क्या अमेरिका और चीन के बीच हालात शीत युद्ध से भी ख़तरनाक हैं?

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- Author, जोनाथन मार्कस
- पदनाम, डिप्लोमेटिक एनालिस्ट
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों की चीन के राष्ट्रपति के वरिष्ठ अधिकारियों से आमने सामने होने वाली मुलाकात को दुनिया के दो सुपर पॉवर के बीच उतार चढ़ाव भरे रिश्तों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी बिलनकेन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवान गुरुवार को लास्का में चीन के विदेश मंत्री वैंग यी और वरिष्ठ राजनयिक यैंग जिइची से मुलाकात कर रहे हैं.
हालांकि इस मुलाकात से पहले बाइडन की टीम किसी भ्रम में नहीं है. मुलाकात से पहले बिलनकेन ने यह रेखांकित किया है कि यह कोई रणनीतिक वार्ता नहीं है और इस वक़्त फॉलोअप करने वाली चर्चाओं का भी इरादा नहीं है.
हालांकि उन्होंने कहा है कि इस दिशा में चर्चाओं का दौर तभी शुरू होगा जब चीन के साथ अमेरिकी चिंता वाले मुद्दों पर ठोस प्रगति और ठोस नतीजों वाले प्रस्ताव आएंगे.
पिछले कुछ सालों से अमेरिका और चीन के आपसी रिश्ते बेहद ख़राब स्थिति में हैं और इसमें सुधार की बहुत गुंजाइश नहीं दिख रही है. अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर पद पर अपनी नियुक्ति से पहले सुलिवान ने फॉरेन अफ़ेयर्स पत्रिका के लिए बाइडन के शीर्ष एशियाई सलाहकार कुर्ट कैंपबेल के साथ मिलकर एक आलेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि चीन के साथ बातचीत का दौर अब अचानक समाप्त होने तक पहुंच गया है.
वाशिंगटन और बीजिंग यानी अमेरिका और चीन के आपसी रिश्तों की पहचान कैसे की जा सकती है, यह एक हद तक पूछे गए सवालों और उनके जवाबों पर निर्भर करता है. यह नीतिगत विकल्पों के मानक तय करता है, कुछ रास्तों से दूर करता है और कुछ रास्ते बंद भी कर देता है. विकल्पों पर बात करने, संदर्भों को समझने और स्थिति को स्पष्ट करने के लिए कहा जाता है कि कई बार ऐतिहासिक संदर्भ मददगार होते हैं लेकिन दूसरे लोगों का यह भी तर्क है कि इससे कोई मदद नहीं मिलती. कई बार इतिहास खुद को नहीं दोहराता है और मतभेद आपसी समानता पर भारी पड़ सकते हैं.
अगर शीत युद्ध दो ताक़तवर देशों, दो एकदूसरे से अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं के बीच संघर्ष को दर्शाता है तो अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता में अमेरिका-सोवियत संघ के टकराव की गूंज सुनी जा सकती है.
चीन संभावित प्रतिद्वंद्वी है
अमेरिका और चीन के बीच मौजूदा तनाव को आम तौर पर नया शीत युद्ध कहा जाने लगा है. बीसवीं शताब्दी के आधे हिस्से पर शीत युद्ध यानी अमेरिका और सोवियत संघ के बीच टकराव की छाया देखने को मिली थी.
बाइडन प्रशासन ने इसी महीने अंतरिम विदेशी नीति संबंधी रणनीति संबंधी नोट्स किए हैं, जिसके मुताबिक 'कहीं ज़्यादा मुखर' चीन ही आर्थिक, राजनयिक, सैन्य और तकनीकी दृष्टिकोण से संभावित प्रतिद्वंद्वी है जो स्थिर और खुली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की निरंतर चुनौती से पार पाने में सक्षम है.

