तालिबान पर भारत में रह रहे अफ़ग़ान क्या सोचते हैं?

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

मोहम्मद साबिर शाहरुख़ी वैसे तो उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के समांगन के रहने वाले हैं, लेकिन उनका जन्म दक्षिण प्रांत कंधार में हुआ, जहाँ उनके पिता रोज़गार की तलाश में आकर बस गए थे. उनका बचपन बेहद संघर्ष में गुज़रा, क्योंकि जब तक उन्होंने होश संभाला, तब तक अफ़ग़ानिस्तान के हालात बेहद ख़राब हो चुके थे.

कंधार के आसपास का इलाक़ा पूरी तरह से तालिबान के नियंत्रण में आ चुका था. बेहतर ज़िंदगी की आस में मोहम्मद साबिर शाहरुख़ी ने एक निजी संस्था में नौकरी करनी शुरू कर दी. वो कहते हैं कि उनके परिवार और कंधार के ज़्यादातर लोग डर के साए में ही रहते रहे.

फिर जब लगा कि रहना मुश्किल हो गया है, तो वो अपने परिवार को लेकर भारत आ गए. ये बात 10 साल पुरानी है. उनके पिता भी कंधार से वापस मजार-ए-शरीफ़ चले गए थे. उन्हें वहाँ रह रहे अपने रिश्तेदारों की सुरक्षा को लेकर चिंता सता रही है, क्योंकि ख़बरों में उन्होंने अपने इलाक़े में तालिबान के क़ब्ज़े की बात सुनी है.

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इमेज कैप्शन, दिल्ली के मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन में रहने वाले अफ़ग़ाानी

दिल्ली में रहने वाले अफ़ग़ाानी चिंतित

शाहरुख़ी दिल्ली के मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन में रहते हैं. इस इलाक़े में अफ़ग़ानिस्तान से भाग कर आए लोगों की बड़ी तादाद रहती है. लाजपत नगर के बाद ये दिल्ली का दूसरा ऐसा इलाक़ा है, जहाँ इतनी बड़ी तादाद में अफ़ग़ानिस्तान से आए परिवारों ने शरण ले रखी है.

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी फौजों की वापसी और देश में तेज़ी से बिगड़ते हालात को लेकर वहाँ से भारत आए इन शरणार्थियों की चिंता बढ़ रही है. जैसे-जैसे अमेरिकी फौजों ने वापसी शुरू की, वैसे-वैसे तालिबान ने एक-एक कर कई ज़िलों को पूरी तरह अपने क़ब्ज़े में ले लिया है.

वीडियो कैप्शन, Cover Story: अफ़ग़ानिस्तान में फिर पांव पसारता तालिबान

शाहरुख़ी कहते हैं कि अब सरकार की मौजूदगी कहीं-कहीं पर, सिर्फ़ ज़िला मुख्यालयों की कुछ एक इमारतों में ही नज़र आती है, जबकि बाक़ी का इलाक़ा उनके क़ब्ज़े में आता जा रहा है. उनके इलाके से बड़ी तादाद में सरकारी फ़ौज में काम रहे सैनिकों ने भाग कर ताजिकिस्तान में शरण ले ली है.

शुजाउद्दीन इस इलाक़े में अफ़ग़ानी रोटियों की एक छोटी सी दुकान चलाते हैं. वो चार साल पहले अपने परिवार के साथ भारत आए थे. अब इस रोटी की दुकान से उनकी और उनके परिवार की रोज़ी-रोटी चलती है. वो बताते हैं कि नब्बे के दशक में तालिबान ने किस तरह सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया और आम लोगों पर बहुत ज़ुल्म ढाए थे.

लेकिन अक्तूबर 2001 में अमेरिका की अगुवाई वाली विदेशी फौजों ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के ठिकानों पर हमला किया और उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया.

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'तालिबान ने सब तहस-नहस कर दिया'

वो कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान अब खंडहरों के लिए ही जाना जाता है. उनका कहना है कि उनकी धरोहर को पहले रूस के साथ हो रही जंग में नुकसान पहुँचा. फिर तालिबान ने "सब कुछ तहस नहस" कर दिया.

उनका कहना था, "पिछले 20 सालों में चीज़ें सुधरने लगीं थीं. लेकिन अब अफ़ग़ानिस्तान वहीँ पहुँच गया है, जहाँ वो 2001 से पहले हुआ करता था."

ख़ुशबख़्त भी इस इलाक़े में सब्ज़ी की रेहड़ी लगाते हैं, क्योंकि इसके अलावा रोज़गार का कोई दूसरा ज़रिया उनके पास नहीं है. पास के ही रहने वाले समद कहते हैं कि भारत ने उन्हें 'शरणार्थियों' के रूप में मान्यता नहीं दी है, जबकि पिछले दो दशकों से भी ज़्यादा से अफ़ग़ानिस्तान के लोग वहाँ की हिंसा से बचने के लिए भारत आते रहे हैं.

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान में पांव पसारता तालिबान

उनका कहना है, "वैसे तो अफ़ग़ानिस्तान आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा है, जिन्हें कभी कामयाबी नहीं मिली, लेकिन तालिबान ने जो किया है, वो अफ़ग़ानिस्तान का कोई दुश्मन भी करने की नहीं सोच सकता. प्राकृतिक सुंदरता वाला देश अब एक खंडहरों के बदनुमा धब्बे जैसा है."

