सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और क़तर के लिए ट्रंप की हार और बाइडन की जीत से क्या बदलेगा

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- Author, फ्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता
"अगर मैं आपकी बातों पर ध्यान न दे पाऊं तो मुझे माफ़ करें, मेरा ध्यान कहीं और है. मैं विस्कॉन्सिन के चुनावी नतीज़ों पर नज़र रख रहा हूं." - ब्रिटेन के लिए सऊदी अरब के दूत की नज़र बार-बार उनके मोबाइल फ़ोन पर जा रही थी.
यह ग्यारह दिन पहले की बात है, जब हमें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि 2021 की जनवरी में कौन व्हाइट हाउस में नया राष्ट्रपति बन कर आएगा.
जब अमेरिकी चुनावों में जो बाइडन की जीत की घोषणा हुई तो सऊदी अरब की तरफ से उन्हें थोड़ी देर में बधाई दी गई. लेकिन जब चार साल पहले डोनाल्ड ट्रंप जीत कर व्हाइट हाउस में आए थे, उस वक्त उसने नए राष्ट्रपति को बधाई देने में देर नहीं की थी.
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान डोनाल्ड ट्रंप के क़रीबी माने जाते हैं. और माना जा रहा है कि ट्रंप के जाने से सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना एक अहम मित्र खोने वाला है.
राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले विदेश दौरे पर सऊदी अरब गए थे जहां उनकी शानदार आवभगत की गई. इससे पहले सऊदी अरब ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा स्वागत के लिए इस तरह का विशेष आयोजन नहीं किया था. ओबामा ईरान के प्रति नरम रुख़ रखने वाले माने जाते रहे हैं.
अमेरिकी चुनावों के नजीता आने के बाद अहब ये माना जा रहा है कि सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों के लिए बाइडन की जीत के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.
मध्यपूर्व के इलाक़े के साथ अमरीका की रणनीतिक साझेदारी का इतिहास साल 1945 तक जाता है और उम्मीद यही है कि यह साझेदारी आगे भी कायम रहेगी. हालांकि बाइडन के आने से इसमें बदलाव होने की संभावना है जिसे शायद खाड़ी देशों की सरकारें पसंद न करें.

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सऊदी अरब खो देगा अहम मित्र
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब के अहम मित्र और सऊदी राजपरिवार के समर्थक रहे हैं. साल 2017 में अमेरिका की सत्ता संभालने के बाद अपने पहले विदेशी दौरे के लिए उन्होंने सऊदी अरब को चुना था.
डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के सऊदी अरब के सबसे शक्तिशाली क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ नज़दीकी रिश्ता बनाया और उनके साथ मिल कर काम किया.
जब साल 2018 में इंस्तांबुल के सऊदी वाणिज्यिक दूतावास में सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या हुई तो पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने शक़ जताया कि हत्या का आदेश क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने दिया था.
लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इस दलील को सीधे तौर पर खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि ये संभव है कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को शायद इस बारे में पता नहीं था.

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इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ट्रंप के इस बयान के बाद के दिनों में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की मीडिया टीम ने लोगों से कहा, "चिंता न करें, स्थिति क़ाबू में है."
ट्रंप ने न केवल सऊदी अरब पर किसी तरह की पाबंदियां लगाने से साफ़ इनकार कर दिया था बल्कि सऊदी अरब को हथियार बेचने पर रोक लगाने की कांग्रेस की मांग को भी उन्होंने मानने से इनकार कर दिया था.
बाइडन की जीत के साथ सऊदी अरब के साथ-साथ कुछ हद तक संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन भी अपना एक अहम मित्र खोने वाले हैं.
ये बात सच है कि खाड़ी देशों से जुड़ी कई अहम बातों में बदलाव नहीं आएगा लेकिन आने वाले सालों में कुछ बातें ज़रूर बदल सकती हैं.

