अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान मान्यता पाने के लिए क्या कुछ कर रहा है

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- Author, अब्दीरहीम सईद
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
हाल के वक्त में तालिबान ने अपनी कूटनीतिक और जनसंचार की गतिविधियां बढ़ा दी हैं. इससे साफ़ है कि वह चाहता है कि वैश्विक स्तर पर उसकी सरकार को मान्यता मिले और इसके लिए वो पूरी कोशिश कर रहा है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि दुनियाभर की सरकारों और संयुक्त राष्ट्र ने अब तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है.
तालिबान दुनिया से गुहार लगा रहा है कि वह उनकी सरकार और शासन को मान्यता दें और अफ़गानिस्तान की वित्तीय मदद करें.
तालिबान अपने सोशल मीडिया अकाउंट के ज़रिए विदेशी और मानवीय राहत देने वाली एजेंसियों के प्रतिनिधिमंडलों के दौरों के बारे में भी खूब लिख रहा है. यह काफ़ी हद तक दुनिया को ये दिखाने की कोशिश है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नए अफ़ग़ान शासन को मान्यता मिल रही है और दुनिया के बाकी देशों को भी ऐसा करना चाहिए.
इस साल 15 अगस्त को अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा करने वाले तालिबान ने ये पहले ही साफ़ कर दिया है कि वह आतंकी गतिविधियों के लिए अफ़गानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा.
तालिबान ने एक 'केयरटेकर' सरकार की भी घोषणा की है ताकि वह लोगों के बीच खुद को कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली सरकार की तरह पेश कर सके.
वैश्विक स्तर पर मान्यता की चाहत में तालिबान इन दिनों कई अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संदेश भेज रहा है, बयान जारी कर रहा है और उसके अधिकारी एक के बाद एक कई विदेशी और मानवीय राहत देने वाली एजेंसियों के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाक़ात कर रहे हैं.
तालिबान अधिकारी अपने आलोचकों को मानावाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का यक़ीन दिलाने के लिए उत्सुक हैं, ख़ासकर महिला अधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर तालिबान ये भरोसा दिलाना चाहता है कि वह इसके लिए प्रतिबद्ध है और शरिया क़ानून की अपनी परिभाषाओं के दायरे में रह कर वह महिलाओं को उनके अधिकार देंगे.
अपना संदेश दुनिया तक पहुंचाने के लिए तालिबान पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ और सोशल मीडिया दोनों का इस्तेमाल कर रहा है.

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मान्यता पाने के लिए अपील करता तालिबान
तालिबान की हालिया डिप्लोमैसी का सार यही है कि उसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल जाए. सत्ता में वापसी के बाद तालिबान के प्रवक्ता हजीबुल्ला मुजाहिद और अन्य अधिकारी संगठन के इस विज़न को स्पष्ट ज़ाहिर कर चुके हैं.
हजीबुल्ला मुजाहिद ने कहा था, "दुनिया को हमसे डरना नहीं चाहिए. हम अमेरिका समेत दुनिया के सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते हैं."
मुजाहिद और अन्य तालिबान नेता बार-बार कह रहे हैं कि वह अफ़ग़ानिस्तान को वो आतंकवादी गतिविधियों का ठिकाना नहीं बनने देंगे. लेकिन अफ़गानिस्तान में अल-क़ायदा और अन्य जिहादी समूहों की मौजूदगी चिंता का विषय बनी हुई है.
कई देश जैसे- क़तर, पाकिस्तान और चीन तालिबान का सहयोग कर रहे हैं लेकिन अब तक इन तीनों देशों ने भी दुनिया के सामने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है.
इतना ही नहीं क़तर ने तो ये भी कह दिया है कि तालिबान सरकार को मान्यता देना 'अभी उसकी प्राथमिकता नहीं है', जबकि फ्रांस ने कहा है कि तालिबान से बातचीत के लिए 'जिस तरह की परिस्थितियां चाहिए अभी वैसी परिस्थितियां नहीं है.'

