कोरोना वायरस: लॉकडाउन के बिना जापान ने महामारी को कैसे हराया?

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    • Author, ब्रजेश मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दुनियाभर में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले जैसे-जैसे बढ़े, इससे निपटने के लिए अधिकतर देशों ने लॉकडाउन और ज़्यादा से ज़्यादा टेस्ट करने पर ज़ोर दिया. हालांकि फिर भी कई देशों में संक्रमण के मामले कम होते नहीं दिखे.

भारत में अब तक कोरोना संक्रमण के कुल मामले करीब 1.75 लाख हैं और अब तक करीब पांच हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है. भारत में 24 मार्च से लॉकडाउन जारी है. लेकिन लॉकडाउन में जैसे ही थोड़ी छूट दी गई संक्रमण के मामले और तेज़ी से बढ़े.

संक्रमण के मामले बढ़े तो बहुत से लोग सरकार की आलोचना भी करने लगे कि जब संक्रमण बढ़ रहा है तो लॉकडाउन में छूट क्यों दी जा रही है.

अमरीका, रूस, ब्रिटेन, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए लॉकडाउन लागू किया. हालांकि तमाम आलोचनाओं और सवालों के बावजूद जापान ने संपूर्ण लॉकडाउन लागू नहीं किया.

यहां आपातकाल लागू था लेकिन इस दौरान लोगों को घरों से बाहर निकलने और काम करने की छूट थी. दुनिया के बाकी देशों की तरह जापान की सरकार के पास संपूर्ण लॉकडाउन लागू करने का कानूनी अधिकार नहीं है. हालांकि स्थानीय गवर्नर कारोबार बंग रखने और लोगों से घर में रहने की अपील कर सकते हैं. लेकिन इसका पालन न करने पर किसी तरह की सजा या जुर्माने का प्रावधान नहीं है. हालांकि अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि संक्रमण के प्रभाव की वजह से लोगों की आवाजाही थोड़ी कम हुई है.

संक्रमण से बचने के लिए जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन और तमाम देशों ने अधिक से अधिक टेस्टिंग पर ज़ोर दिया वहीं जापान ने सिर्फ़ उनका टेस्ट किया जिनमें गंभीर लक्षण दिखे. जापान ने कुल आबादी में से सिर्फ 0.2 फीसदी का ही टेस्ट किया.

जापान में बेहद कम हुई टेस्टिंग पर भी सवाल उठे लेकिन प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे का कहना है कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की उनकी रणनीति अधिकतर इलाकों में कारगर साबित हुई जिससे वो संक्रमण को फैलने से रोकने में कामयाब रहे.

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'जापान मॉडल' कितना कारगर?

जिस वक़्त दुनिया में संक्रमण फैलने की शुरुआत हुई थी तभी डायमंड प्रिंसेज़ क्रूज़ शिप में फैले संक्रमण से निपटने में ढिलाई बरतने को लेकर जापान की आलोचना भी हुई थी. बहुत से विशेषज्ञों ने जापान के स्वास्थ्य सिस्टम के फेल होने का अंदेशा जताया था और अनुमान लगाया था कि यहां संक्रमण से लाखों लोगों की जान जा सकती है. लेकिन सरकार ने अपनी रणनीति के तहत काम किया और कोरोना से जीत की घोषणा कर दी है.

प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने करीब डेढ़ महीने तक चले आपातकाल को ख़त्म करने की घोषणा की है.

आपातकाल ख़त्म करने की घोषणा के वक़्त प्रधानमंत्री आबे ने कहा, ''जापान के अपने ख़ास तरीके को अपनाते हुए हमने इस संक्रमण की लहर को लगभग पूरी तरह हरा दिया है.'' उन्होंने कहा कि इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए 'जापान मॉडल' काफ़ी कारगर साबित हुआ है.

तो अब सवाल उठता है कि जापान मॉडल में ऐसा क्या है जिससे उसने कोरोना संक्रमण पर इतनी जल्दी जीत हासिल कर ली है. और इस महामारी को बड़े स्तर पर फैलने नहीं दिया जबकि अमरीका या रूस जैसे देशों की हालत पस्त हो गई.

स्वास्थ्य रैंकिंग में जापान दूसरे स्थान पर है. यहां की कम से कम 26 फ़ीसदी आबादी 65 साल के ऊपर है. यानी ये वो आयु वर्ग है जिसे कोविड-19 के संक्रमण का ख़तरा बहुत ज़्यादा है. जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक, अब तक यहां संक्रमण के कुल मामले 16716 हैं और 888 लोगों की मौत हुई है.

हालांकि यहां बड़े स्तर पर टेस्टिंग नहीं हुई लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बेहतर और सस्ती हैं कि थोड़ी सी भी परेशानी होने पर लोग डॉक्टर को दिखा लेते हैं न कि किसी बड़ी मुश्किल होने का इंतज़ार करते.

