अफ़ग़ानिस्तानः "तालिबान ने अगर शहर पर कब्ज़ा जमा लिया तो मार डालेगा"

Silhouette image of Habib, हबीबी की छायाचित्र

इमेज स्रोत, BBC

इमेज कैप्शन, "अगर तालिबान ने मेरे शहर पर कब्ज़ा जमा लिया तो..." हबीबी को अपनी जान का डर सता रहा है
    • Author, स्वामीनाथन नटराजन और हफीज़ुल्लाह मरूफ़
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

"मैं अपने सपनों में अक्सर ये देखता हूं कि तालिबान ने मेरे शहर पर कब्ज़ा जमा लिया है."

अफ़ग़ानिस्तान के पत्रकार हबीब (बदला हुआ नाम) यह कहते हुए हमसे आग्रह भी करते हैं कि उनका सही नाम इस रिपोर्ट में न छापा जाए.

हबीब अफ़ग़ानिस्तान में बीते आठ सालों से जर्मन सेना के फंड से चलने वाले एक मीडिया आउटलेट के लिए काम करते हैं. बीते महीने जून में उनका रोज़गार ख़त्म हो गया क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सेनाएं अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौट रही हैं.

बीबीसी को फ़ोन पर दिए इंटरव्यू में तीन बच्चों के पिता हबीब ने बताया, "तालिबान ने अगर मेरे शहर पर कब्ज़ा कर लिया तो वो मुझे मार डालेंगे."

तालिबान उत्तर अफ़ग़ानिस्तान में स्थित हबीब के शहर की ओर तेज़ी से बढ़ता आ रहा है और वे कहते हैं कि अक्सर सड़कें खाली हो जाया करती हैं जो आने वाले संकट का आभास देती हैं.

अफ़ग़ानिस्तान की खाली सड़कें
इमेज कैप्शन, हबीब का कहना है कि जब भी तालिबान के हमले की अटकलें होती हैं तो यहां की सड़कें खाली हो जाती हैं

वे कहते हैं, "मेरे प्रांत के आधे से अधिक ज़िले पहले ही तालिबान के कब्ज़े में हैं. कुछ दिन पहले वो हमारे शहर के 10-12 किलोमीटर पास तक आए थे, लेकिन उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा."

अफ़ग़ानिस्तान के लोग दशकों से यह संघर्ष देख रहे हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की इस घोषणा के बाद से कि 'अमेरिकी सैनिक अगस्त तक पूरी तरह वापस लौट आएंगे', कई लोगों में यह डर पैदा हो गया है कि अब तक का सबसे बुरा वक़्त आने वाला है.

अमेरिकी नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय सेना काफी हद तक यहां स्थिरता बनाने में कामयाब हो गई थी. लेकिन क्या अफ़ग़ानिस्तान की सेना भी ऐसा कर सकती है? इसे लेकर लोगों के बीच व्यापक संदेह है.

डर का आलम यह है कि कई लोग पासपोर्ट बनवाने के लिए भागदौड़ कर रहे हैं.

वीडियो कैप्शन, Cover Story: अफ़ग़ानिस्तान में फिर पांव पसारता तालिबान

प्रतिशोध का डर

90 के दशक के अंत में अपने कुछ समय के शासनकाल के दौरान, तालिबान ने सबके सामने कई लोगों को मार डाला था, साथ ही महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करना और उनके रोज़गार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था.

तालिबान का कहना है कि वो बदल गए हैं और अब उस तरह की हिंसा का सहारा नहीं लेंगे.

उन्होंने बाक़ायदा एक वक्तव्य जारी कर कहा कि हबीब जैसे लोग जिन्होंने विदेशी सेना के लिए काम किया है, उन्हें निशाना नहीं बनाया जाएगा. लेकिन इसमें भी एक शर्त है, "उन्हें अपने किए पर पछतावा दिखाना होगा और भविष्य में ऐसी किसी भी गतिविधियों में शामिल होने से ख़ुद को दूर रखना पड़ेगा जो इस्लाम और देश के ख़िलाफ़ देशद्रोह के बराबर हों."

हबीब को इस पर संदेह है और उन्होंने सरकार का समर्थन करने वालों पर प्रतिशोध में किए गए हमलों का एक दस्तावेज़ तैयार किया है.

Habib, हबीब

इमेज स्रोत, BBC

इमेज कैप्शन, हबीब का कहना है कि रात में वो गोलियों के चलने और विस्फोटों की आवाज़ें पहले से ही सुनते आ रहे हैं

हबीब को इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन्हें देशद्रोही करार दिया जाएगा और इसलिए वे एक सूटकेस में कैश, ज्वेलरी, सर्टिफिकेट्स और कपड़े तैयार रखे रहते हैं.

