तालिबान रूस क्यों गया और इस्लामिक स्टेट को लेकर क्या वादा किया?

तालिबान की रूस में प्रेस कांफ्रेंस

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इमेज कैप्शन, तालिबान की रूस में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान लतीफ मंसूर (बाएं), शहाबुद्दीन दिलावर (केंद्र) और सुहैल शाहीन (दाएं).
    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तालिबान ने शुक्रवार को मॉस्को में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान का 85 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र अब उसके नियंत्रण में है. साथ ही, तालिबान ने रूस को यह आश्वासन दिया कि वो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल अपने पड़ोसियों पर हमला करने के लिए नहीं होने देगा.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार तालिबान के अधिकारी शहाबुद्दीन दिलावर ने एक अनुवादक के माध्यम से कहा, "हम सभी उपाय करेंगे ताकि 'इस्लामिक स्टेट' अफ़ग़ान क्षेत्र में काम न करे और हमारे क्षेत्र का इस्तेमाल हमारे पड़ोसियों के ख़िलाफ़ कभी नहीं किया जाए."

तालिबान प्रतिनिधिमंडल ने उसी समाचार सम्मेलन में कहा कि वे जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करेंगे और सभी अफ़ग़ान नागरिकों को इस्लामी क़ानून और अफ़ग़ान परंपराओं के ढाँचे में अच्छी शिक्षा का अधिकार होगा. दिलावर ने कहा, "हम चाहते हैं कि अफ़ग़ान समाज के सभी प्रतिनिधि, एक अफ़ग़ान राष्ट्र के निर्माण में भाग लें."

20 साल अफ़ग़ानिस्तान में बिताने के बाद अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी फौजें हट रही हैं और इसी कारण देश में नए इलाकों को तालिबान के कब्ज़े में लेने में अचानक तेज़ी देखी जा रही है.

व्लादिमीर पुतिन

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रूस को आश्वस्त करने की कोशिश

ये आशंका जताई जा रही है कि तालिबान की कार्रवाई के कारण अफ़ग़ानिस्तान से उसके पड़ोसी देशों में हज़ारों लोगों का पलायन हो सकता है जो मध्य एशिया के कई देशों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन सकता है.

चूँकि ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देश रूस के पड़ोसी हैं इसीलिए रूसी सरकार यह सुनिश्चित करना चाह रही है कि आने वाले समय में उसके पड़ोस में कोई मानवीय और सुरक्षा संकट न खड़ा हो जाए. रूस का दौरा कर रहे तालिबान के प्रतिनिधिमंडल ने यह आश्वासन देने की कोशिश की है कि अफ़ग़ानिस्तान में चल रहा घटनाक्रम मध्य एशिया क्षेत्र के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करेगा.

हाल ही में ताजिकिस्तान से खबरें आईं कि तकरीबन एक हज़ार अफ़ग़ान सैनिक तालिबान के हमलों से जान बचाकर सीमा पार कर ताजिकिस्तान भाग गए हैं.

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शुक्रवार को यह ख़बर आई कि तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच की बॉर्डर क्रॉसिंग पर कब्ज़ा कर लिया है जिसे इस्लामकाला के नाम से जाना जाता है. वीडियो फ़ुटेज में तालिबान सैनिकों को सीमा शुल्क कार्यालय की छत से अफ़ग़ानिस्तान सरकार का झंडा उतारते हुए दिखाया गया है.

इस्लामकाला क्रॉसिंग ईरान में प्रवेश के सबसे बड़े व्यापार मार्ग में से एक है जहां से अफ़ग़ान सरकार के लिए हर महीने अनुमानित दो करोड़ अमेरिकी डॉलर के राजस्व की कमाई होती है.

इन सब घटनाओं के कारण यह माना जा रहा है कि आने वाले कुछ महीनों में अफ़ग़ानिस्तान के हालात का सीधा असर मध्य एशिया क्षेत्र पर पड़ सकता है.

तालिबान

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तालिबान की रूस से बातचीत

आठ जुलाई को रूसी राष्ट्रपति के अफ़ग़ानिस्तान के लिए विशेष प्रतिनिधि ज़मीर काबुलोव ने तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत की. ये चर्चा अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति और अफ़ग़ानिस्तान के अलग-अलग गुटों के बीच वार्ता शुरू करने की संभावनाओं पर केंद्रित थी.

