2021: तालिबान, कोरोना, ईरान...ऐसा क्या हुआ कि बदल गई दुनिया

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21वीं सदी का इक्कीसवां साल कोविड के साए में रहा. कोरोना की दूसरी लहर आंधी की तरह आई और पूरी दुनिया ने तबाही का ख़ौफ़नाक मंज़र देखा.
लेकिन इस बीच कई दूसरी घटनाएं भी वैश्विक परिदृश्य पर छाई रहीं.
दुनिया जहान में पड़ताल उन बड़ी घटनाओं की, जिनकी वजह से साल 2021 याद किया जाएगा.


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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी
अफ़ग़ानिस्तान के लिए साल 2021 इतिहास बदलने वाला साबित हुआ. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी हुई.
तमाम लोगों की उम्मीदों के परे देखते ही देखते अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया. इस दौरान दुनिया ने ऐसी झकझोर देने वाली तस्वीरें देखीं जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती थी.
अफ़ग़ानिस्तान की इस हालत को लेकर कई लोगों और देशों ने अमरीका की भूमिका पर सवाल उठाए.
साल 2020 में अमरीका ने तालिबान के साथ दोहा में एक समझौता किया था. इस समझौते के तहत अमरीकी सेना की वापसी का रास्ता तैयार हुआ.
अमरीकी सैनिकों की वापसी की घोषणा के साथ ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के शहरों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते तालिबान का दबदबा कायम होने लगा.
जो अमरीका साल 2001 में तालिबान के हाथ से सत्ता जाने की वजह बना था, उसी को बीस साल बाद तालिबान की वापसी की वजह माना गया लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने फ़ैसले को सही ठहराया.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के अनुसार, "हुआ ये कि अफ़ग़ानिस्तान के नेताओं ने ही हार मान ली और देश छोड़ दिया. अफ़ग़ान सेना लड़खड़ा गयी. कई मोर्चों पर उसने बिना लड़े ही हार मान ली. ऐसे में अमरीकी सेना की भूमिका ख़त्म करना सही फैसला था."
अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़े के लिए तालिबान को उम्मीद से कम मशक़्क़त करनी पड़ी. तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और उनके कई सहयोगी देश छोड़कर चले गए. 15 अगस्त को हथियारों से लैस तालिबानी लड़ाके राष्ट्रपति भवन में दाखिल हुए और काबुल पर कब्ज़ा कर लिया.
कुछ दिन बाद तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि हमारी ज़मीन किसी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं होगी.
तालिबान प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा, "मैं दुनियाभर के लोगों, संयुक्त राष्ट्र, सभी दूतावासों और अपने पड़ोसियों को आश्वस्त करता हूं कि हम किसी के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल होने नहीं देंगे. हमने सबको माफ़ कर दिया है, हम बदला नहीं लेंगे. वो सभी युवा जिनके पास प्रतिभा है, हम नहीं चाहते कि वो देश छोड़ कर चले जाएं."
इसके कुछ दिन बाद तालिबान ने अंतरिम सरकार के गठन का एलान किया. तालिबान के संस्थापकों में से एक मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को प्रधानमंत्री और मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर को उप प्रधानमंत्री बनाया गया.
हालाँकि इस सरकार को दुनिया के किसी देश ने मान्यता नहीं दी. वजह थी, तालिबान की अंतरिम सरकार में कई ऐसे चेहरों को शामिल किया जाना जो एफ़बीआई के 'वांछित आतंकवादियों' की लिस्ट में शामिल थे.

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कुछ देशों ने कहा कि जब तक सरकार में किसी महिला को शामिल नहीं किया जाता, महिलाओं को काम करने और लड़कियों को पढ़ने की इजाज़त नही दी जाती तब तक सरकार को मान्यता नहीं दी जा सकती.
हालाँकि तालिबान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्ताक़ी ने बीबीसी संवाददाता फ़रहत जावेद को दिए इंटरव्यू में तमाम बातों पर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की.
