अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका-ब्रिटेन की सेना के 20 साल: आख़िर हासिल क्या हुआ?

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- Author, फ्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीस साल यहां रहने के बाद अमेरिकी और ब्रिटिश सेना अफ़ग़ानिस्तान छोड़ रहीं हैं. इसी महीने राष्ट्रपति बाइडन ने घोषणा की कि बचे हुए 2,500-3,500 अमेरिकी सैनिक 11 सितंबर तक वापस चले जाएंगे. ब्रिटेन भी अपने बचे हुए 750 सैनिकों को वापस बुला रहा है.
ये तारीख़ महत्वपूर्ण है. अल-कायदा द्वारा अमेरिका पर 9/11 हमले को अफ़ग़ानिस्तान की धरती से अंजाम दिया गया था. उसके बाद अमेरिका के नेतृत्व में योजनाबद्ध तरीके से वहां से तालिबान को सत्ता से हटाया गया और अस्थाई रूप से अल-कायदा को बाहर निकाल किया गया.
बीस साल तक मिलिट्री और सुरक्षा की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है - पैसों और ज़िदगियों से. अमेरिकी सेना के 2300 से ज़्य़ादा पुरुष और महिलाओं को जान गंवानी पड़ी और 20,000 से ज़्यादा घायल हुए. इसके अलावा ब्रिटेन के 450 सैनिकों समेत दूसरे देशों के सैंकड़ों सैनिक मारे गए या घायल हुए.
लेकिन सबसे ज़्यादा नुकसान अफ़ग़ानियों को हुआ है. उनके 60,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी इस दौरान मारे गए और इससे दोगुनी संख्या में नागरिक की जान गई.
अमेरिकी करदाताओं पर इससे क़रीब 1 ट्रिलियन डॉलर का बोझ बढ़ा.

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अच्छा या बुरा - कैसे हिसाब लगाया जाए?
तो ये सवाल पूछा जाना चहिए कि क्या यह सब वाजिब था? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे मापते हैं.
एक पल के लिए पीछे चलते हैं और सोचते हैं कि पश्चिमी ताक़तें आखिर वहां क्यों गईं और वो क्या हासिल करना चाहती थीं.
1996-2001 तक, पांच सालों में चरमपंथी समूह अल-कायदा अपने नेता ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अफ़ग़ानिस्तान में खुद को स्थापित करने में कामयाब हो गया. उन्होंने चरमपंथी प्रशिक्षण शिविर बनाए, जिसमें कुत्तों पर जहरीले गैस के प्रयोग करने जैसे काम किए गए.
इसके बाद दुनिया भर से क़रीब 20,000 जिहादियों की भर्ती की गई और उन्हें प्रशिक्षण दिया गया. इन्होंने ही 1998 में कीनिया और तंजानिया में अमेरिकी दूतावासों पर हमले किए जिसमें 224 लोग मारे गए. इनमें ज्यादातर अफ्रीकी नागरिक थे.
अल-क़ायदा अफ़गानिस्तान में आसानी से काम करने में सक्षम था क्योंकि उस समय तालिबानी सरकार उसे संरक्षण देती थी. सोवियत रेड आर्मी के वापस लौटने और बाद में विनाशकारी गृहयुद्ध के बाद के वर्षों में तालिबान ने 1996 में पूरे देश पर नियंत्रण कर लिया था.
अमेरिका ने अपने सऊदी सहयोगियों के माध्यम से, अल-कायदा को बाहर निकालने के लिए तालिबान को मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.