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निमोनिया से बचाव

एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जापान में निमोनिया की वजह से बड़ी संख्या में लोग हर साल मारे जाते रहे हैं. साल 2014 से 65 साल या इससे अधिक उम्र के लोगों को निमोनिया की टीका मुफ़्त में लगाने की शुरुआत की गई लेकिन यह निमोनिया के एक प्रकार के लिए था. हालांकि इसे लगवाना ज़रूरी नहीं किया गया. इस टीकाकरण के बाद साल 2017 से निमोनिया वजह से होने वाली मौतों में काफ़ी गिरावट दिखी. साल 2018 में निमोनिया जापान में मौत के आम कारणों की सूची में तीसरे स्थान से खिसककर पांचवें पर पहुंच गया. इसके लिए नई दवाओं और जांच की सुविधाओं को वजह माना जा रहा है.

कोरोना संक्रमण के लक्षणों में निमोनिया भी है और इसके चलते मरीज़ को सांस लेने में तकलीफ़ हो सकती है. निमोनिया का बेहतर इलाज होने पर जापान इससे निपटने की स्थिति में है.

बीबीसी ट्रैवल की एक रिपोर्ट में टोक्यो की डॉक्टर मीका वाशियो कहती हैं, "सीटी स्कैन से निमोनिया के शुरुआती चरण का भी पता लगाया जा सकता है, फिर तुरंत ही उसका इलाज शुरू हो जाता है." इसी वजह से जापान में गंभीर मामले कम हुए.

सामुदायिक संक्रमण का पता लगाकर और उसे रोककर वायरस का प्रसार सीमित रखने पर काम किया गया.

सेहत के प्रति जागरुक जापानी संस्कृति के कारण भी कोविड-19 के प्रभाव को कम किया जा सका. वाशियो कहती हैं, "बहुत से लोग पहले से मास्क पहनते थे, ख़ास तौर पर सर्दियों में. इससे वायरस बहुत ज़्यादा नहीं फैला."

जापान के क़रीब 60 फ़ीसदी लोग सालाना हेल्थ चेक-अप कराते हैं और तंदुरुस्त रहने की कोशिश करते हैं.

इसका यह मतलब नहीं है कि आगे चुनौतियां नहीं हैं. कोविड-19 संक्रमण वाले कई मरीजों को अस्पताल में होना चाहिए, लेकिन जापान ज़्यादा गंभीर मामलों के लिए अस्पताल के बेड बचाकर रख रहा है.

सांस्कृतिक कारण

जापान में सोशल डिस्टेंसिंग आम ज़िंदगी का हिस्सा है. अमरीका, फ्रांस और इटली की तरह लोग यहां मिलने के लिए या स्वागत में बहुत ज़्यादा करीब नहीं आते. यहां लोग स्वास्थ्य और साफ-सफाई के प्रति काफ़ी जागरूक हैं, मास्क पहनना यहां की आम ज़िंदगी का हिस्सा है. ख़ासकर सर्दियों के मौके पर. इस वजह से उनके लिए यह सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और बाकी दूसरे नियमों का पालन मुश्किल नहीं रहा.

दूसरे देशों के मुकाबले जल्द एक्शन

डायमंड प्रिंसेज़ क्रूज़ शिप में कोरोना संक्रमण से निपटने के दौरान ही जापान को इस महामारी की भयावह स्थिति का अंदाज़ा हो गया था और उसने यहीं से एक्शन की शुरुआत कर दी थी.

बिजनस इनसाइडर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जापान में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग नेटवर्क जनवरी से ही सक्रिय था और यहां शोधकर्ताओं ने इस बात की भी संभावना जताई थी कि यूरोप के मुकाबले एशिया में वायरस का प्रकोप कम होगा. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दखल और जनता के साझा प्रयासों की वजह से यहां हालात थोड़े अलग हुए.

जापान ने लॉकडाउन लागू करने के बजाय लोगों से अपील की कि वो ऐसी जगहों पर न जमा हों जहां पर्याप्त वेंटिलेशन न हो, यानी छोटी जगह पर बड़ी संख्या में लोगों के एकत्रित न होने की अपील, किसी भी सार्वजनिक जगह पर बड़ी संख्या में जमा न होने की अपील और दूसरे के ज़्यादा करीब आने से बचने की भी अपील की गई.

बीते सोमवार को जापान के प्रधानमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ''हमें अब से नई जीवनशैली अपनानी होगी. हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है.''

हालांकि बहुत से विशेषज्ञ जापान के इन प्रयासों पर सवाल उठाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ये प्रयास उतने कारगर नहीं हैं क्योंकि बाकी दुनिया में भी लोगों ने ऐसी चीज़ें अपनाई हैं लेकिन वहां मामले कम नहीं हुए. ऐसे में जापान पर आंकड़े छुपाने के आरोप भी लग रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख डॉ. ट्रेड्रॉस गेब्रेयेसस ने बीते सोमवार कोरोना संक्रमण से निपटने के जापान के प्रयासों को 'सफल' बताया.

जेनेवा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में WHO प्रमुख ने हाल के दिनों में जापान के उन प्रयासों की तारीफ की जिनकी वजह ये यहां संक्रमण के मामले ज्यादा नहीं बढ़े.

हालांकि उन्होंने जापान के लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग अपनाने और दूसरी आम सावधानियां बरतते रहने की अपील की है.

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