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पश्चिमी देश मानवाधिकारों की रक्षा, ख़ासकर महिलाओं और बच्चियों के अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे हैं.
क़तर में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रवक्ता नईम वरदक ने हाल ही में कहा था कि अंतराष्ट्रीय देशों ने तालिबान की सरकार को मान्यता देने के लिए जो पैमाने तय किए हैं वह 'अनुचित' हैं.
अफ़गानिस्तान में अपनी सरकार को मान्यता देने के लिए तालिबान अक्सर ये दलील देता है कि 'ये अफ़गानों की मर्ज़ी है'.
इन सब कोशिशों के अलावा, तालिबान के अधिकारी इटली और दक्षिण कोरिया सहित दुनिया भर के मीडिया से बात कर रहे हैं ताकि उसकी सरकार की जल्द से जल्द मान्यता मिलने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जा सके. इसी तरह की एक अपील तालिबान ने अरब के स्थानीय मीडिया आउटलेट्स पर भी की है.
इसके अलावा तालिबान ग़ैर-सरकारी संगठनों से मिल रही मान्यता को भी दुनिया के सामने पेश कर रहा है. हाल ही में दोहा स्थित मुस्लिम मौलवियों के वैश्विक संगठन ने तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन को अफ़गानिस्तान के संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि के तौर पर नामित किया था. इसके साथ ही उन्होंने ये भी अपील की कि संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में उन्हें (तालिबान को) दुनिया के नेताओं को संबोधित करने का मौक़ा दिया जाए.
मानवीय सहायता की गुहार
हाल के दिनों में अपनी कूटनीतिक कोशिशों के ज़रिए तालिबान मानवीय और वित्तीय सहायता की ज़रूरत के बारे में भी बताना चाहता है.
जानकार पहले ही आगाह कर चुके हैं कि अफ़गानिस्तान की नई सत्ता स्वास्थ्य और आर्थिक संकट की चुनौतियों से जूझ रही है.
तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा करने के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अफ़ग़ानिस्तान पर अपने सभी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर रोक लगा दी, साथ ही विश्व बैंक ने उसे दी जा रही वित्तीय मदद भी बंद कर दी.
इसी तरह कई देश जैसे- जर्मनी ने अफ़ग़ानिस्तान के विकास के लिए दी जाने वाली सहायता रोक दी और इटली ने वित्तीय सहायता को मानवाधिकारों के सम्मान के साथ जोड़ा और इस पर रोक लगा दी.
शुरूआत से ही तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय मदद की ज़रूरत और इसे जारी रखने पर ज़ोर दे रहा है.
शरणार्थी मामलों के कार्यवाहक मंत्री हाजी ख़लील-उर रहमान हक़्क़ानी ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अफ़ग़ानिस्तान को वित्तीय सहायता देने की अपनी पहले की प्रतिबद्धता का पालन करना चाहिए.
सहायता भेजने या उसका वादा करने वाले कुछ पहले देशों में क़तर, संयुक्त अरब अमीरात और चीन शामिल हैं. चीन ने जी20 देशों से भी अफ़ग़ानिस्तान की मदद करने की अपील की है.

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तालिबान ने संयुक्त राष्ट्र की वरिष्ठ प्रतिनिधि डेबोरा लियॉन्स सहित संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों को अफ़ग़ानिस्तान में अपना काम जारी रखने को कहा है और उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया है. संयुक्त राष्ट्र ने पहले भी अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा का आश्वासन मांगा था.
13 सितंबर को, जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में दानकर्ता देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को मानवीय सहायता के रूप में एक अरब डॉलर की मदद देने का वादा किया है. इस ख़बर का तालिबान ने सोशल मीडिया के ज़रिए खूब प्रचार किया.
तालिबान की मांग है कि अमेरिका उसके अधिकारियों को आतंकवादियों की सूची से हटाए और अफ़ग़ानिस्तान सरकार की जो संपत्ति फ्रीज़ कर दी गई है उस पर रोक हटाए. तालिबान का दावा है कि अमेरिका पर लगभग 10 बिलियन डॉलर का बकाया है. ये रक़म अमेरिका की ओर से अफ़ग़ानिस्तान को दिया जाना है.
तालिबान से जुड़े कई ट्विटर अकाउंट्स ने हाल ही में एक ऑनलाइन अभियान चलाया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अरबों डॉलर की अफ़ग़ान संपत्तियों को अनब्लॉक करने की अपील की गई. ये संपत्तियां अफ़गानिस्तान में तालिबान के कब्जे के तुरंत बाद फ्रीज़ कर दी गई थीं.
विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की मेज़बानी
सत्ता में अपने पहले महीने के दौरान, तालिबान ने अन्य देशों को लुभाने और अंतरराष्ट्रीय पहचान के अपने व्यापक प्रयासों के तहत काबुल में कई विदेशी अधिकारियों से मुलाकातें की.
इन विदेशी मेहमानों में यूके, क़तर, तुर्की, पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के प्रतिनिधि शामिल थे. इसके अलावा कुछ एशियाई देश मसलन-किर्गिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के प्रतिनिधियों से भी तालिबान के अधिकारियों से मुलाक़ात की है.
तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अब तक क़तर के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी देश का दौरा करने वाले सर्वोच्च स्तर के विदेशी अधिकारी हैं.
इसके साथ ही, अफ़ग़ानिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत डेबोरा लियॉन्स अगस्त के मध्य से लेकर अब तक अफ़ग़ानिस्तान का दौरा करने वाली मानवीय राहत का काम करने वाली एजेंसी की सबसे वरिष्ठ प्रतिनिधियों में से एक हैं.
क़तर में, जहां लंबे समय से तालिबान का राजनीतिक कार्यालय है, वहां भी विदेशी राजनयिकों और अन्य प्रतिनिधियों से मुलाक़ातों का सिलसिला जारी है.
काबुल में, प्रतिनिधियों की मेज़बानी आमतौर पर तालिबान के प्रधानमंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद, उनके दो डिप्टी, मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर और मुल्ला अब्दुल सलाम हनफ़ी या फिर विदेश मंत्री मुल्ला अमीर खान मोताक़ी कर रहे हैं.
सितंबर के अंत में, बरादर और मोताक़ी ने अन्य तालिबान अधिकारियों के साथ, काबुल में स्थित राजनयिक मिशन के राजदूतों और प्रतिनिधियों के लिए डिनर का आयोजन किया था.