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तालिबान को सत्ता से हटाया गया
सितंबर 2001 में 9/11 के हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तालिबान को हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को सौंपने के लिए कहा, लेकिन फिर से तालिबान ने इनकार कर दिया.
फिर अगले महीने अफ़गानों का एक तालिबान-विरोधी गुट, जिसे उत्तरी गठबंधन कहते हैं, अमेरिकी और ब्रिटिश सेना की मदद से काबुल की ओर बढ़ा.
अमेरिका और ब्रिटिश सेना ने तालिबान को सत्ता से हटाकर अल-कायदा को पाकिस्तान की सीमा पर जाने के लिए मजबूर कर दिया.
इसी हफ़्ते वरिष्ठ सुरक्षा सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि उस समय से अफगानिस्तान की धरती से एक भी सफल अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी हमला नहीं हुआ है.
इसलिए अंतरराष्ट्रीय चरमपंथ की दृष्टि से पश्चिमी सैन्य उपस्थिति अपने उद्देश्य में सफल रही है.
दो दशक बाद भी शांति नहीं
लेकिन निश्चित रूप से इसे सिर्फ इस तरीके से मापना बहुत साधारण प्रक्रिया होगी और ये अफ़ग़ानिस्तान के सैनिक और आम लोग जो अपनी जान गंवा चुके है और अभी भी गंवा रहे हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ करना होगा.
बीस साल बाद भी देश में शांति नहीं है.
रिसर्च समूह एक्शन ऑन आर्म्ड फोर्सेस वॉयलेंस के मुताबिक 2020 में दुनिया के किसी भी देश की तुलना में विस्फोटक उपकरणों से मारे गए सबसे ज़्यादा लोग अफ़ग़ानिस्तान के थे.
अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट (आईएस) और अन्य चरमपंथी समूह ख़त्म नहीं हुए हैं, पश्चिमी ताकतों के जाने की ख़बरों से वो उत्साहित हैं और बेहतर तरीके से संगठित होने की कोशिश में हैं.
दोहा में शांति वार्ता
साल 2003 में मैं अमेरिकी सेना के 10 माउंटेन डिविजन के साथ पक्तिका प्रांत के एक दूरस्थ फायरबेस पर 'एंबेडेड' पत्रकार के तौर पर मौजूद था.
मुझे याद है कि वरिष्ठ बीबीसी सहयोगी, फिल गुडविन के मन में गठबंधन की सैन्य उपस्थिति, क्या विरासत छोड़कर जाएंगी इसे लेकर शंकाएं थीं.
उन्होंने कहा था, "20 साल के भीतर, दक्षिण के अधिकांश हिस्सों में तालिबान वापस आ जाएगा."
आज के समय में दोहा में शांति वार्ता और ज़मीन पर सेनाओं की वापसी के बाद वे पूरे देश के भविष्य में एक निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं.
इसके बावजूद ब्रिटेन के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, जनरल सर निक निक्टर, जो कि कई बार वहां के दौरे कर चुके हैं, बताते हैं कि "अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने एक सभ्य समाज का निर्माण किया है."
उनके मुताबिक "देश 2001 की तुलना में बेहतर स्थिति में है, और तालिबान अधिक खुले दिमाग वाले हो गए हैं."
कैसा होगा भविष्य?
एशिया पैसिफिक फाउंडेशन के डॉक्टर सज्जन गोहेल के विचार अलग हैं. वो कहते हैं, "सबसे बड़ी चिंता है कि अफगानिस्तान 1990 के दशक की स्थिति की ओर लौट सकता है जब ये चरमपंथ के पनपने वाली जगह थी."
डॉक्टर गोहेल कहते हैं, "पश्चिमी देशों से चरमपंथी प्रशिक्षण के लिए अफगानिस्तान आने वालों की एक नई लहर पैदा होगी. लेकिन पश्चिम के देश इससे निपटने में असमर्थ होंगे क्योंकि अफगानिस्तान को वो पहले ही छोड़ चुके होंगे."
हो सकता है कि इन्हें रोकना मुमकिन न हो. यह दो चीज़ो पर निर्भर करेगा: पहला, क्या एक विजयी तालिबान अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में अल-कायदा और आईएस की गतिविधियों की अनुमति देगा, और दूसरी बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उनसे निपटने में क्या तब कामयाब होगा, जब उस देश में उनकी कोई मौजूदगी नहीं होगी.
इसलिए अफगानिस्तान के भविष्य के बारे में बताना अभी आसान नहीं है.
9/11 के बाद
जिस देश को पश्चिम की सेनाएं इन गर्मियों में छोड़ रही हैं, वो सुरक्षित नहीं है. कुछ लोगों ने 9/11 के बाद ही अनुमान लगाया था कि सेना दो दशकों तक वहां रहेगी.
मैंने अमेरिका, ब्रिटिश और अमीराती सैनिकों के साथ कई बार रिपोर्टिंग के लिए अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की. इन यात्राओं की कई यादों में से एक बेहद ख़ास है.
यह उस समय अमेरिकी सेना ने पाकिस्तान से लगी सीमा से सिर्फ 3 मील (6 किमी) की दूरी पर गोलाबारी थी.
हम सितारों से भरे आसमान के नीचे एक मिट्टी के बने किले में गोला-बारूद के डिब्बों पर बैठे थे. इस बात से अनजान कि तालिबान के रॉकेट थोड़ी ही देर में वहां टकराएंगे.
न्यूयॉर्क के एक 19 वर्षीय सैनिक ने हमें बताया कि कैसे उसने अपने कई दोस्तों को खो दिया. उसने कहा, "अब अगर मेरा टाइम है, तो मेरा टाइम होगा."
तभी किसी ने एक गिटार निकाला और रेडियोहेड बैंड का गीत, 'क्रीप' गाने लगा. वो इन शब्दों के साथ ख़त्म हुआ -"मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? मैं यहाँ का नहीं हूँ."
उस वक़्त मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि "नहीं, हम शायद नहीं हैं."
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