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बाइडन प्रशासन का मूलमंत्र ज़रूरत पड़ने पर चीन को चुनौती देना और जहां संभव हो वहां सहयोग करना है. वहीं दूसरी ओर चीन भी इसी तरह का दृष्टिकोण अपना रहा है, एक तरफ वह रचनात्मक संबंधों के लिए तैयार है वहीं दूसरी ओर वह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए क़दम उठाना जारी रखे हुए है- चाहे वह हॉन्गकॉन्ग में लोकतांत्रिक प्रदर्शनों का दमन हो या फिर चीन में मुस्लिम वीगर समुदाय का उत्पीड़न हो. (बिलनकेन वीगर समुदाय के साथ चीन के बर्ताव को नरसंहार कह चुके हैं.)
बीजिंग प्रशासन अमेरिकी व्यवस्था की खामियों का फ़ायदा उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ता. चाहे वह कोविड-19 महामारी के संक्रमण को रोकने में डोनाल्ड ट्रंप के ग़लत तरीके रहे हों या फिर कैपिटल हिल पर हुई हिंसा, इन सबका इस्तेमाल चीन ने खुद को सामाजिक और आर्थिक मॉडल देश के तौर पर प्रदर्शित करने के लिए किया.
हालांकि सतही तौर पर अमेरिका और चीन के संबंधों को शीत युद्ध की संज्ञा दी जा सकती है लेकिन वास्तव में क्या ऐसा ही है? शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ और उसके सहयोगी देश, दुनिया भर की अर्थव्यवस्था से कटे हुए थे और उन पर निर्यात संबंधी पाबंदी थी. वहीं दूसरी ओर चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बना हुआ है और उसकी अपनी अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है.
अमेरिकी और सोवियत संघ के शीत युद्ध का तकनीकी पहलू बेहद अहम था- पहले तो हथियारों को लेकर होड़ थी और बाद में अंतरिक्ष में पैठ जमाने की रेस. वहीं अमेरिका और चीन के नए शीत युद्ध में भी तकनीक का पहलू अहम बना हुआ है, इस बार होड़ आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस और 5 जी की तकनीक को लेकर है.

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शीत युद्धा का मॉडल ख़तरनाक
इस बार वैश्विक परिदृश्य भी बदला हुआ है. शीतयुद्ध के समय में दुनिया दो स्थिर गुटों में तब्दील हो गई थी, हालांकि कुछ अहम देशों का निर्गुट समूह भी था (पश्चिमी दुनिया में इन्हें सोवियत समर्थक माना जाता था). मौजूदा समय में दुनिया कहीं ज़्यादा बहुध्रुवीय है लेकिन उदार दुनिया के संस्थान पर इतना ख़तरा पहले कभी नहीं था. इसके चलते ही चीन को दुनिया भर में अपना दृष्टिकोण थोपने का लाभ मिलता है.
लेकिन मूल भाव में शीत युद्ध का मॉडल बेहद ख़तरनाक है. शीत युद्ध एक ऐस राजनीतिक संघर्ष था जिसमें दोनों पक्षों ने एक दूसरे की वैधता को नकार दिया था. हालांकि उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वास्तविकता में संघर्ष नहीं हुआ था लेकिन अप्रत्यक्ष संघर्ष में काफ़ी संख्या में लोगों की जानें गई थीं.
हालांकि अंतिम विश्लेषण में सोवियत संघ की व्यवस्था को हार का सामना करना पड़ा और वह व्यवस्था अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है. इसी वजह से कईयों की आशंका है कि अमेरिका और चीन का संघर्ष के दौरान कट्टर वैचारिकता को लेकर दोनों पक्षों में ग़लतफ़हमी पैदा हो सकती है और चीन संभावित हार के ख़तरे को टालने के लिए किसी हद तक जा सकता है.
