रूस की खुफिया एजेंसी के यूनिट नंबर 29155 की कहानी

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- Author, गॉर्डन कोरेरा
- पदनाम, सुरक्षा संवाददाता, बीबीसी
वैसे तो ये घटना साल 2014 के अक्टूबर महीने की है लेकिन इस राज़ पर पर्दा हाल में जाकर उठा है.
चेक रिपब्लिक में हथियारों के एक डिपो में क़रीब सात साल पहले धमाका हुआ था, जिसमें दो लोग मारे गए थे.
राज़ खुला, ज़ख्म हरे हुए और चेक रिपब्लिक और रूस के बीच एक बड़े कूटनीतिक संकट की स्थिति पैदा हो गई.
लेकिन इसके साथ ही ये सवाल भी खड़े हुए कि रूस के मिलिट्री इंटेलिजेंस की इकाई 'जीआरयू' की क़ाबिलियत क्या थी, क्या उसे रोका जा सकता था और उसने अब तक किन-किन कारनामों को अंजाम दिया है.
यूरोपीय देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों का मानना है कि 'जीआरयू यूनिट 29155' का कहीं तबाही मचाने के लिए, कुछ बर्बाद करने के लिए या फिर किसी का क़त्ल करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

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रूसी डबल एजेंट की हत्या की कोशिश
ब्रितानी खुफिया एजेंसी के लिए काम करने वाले रूसी डबल एजेंट सर्गेई स्क्रिपाल और उनकी बेटी यूलिया को साल 2018 में इंग्लैंड में ज़हर दिए जाने की घटना के बाद से ही यूरोपीय देशों की सुरक्षा एजेंसियां 'जीआरयू यूनिट 29155' की गतिविधियों पर नज़र रखी हुई हैं.
इसी रूसी यूनिट के तकरीबन 20 एजेंट पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और विदेशों में खुफिया अभियानों को अंजाम देते हैं.
इस यूनिट का नाम चेक रिपब्लिक के हथियार डिपो में हुए धमाके से लेकर साल 2015 में बुल्गारिया के एक आर्म्स डीलर को ज़हर दिए जाने की घटना से जोड़ा गया है.
इतना ही नहीं दक्षिण पूर्वी यूरोप के देश मॉन्टेनीग्रो में साल 2016 में हुई तख़्तापलट की एक कोशिश के तार भी इस रूसी ख़ुफ़िया यूनिट से जुड़े पाए गए थे.
कहा जाता है कि मॉन्टेनीग्रो नेटो के क़रीब जा रहा था और जीआरयू का मक़सद उसे ऐसा करने से रोकना था.
जीआरयू के उन कथित एजेंटों पर मॉन्टेनीग्रो की एक अदालत में उनकी ग़ैरमौजूदगी में मुक़दमा चलाया गया और उन्हें कसूरवार ठहराया गया.
टर्निंग पॉइंट
फ्रांस की सुरक्षा सेवाओं ने इस बात की पुष्टि की है कि 'जीआरयू' ने आल्प्स पर्वत के एक इलाके में अपना अड्डा बना रखा है, जहां से उसके एजेंट दूसरे देशों में अपने मिशन को अंज़ाम देते हैं.
'जीआरयू' के कारनामों पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती है. कहा तो ये भी जाता है कि 'जीआरयू' ने अफ़ग़ानानिस्तान में अमरीकी सुरक्षा बलों पर हमले के एवज में तालिबान को इनाम देने की कथित तौर पर पेशकश की थी.
हालांकि बाइडन प्रशासन ने हाल ही में इस पर कहा है कि उनके पास इन आरोपों को लेकर बहुत कम सबूत हैं.
'जीआरयू' से जुड़ी ज़्यादातर घटनाएं जो अब तक सामने आई हैं, वे साल 2014 के बाद की है.
ऐसा लगता है कि उसी साल ख़ासकर यू्क्रेन संकट के बाद रूस को ये एहसास हुआ कि पश्चिमी देशों से उसकी रंजिश अब अदावत में बदल रही है. शायद यही वो टर्निंग पॉइंट था जहां से रूस ने खुल कर सामने आने के बजाय पर्दे के पीछे से लड़ाई का रास्ता चुना.

