अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिमी प्रांत में संघर्ष के बाद तालिबान को खदेड़ने का दावा

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अफ़ग़ानिस्तान में अधिकारियों ने कहा है कि उसके सैनिकों ने पश्चिमी प्रांत बदग़िस के शहर क़ला-ए-नाव में सरकारी इमारतों पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया है. इन इमारतों पर तालिबान ने हमला करके क़ब्ज़ा कर लिया था.
बुधवार को तालिबान ने इस शहर पर हमला किया था. इस हमले को किसी प्रांत पर पहला सीधा हमला माना जा रहा है.
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाना शुरू कर दिया है. अमेरिकी सैनिकों की वापसी शुरू होने के बाद पहली बार तालिबान ने किसी प्रांत पर सीधा हमला किया है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि तालिबान लड़ाकों को वापस भेजने के लिए हवाई हमले का सहारा लिया गया और विशेष बलों को तैनात किया गया.
माना जा रहा है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी शुरू होने के बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के कई इलाक़ों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान के स्पेशल फ़ोर्स के कमांडर सैयद निज़ामी ने बताया, "दुश्मनों का भारी नुक़सान हुआ है. अब हम आगे बढ़ रहे हैं और दुश्मनों को खदेड़ रहे हैं."
अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय ने कहा है कि शहर को तालिबान से मुक्त करा लिया गया है और अब ये शहर पूरी तरह अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है. ख़ामा प्रेस न्यूज़ एजेंसी ने ये रिपोर्ट दी है.
टोलो की एक न्यूज़ रिपोर्ट ने प्रांतीय गवर्नर के हवाले से बताया है कि तालिबान को शहर के कई हिस्सों से खदेड़ दिया गया है.
अमेरिका समेत विदेशी सैनिकों को 11 सितंबर तक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देना है. और अभी तक बड़ी संख्या में विदेशी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से जा चुके हैं. अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा अब अफ़ग़ान मिलिटरी के कंधों पर आ गई है.
तालिबान का हमला

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बुधवार को तालिबान लड़ाके बदग़िस प्रांत के क़ला ए नाव शहर में घुस आए.
स्थानीय सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि लड़ाकों ने शहर की जेल पर क़ब्ज़ा कर लिया और क़रीब 400 क़ैदियों को छुड़ा लिया. इनमें 100 से ज़्यादा तालिबान लड़ाके थे. जेल की सुरक्षा में लगे अफ़ग़ान सैनिकों ने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए.
उस समय प्रांतीय गवर्नर हिसामुद्दीन शम्स ने बताया था कि ख़ुफ़िया सेवा के मुख्यालय को आग लगा दी गई थी.
लेकिन उन्होंने इससे इनकार किया कि पूरा शहर तालिबान के नियंत्रण में आ गया है. उन्होंने बताया कि अफ़ग़ान सैनिक शहर की सुरक्षा कर रहे हैं. प्रांतीय गवर्नर ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि तालिबान ने सुबह में शहर में तीन तरफ़ से हमला किया.
तालिबान ने हाल के सप्ताह में देश के कई ज़िलों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है. माना जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के एक तिहाई हिस्से पर उनका नियंत्रण हो गया है और हर दिन वे किसी नए इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं. अभी तक प्रांतीय राजधानियों पर सरकारी सैनिकों का ही नियंत्रण है.
अफ़ग़ान सैनिकों की रणनीति

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अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते के तहत अमेरिका और उसके नेटो सहयोगियों ने अपने सैनिकों को हटाने की बात की थी. लेकिन तालिबान ने भी ये वादा किया था कि वे अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में चरमपंथी गुटों को काम नहीं करने देंगे.
लेकिन तालिबान इस पर सहमत नहीं हुआ था कि वे अफ़ग़ान सैनिकों के साथ संघर्ष नहीं करेगा. तालिबान से दो-दो हाथ करने में अफ़ग़ान सैनिकों की क्षमता पहले से ही सवालों के घेरे में है.
काबुल में सैनिक अधिकारियों ने विद्रोहियों के आगे बढ़ने की स्थिति में रणनीतिक दृष्टि से पीछे हटने की बात की है, लेकिन मौक़े पर मौजूद कमांडरों ने बीबीसी को गोला-बारूद की कमी और सहायता भेजने में देरी के बारे में बताया है.
अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों को लग रहा है कि अगर लड़ाई तेज़ हुई, तो उनके यहाँ बड़ी संख्या में शरणार्थी आ सकते हैं.
ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने कहा है कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में नाकाम हो गया है और यहाँ उसकी मौजूदगी ने अफ़ग़ानिस्तान को बहुत नुक़सान पहुँचाया है. जवाद ज़रीफ़ ने तेहरान में अफ़ग़ान प्रतिनिधिमंडल और तालिबान के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की.
अमेरिकी सैनिकों की वापसी

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अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अफ़ग़ान सुरक्षाबल विद्रोहियों को दूर रखने में पूरी तरह सक्षम हैं, लेकिन हाल ही में क़रीब एक हज़ार अफ़ग़ान सैनिक भाग कर ताजिकिस्तान चले गए थे. और ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि कई सैनिक पाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान में शरण मांग रहे हैं.
इस सप्ताह के शुरू में तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने बीबीसी को बताया था कि अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में हिंसा में आई तेज़ी के पीछे उनका संगठन नहीं है. उन्होंने दावा किया कि कई ज़िले बातचीत के बाद तालिबान के नियंत्रण में आए हैं, क्योंकि अफ़ग़ान सैनिकों ने लड़ने से मना कर दिया.
अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के लिए ये समय काफ़ी चिंताजनक है. तालिबान पर कई तरह के मानवाधिकार हनन के आरोप हैं और वे सांस्कृतिक रूप से भी कड़े प्रतिबंधों के हिमायती रहे हैं. तालिबान ने इस मामले में सज़ा दिए जाने का समर्थन किया है और सार्वजनिक रूप से मौत की सज़ा तक दी है. इसके अलावा तालिबान टेलीविज़न, संगीत और सिनेमा के विरोधी रहे हैं. यहाँ तक कि वे 10 साल से ज़्यादा की लड़कियों को स्कूल भेजे जाने के ख़िलाफ़ हैं.
वर्ष 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाली सेना ने तालिबान को सत्ता से हटा दिया था. अमेरिका में 11 सितंबर को हुए हमले के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर सैनिक कार्रवाई हुई थी. तालिबान की सरकार पर ओसामा बिन लादेन और अल क़ायदा के अन्य लोगों को पनाह देने का आरोप था.
तालिबान ने वर्ष 2018 में अमेरिका से सीधी बातचीत शुरू की थी. अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन भी अमेरिकी सैनिकों की वापसी को सही ठहराते हैं. अमेरिका का कहना है कि उसकी सेना ने ये सुनिश्चित कर दिया है कि अफ़ग़ानिस्तान फिर से विदेशी जिहादियों का अड्डा न बने और पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ साज़िश न करे. लेकिन कई पर्यवेक्षक इस दावे पर सवाल उठाते हैं.
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