उन्होंने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के कंट्रोल के बाद यहां की हूकुमत में जितनी महिलाएं काम कर रही थीं उनसें के किसी को भी नौकरी से निकाला नहीं गया. उनका तन्ख़्वाह, तालीम और रोज़गार के मामले में किसी किस्म की कमी नहीं की गई है. हम नहीं समझते कि उन्हें हमारी हुकूमत में कोई हिस्सा नहीं मिल रहा है."
तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफ़ग़ानिस्तान में स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है. मानवीय सहायता के रूप में भारत की ओर से 1.6 मीट्रिक टन स्वास्थ्य सामग्री अफ़ग़ानिस्तान भेजी गयी.
अफ़ग़ानिस्तान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत के इस कदम का स्वागत किया लेकिन कहा कि वर्तमान स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए उन्हें अभी और मदद की ज़रूरत है.
साल के अंत तक आते-आते तालिबान ने कुछ कठोर फ़ैसले लिए, मंत्रालय भंग किए, पाकिस्तान के साथ भी उसके रिश्तों में तनाव देखा गया और एक बार फिर महिलाओं के लिए फ़रमान जारी करते हुए उसने मध्यम और लंबी दूरी की यात्रा करने वाली महिलाओं के अकेले सफ़र करने पर रोक लगा दी.


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कोरोना का साया
चीन के वुहान से फैले कोरोना वायरस ने धीरे धीरे पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले लिया. साल 2021 में जब धीरे धीरे दुनिया पटरी पर लौट रही थी तभी कोरोना के डेल्टा वेरिएंट कई देशों में दिक्कत की वजह बन गया.
इस वेरिएंट की पहचान सबसे पहले भारत में की गयी. इस वेरिएंट ने उन लोगों को भी प्रभावित किया जिनका टीकाकरण हो चुका था.
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉक्टर टेड्रोस एडहानोम ग़ीब्रियेसुस ने जुलाई में इसकी गम्भीरता के विषय में आगाह करते हुए कहा था, "डेल्टा वेरिएंट बेहद ख़तरनाक है और लगातार तेज़ी से म्यूटेट हो रहा है. अब तक करीब 100 देशों में यह फैल चुका है. यह सभी देशों में तेज़ी से फैल रहा है चाहे वहाँ टीकाकरण की दर कम हो या ज़्यादा."
ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक में सबसे ज़्यादा मामले डेल्टा वेरिएंट के ही मिले. इसका असर केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा, दुनिया का आर्थिक स्वास्थ्य भी इससे प्रभावित हुआ.
कई बंदरगाहों पर समान से लदे जहाज़ रुके रहे. इसका असर वस्तुओं के दाम पर पड़ा. कई चीज़ों की मांग बढ़ी, कई चीज़ों की क़िल्लत हुई. नतीजा ये हुआ कि सप्लाई चेन पर दबाव आ गया.
आपूर्ति श्रंखला बहाल करने को लेकर देशों के बीच बैठकें हुईं. जी20 शिखर सम्मेलन में भी सप्लाई चेन प्रमुख मुद्दा रहा.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस सम्बंध में सप्लाई चेन दुरुस्त करने की बात कही. उन्होंने कहा, "हर विभाग दिन रात काम करने लिए प्रतिबद्ध हैं. हमें सबसे पहले अपनी सप्लाई चेन की मदद से सामान सही जगह पहुँचाने होंगे."
पूरे साल कोरोना वायरस के खिलाफ जारी लड़ाई में दुनिया के सभी देश वैक्सीनेशन में तेज़ी लाए.
भारत ने भी 21 अक्टूबर को एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की. दुनिया में भारत 100 करोड़ वैक्सीनेशन का आंकड़ा पार करने वाला देश बन गया.
लेकिन दुनिया के कुछ देश ऐसे भी रहे जहाँ टीकाकरण शुरू नहीं हो सका और कुछ देशों में एक डोज़ के बाद दूसरी डोज़ नहीं पहुँच सकी. वजह थी, न तो उनके पास टीका खरीदने के पैसे थे और न ही वैक्सीन उत्पादन के साधन.
