विवेचना: स्टालिन की बेटी को जब अमेरिकी ख़ुफ़िया तरीके से भारत से उड़ा ले गए

स्टालिन की गोद में उनकी बेटी स्वेतलाना अलीलुयेवा

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बात मार्च 1967 की है. भारत में अमेरिकी राजदूत चेस्टर बाउल्स के असिस्टेंट रिचर्ड सेलेस्ट ने अपने घर कुछ लोगों को भोज पर बुलाया था.

अभी मेहमान आना शुरू ही हुए थे कि उनके फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर दिल्ली में सीआईए के दिल्ली स्टेशन चीफ़ डेव ब्ली थे. उन्होंने कहा 'सेलेस्ट तुरंत दूतावास पहुंचो'.

सेलेस्ट ने कहा कि उनके यहाँ पार्टी चल रही है और वो मेहमानों को छोड़कर नहीं आ सकते. लेकिन सीआईए के स्टेशन चीफ़ पर उनकी गुज़ारिश का कोई असर नहीं हुआ.

उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, "कुछ भी हो तुरंत दूतावास पहुंचो." सेलेस्ट का घर दूतावास से थोड़ी ही दूर पर था इसलिए वो कार से न जाकर पैदल ही वहाँ पहुंचे.

जब उन्होंने दरवाज़े की घंटी बजाई तो एक गार्ड ने दरवाज़ा खोला. उसने सेलेस्ट को धीमी आवाज़ में बताया, "थोड़ी देर पहले एक महिला यहाँ पहुंची है. उसका नाम स्वेतलाना है. वो ख़ुद को स्टालिन की बेटी बता रही है."

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स्वेतलाना अलीलुयेवा

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ब्ली से मुलाक़ात करते ही सेलेस्ट का पहला सवाल था, "क्या वो वास्तव में स्टालिन की बेटी है?"

ब्ली का जवाब था, "हो सकता है वो स्टालिन की बेटी हो. लेकिन हम नहीं जानते. ये भी हो सकता है कि ये हमें शर्मसार करने की सोवियत की चाल हो."

पति की अस्थियों को प्रवाहित करने भारत आईं

बाद में भारत में अमेरिकी राजदूत बने रिचर्ड सेलेस्ट ने हाल ही में प्रकाशित अपनी क़िताब 'लाइफ़ इन अमेरिकन पॉलिटिक्स एंड डिप्लोमेटिक इयर्स इन इंडिया' में लिखते हैं, "उसकी कहानी पर विश्वास करना मुश्किल था. न सिर्फ़ वो महिला कह रही थी कि वो स्टालिन की बेटी है बल्कि उनका ये भी दावा था कि वो एक भारतीय व्यक्ति ब्रजेश सिंह की पत्नी हैं जो मॉस्को में विदेशी भाषा प्रेस में काम करते थे."

रिचर्ड सेलेस्ट की किताब 'लाइफ़ इन अमेरिकन पॉलिटिक्स एंड डिप्लोमेटिक इयर्स इन इंडिया'

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वो लिखते हैं, "ब्रजेश सिंह दिनेश सिंह के चाचा थे जो उस समय विदेश राज्य मंत्री के पद पर काम कर रहे थे और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के काफ़ी नज़दीक माने जाते थे. उस महिला के पति का पिछले नवंबर में देहांत हो गया था. वो उनकी अस्थियों को लेकर भारत आई थीं और उनको गंगा में प्रवाहित करने के बाद अमेरिका में राजनीतिक शरण लेना चाहती थीं."

ब्रजेश सिंह
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ब्रेझनेव चाहते थे स्वेतलाना तुरंत मॉस्को वापस लौटें

ये आश्चर्य की बात थी की स्टालिन की बेटी नवंबर में ही भारत पहुंच चुकी थीं. उनको यहाँ रहते हुए करीब चार महीने होने को आए थे.

वो प्रतापगढ़ ज़िले में ब्रजेश सिंह के गाँव कलाकाँकर होकर आई थीं और दिनेश सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में रह रही थीं. लेकिन न तो सीआईए और न ही भारत की प्रेस को इसकी हवा लगी थी.