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प्रोपेगैंडा वॉर से हैकिंग अटैक तक
इसके दायरे में इंटरनेट पर चल रहे प्रोपेगैंडा वॉर से लेकर पश्चिमी देशों को निशाना बनाकर किए गए हैकिंग हमले भी आते हैं.
साल 2016 में हुए अमेरिकी चुनाव में रूस की कथित दखलंदाज़ी इसी कड़ी का हिस्सा है. और इन सब के पीछे 'जीआरयू' के कुछ यूनिट्स का हाथ बताया जाता है. यहां तक कि यूनिट नंबर 29155 को कुछ पारंपरिक कोवर्ट ऑपरेशंस (खुफिया अभियानों) के लिए भी तैनात किया गया था.
कुछ लोग इस बात पर हैरत जताते हैं कि सर्गेई स्क्रिपाल को ज़हर देने की घटना और चेक रिपब्लिक में जो कुछ हुआ था, उससे 'जीआरयू' से हुई चूक का पता चलता है.
जीआरयू के एजेंटों ने इन दोनों मिशनों के लिए एक ही ख़ुफ़िया पहचान का इस्तेमाल किया था. इंग्लैंड और चेक रिपब्लिक दोनों ही जगहों पर उन्होंने अपने एक ही नाम पेट्रोव और बोशिरोव बताए थे.
रिसर्च ग्रुप बेलिंगकैट का कहना है कि जीआरयू के एजेंटों ने कभी-कभी तो ऐसे पासपोर्ट दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया है जिनके सीरियल नंबर एक दूसरे के बाद आते हैं और इससे उनके कनेक्शन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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जीआरयू के एजेंट
लेकिन चेक रिपब्लिक की घटना का सच सामने आने में सात साल लग गए क्योंकि 'जीआरयू' के कुछ एजेंटों से ग़लती हो गई थी. और इसका मतलब ये भी नहीं है कि वे लोग ख़तरनाक नहीं हैं.
चेक रिपब्लिक में हुए उस धमाके में दो लोग मारे गए थे और इंग्लैंड में रूस के डबल एजेंट को नर्व गैस देकर ख़त्म करने की कोशिश की गई.
मुमकिन है कि इस यूनिट के बहुत से कारनामे अब तक सामने न आ पाए हों. बहुत कुछ ऐसा है जैसे किसी की मौत या फिर कोई धमाका, जिन्हें नए सबूतों की रोशनी में फिर से देखे जाने की ज़रूरत हो. जीआरयू के एजेंटों की यात्रा करने के तौर-तरीकों का विश्लेषण करने पर कई घटनाओं में उनके शामिल होने की बात सामने आ सकती है.
जो बात सबसे अहम है, वो ये है कि सर्गेई स्क्रिपाल की घटना के बाद कई देश सूचनाएं शेयर कर रहे हैं और वे रूस का सामना करने के लिए साथ काम करने को तैयार हैं. इस तरह से साथ आने पर उन्हें सुरक्षा का एहसास होता है और उनका मानना है कि रूस अपने आक्रामक तौर तरीकों से उन्हें निशाना बना रहा है.
रूस का इनकार
ऐसे देशों की लिस्ट में केवल ब्रिटेन और अमेरिका ही नहीं हैं. बल्कि पूर्वी यूरोप के देश पोलैंड, चेक रिपब्लिक और बुल्गारिया भी अपने देशों में रूसी जासूसों के ख़िलाफ़ क़दम उठा रहे हैं.
लेकिन क्या हवा का रुख बदल जाने से रूस और उसका जीआरयू अपने कदम रोक लेंगे. रूस जिस तरह से बाक़ी दुनिया को देखता है, उस लिहाज से देखें तो ये मुश्किल लगता है.
रूस ने खुद पर लगे जासूसी के तमाम आरोपों से इनकार किया है. उसका कहना है कि ये आरोप बकवास और बेबुनियाद हैं और वो इसे शर्मिंदगी का सबब नहीं मानता है.
लेकिन उम्मीद इस बात की है कि जिस तरह से जीआरयू के अभियानों के बारे में चीज़ें सामने आ रही हैं, उससे भविष्य में उस यूनिट का अपनी गतिविधियों को अंजाम देना मुश्किल हो जाएगा.
उदाहरण के लिए रूस के जिन दो लोगों ने सर्गेई स्क्रिपाल को ज़हर देने या फिर चेक रिपब्लिक में धमाके को अंज़ाम देने का इलजाम है, वे अब रूस के बाहर की दुनिया नहीं देख पाएंगे क्योंकि उनकी पहचान सार्वजनिक कर दी गई है.
मुमकिन है कि उन दोनों की जगह लेने के लिए और लोग प्रशिक्षित किए जाएं और इस बात पर कम ही लोगों को यकीन है कि रूस अपने जासूसों की लगाम खींच लेगा.
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