ईरान परमाणु समझौता: क्या चाहते हैं बातचीत में शामिल देश

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ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए हुए समझौते को बहाल करने के लिए ऑस्ट्रिया में सोमवार से बातचीत शुरू हो रही है. लेकिन इस बातचीत को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं.
विदेश मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जोनाथन मार्कस की राय है कि इस वार्ता में शामिल देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा और महत्वकांक्षाएं समझौते पर सहमति को दूर की कौड़ी बना सकते हैं.
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2018 में इस समझौते से बाहर निकलने का एलान कर दिया था. तब से इस पर संकट के बादल छाए हैं.
ऑस्ट्रिया में हो रही बातचीत के बाद ये जानकारी हो सकती है कि ये समझौता आगे रहेगा या नहीं.
ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में हो रही आधिकारिक बैठक में ईरान, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी शामिल हो रहे हैं. इसमें अमेरिका शामिल नहीं है लेकिन वियना में मौजूद अमेरिकी अधिकारियों की इस पर नज़र बनी हुई है.
साल 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते (ज्वाइंट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन- जेसीपीओए) में भी अमेरिका समेत यही देश शामिल थे. इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु संवर्द्धन कार्यक्रम को सीमित करने के बदले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में कुछ छूट दी जानी थी.

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क्यों हुआ समझौता
ये समझौता इसलिए हुआ क्योंकि पश्चिम देशों को डर था कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है या फिर वो ऐसा देश बन सकता है जिसके पास परमाणु हथियार भले ही ना हों लेकिन उन्हें बनाने की सारी क्षमताएं हों और वो कभी भी उनका इस्तेमाल कर सके.
इसराइल और अमेरिका को कभी भी ये मंजूर नहीं था. ईरान परमाणु समझौते को 'परफ़ेक्ट या बिल्कुल सटीक' नहीं कहा जा सकता था लेकिन ईरान के साथ सकारात्मक संबंधों की शुरुआत के लिए इसे एक विकल्प के तौर पर देखा गया.
इसके तहत ईरान के शोध कार्यक्रम को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया गया और उसे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर ज़ोर देने वाली अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय निगरानी में लाया गया. इसके बदले परमाणु कार्यक्रम के चलते ईरान के ऊपर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए.
तो क्या ये समझौता फिर से अमल में आ सकता है? इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज में नॉन-प्रलिफरेशन विशेषज्ञ मार्क फिट्ज़पैट्रिक कहते हैं, "इस समझौते से जुड़े कुछ लक्ष्यों के लिए अब बहुत कम समय बचा है और समझौते का मसौदा तैयार होने के बाद से ईरान ने जो प्रगति की है उसके चलते जेसीपीओए अब कम उपयोगी हो गया है."
लेकिन, फिर भी इस समझौते पर विचार और इसकी वापसी की कोशिशें हो रही हैं. ऐसे में जानते हैं कि इसमें शामिल विभिन्न पक्ष इस समझौते से क्या चाहते हैं

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ईरान
ईरान के लिए ये समझौता उस पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए ज़रूरी है. निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो ईरान इस समझौते की शर्तों का काफी हद तक सम्मान कर रहा था लेकिन अमेरिका एक तरफ़ा तरीक़े से इससे अलग हो गया.
ऐसे में ईरान चाहता है कि उस पर लगे सभी प्रतिबंध हटा लिए जाएं और अब अमेरिका की प्रतिबद्धताओं पर ध्यान दिया जाए.
लेकिन, ईरान से आने वाले बयानों में अब भी स्पष्टता नहीं है. कुछ बयान संकेत देते हैं कि उन्हें समझौते में लौटने से गुरेज नहीं है. हालांकि, वो समझौते का दायरा अपनी मिसाइलों और क्षेत्रीय गतिविधियों तक नहीं बढ़ने देना चाहते.