इस बातचीत में रूसी पक्ष ने अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों में बढ़ते तनाव पर अपनी चिंता व्यक्त कर तालिबान से इसे देश के बाहर नहीं फैलने देने का आग्रह किया था.

रूसी विदेश मंत्रालय के अनुसार तालिबान प्रतिनिधिमंडल ने रूसी पक्ष को आश्वस्त किया कि तालिबान मध्य एशियाई देशों की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करेगा और अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी देशों के राजनयिक और कांसुलर मिशनों की सुरक्षा की गारंटी भी देगा.

रूस ने यह भी कहा कि तालिबान के प्रतिनिधियों ने बातचीत के रास्ते अपने देश में स्थायी शांति हासिल करने में दिलचस्पी दिखाई है और कहा है कि वे अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले सभी जातीय समूहों के हितों के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों सहित मानवाधिकारों का पालन इस्लामी मानकों और अफ़ग़ान परंपराओं के अनुरूप करेंगे.

रूस ने साथ ही यह भी कहा कि तालिबान ने इस बात पर ख़ास ज़ोर दिया कि वो अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के ख़तरे को दूर करने और गृह युद्ध की समाप्ति के बाद देश में नशीले पदार्थों के उत्पादन को ख़त्म करने का वादा करता है.

रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा

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इमेज कैप्शन, रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा

क्या है रूस का रुख़?

रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने एक जुलाई को एक सवाल के जवाब में कहा था कि तालिबान के बयानों और रूस के विश्लेषणों के आधार पर रूस का मानना है कि तालिबान पड़ोसी देशों के साथ संबंध ख़राब करने की योजना नहीं बना रहा है.

लेकिन ज़खारोवा ने माना था कि कुछ मध्य एशियाई देशों की सीमा से लगे अफ़ग़ानिस्तान के प्रांतों में बढ़ते तनाव के कारण उन क्षेत्रों में शरणार्थियों की बढ़ती संख्या की वजह से मानवीय संकट पैदा हो सकता है जो एक चिंता का विषय बन सकता है.

ज़खारोवा ने कहा था कि रूस दोनों अफ़ग़ान पक्षों से जल्द से जल्द सैन्य कार्रवाइयों को रोकने और राष्ट्रीय सुलह के एजेंडे पर ठोस बातचीत शुरू करने का आह्वान कर रहा है ताकि बात केवल शब्दों तक सीमित न रहकर ठोस कार्रवाई तक पहुंचे.

वीडियो कैप्शन, तालिबान कौन हैं, उनका इतिहास क्या है और आख़िर वो क्या चाहते हैं?

एक अन्य सवाल के जवाब में ज़खारोवा ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी के कारण कई क्षेत्रों में, खासकर से उत्तरी और उत्तर-पूर्वी प्रांतों में कुछ मध्य एशियाई देशों की सीमाओं के निकट तालिबान की बढ़ती गतिविधियां देखी जा रही हैं.

एक महत्वपूर्ण बात रूसी प्रवक्ता ज़खारोवा ने कही वो ये थी कि चूंकि अफ़ग़ान राजधानी काबुल सहित प्रांतों में बड़े शहर और प्रशासनिक केंद्र अब भी अफ़गानिस्तान की सरकार के नियंत्रण में हैं जिससे ये लगता है कि तालिबान अभी देश पर कब्ज़े से दूर है.

ज़खारोवा ने साथ ही यह भी कहा था कि रूस सामान्य तौर पर अफ़ग़ानी सरकारी बलों और तालिबान के बीच सशस्त्र संघर्ष की "परंपरागत मौसमी वृद्धि" पर अधिक प्रतिक्रिया नहीं करना चाहता और मानता है कि "थोड़ी लड़ाई के बाद देश में सैन्य स्थिति कमोबेश स्थिर हो जाएगी और विरोधी पक्ष रचनात्मक और शांत बातचीत शुरू करने के लिए तैयार होंगे".

व्लादिमीर पुतिन

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रूस तालिबान से चाहता क्या है?