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यमन में जारी युद्ध
यमन में जिस तरह सऊदी अरब ने हूथी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी उससे पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा सहज नहीं थे. जो बाइडन उप-राष्ट्रपति के तौर पर ओबामा के साथ आठ साल तक काम कर चुके हैं.
जब बराक ओबामा ने राष्ट्रपति का पद छोड़ा उस वक्त यमन में युद्ध के दो साल हो चुके थे. यमन पर लगातार हवाई हमले किए जा रहे थे. एक तरफ इन हमलों में बड़ी संख्या में आम नागरिक हताहत हो रहे थे तो दूसरी तरफ इमारतें और घर खंडहरों में तब्दील हो रहे थे.
अमेरिका में यमन युद्ध को लेकर नाराज़गी बढ़ रही थी और ऐसे में बराक ओमाबा ने सऊदी अरब को दी जाने वाली सैन्य और ख़ुफ़िया मदद पर रोक लगा दी. उनके इस फ़ैसले को बाद में ट्रंप प्रशासन ने बदल दिया और उन्होंने सऊदी अरब को यमन पर हमले करने की खुली छूट दे दी.
अब ऐसा लगता है कि बाइडन के हाथों में प्रशासन की चाबी आने के बाद इस फ़ैसले को पलटा जा सकता है. हाल में बाइडन ने विदेश संबंधों पर बनी परिषद से कहा था कि वो "सऊदी अरब के नेतृत्व में जारी विनाशकारी यमन युद्ध में सभी तरह की अमेरिकी मदद बंद करेंगे और सऊदी अरब के साथ देश के रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन के लिए आदेश देंगे."
ये भी संभव है कि बाइडन प्रशासन इस बात के लिए सऊदी अरब पर दवाब बनाए कि वो यमन में सहयोगियों के साथ मिल कर इस संकट का हल तलाशे.
कुछ वक्त पहले तक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को भी इस बात का अंदाज़ा लग गया है कि यमन में जारी युद्ध में उनकी सेना को जीत मिलने की उम्मीद कम ही है. वो खुद अपनी साख बचाते हुए इस युद्ध से बाहर निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं बशर्ते मार्च 2015 में युद्ध शुरू होने के वक्त हूथी विद्रोहियों की जो स्थिति थी, उसमें बदलाव हो.

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ईरान
मध्यपूर्व में राष्ट्रपति के तौर पर ओबामा की एक अहम उपलब्धि थी साल 2015 में ईरान के साथ हुई परमाणु समझौता या ज्वॉइंट कंप्रिहेन्सिव प्लान ऑफ़ एक्शन.
उन्होंने इस शर्त के साथ ईरान पर लगाई पाबंदियों को हटा दिया था कि वो परमाणु संधि के तहत सभी शर्तों का पूरी तरह पालन करेगा और केवल सीमित मात्रा में परमाणु उर्जा के लिए यूरेनियम का संवर्धन करेगा और अपने परमाणु केंद्रों का निरीक्षण करने पर सहमत होगा.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे "अब तक का सबसे ख़राब समझौता" कहते हुए अमेरिका को इससे दूर कर लिया था. लेकिन अब ट्रंप के बाद हो सकता है कि बाइडन फिर से इस समझौते में शामिल होने का फ़ैसला लें.