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साथ ही वो इस बात की पूरी तसल्ली चाहते हैं कि अगर समझौता बहाल होता है तो भावी अमेरिकी प्रशासन भी इससे बंधा रहेगा.
इसके बाद ही ईरान समझौते में वापस लौटने की प्रक्रिया पर बात करेगा. लेकिन, भावी अमेरिकी प्रशासन को लेकर की गई मांग का पूरा होना असंभव है. अमेरिकी व्यवस्था इस तरह काम नहीं करती है.
ईरान का रुख इस बार सख़्त है लेकिन फिर भी क्या वो लचीलापन दिखा सकता है?
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर अली वेज़ ने कहा, "हम ये मान सकते हैं कि ईरान का प्रतिनिधिमंडल इस बार सख़्त मोल-भाव करेगा लेकिन ये कहना मुश्किल है कि अपनी मांगों के साथ ईरान अमेरिका के साथ बीच के रास्ते तक पहुंचने के लिए लचीला रुख अपनाएगा या नहीं."

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अमेरिका
राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन का मानना है कि इस साल की शुरुआत में समझौते में कुछ और पक्षों को शामिल करके होने वाली बातचीत के जरिए ईरान के साथ समझ बनाने की कोशिश है.
अमेरिका परमाणु समझौते में वापस आना चाहता है और ईरान के नए राष्ट्रपति से भी यही उम्मीद करता है. हालांकि, ऐसा लगता है कि अमेरिका ने ईरान की मंशा को गलत आंका है.
ये भी एक सवाल है कि इस बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान ने जो प्रगति की है उसका क्या किया जाए और समझौते को चरणबद्ध तरीक़े से कैसे बहाल किया जाए.
अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट तौर पर अपनी सीमाएं बता दी हैं. राष्ट्रपति जो बाइडन ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने की बात नहीं मानेंगे और अगर वार्ता विफ़ल होती है तो अमेरिका अन्य विकल्पों का इस्तेमाल करेगा.

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इसराइल
इसराइल इस बैठक में शामिल नहीं है लेकिन उसका प्रभाव वार्ता पर ज़रूर है.
इसराइल और ईरान के बीच मुक़ाबले की स्थिति बनी रहती हैं. ईरान इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता और इसराइल में कई लोग ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए ही ख़तरा मानते हैं.
इसराइल पहले से ही ईरान और सीरिया में उसके सहयोगी गुटों के साथ अघोषित लड़ाई लड़ रहा है. उसने हाल के हफ़्तों में अपने हवाई हमलों के दायरे को बढ़ाया है.
इसराइल के प्रधानमंत्री नफ़्टाली बेनेट ने कड़ा बयान देते हुए कहा कि वार्ता का जो भी नतीजा निकले लेकिन इसराइल ईरान के संबंध में अपने "कार्रवाई की स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखेगा".
"इसराइल जेसीपीओए में पक्षकार नहीं है और वो इससे बंधा भी नहीं है."
प्रधानमंत्री के इस बयान के इतर परमाणु समझौते को लेकर इसराइल में लंबे समय से अस्पष्टता रही है.
देश का आधिकारिक बयान राष्ट्रपति ट्रंप की लाइन पर है लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने और संभावित युद्ध को टालने में मददगार होगा.
लेकिन, ईरान ने इस बीच परमाणु कार्यक्रम में काफ़ी प्रगति कर ली है और इसराइल उसे उसके कामों से आंकता है ना कि शब्दों से.
इसराइल का बाइडन की टीम के साथ तनाव होने की भी आशंका है क्योंकि कई इसराइली अधिकारियों का मानना है कि बाइडन टीम किसी भी कीमत पर ईरान के साथ परमाणु समझौता करना चाहती है.