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एक 'नए अफ़ग़ानिस्तान' की छवि बेचने की कोशिश
तालिबान ये दिखाने में जुटा है कि उसका शासन सामान्य और सुरक्षित है.
सितंबर में आयोजित एक भोज में मोताक़ी ने विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तालिबान शासित अफ़ग़ानिस्तान को लेकर एक छोटा-सा भाषण दिया था.
उन्होंने कहा "इस्लामिक अमीरात अफ़ग़ानिस्तान ने पूरी दुनिया के साथ सकारात्मक संबंधों के संदेश के साथ काबुल में प्रवेश किया है. हम अन्य देशों के क़ानूनी हितों और अनुरोधों का पूरा सम्मान करते हैं, और बदले में, हम दूसरों से भी इसी तरह के व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं."
ये भाषण और ऐसे ही तालिबान के अन्य संदशों को पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया.
तालिबान अपनी नरम छवि पेश करने के लिए सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल कर रहा है. उन्होंने हाल ही में खुद को 'प्राचीन वस्तुओं के संरक्षक' और 'पशु अधिकारों' का समर्थक होने का दावा भी किया है.
वह ये दिखा रहा है कि देश में सब सामान्य और सुरक्षित है, लोगों में एकता की भावना है. साथ ही वो आंतरिक विभाजन या फिर सामने आने वाली चुनौतियों को नकारता भी नज़र आ रहा है.
लेकिन तालिबान महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़ी चिंताओं को बहुत तवज्जो नहीं दे रहा है. उसने सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा है कि महिलाओं को घरों पर ही रहना चाहिए. तमाम आलोचनाओं के बावजूद अभी तक तालिबान ने लड़कियों को सेकेंड्री स्कूल जाने की इजाज़त नहीं दी है.
तालिबान पर असहमति को दबाने और पत्रकारों को परेशान करने के साथ-साथ हजारा अल्पसंख्यक समूह को निशाना बनाने का भी आरोप है.
आलोचकों को आश्वस्त करने के प्रयास में, तालिबान ने हाल ही में अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह अनुशासनहीन सदस्यों को बाहर निकालें. लेकिन तालिबान लड़कियों की शिक्षा पर चल रहे प्रतिबंध जैसी राष्ट्रव्यापी नीतियों पर कोई चर्चा नहीं कर रहा.
एक अन्य रणनीति के तहत तालिबान पश्चिमी शक्तियों को कह रहा है कि तालिबान के लिए मानवाधिकारों की चिंताओं को देखने के लिए उसे मान्यता मिलना ज़रूरी है.
हालांकि तालिबान को अपनी सरकार के लिए मान्यता के लिए अभी और इंतज़ार करना होगा.
नीदरलैंड्स, फ्रांस, जर्मनी जैसे कुछ यूरोपीय देशों ने साफ़ कहा है कि तालिबान से बातचीत के लिए एक तय परिस्थिति होनी आवश्यक है, और वर्तमान समय में परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं. इन देशों ने कहा है कि फिलहाल तालिबान के साथ किसी तरह की बातचीत को उसे मान्यता देना नहीं माना जाना चाहिए.
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