पाकिस्तान में दिवालिया होने पर बहस क्यों? कोई देश कब होता है दिवालिया

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पाकिस्तान की वित्तीय मामलों की जांच एजेंसी फ़ेडरल बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू यानी एफ़बीआर के पूर्व चेयरमैन सैयद शब्बर ज़ैदी ने कहा है कि अगर हालिया चालू खाते और राजकोषीय घाटे को देखें तो यह पाकिस्तान के दिवालिया होने से जुड़े मुद्दे हैं.
उन्होंने कहा, ''सरकार का ये दावा कि सब कुछ ठीक है और चीज़ें अच्छी हो रही हैं. ये सारी बातें झूठ हैं.''
शब्बर ज़ैदी ने ये बात हाल ही में हमदर्द यूनिवर्सिटी में एक भाषण के दौरान कही थी.
हालांकि अब ज़ैदी ने ट्विटर पर इसे लेकर सफ़ाई दी है. उनका कहना है कि उनके भाषण के तीन मिनट के क्लिप पर ही बात हो रही है. ज़ैदी का कहना है कि उन्होंने समाधान की बात भी कही थी.
ज़ैदी ने कहा, ''किसने क़र्ज़ लिया था, इस पर ताना देने से कुछ नहीं होगा. ये पाकिस्तान का क़र्ज़ है. ब्याज दरों पर फ़ैसला तार्किक तरीक़े से होना चाहिए. दुनिया के किसी भी मुल्क की तरक़्क़ी निर्यात के दम पर होती है. हमें निर्यात को दुरुस्त करना होगा.''
"क़र्ज़ लेने की धारणा से बाहर निकलना होगा. इससे देश नहीं चलेगा. हमें सर्विस निर्यात करनी है न कि काम करने वाले लोगों को एक्सपोर्ट करना है. अफ़ग़ानिस्तान में जब तक समावेशी सरकार नहीं आएगी तब तक पाकिस्तान फंसा रहेगा. पाकिस्तान का निर्यात 20 अरब डॉलर का है और हमारा कोई ख़रीदार है तो पश्चिम है. हमें निर्यात बढ़ाना है तो अमेरिका से दोस्ती करनी होगी.''
"मुझे तो आज तक सीपीईसी समझ में नहीं आया. इसमें पारदर्शिता लानी होगी. इससे हमारी अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है. भारत से हम दवाई ले रहे हैं. ये जो ड्रामेबाज़ी है कि भारत से व्यापारिक संबंध नहीं रखेंगे, ये बंद होनी चाहिए. हर प्राथमिक स्कूल में अंग्रेज़ी होनी चाहिए. जो बच्चा अंग्रेज़ी नहीं पढ़ता है वो दोयम दर्जे का नागरिक बन जाता है. तमाम मज़हबी शिक्षा ग्रैजुएशन के बाद होनी चाहिए.''
शब्बर ज़ैदी इमरान ख़ान की सरकार में ही 10 मई, 2019 से आठ अप्रैल, 2020 तक एफ़बीआर के चेयरमैन थे.

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क्या दी सफ़ाई
पाकिस्तान के दिवालिया होने वाली बात को तूल मिलने पर शब्बर ज़ैदी ने ट्वीट कर कहा, ''हमदर्द यूनिवर्सिटी में मेरे भाषण की ग़लत व्याख्या हो रही है. वहां आधे घंटे का प्रेजेंटेशन था. इसमें से केवल तीन मिनट के क्लिप पर बात हो रही है. हां, मैंने चालू खाता घाटा और राजस्व घाटे की बात उठाई थी और यह दिवालिए का मुद्दा है जो कि चिंताजनक है. हमें समाधान की ओर देखना है. मैंने अपनी बात पूर्ण विश्वास के साथ कही है.''
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शब्बर ज़ैदी ने शनिवार को भी ट्वीट करके इस मामले में अपना पक्ष रखा. उन्होंने ट्वीट किया, "मैंने क्यों कहा कि वर्तमान केंद्रीय वित्तीय ढांचा अलाभकारी और दिवालिया है. केंद्रीय राजस्व 6500 अरब का है. प्रांतों को केंद्र 3500 अरब देता है. बचा 3000 अरब. केंद्र की ऋण सेवा: मंत्रालय 2800 अरब, रक्षा 1500 अरब, प्रशासन 300 अरब, एसओई 500 अरब. मैंने राजस्व को यहां पर उच्च स्तर पर रखा है और ख़र्चों को नीचे."
इसके बाद अगले ट्वीट में ज़ैदी ने कहा, "मैं लगातार कह रहा हूं कि मैं अपने एक भी शब्द से पीछे नहीं हटा हूं. मैं देखने के लिए तथ्य दे रहा हूं. हमें केंद्रीय वित्तीय ढांचे को दोबारा बनाने की ज़रूरत है. किसी भी तरह से यह वर्तमान आकार में काम नहीं कर सकता है. हम जब तक इसके लिए काम नहीं करेंगे तब तक यह काम नहीं करेगा."
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शब्बर ज़ैदी के तर्कों के बाद इस बात को लेकर बहस तेज़ हो गई है कि क्या पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर है या दिवालिया हो गया है?
इस बहस के बीच पाकिस्तान के स्तंभकार फ़र्रूख़ सलीम ने ट्वीट करके कहा है कि दिवालिया होना एक लंबी प्रक्रिया है.
सलीम ट्वीट में लिखते हैं, "क्या पाकिस्तान दिवालिया हो गया है?
1. दिवालियापन एक क़ानूनी प्रक्रिया है जो क़र्ज़दार शुरू करता है.
2. यह कोर्ट के आदेश से लागू होता है
3. जो कोई क़र्ज़ के भुगतान करने में असमर्थ होता है
4. किसी भी क़र्ज़दार ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ क़ानूनी प्रक्रिया शुरू नहीं की है
5. किसी कोर्ट का आदेश नहीं है
6. पाकिस्तान ने अपने सभी क़र्ज़ों की अदायगी की है.
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पाकिस्तान पर क़र्ज़
एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान के ऊपर इस समय 50.5 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये का क़र्ज़ और देनदारियां हैं, जिसमें से 20.7 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये का क़र्ज़ सिर्फ़ वर्तमान सरकार के ऊपर है.
इसी रिपोर्ट के मुताबिक़, इमरान ख़ान सरकार बनने के बाद पाकिस्तान का सार्वजनिक क़र्ज़ काफ़ी बढ़ा है.

