ईरान-अमेरिका संबंध: 'रईसी नहीं, ख़ामेनेई जो चाहेंगे, वही होगा'

ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

इब्राहीम रईसी ईरान के नए राष्ट्रपति के रूप में अगस्त में शपथ लेंगे.

उनके निर्वाचन के बाद से ही राजनयिक हलकों में ये पूछा जा रहा है कि प्रतिबंधों का सामना कर रहे ईरान और अमेरिका के बीच रिश्तों में किस तरह का बदलाव संभव हो सकेगा?

रईसी ईरान के उन लोगों में शामिल हैं, जिन पर अमेरिका ने अलग से भी प्रतिबंध लगा रखा है.

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अमेरिका और ईरान-दोनों देशों में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है और दोनों ही एक दूसरे से संबंधों में नए समीकरणों की संभावनों की तलाश करने में लगे हैं.

ईरान में हुई नई तब्दीली के बाद संबंधों को लेकर अमेरिका ने अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन वो क्या चाहता है ये तो राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने चुनावी भाषणों में ही स्पष्ट कर दिया था.

बाद में ईरान के साथ परमाणु समझौते को फिर से बहाल करने के लिए बातचीत की शुरुआत भी हुई.

परमाणु संधि वर्ष 2015 में हुई थी. इसे एक साल के बाद लागू किया गया और इसमें अमेरिका के अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अन्य स्थायी सदस्य जैसे ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, जर्मनी और रूस भी शामिल थे.

लेकिन साल 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने ख़ुद को इस संधि से अलग कर लिया था.

जानकार मानते हैं कि इब्राहीम रईसी भले ही ईरान के राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो गए हों, लेकिन अहम फ़ैसले देश के सुप्रीम लीडर यानी सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ही हमेशा की तरह लेंगे.

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"अड़ियल रवै में बदलाव ज़रूरी"

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सलिवन ने कहा कि अमेरिका की बातचीत सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई से ही हो रही है और वो जारी रहेगी.

राजनयिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत बीबीसी से कहते हैं, "लंबे अरसे से प्रतिबंधों का सामना कर रहा ईरान अब उससे बाहर निकलना चाहता है. इसलिए कई ऐसे राजनयिक मुद्दे हैं, जिनको लेकर उसका रवैया जो पहले अड़ियल था, उसमें बदलाव ज़रूर आएँगे."

पंत के अनुसार नव निर्वाचित इब्राहीम रईसी सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के क़रीबी हैं इसलिए अहम फ़ैसले लेने में रईसी को किसी भी तरह की बाधा का सामना नहीं करना पड़ेगा. जबकि हसन रूहानी और ख़ामेनेई की सियासत अलग-अलग थी.

वीडियो कैप्शन, ईरान के ड्रोन बने अमरीका के लिए ख़तरा

हालाँकि विदेश मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि ईरान-अमेरिका संबंधों में बदलाव तभी संभव है जब ईरान की तरफ़ से अमेरिका को ठोस आश्वासन मिले कि वो परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और साल 2015 के परमाणु संधि पर क़ायम रहेगा.

लेकिन हर्ष पंत कहते हैं, "सब कुछ अमेरिका पर निर्भर करता है कि वो ईरान को किन चीज़ों के लिए तैयार करने में सफलता हासिल कर पाता है. वैसे ईरान भी अब चाहता है कि उसका दूसरे देशों के साथ होने वाला व्यापार फिर से बहाल हो जाए, क्योंकि उससे देश गहरे आर्थिक संकट के लंबे दौर से गुज़रता आ रहा है."

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क्या ईरान से नज़दीकी बनाएगा अमेरिका?

एक राय ये भी है कि अमेरिका को रईसी पर लगे प्रतिबंध को हटाना पड़ेगा, जिससे राजनयिक संबंधों में बेहतरी की शुरुआत हो सकती है.

डोनाल्ड ट्रंप ने मध्य पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब को काफ़ी ज़्यादा तरजीह दी थी. लेकिन बाइडन ने सऊदी अरब को लेकर अपना रुख़ स्पष्ट नहीं किया है.

अमेरिका के ईरान के साथ संबंधों में नरमी आने की सूरत में सऊदी अरब की परेशानी भी बढ़ सकती है, क्योंकि ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंध बेहतर नहीं रहे हैं.

विदेश मामलों के जानकार मनोज जोशी, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी के कार्यकाल को 'काफ़ी ढीला' मानते हैं और कहते हैं कि इसकी वजह ये भी हो सकती है कि रूहानी के फ़ैसलों को सर्वोच्च नेता की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता था.

जबकि रईसी की छवि कट्टरपंथी नेता की है और उन्हें आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का समर्थन भी प्राप्त है.

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़मेनेई

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"सर्वोच्च धार्मिक नेता का फ़ैसला अंतिम"

हालाँकि वो मानते हैं कि रईसी हों या कोई और नरमपंथ के नेता ईरान में सर्वोच्च धार्मिक नेता का फ़ैसला ही अंतिम होता है.

वे कहते हैं, "वैसे भी रईसी को आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है. इसलिए फ़ैसले लेने में जो मुश्किलें रूहानी के सामने थीं, वो रईसी के सामने नहीं होंगी. साथ ही इसराइल में भी नेतृत्व परिवर्तन हुआ है लिहाजा पश्चिमी एशिया और मध्यपूर्व की राजनीति में कई बदलाव देखने को मिलेंगे."

जहाँ तक बात ईरान की है, तो जोशी कहते हैं, "इसराइल और सऊदी अरब उसे बड़ी अड़चन के रूप में ही देखते रहे हैं. इसराइल और सऊदी अरब ने ईरान और प्रमुख देशों के बीच हुई परमाणु संधि का विरोध भी किया था. अब भी दोनों ही देश ईरान पर से प्रतिबंध हटाने के समर्थन में नहीं हैं."

हर्ष पंत कहते हैं, "न तो अमेरिका और न ही ईरान- किसी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं. लेकिन कूटनीतिक स्तर पर दोनों देशों के बीच गतिविधियाँ चल रहीं हैं. ये कुछ समय में ही स्पष्ट हो जाएगा कि ईरान को लेकर अमेरिका क्या फ़ैसला करता है."

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