उनकी कहानी ये थी कि रूस के नेता ब्रेझनेव चाहते थे कि वो जल्द से जल्द मॉस्को लौटें इसलिए सोवियत राजदूत निकोलाई बेनेडिक्टोव ज़ोर दे रहे थे कि उनका अब भारत में रहना ठीक नहीं है.

सोवियत नेता लियोनिद ब्रेझनेव

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टैक्सी से अमेरिकी दूतावास पहुंचीं

इस घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा स्वेतलाना अलीलुयेवा ने अपनी आत्मकथा 'ओनली वन इयर' में भी किया है.

स्वेतलाना लिखती हैं, "मैं टैक्सीवाले को फ़ोन कर दूतावास के गेट पर आ गई. पाँच मिनट में ही एक सिख ड्राइवर अपनी टूटी-फूटी कार लेकर वहाँ पहुंच गया."

"उसने मेरे लिए टैक्सी का दरवाज़ा खोला. मैंने कहा, एक मिनट, और मैं अंदर अपना सूटकेस और कोट लेने भागी. लौट कर मैंने ड्राइवर से पूछा क्या तुम अमेरिकी एंबेसी का रास्ता जानते हो? उसने जवाब दिया एंबेसी बिल्कुल बगल में है."

स्वेतलाना अलीलुयेवा की आत्मकथा 'ओनली वन इयर'

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स्वेतलाना लिखती हैं, "हम रूसी दूतावास के पीछे से होते हुए गए और एक मिनट में ही उसने मुझे रोशनी से नहाए अमेरिकी दूतावास के गेट तक पहुंचा दिया. मैंने ड्राइवर को कुछ रुपए दिए. जब मैं अंदर पहुंची तो एक छोटी मेज़ के सामने एक युवा लंबा, नीली आँखों वाला अमेरिकी सैनिक खड़ा था. पहले तो उसने मुझसे कहा कि इस समय वहाँ कोई मौजूद नहीं है लेकिन जब उसने मेरे हाथ में लाल रंग का सोवियत पासपोर्ट देखा तो उसकी समझ में आ गया कि उसे अपने उच्चाधिकारियों को बुलाना चाहिए."

स्वेतलाना अलीलुयेवा

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राजदूत वोल्स के सामने तीन विकल्प रखे गए

उस समय अमेरिकी राजदूत चेस्टर बोल्स ब्रोंकाइटिस से पीड़ित थे और अपने घर पर आराम कर रहे थे. सीआईए के स्टेशन चीफ़ डेव ब्ली और सेलेस्ट ने उनके घर जाकर उन्हें ब्रीफ़ किया.

सेलेस्ट लिखते हैं, "राजदूत ने हमसे पूछा, हमारे पास क्या विकल्प हैं? हमने उनके सामने तीन विकल्प रखे. नंबर एक कूटनीतिक कायदा ये कहता है कि हम भारत सरकार को सूचित करें कि हमारे यहाँ एक सोवियत नागरिक ने जो अपने आप को स्टालिन की बेटी बताती है, राजनीतिक शरण का अनुरोध किया है."

"ब्ली ने कहा लेकिन इसमें समस्या भी हो सकती है क्योंकि जब तीन महीने पहले एक रूसी नाविक ने कलकत्ता (आज का कोलकाता) में अपने जहाज़ को छोड़कर हमारे मिशन में शरण ली थी तो भारत सरकार को उसे अमेरिका भेजने की अनुमति देने में तीन महीने लग गए थे. उस नाविक का कोई राजनीतिक महत्व नहीं था. लेकिन जब भारत सरकार को पता चलेगा कि शरण मांगने वाला और कोई नहीं स्टालिन की बेटी हैं तो क्या होगा इसका अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते."

भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत चेस्टर बोल्स

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सेलेस्ट आगे लिखते हैं, "हमारा दूसरा विकल्प है कि हम स्वेतलाना को ये कहते हुए वापस लौटा दें कि हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते. ब्ली ने तीसरा विकल्प ये बताया कि हम स्वेतलाना को अमेरिका जाने का वीज़ा तो दें लेकिन उनके लिए सिर्फ़ आधे रास्ते का टिकट खरीदें."

"रात एक बजे क्वानटास एयरलाइंस की फ़्लाइट रोम जाने वाली है. हम उन्हें उससे रोम पहुंचा कर वहाँ के सेफ़ हाउज़ में तब तक रखें जब तक हम इस मसले को सुलझा नहीं लेते."

अमेरिकी विदेश मंत्री को गुप्त तार भेजा गया

राजदूत बोल्स ने तीनों विकल्पों पर विचार करने के बाद कहा कि "अगर हम इसमें भारत सरकार को शामिल करते हैं तो भारत, रूस और अमेरिका के बीच रस्साकशी शुरू हो जाएगी. ऐसा करिए आप उन्हें वीज़ा दे दीजिए और उनको बता दीजिए कि हम आपको हवाईअड्डे तक पहुंचा तो सकते हैं लेकिन आपको अपने बल पर हवाईजहाज़ में सवार होना होगा."

सेलेस्ट आगे लिखते हैं, "बोल्स ने हमें निर्देश दिए कि वॉशिंगटन को गुप्त तार भेज बता दिया जाए कि हमने क्या निर्णय लिया है. हम क़रीब साढ़े आठ बजे दूतावास लौटे और हमने वॉशिंगटन को संदेश भेजा, फ़ॉर योर आइज़ ओनली. अमेरिका के विदेश मंत्री डीन रस्क. क़रीब 7 बज कर दस मिनट पर एक महिला हमारे दूतावास पहुंची है."

पूर्व अमेरिकी राजदूत रिचर्ड सेलेस्ट और एलके आडवाणी

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"वो स्टालिन की बेटी होने का दावा कर रही है. हम उन्हें अमेरिकी वीज़ा दे रहे हैं और क्वानटास की फ़्लाइट पर रोम तक भेज रहे हैं. इस मामले में आपकी सलाह क्या है. आधे घंटे बाद हमारे पास संदेश आया, आपका संदेश हमें मिल गया है. जल्दी ही हम आपको अपना फ़ैसला बताएंगे. इसके बाद विदेश मंत्री ने चुप्पी साध ली."

सीआईए के स्टेशन चीफ़ स्वेतलाना को छोड़ने पालम गए

जब इंतज़ार करने के बाद भी डीन रस्क की तरफ़ से कोई संदेश नहीं आया तो आधी रात के समय दिल्ली में सीआईए के स्टेशन चीफ़ डेव ब्ली स्वेतलाना को अपनी कार में बैठा कर पालम हवाईअड्डे ले गए.

स्टालिन अपनी बेटी और बेटे के साथ

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अमेरिकियों ने एक रूसी बोलने वाले सीआईए एजेंट को स्वेतलाना से पहले ही जहाज़ में चढ़ा दिया. उसको सख़्त हिदायत दी गई कि वो स्वेतलाना को अपने बारे में तब तक कुछ न बताए जब तक जहाज़ टेक-ऑफ़ न कर ले.

क्वानटास के विमान ने 45 मिनट देरी से टेक ऑफ़ किया. तब तक स्वेतलाना लाउंज में बैठी एक पत्रिका पढ़ती रहीं.

दूसरे दिन अमेरिकी दूतावास को कई संदेश मिले. पहला संदेश अमेरिकी विदेश मंत्री का था जिसमें पूछा गया था आगे क्या हुआ? दूसरा संदेश सीआईए की तरफ़ से था.

इस बीच ब्ली ने सीआईए के मुख्यालय लैंगली के हर कोने में संदेश भेजकर पूछा कि क्या उनके पास स्टालिन की बेटी के बारे में कोई ख़ुफ़िया जानकारी है.

पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री डीन रस्क

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सीआईए की फ़ाइलों में स्वेतलाना से संबंधित कोई भी जानकारी दर्ज नहीं थी. आठ साल पहले एक गैर महत्वपूर्ण स्रोत ने ये ज़रूर फ़ाइल किया था कि स्टालिन की बेटी मॉस्को के फ़ॉरेन लेंग्वेज प्रेस में काम कर रहे एक बुज़ुर्ग भारतीय शख़्स के साथ रह रही हैं.

उस वक्त सीआईए ने इस सूचना को दिल्ली भेजना मुनासिब नहीं समझा था.

लैंगली अमेरिका में सीआईए का मुख्यालय

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रूसी दूतावास में हड़कंप

अगले दिन जैसे ही रूसियों को इसके बारे में पता चला वहाँ के दूतावास में हड़कंप मच गया. दिल्ली में केजीबी के स्टेशन चीफ़ ने डेव ब्ली को फ़ोन कर पूछा, तुम लोगों ने स्टालिन की बेटी के साथ क्या किया? तुमने उसका अपहरण कर लिया?

ब्ली ने जवाब दिया हमने किसी का भी अपहरण नहीं किया. उस महिला ने हमारे दूतावास में आकर कहा था कि अमेरिका में राजनीतिक शरण लेना चाहती है. केजीबी के चीफ़ ने चिल्लाकर पूछा तो क्या वो महिला अब अमेरिका में है?

अगले दिन पूरी दुनिया में अमेरिकी और सोवियत राजनयिकों के बीच होने वाली हर बातचीत रद्द कर दी गई. अगले शुक्रवार को रिचर्ड सेलेस्ट पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार सोवियत राजनयिक वेलेरी ओस्तेपेंकों के घर भोज पर जाने वाले थे.

सेलेस्ट ने शुक्रवार की सुबह उन्हें फ़ोन कर पूछा "मैं मान कर चल रहा हूँ कि आज का रात्रि भोज अब शायद नहीं होगा. वेलेरी ने पूछा लेकिन आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं?"

सेलेस्ट ने जवाब दिया "क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसा ही हो रहा है." वेलेरी ने कहा "नहीं हमारे कार्यक्रम में कोई फेरबदल नहीं है."

स्वेतलाना अलीलुयेवा

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गार्ड को तैयार रहने के लिए कहा गया

सेलेस्ट लिखते हैं, "फ़ोन रखने के बाद मुझे चिंता होने लगी. मैं नहीं चाहता था कि मैं वहाँ जाऊँ और मुझे वहाँ से वापस नहीं आने दिया जाए. लेकिन मेरे राजदूत ने कहा कि मुझे वहाँ जाना चाहिए. लेकिन सुरक्षागार्ड के पास संदेश छोड़ जाऊँ कि अगर मैं इतने समय तक वापस न लौटूँ तो वो राजदूत को इसकी ख़बर कर दे ताकि वो भारत सरकार को इस बारे में सूचित कर दें."

"मैं और मेरी पत्नी डैग्नर जब वहाँ पहुंचे तो वैलेरी मौजूद नहीं थे. वैलेरी की पत्नी ने हमारी ख़िदमत में वोदका और कैवियर पेश किया. मैंने वोदका पीने से ये सोचते हुए मना कर दिया कि कहीं नशे की हालत में ये मेरा अपहरण न कर लें."

स्टालिन और स्वेतलाना

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सेलेस्ट आगे लिखते हैं, "वैलेरी करीब आठ बजे वहाँ पहुंचे. जब खाने के बाद डेसर्ट का समय आया तो वैलेरी ने मुझसे पूछ ही लिया, आप लोगों ने स्वेतलाना स्टालिन का अपहरण क्यों किया? मैंने जवाब दिया हम किसी का अपहरण नहीं करते. फिर मैंने उनको सारी कहानी बताई. मैंने उन्हें बताया कि स्वेतलाना इस समय यूरोप में हैं लेकिन मैंने देश का नाम नहीं बताया."