वो कहते हैं, "हमारा समाज तेज़ी से बदल रहा है. कई लोग मुझसे खुलेआम कह रहे हैं कि आपने विदेशियों के लिए काम किया है. यह मुझे और डरा रहा है."

वह इसे लेकर भी आश्वस्त नहीं हैं कि इमरजेंसी की स्थिति में उनका कोई रिश्तेदार या दोस्त, इससे जुड़े ख़तरों को जानते हुए, उन्हें पनाह भी देगा या नहीं.

वो कहते हैं, "हमने जर्मनी के लिए काम किया. हमने तालिबान पर आलोचनात्मक कहानियां छापी हैं. यही ख़तरों की सबसे बड़ी वजह है."

हबीब और उनके सहयोगी अक्सर जानकारियां साझा करने के लिए मिलते हैं.

वे कहते हैं, "मैंने पढ़ा है कि जर्मनी उन सभी लोगों को अपने यहां शरण देने जा रहा है जिन्होंने उनकी सेना के लिए काम किया है. लेकिन पूरी प्रक्रिया के बारे में नहीं जानता हूं, या कि इसमें कितना वक़्त लगेगा."

कुछ लोग वीज़ा के लिए आवेदन कर रहे हैं. हबीब भी भारतीय दूतावास के साथ किस्मत आजमाइश कर रहे हैं.

वे ऐसे कई लोगों को जानते हैं जिन्होंने मानव तस्करी करने वालों को पैसे दिए हैं लेकिन हबीब इस रास्ते पर नहीं चलना चाहते.

वो कहते हैं, "अवैध तरीके से जाना बहुत जोखिम भरा है. हमें लूटा जा सकता है यहां तक की हमारी हत्या भी की जा सकती है. फिर यहां मरने या यूरोप जाने के क्रम में रास्ते में मरने में क्या फ़र्क रह जाएगा."

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

आशंकाएं

हबीब के उलट बहुत से ऐसे लोग हैं जो अफ़ग़ानिस्तान से भागने के रास्ते तलाश रहे हैं, फिर चाहे वो वैध हो या अवैध.

पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के एक डॉक्टर ने बीबीसी को बताया, "मैं ब्रिटेन के लिए वीज़ा लेने की कोशिश कर रहा हूं. अगर मुझे यह नहीं मिला तो मैं अवैध तरीक़े से यूरोप जाऊंगा."

Bagram runway, बगराम रनवे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अमेरिकी सेना बगराम एयरबेस से 5 जुलाई को रवाना हुई

डॉक्टर का कहना है कि उन्हें इलाके में सक्रिय सरकार विरोध सशस्त्र समूहों से कई धमकियां मिली हैं. वे कहते हैं, उन्हें इस बात का यकीन नहीं है कि सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगी.

सात बच्चों के पिता ये डॉक्टर जल्द से जल्द अपनी चीज़ों को बेच कर देश छोड़ कर जाना चाहते हैं.

भारी मांग

मानव तस्करी का काम करने वाले शमी कहते हैं, "बहुत कम अफ़ग़ानी लोगों को वीज़ा मिल रहा है, और हताशा में कई तो क्रिमिनल नेटवर्क की मदद लेते हैं. मांग बहुत ज़्यादा है, लिहाजा कीमत भी अधिक है.

तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, कई क्षेत्रों में अफ़ग़ान सुरक्षाबलों और तालिबान के बीच तेज़ संघर्ष चल रहा है

इटली ले जाने के लिए आठ हज़ार डॉलर (क़रीब छह लाख भारतीय रुपये) चार्ज कया जाता था, जो अब बढ़ कर 10 हज़ार डॉलर (साढ़े सात लाख भारतीय रुपये) हो गया है.

वैसे देश में जहां प्रति व्यक्ति औसत आय केवल 5000 डॉलर (लगभग 3.73 लाख भारतीय रुपये) है, यह एक बड़ी राशि है.

जब से बगराम एयरपोर्ट से अमेरिका सैनिकों की वापसी हुई है, उनका कारोबार फलफूल रहा है.

वे कहते हैं, "बीते दो हफ़्ते में मैंने लगभग 195 लोगों को बाहर भेजा है. जल्द ही मैं दर्जन भर और लोगों को बाहर भेजूंगा."

वीडियो कैप्शन, क्या रूस ने तालिबान से अमरीकी फ़ौज़ी मारने की डील की थी?

ख़तरनाक यात्रा

शमी कहते हैं कि वे अपने ग्राहकों को इस तरीके से बाहर जाने पर होने वाले ख़तरों के बारे में बताते हैं. लेकिन इससे कोई पीछे नहीं हटता. पहले कुछ लोग गिरफ़्तार किए गए हैं और उन्हें निर्वासित भी किया गया है.

वे कहते हैं, "अगर तालिबान की वापसी होती है तो कई लोग मारे जाएंगे लिहाज़ा लोग बड़े जोखिम उठा रहे हैं."