रूस ने कई वर्षों से तालिबान के साथ घनिष्ठ संबंध रखे हैं. अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद रूस की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस्लामी कट्टरवाद अफ़ग़ानिस्तान से चलकर उसकी चौखट तक न पहुँच जाए. इसी चिंता के मद्देनज़र रूस तालिबान को एक संभावित सुरक्षा कवच के रूप में देखता है और उससे अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखता है.

ऐसा माना जाता रहा है कि मॉस्को ने तालिबान के प्रमुख नेताओं को हथियारों और पैसे से समर्थन दिया है. समय-समय पर ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि रूसी एजेंट अमेरिका या गठबंधन सैनिकों की हत्या के लिए तालिबान को इनाम देते रहे हैं.

डॉ. गुलशन सचदेव जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज़ के अध्यक्ष और अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े मामलों के जानकार हैं.

उनके अनुसार रूस और चीन तो काफी समय से यह मानकर ही चल रहे हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ही सत्ता में आ रहा है. वे कहते हैं कि पिछले एक-डेढ़ साल में रूस ने जो बयान दिए हैं उससे यही लगता है.

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प्रोफेसर सचदेव कहते हैं, "रूस के अफ़ग़ानिस्तान में हित तो हैं और सबसे बड़ा हित ये है कि अगर अफ़ग़ानिस्तान में कोई भी अस्थिरता होती है तो उसका प्रभाव मध्य एशिया में नहीं आना चाहिए क्योंकि अगर कोई प्रभाव मध्य एशिया तक पड़ता है तो रूस तक भी पहुंचेगा. रूस का यही मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे घटनाक्रम का उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों पर कोई नकारात्मक असर न पड़े. रूस तालिबान से यही आश्वासन चाहता है."

वे कहते हैं कि रूस यही मानता रहा है कि अमेरिकी अफ़ग़ानिस्तान में नहीं रहने चाहिए. वे कहते हैं, "अमेरिकी बलों के अफ़ग़ानिस्तान में रहने को रूस ने एक दिक्कत के तौर पर देखा है. आज रूस सिर्फ़ यह चाहता है कि अमेरिकी सेना के अफ़ग़ानिस्तान से चले जाने के बाद अगर देश में अस्थिरता आती है तो उसका असर उस पर न पड़े. मुझे नहीं लगता का इस बात से आगे जाकर रूस अफ़ग़ानिस्तान में उलझना चाहेगा."

तालिबान

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तालिबान की रणनीति

प्रोफेसर सचदेव का मानना है कि पश्चिमी देशों से गलती यही हुई है की शायद उन्हें लगा था कि तालिबान के साथ कोई पक्का समझौता हो जाएगा जिसमें सत्ता का कुछ हिस्सा तालिबान के पास रहेगा और कुछ अफ़ग़ानी ताकतों के पास, "पर तालिबान ने पश्चिमी देशों को आश्वासन देकर विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तो हासिल कर ली लेकिन मसले का पूरा निपटारा नहीं किया और अपने सैन्य हमले जारी रखे."

वे कहते हैं कि तालिबान की रणनीति यही है कि जब पहले से ही आधे से ज़्यादा अफ़ग़ानिस्तान उनके कब्ज़े में है और हर दिन नए इलाके़ उनके कब्ज़े में आते जा रहे हैं और अफ़ग़ान सेनाएं उनसे कोई भी इलाके़ वापस नहीं जीत पा रही हैं तो वे छोटे इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लें और बड़े शहरों की सीमाओं तक अपना प्रभाव बढ़ा लें.

वे कहते हैं, "वे चाहें तो इन बड़े शहरों पर भी कब्ज़ा कर सकते हैं लेकिन अब वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि ऐसा करने से पश्चिमी देशों के लिए उन्हें स्वीकार करना मुश्किल हो जाएगा. हालात पहले जैसे नहीं हैं और आज तालिबान को स्वीकार्यता भी चाहिए और शायद आने वाले समय में सरकार चलाने के लिए पैसा भी चाहिए होगा."

प्रोफेसर सचदेव के अनुसार ये बात तो सबको समझ आ रही है कि अफ़ग़ानिस्तान में जो कुछ भी होने जा रहा है उसमें तालिबान की एक अहम भूमिका रहेगी और वे अफ़ग़ानिस्तान में एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैक्टर बने रहेंगे.

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