कोरोना के नए वेरिएंट आने के बाद वैक्सीन निर्माता देश, निर्यात की जगह अपने नागरिकों के वैक्सीनेशन पर ध्यान देने लगे. वैक्सीन होर्डिंग के इस कदम की आलोचना हुई. अफ़्रीका की डॉक्टर फ़ाइना अतहेब्वे कहती हैं कि वैक्सीन वितरण की इस असमानता का सबसे ज़्यादा असर अफ़्रीकी देशों पर पड़ा.
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यानी इस साल कुछ देशों को पहले और दूसरे डोज़ की चिंता थी तो कई समृद्ध देश ऐसे भी थे जिन्होंने बूस्टर डोज़ यानी कोरोना की तीसरी डोज़ देना शुरू कर दिया.
बूस्टर डोज़ इसलिए ताकि नए वेरीयंट से बचा जा सके लेकिन साल का अंत होते-होते कोरोना वायरस का नया वेरिएंट सामने आया- ओमिक्रॉन.
इस वेरीयंट ने पूरी दुनिया में हलचल मचाई हुई है. तीन हफ्तों में ही ये वेरिएंट 70 से अधिक देशों में फैल गया.
दुनिया भर के देश अपने अपने स्तर पर एहतियातन कदम उठा रहे हैं. अब तक सामने आयी जानकारियों के अनुसार विशेषज्ञ बता रहे हैं कि आमिक्रॉन अधिक संक्रामक तो है, लेकिन शरीर को यह कितना अधिक प्रभावित कर सकता है इस बारे में अभी स्पष्ट तौर पर ज़्यादा कुछ नहीं पता.

ईरान परमाणु समझौता और रईसी दौर की शुरुआत
ईरान का परमाणु कार्यक्रम और परमाणु समझौते को पटरी पर लाने की कोशिश साल 2021 में लगातार सुर्ख़ियों में रहे.
इसकी भूमिका अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2018 में तब लिखी थी जब उन्होंने फैसला किया कि अमरीका ईरान परमाणु समझौते से अलग हो रहा है. उन्होंने ईरान पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे.
ईरान की आर्थिक स्थिति ख़राब होने लगी. ईरान ने भी परमाणु समझौते की शर्त तोड़ते हुए यूरेनियम संवर्धन की शुद्धता को तय सीमा से बढ़ाना शुरू कर दिया.
साल 2021 की शुरुआत में जब जो बाइडन अमेरिका के नए राष्ट्रपति बने तो समझौता बहाल करने की कोशिशें की गयीं लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़मनेई की ओर से कहा गया कि अमेरिका को पहले सारे प्रतिबंध हटाने होंगे तभी समझौते में वापसी संभव हो सकेगी.
इस समझौते को बहाल करवाने के लिए पहले पेरिस में बैठक हुई, फिर ऑस्ट्रिया के विएना में समझौते से जुड़े देशों ने मिलने का फ़ैसला किया. इस बीच साल 2021 ईरान की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया.
ईरान में रूहानी युग ख़त्म हुआ और रईसी दौर की शुरुआत हुई. कट्टरपंथी विचारों वाले इब्राहीम रईसी ने चुनावों में 62 फीसदी वोटों के साथ जीत दर्ज की और देश के 13वें राष्ट्रपति बने. हालाँकि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में देश से जुड़े सभी मसलों पर आख़िरी फ़ैसला सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई का होता है.
राष्ट्रपति बनने के बाद रईसी ने परमाणु समझौते पर ख़ामनेई की ही बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह समझौता ईरान के लिए कोई ख़ास महत्व नहीं रखता.
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पहले आप-पहले आप की ज़िद में समझौते के टूटते तारों को जोड़ने की कोशिशें साल भर जारी रहीं.
साल 2015 में हुए समझौते के तहत ईरान सिर्फ़ 4 प्रतिशत शुद्धता तक ही यूरेनियम को संवर्धित कर सकता है लेकिन समझौता टूटने के बाद ईरान यह संवर्धन कई गुना बढ़ा चुका है.
परमाणु बम बनाने के लिए यूरेनियम को 90 प्रतिशत तक शुद्ध करना होता है, ऐसे में संवर्धन बढ़ाना महाशक्तियों के लिए चिंता का है. अब ऑस्ट्रिया में हो रही बातचीत के बाद ही यह साफ़ हो सकेगा कि ये समझौता आगे रहेगा या नहीं.