हालांकि चीन सोवियत संघ की तुलना में कहीं ज़्यादा शक्तिशाली है. सोवियत संघ अपने शीर्ष दौर में भी अमेरिकी जीडीपी के 40% हिस्से तक पहुंच पाया था. वहीं चीन कुछ ही दशकों में अमेरिका जितनी जीडीपी विकसित कर चुका है. 19वीं शताब्दी में अमेरिका ने जिन प्रतिद्वंद्वियों का सामना किया है उनमें चीन सबसे शक्तिशाली है. आने वाले कई दशकों में दोनों की एक दूसरे के प्रति यही स्थिति बनी रहेगी.
शीत युद्ध से ज़्यादा ख़तरनाक स्थिति
वैसे यह हमारे दौर की आवश्यक प्रतिद्वंद्विता है. पुराने मुहावरों और झूठे ऐतिहासिक संदर्भों को अलग करके रखा जाना चाहिए. वास्तविकता में यह शीत युद्ध-2 की स्थिति नहीं है, उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक स्थिति है. कई क्षेत्रों में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है. और अभी तक चीन ग्लोबल सुपरपावर नहीं बन पाया है, यह काफ़ी हद तक अमेरिका के लिए उन क्षेत्रों में सैन्य प्रतिद्वंद्वी है जो उसकी अपनी सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन के लिए चीन एक जटिल समस्या है. उनकी अपनी विदेशी नीति के लक्ष्य चीन के साथ संघर्ष की स्थिति की ओर इशारा करते हैं. अमेरिका किस तरह से चीन पर बेहतर कारोबारी नीति लागू करने, लोकतांत्रिक मूल्य और मानवाधिकार को अक्षुण्ण रखने का दबाव डालते हुए एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और स्थायित्व के लिए सहयोग की उम्मीद कर सकता है? यह एक तरह से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रबंधन के तौर पर बदलने वाला है.
दोनों देशों के बीच आपनी होड़ को ना तो कमतर करके देखा जाना चाहिए और ना ही इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश किए जाने की ज़रूरत है. यह धारणा भी बनाई जा रही है- चीन उभर रहा है और अमेरिका पिछड़ रहा है- लेकिन यह कमज़ोर मुहावरा है जिसमें सच्चाई का तत्व शामिल है लेकिन यही पूरी तस्वीर नहीं है.
क्या चीन ट्रंप के दौर की अफ़रातफ़री से उबरते हुए अपने लोकतंत्र को फिर से मज़बूत कर पाएगा? क्या वह अपने सहयोगियों को यह भरोसा दे पाएगा कि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र पर अमेरिका लगातार स्थायी तौर पर भरोसेमंद साथी की तरह साथ खड़ा रहेगा? और क्या अमेरिका अपने शैक्षणिक और तकनीकी आधार के दायरे को तेजी से विस्तार दे पाएगा?
बीजिंग प्रशासन ने कई मायनों में वाशिंगटन प्रशासन पर बढ़त बनायी है लेकिन उसका सत्तावादी दृष्टिकोण क्या उसकी आर्थिक प्रगति को प्रभावित करेगा? क्या चीन अर्थव्यवस्था में सुस्ती और बढ़ती बुर्ज़ुग आबादी की समस्या का सामाधान तलाश पाएगा? और क्या चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को लंबे समय तक चीन के लोगों का समर्थन और विश्वास मिलता रहेगा?
चीन का कई मज़बूत पक्ष है तो कई कमजोरियां भी हैं. अमेरिका की भी कई कमजोरियां हैं लेकिन वहां शानदार डायनामिक सोसायटी है जो खुद को नए सिरे से तलाशने में सक्षम है. लेकिन कोविड-19 महामारी ने दिखाया है सरसरी तौर पर यह स्पष्ट किया है कि जो चीन में होता है वह केवल चीन तक नहीं रहता है. चीन एक वैश्विक ताक़त है और वहां की बात पूरी दुनिया को प्रभावित करती है.
इस लिहाज़ से दुनिया को तैयार रहना चाहिए, अमेरिका-चीन के आपसी संबंध उतार चढ़ाव भरा रास्ता है और अभी इसकी केवल शुरुआत भर हुई है.
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