कुछ युवा प्रवासी अब तुर्की में हैं

इमेज स्रोत, BBC

इमेज कैप्शन, यूरोप जाने के लिए एक युवा को 10 हज़ार डॉलर (क़रीब साढ़े सात लाख भारतीय रुपये) खर्च करने पड़ते हैं

लोगों को ईरान के रास्ते तुर्की में तस्करी कर लाया जाता है, फिर नाव से ग्रीस भेजा जाता है.

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता बाबर बलूच कहते हैं कि इस साल यूरोप में समुद्र पार कर जाने की कोशिश में क़रीब 900 लोगों ने अपनी जानें गंवा दीं.

ग्रीस में क़रीब 9,000 लोग शरण लेना चाहते हैं. इनमें से 48 फ़ीसद लोग अफ़ग़ानिस्तान के हैं.

यूएनएचआरसी की ग्लोबर ट्रेंड्स रिपोर्ट 2020 के मुताबिक, बीते साल के अंत में क़रीब 30 लाख अफ़ग़ान लोग अफ़ग़ानिस्तान के भीतर ही विस्थापित हुए थे. इनमें से 26 लाख लोग विदेश चले गए थे.

इस साल के शुरुआती छह महीनों में अतिरिक्त 2 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए और संयुक्त राष्ट्र को अभी देश की सीमाओॆं के बाहर और अधिक विस्थापन की आशंका है.

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले भारतीयों का हाल

सबसे बुरे की आशंका

समी को पैसे देने वालों में 17 वर्षीय असद (वास्तविक नाम नहीं) भी शामिल है. जब उन्होंने ईरान को पार किया तो बीबीसी से बात की. तब वे तुर्की की सीमा पर स्थित शहर वान में थे.

भीड़ भरे कमरे में सो रहे अफ़ग़ान प्रवासी

इमेज स्रोत, BBC

इमेज कैप्शन, तस्करों के साथ यात्रा करने वाले अफ़ग़ान प्रवासियों को हफ़्तों तक तनाव भरी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है

असद कहते हैं, "आने वाले हफ़्तो में सड़कों पर लड़ाई दिखेगी."

"देश में कई सशस्त्र समूह सक्रिय हैं. कुछ सरकार का हिस्सा हैं जो तालिबान और इस्लामिक स्टेट जैसे अन्य आतंकी समूहों के जानी दुश्मन हैं."

असद कहते हैं, "हमें नहीं पता कि भविष्य में अफ़ग़ानिस्तान का क्या होगा. मैं तो बस एक शांतिपूर्ण जगह जाना चाहता हूं."

वे अंग्रेज़ी या कोई अन्य यूरोपीय भाषा नहीं बोल सकते. वे क़रीब तीन दर्जन अफ़ग़ान लोगों के साथ इस यात्रा पर निकल पड़े हैं- उनकी ही तरह इनमें से अधिकतर लोगों ने न तो स्कूली शिक्षा ही पूरी की है और न ही इनके पास कोई टेक्निकल योग्यता ही है.

वे कहते हैं, "अगर मैं पकड़ा गया, तो दोबारा कोशिश करूंगा. मैं अफ़ग़ानिस्तान में अब नहीं रहना चाहता हूं."

एक संपन्न परिवार से आने वाले असद कहते हैं कि उनका इरादा फ़्रांस में शरण लेने का है.

आशा और निराशा के बीच

उधर उत्तर अफ़ग़ानिस्तान में हबीब के लिए इंतज़ार कठिन होता जा रहा है.

हबीब अपने लैपटॉप पर काम करते हुए

इमेज स्रोत, BBC

इमेज कैप्शन, हबीब को उम्मीद है कि जल्द ही उन्हें जर्मनी आने का बुलावा ईमेल के ज़रिए आएगा

उनका शहर अब भी अफ़ग़ान सेना के नियंत्रण में है लेकिन तालिबान भी दूर नहीं है. रात को वे विस्फोट और गोलियों के चलने की आवाज़ सुनते हैं.

वे इस बात से चिंतित हैं कि अगर हवाई अड्डा ढह गया तो वे यहां से निकल नहीं पाएंगे.

इस बीच उनकी संपति के दाम तेज़ी से नीचे आते जा रहे हैं.

वे कहते हैं, कोई भी कार या घर नहीं ख़रीदना चाहता है. लोग अपनी सभी चीज़ें बेच कर बस यहां से निकलना चाहते हैं.

हबीब एक 'लाइफ सेविंग मैसेज' का इंतज़ार कर रहे हैं.

वे कहते हैं कि, "हम उम्मीदें और नाउम्मीदी के बीच जी रहे हैं. मैं उस ईमेल का इंतज़ार कर रहा हूं जिसमें लिखा हो कि आप जर्मनी आ सकते हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)