लेकिन किसी दौर में यहां रहने वालों के निशान आज भी मिलते हैं. मकान, स्कूल, कैंटीन. मार्क्स और लेनिन की क़िताबें. सोवियत नेताओं के बुत. सब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है. यहां पर आपको न तो एक भी परिंदा दिखेगा और न ही एक भी कीड़ा. पूरे इलाक़े में सन्नाटे की चीख सुनाई पड़ती है.

जो स्थानीय लोग निक और बटलर के साथ आए थे, वो सामान लूटकर जल्द से जल्द निकलना चाहते थे.

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अमरीका से होड़

निक बताते हैं कि लैब आज भी वैसे ही खुली पड़ी हैं. यहां पर जो ज़हरीले केमिकल थे, न तो उन्हें हटाया गया और न ही दबाकर रखा गया. ऐसे में प्रयोगशालाओं के भीतर जाना बेहद ख़तरनाक था. यहां पर मास्क, सांस लेने की नली, पूरे शरीर को ढंकने वाले लबादे पड़े मिले.

पंद्रह मिनट के अंदर ही बटलर और निक के एयर फिल्टरों ने काम करना बंद कर दिया था. यानी हवा इतनी ज़हरीली थी कि फिल्टर उन्हें छान नहीं पा रहे थे. इसलिए निक और बटलर दोनों ही वहां से जल्दी से जल्दी भाग निकलना चाहते थे, वरना उनकी जान को भी ख़तरा हो सकता था.

अर्लास्क-7 प्रोजेक्ट, सोवियत संघ ने ब्रिटेन और अमरीका से होड़ लेने के लिए शुरू किया था. जंगली इलाक़ों से भयंकर बीमारियों के जीवाणु यहां लाकर जमा किए गए थे. हालांकि 1972 में तीनों देशों ने आपस मे समझौता करके जैविक हथियारों से तौबा कर ली थी.

वोजरोझडेनीया में सोवियत संघ ने एंथ्रैक्स बैक्टीरिया की जो क़िस्म तैयार की थी, उस पर किसी भी एंटीबायोटिक का असर नहीं होता था. इसे दुनिया एसटीआई के नाम से जानती थी.

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फिर से चपेट में आने का ख़तरा

सोवियत वैज्ञानिकों ने यहां एंथ्रैक्स की जो क़िस्म तैयार की थी, वो भारत के एक आदमी के ज़रिए 1967 में मॉस्को पहुंची थी. इस शख़्स के अंदर जो बैक्टीरिया पाया गया था उस पर किसी टीके का भी असर नहीं होता. यही एंथ्रैक्स 1988 में एक वैज्ञानिक के बीमार होने की वजह बना था.

वैज्ञानिक मानते हैं कि अब वोजरोझडेनीया से एंथ्रैक्स के फ़ैलने का ख़तरा ख़त्म हो चुका है. हालांकि प्लेग के बैक्टीरिया अभी भी पूर्व सोवियत गणराज्यों में मौजूद हैं.

वोजरोझडेनीया का मतलब होता है पुनर्जन्म. दुनिया ये दुआ करती है कि वोजरोझडेनीया में दफ़्न किए गए एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया को पुनर्जन्म नसीब न हो.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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