"तब तक रात के बारह बज चुके थे. मैं नहीं चाहता था कि मेरे तब तक घर वापस न पहुंचने पर मेरा गार्ड शोर मचा दे. मैंने वैलेरी से बहाना किया कि मुझे एक ज़रूरी संदेश का इंतेज़ार है. क्या मैं थोड़ी देर के लिए दूतावास जाकर वापस आ सकता हूँ. वैलेरी मुझे अपनी कार में बैठा कर अमेरिकी दूतावास ले गए. अंदर जा कर मैंने गार्ड को आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है. फिर मैं वैलेरी के साथ वापस उनके घर लौट आया."

दिल्ली में अमेरिकी दूतावास

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इंदिरा गाँधी ने स्वेतलाना के पास अपना दूत भेजा

बाद में सोवियत सरकार ने स्वेतलाना के अमेरिका जाने के लिए भारत सरकार को दोषी ठहराया. उनकी शिकायत थी कि भारत ने इस महत्वपूर्ण मेहमान का ढंग से ख़याल नहीं रखा.

दो सप्ताह बाद प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गाँधी के दूत के रूप में भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रिखी जयपाल स्वेतलाना से मिलने स्विटज़रलैंड गए.

जयपाल की यात्रा का एकमात्र उद्देश्य स्वेतलाना से इस बात की आधिकारिक पुष्टि कराना था कि भारत से किसी ने उनके अमेरिका भागने में मदद नहीं की.

पूर्व भारतीय राजनयिक रिखी जयपाल

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स्वेतलाना अलीलुयेवा ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "जयपाल अपने साथ मेरे द्वारा दिनेश सिंह के भेजे जाने वाले पत्र का मसौदा लाए थे जिसे दिनेश सिंह ने स्वयं लिखा था. ये सही था कि किसी भारतीय ने मेरी अमेरिका आने में कोई मदद नहीं की थी. दिनेश को इस पत्र की ज़रूरत थी ताकि सोवियत संघ को उनकी भूमिका पर कोई संदेह न हो. इसलिए मैंने उस पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए."

"जयपाल ने मुझे ये भी पेशकश की कि अगर मैं मॉस्को में अपने बच्चों को पत्र लिखूँ तो वो वहाँ के भारतीय राजदूत के ज़रिए वो पत्र उन कर पहुंचवा देंगे. मैंने अपने बच्चों को पंद्रह पन्नों का पत्र लिखा जिसमें मैंने उन्हें बताया कि मैंने सोवियत संघ छोड़ने का फ़ैसला क्यों किया? मुझे अफ़सोस है कि इंदिरा गाँधी के दूत ने अपना वादा पूरा नहीं किया और वो पत्र मेरे बच्चों तक कभी नहीं पहुंचा."

स्वेतलाना अलीलुयेवा

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अमेरिका में ही मृत्यु

कुछ दिनों बाद स्वेतलाना रोम से स्विटज़रलैंड गईं और फिर वहाँ से अमेरिका पहुंचीं. उस समय न्यूयार्क के जॉन एफ़ केनेडी हवाई अड्डे पर पूरी दुनिया के पत्रकार मौजूद थे.

वहाँ पर स्वेतलना ने एक पत्रकार सम्मेलन में कहा, "मेरे लिए सोवियत संघ छोड़ने का फ़ैसला करना बहुत कठिन था. मैं वो बेकार ज़िन्दगी जारी नहीं रख सकती थी जो मैंने 40 साल वहाँ जी थी. मैं एक नई ज़िदगी जीना चाहती थी. मुझे उम्मीद है मेरे देशवासी मुझे समझ पाएंगे."

स्वेतलाना 1984 में सोवियत वापस गईं लेकिन वो वहाँ दोबारा बस नहीं पाईं. वो अमेरिका वापस आईं जहाँ वो गुमनामी और ग़रीबी के बीच रहीं.

उन्होंने एक अमेरिकी वास्तुकार विलियम पीटर्स से विवाह किया लेकिन तीन साल बाद उनका तलाक हो गया. 22 नवंबर, 2011 को 85 साल की उम्र में स्वेतलाना का अमेरिका में निधन हो गया.

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