इस इलाक़े में बक्तश हसन जैसे कुछ बुज़ुर्ग अफ़ग़ान भी हैं. हसन मूल रूप से काबुल के रहने वाले हैं. वो बताते हैं कि उन्हें हिंदी बोलनी पहले से आती थी, क्योंकि काबुल और अफ़ग़ानिस्तान में हिंदी सिनेमा और गानों का बड़ा क्रेज़ है.

उन्होंने उस दौर को भी याद किया, जब फ़िल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन अफ़ग़ानिस्तान शूटिंग के लिए आए थे, तो उनकी एक झलक के लिए लोग पागल हो गए थे. हसन भी उनमे से एक थे और तब नौजवान थे. अब उनकी उम्र ढलान पर आ चुकी है.

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'भागने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं'

हसन कहते हैं कि अमेरिकी फौजों की अब रवानगी हो रही है, लेकिन पिछले चार सालों से ही अफ़ग़ानिस्तान के हालात फिर से ख़राब होने शुरू हो गए थे. वो कहते हैं कि जिन इलाक़ों में तालिबान ने फिर से पाँव पसारने शुरू किए, वहाँ से भागने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रहा.

बक्तश हसन के पास बहुत कुछ है कहने के लिए. उनकी आँखों ने काफ़ी कुछ देखा है. वो कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान को उसके लोक संगीत के लिए जाना जाता रहा है. लगभग हर शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में दिलरुबा और रबाब की गूँज सुनाई देती थी.

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शहरी इलाक़ों में तो हर गली में किसी न किसी घर से हिंदी गानों की आवाज़ आती थी. तालिबान ने सब कुछ ख़त्म करवा दिया. अफ़ग़ानिस्तान बदरंग हो गया है."

खिड़की एक्सटेंशन की संकीर्ण गलियों में कहीं-कहीं अफ़ग़ान शरणार्थी नज़र आ जाएँगे. कोई रेहड़ी पर सामान बेचते हुए या कोई छोटी सी दुकान चलाते हुए. शुजाउद्दीन कहते हैं कि चूँकि उन लोगों को शरणार्थी का दर्जा भी नहीं मिला है, इसलिए किसी तरह की कोई राहत भी नहीं मिल पाती है.

वो कहते हैं कि एक चाय की दुकान भी चलानी हो, तो किसी और के नाम पर लेनी पड़ती है और हर महीने इसके एवज़ में उसे पैसे भी देने पड़ते हैं. इसके बावजूद वो खुश हैं और कहते हैं, "भारत के लोगों ने हमें दुत्कारा नहीं. यहाँ लोगों ने हमें अपनाया. भारत ने तालिबान से तबाह हुए अफ़ग़ानिस्तान को फिर से बनाया. पार्लियामेंट बनाई. सडकें बनाई. भारत के लोग हमारे दोस्त हैं जिनपर हम भरोसा करते हैं. पाकिस्तान के साथ हम ये उम्मीद नहीं कर सकते."

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ग़ैर सरकारी संगठन, सेंटर फ़ॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट (सीएचडी) के सुनील कुमार अलेडिया ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि किसी तरह की आमदनी का कोई साधन नहीं होने की वजह से इन शरणार्थियों को कोरोना की वजह से लगाए गए लॉकडाउन में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा. वो कहते हैं कि इस दौरान उनकी संस्था ने इन परिवारों को रहत सामग्री पहुँचाने का काम किया.

जानकार कहते हैं कि भारत ने 1951 में हुए 'यूएन कन्वेंशन ऑन रिफ्यूजीज़' पर हस्ताक्षर नहीं किया था. भारत ने ये मामले शरणार्थियों के मामलों को देखने वाले संयुक्त राष्ट्र के उच्च आयुक्त यानी 'यूएनएचसीआर' पर सबकुछ छोड़ दिया है, जहाँ अफ़ग़ान शरणार्थियों के आवेदन वर्षों से लंबित हैं.

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वर्ष 2018 तक के मौजूद आँकड़ों के हिसाब से अफ़ग़ानिस्तान से भारत आने वाले शरणार्थियों में ज़्यादा तादाद वहाँ के प्रताड़ित हिंदुओं और सिखों की ही है.

अमेरिका स्थित पेंनिसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर एडवांस्ड स्टडी ऑफ़ इंडिया की चयनिका सक्सेना ने अपने शोध के बाद जो रिपोर्ट पेश की, उसमे कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान से भारत आने वाले शरणार्थियों में मुसलमान और ईसाइयों की तादाद 30 प्रतिशत है.

दिल्ली के लाजपत नगर और खिड़की एक्सटेंशन में रह रहे अफ़ग़ान शरणार्थियों को भले ही वहाँ से जान हथेली पर रख कर भाग कर आने के बाद राहत ज़रूर मिली, लेकिन उन्हें अपने वतन की याद भी सताती रहती है. मोहम्मद दाऊद के अनुसार भारत आकर ही वो और उनका परिवार ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

उनके अनुसार, "अगर हम भाग कर नहीं आते, तो शायद ज़िंदा भी नहीं रहते. तालिबान के लोग हमें मार देते. वो इस्लामिक अमीरात बनाना चाहते हैं. हम नए ज़माने के साथ चलना चाहते हैं."

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