म्यांमार में तख़्तापलट
भारत का पड़ोसी देश म्यांमार, जहां सेना ने देश की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची समेत कई नेताओं को गिरफ़्तार करने के बाद सत्ता अपने हाथ में ले ली.
साल 2011 में सैन्य शासन ख़त्म होने के बाद से म्यांमार में दूसरी बार चुनाव हुए. चुनावी नतीजों में सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने 83 फीसदी सीटें जीती थीं लेकिन विपक्ष और म्यांमार की सेना ने इन नतीजों पर सवाल खड़े किए.
सैन्यबलों ने विपक्ष की दोबारा वोटिंग की मांग का समर्थन किया और सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ शिकायत की. हालांकि सेना ने इस बात का कोई सबूत नहीं दे पायी कि चुनाव में फ़र्ज़ीवाड़ा हुआ है.
इसके बाद सेना ने सू ची पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए और सत्ता अपने हाथ में ले ली. यह तख्तापलट ऐसे वक्त पर हुआ है जब संसद का नया सत्र शुरू होने ही वाला था.
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म्यांमार के एक नागरिक का कहना था, "तख्तापलट करके सेना ने लोगों पर हमला किया है. यह लोगों द्वारा चुनी हुई लोगों की सरकार थी. हमारा देश अभी उड़ान भर सीख रहा है लेकिन सेना ने पंख काट दिए."
इस गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ पूरे म्यांमार में मज़दूर देशव्यापी हड़ताल पर चले गए. आंग सान सू ची की रिहाई और देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रदर्शन हुए.
म्यांमार में इतने बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन लगभग एक दशक बाद देखे गए. सेना ने एक साल के लिए म्यांमार में आपातकाल लगा दिया और सत्ता, कमांडर-इन-चीफ़ मिन ऑन्ग लिंग को सौंप दी.
सेना ने वित्त, स्वास्थ्य, गृह और विदेश समेत सभी अहम मंत्रालयों में मंत्रियों को हटाकर अपने लोग नियुक्त किए और फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसी सोशल साइट्स बंद कर दी.
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शुरुआत में आंग सान सू ची और उनकी पार्टी के नेताओं को उनके घरों में ही नज़रबंद कर दिया गया था लेकिन दिसम्बर में सू ची को सरकार के ख़िलाफ़ विरोध भड़काने के आरोप में चार साल की सज़ा सुनाई गई.
कमांडर-इन-चीफ़ मिन ऑन्ग लिंग ने सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद कह दिया था कि हिसंक घटनाएँ बर्दाश्त नहीं की जाएँगी. उन्होंने कहा, "अपनी माँगें मनवाने के लिए हिंसक गतिविधियों का सहारा लेना सही नहीं है."
वहीं बीबीसी की रिपोर्ट से इस बात का पता चला कि म्यांमार की सेना ने सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद सिलसिलेवार तरीक़े से लोगों की हत्या की हैं. संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी कहा गया कि तख्तापलट के बाद सेना ने म्यांमार में मानवता के विरुद्ध काम किया है.
मानवाधिकार समूहों के मुताबिक़ तख़्तापलट से पहले भी म्यांमार में लोगों के लापता होने, उनके बंधक बनाए जाने और उत्पीड़न के मामले सामने आते रहे थे लेकिन तख़्तापलट के बाद इस तरह की हिंसा तेज़ी से बढ़ी है.
तो यह थी साल 2020 की चार बड़ी घटनाएँ.
इन सबके अलावा सालभर सेमीकंडक्टर चिप संकट छाया रहा.
स्वेज़ नहर में 400 मीटर लंबे 'एवरग्रीन' जहाज़ का फँसना चौंकाने वाली घटना रही, स्वीडन की पहली महिला प्रधानमंत्री मेगदालेना एंडरसन ने शपथ ग्रहण के 12 घंटे के भीतर इस्तीफ़ा देकर सबको हैरान किया.
..और साल के अंत में 35 साल के युवा गैब्रियल बोरिक ने चिली का राष्ट्रपति बनकर दुनियाभर में सुर्खियां बटोरीं.
( संकलन और आलेख- अंजुम शर्मा )
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