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अमेरिका के सहयोगी
कभी जेसीपीओए के कट्टर विरोधी रहे अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों ने चुपचाप अपने विचार बदल लिए हैं.
अली वेज़ कहते हैं, "ईरान के पड़ोसी खाड़ी देशों ने मान लिया है कि कोई समझौता ना होने से बेहतर है, एक अपूर्ण समझौता. क्योंकि खाड़ी देश ईरान और अमेरिका के आपसी टकराव में फंस चुके हैं और ईरान इस क्षेत्र में बहुत आक्रामक रहा है."
अमेरिका की रणनीति मध्य एशिया की बजाए अब अधिकतर चीन केंद्रित है. ऐसे में मध्य एशिया में उसके कई सहयोगी चाहते हैं इस समझौते की वापसी में ही उनके हित छुपे हैं.

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तीनों यूरोपीय देश
ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई बैठकों में अहम भूमिका निभाई है जिसके कारण बात वार्ता तक पहुंची है.
यहां तक कि ट्रंप प्रशासन में इस समझौते को ज़िंदा रखने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
लेकिन, व्यापक तौर पर देखें तो यूरोपीय देश और अमेरिका दोनों इस मामले में एक ही तरफ़ दिखते हैं. फ्रांस इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि ईरान के साथ फिर से होने वाली बातचीत वहीं से शुरू हो जहां उसे जून में छोड़ा गया था ताकि समझौता जल्दी हो सके.
फ्रांस के विदेश मंत्री ने ईरान को किसी भी 'दिखावटी' बातचीत को लेकर चेतावनी दी है.

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चीन और रूस
पश्चिमी देशों की तरह चीन और रूस भी ईरान के साथ परमाणु समझौते को बहाल कराना चाहते हैं और इस क्षेत्र में किसी भी नए संकट से बचना चाहते हैं.
लेकिन, यूरोपीय देशों के विपरित चीन और रूस के संबंध अमेरिका से बहुत अलग हैं.
दोनों देश जानते हैं कि अमेरिका मध्य पूर्व की तरफ़ से अपना ध्यान हटा रहा है और ऐसे में वो इस क्षेत्र में अपने लिए संभावनाएं देख रहे हैं. ऐसे में वो ईरान को लेकर और ज़्यादा गंभीर हो गए हैं. ईरान भी उनके साथ संबंध आगे बढ़ाना चाहता है.
सितंबर में शंघाई सहयोग संगठन के लिए ईरान की सदस्यता स्वीकार की गई थी. इसमें रूस, चीन, पाकिस्तान, भारत और कई मध्य एशियाई देश शामिल हैं.
इसे ईरान की अमेरिका और पश्चिमी देशों से अलग होने की 'लुक ईस्ट' नीति के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है.
ईरान की ये रणनीति रूस और चीन की बहुध्रुवीय व्यवस्था के लक्ष्य के साथ फिट बैठती है. ऐसे में ईरान परमाणु समझौते में कोई मुश्किल आने पर चीन और रूस से समर्थन की उम्मीद करता है.
क्या हैं फ़ायदे
इस समझौते से किसी को बहुत ज़्यादा उम्मीदें नहीं हैं.
आईआईएसएस के मार्क फिट्ज़पैट्रिक कहते हैं कि ईरान की अवास्तविक मांगों को देखते हुए जेसीपीओए में वापसी की संभावना कम लगती है.
अगर समझौता नहीं होता है तो कुछ देश ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए सैन्य विकल्प को ही अंतिम विकल्प मानने लगेंगे.
मार्क फिट्ज़पैट्रिक कहते हैं, "अमेरिका और ईरान समझौते में कम से कम शर्तों पर राज़ी हो सकते हैं जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के साथ कुछ प्रतिबंध भी हटाए जाएं."
इसकी सभी कमियों के बावजूद ईरान परमाणु समझौते के फायदें भी हैं. इसके बिना मध्य पूर्व कहीं ज़्यादा ख़तरनाक जगह बन सकता है.
(जोनाथन मार्कस ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के स्ट्रेटेजी एंड सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट में प्रोफ़ेसर हैं.)
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