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एक्सप्रेस ट्रिब्यून न्यूज़ पेपर के मुताबिक़, सितंबर 2021 को स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान ने क़र्ज़ के आंकड़े जारी किए थे. इससे एक दिन पहले प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बढ़ते क़र्ज़ को 'राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा' बताया था.
रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते 39 महीनों में पाकिस्तान का क़र्ज़ 20.7 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये बढ़ा है, यह देश के कुल क़र्ज़ में 70 फ़ीसदी की बढ़ोतरी है.
एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान के क़र्ज़ लेने के निवेदन को ख़ारिज कर दिया था क्योंकि वो स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के क़र्ज़ लेने की शर्तों पर सहमत नहीं था.

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पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर है?
किसी देश को दिवालिया घोषित करने में एक साथ कई आर्थिक ताक़तें काम करती हैं. किसी देश को दिवालिया घोषित करना किसी कंपनी के दिवालिया घोषित करने की तरह नहीं है लेकिन एक देश की मौद्रिक नीति की स्थिति अन्य दूसरे कारकों के ऊपर होते हैं जो किसी देश की हैसियत को बताते हैं.
इसके साथ ही निवेशकों का भरोसा भी किसी देश के दिवालियेपन की हैसियत को बताता है, जिसमें मूडीज़ जैसी कंपनी की क्रेडिट रेटिंग भी बड़ी भूमिका अदा करती है.
फ़िच रेटिंग्स ने हाल ही में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनाओं के आधार पर अपनी रेटिंग में सुधार करने की बात को दोहराया था. इसी साल मई में पाकिस्तान को क़र्ज़ देने के जोखिम में उसे 'बी' रेटिंग दी गई थी.
यह रेटिंग एजेंसियां एक देश की वित्तीय ज़िम्मेदारी का इतिहास, उनकी पिछली देनदारियों में चूक और IMF के वर्तमान क़र्ज़ की अदायगी की योजनाओं को देखकर ही क्रेडिट देती हैं.

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अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड मार्केट से क़र्ज़ लेना भी बहुत से देशों को अक्सर महंगा पड़ जाता है क्योंकि वो निवेशकों को अधिक लाभ का वादा कर देते हैं जिनको वो दे नहीं पाते हैं.
जब कोई देश अपने देनदार को इन क़र्ज़ों की अदायगी समय पर नहीं कर पाता है तो उसे 'दिवालिया' कह दिया जाता है लेकिन किसी देश के दिवालियेपन की घोषणा किसी कंपनी के दिवालिया होने की तरह नहीं होती है.
कोई देश इन क़र्ज़ों की अदायगी न कर पाने पर वो अपने क़र्ज़ों का पुनर्गठन करता है और नीतियों में बदलाव करता है. वो अपने बॉन्ड की वर्तमान क़ीमत में भी तब्दीली करता है जिससे निवेशकों को अपनी पूरी रक़म जाने का डर न हो.
जब सारी कोशिशों के बाद भी अर्थव्यवस्था संभलने का नाम नहीं लेती है और देश क़र्ज़ की अदायगी करने में असमर्थ रहता है तो वो ख़ुद को दिवालिया भी घोषित कर देता है. जैसा कि साल 2001 में अर्जेंटीना ने किया था.
अर्जेंटीना उस समय भारी क़र्ज़ में था और दंगाई सड़कों पर घूम रहे थे. अर्जेंटीना की आर्थिक समस्याएं काफ़ी पहले शुरू हो चुकी थीं. उसने अपनी मुद्रा पेसो को अमेरिकी डॉलर के बराबर कर दिया.
अमेरिका की अर्थव्यवस्था बढ़ती गई लेकिन अर्जेंटीना ने अपनी मुद्रा पेसो की क़ीमत नहीं घटाई और वो नए नोट छापता रहा जिससे निवेशकों में डर बैठ गया और वो भाग गए
इसके बाद अर्जेंटीना ने अपने क़र्ज़ों की अदायगी न करने की घोषणा की जिससे अर्जेंटीना को नया क़र्ज़ देने से इनकार कर दिया गया और उसकी अर्थव्यवस्था ढह गई.
पाकिस्तान के ऊपर क़र्ज़ लगातार बढ़ रहा है लेकिन रेटिंग एजेंसियों ने उसकी अर्थव्यवस्था में उम्मीद भी जगाई है. फ़िच रेटिंग एजेंसी का कहना है कि कोरोना महामारी के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पटरी पर दोबारा लौट रही है.
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