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इससे सऊदी अरब बेशक़ उनसे नाराज़ होगा. बीते साल सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको के दो बड़े ठिकानों - अबक़ीक़ और ख़ुरैस - पर संदिग्ध मिसाइल हमले हुए थे.
इसके बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री आदिल अल-ज़ुबैर ने एक संवाददाता सम्मेलन में इसके लिए ईरान परमाणु समझौते को दोष दिया था. उस वक्त मैं उस संवाददाता सम्मेलन में मौजूद था.
उन्होंने कहा कि ये रास्ता तबाही की ओर जाने वाला कदम बताया था और कहा कि इस समझौते में न तो ईरान के विस्तारवादी मिसाइल कार्यक्रम पर ग़ौर किया गया था और न ही मध्यपूर्व में बड़े पैमाने पर विद्रोही गुटों को दिए जा रहे समर्थन के बारे में सोचा गया था.
उनका कहना था कि ये समझौता ओबामा प्रशासन का लिया ग़लत कदम था और इसमें इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया था कि ईरान मध्यपूर्व के लिए बड़े ख़तरे के तौर पर उभर रहा है.
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इस साल जनवरी में जब अमेरिकी के एक ड्रोन हमले में ईरान के बहुचर्चित क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की मौत हुई तो सऊदी अरब समेत कई देशों को इस ख़बर से खुशी हुई होगी.
सऊदी अरब में अरामको की रिफ़ाइनरियों पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी हूथी विद्रोहियों ने ली थी मगर सऊदी अरब ने ड्रोन के हिस्से दिखाकर ईरान पर आरोप लगाया था.
क़ुद्स फ़ोर्स ईरान के सुरक्षा बलों की वो शाखा है जो उनके द्वारा विदेशों में चल रहे सैन्य ऑपरेशनों के लिए ज़िम्मेदार है और सुलेमानी वो कमांडर थे जिन्होंने वर्षों तक लेबनान, इराक़, सीरिया समेत अन्य खाड़ी देशों में योजनाबद्ध हमलों के ज़रिये मध्य-पूर्व में ईरान और उसके सहयोगियों के प्रभाव को बढ़ाने का काम किया था.
अब इन खाड़ी देशों को ये चिंता ज़रूर सता रही होंगी कि कहीं व्हाइट हाउस में आने वाली नई टीम ईरान के साथ अपने संबंध मज़बूत न कर ले, क्योंकि इससे उनके हितों को नुक़सान पहुंच सकता है.

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क़तर
मध्यपूर्व में अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन का सबसे बड़ा और रणनीतिक तौर पर अहम सैन्य अड्डा क़तर में है, ये है अल-उदैद सैन्य अड्डा.
सेंट्रल कमांड के इलाक़े यानी सीरिया से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक अमेरिकी अपने सभी सैन्य अभियानों को यहां से अंजाम देता है.
लेकिन इसके बावजूद मध्यपूर्व के कई देश जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र ने क़तार का बहिष्कार करते हैं. उनका कहना है कि इख्वान अल-मुस्लमीन यानी मुस्लिम ब्रदरहुड नाम के एक राजनीतिक इस्लामी आंदोलन का क़तर का समर्थन करता है.
साल 2017 में ट्रंप के सऊदी अरब के दौरे के बाद इन देशों ने क़तर का बहिष्कार करना शुरु कर दिया और उन्हें इस बात का पूरा भरोसा था कि इस मामले में उन्हें अमेरिकी प्रसासन का समर्थन हासिल है.
सच कहा जाए तो ट्रंप ने शुरुआती दौर में सार्वजनिक तौर पर इसका समर्थन भी किया था लेकिन बाद में उन्हें बताया गया कि क़तर भी अमेरिका का मित्र है और मध्यपूर्व में अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा क़तर में हैं तो उन्होंने इस मामले में ख़ामोश रहना चुना.
माना जा रहा है नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन का प्रशासन खाड़ी देशों के बीच मौजूद इस दरार को ठीक करने की कोशिश करे. उनके लिए ये करना अमेरिका के हित में होगा लेकिन सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देश इसे अपने हित में कतई नहीं मानेंगे.

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मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला
मानवाधिकारों के मामले में खाड़ी के कई देशों का रिकॉर्ड ख़राब हैं. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के कभी भी इस मुद्दे पर अरब के अपने मित्रों से न तो सवाल किए और न ही इस मुद्दे पर ज़्यादा दिलचस्पी दिखाई.
उनकी दलील थी कि अमेरिकी रणनीतिक हितों और व्यापार सौदों का मामला महिला अधिकारों के बारे में प्रचार करने वाली महिलाओं की गिरफ्तारी, क़तर में विदेशी मज़दूरों के साथ कथित दुर्व्यवहार की ख़बरों या फिर, अक्तूबर 2018 में पत्रकार जमाल खा़शोज्जी की हत्या के अभियान को अंजाम देने के लिए सरकारी विमान से इस्तांबुल पहुंचे सऊदी सुरक्षाकर्मियों की ख़बर से अधिक ज़रूरी था. आज तक जमाल खा़शोज्जी का शव बरामद नहीं किया जा सका है.
इन सभी मामलों में शायद बाइडन प्रशासन खामोश रहना पसंद नहीं करेगा.
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