कोरोना वायरस: भारत को कैसे मिलेगी रेमडेसिवियर

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीका ने कोविड 19 बीमारी के उपचार के लिए रेमडेसिवियर दवा पर भरोसा जताते हुए कहा है कि इस बात के 'स्पष्ट' सबूत मिले हैं कि ये दवा कोविड 19 के मरीज़ों को ठीक कर सकती है.
इस ख़बर के आने के बाद भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस वार्ता में गुरुवार को रेमडेसिवियर दवा का ज़िक्र हुआ. रेमडेसिवियर की ख़बर से उम्मीद तो जगी है, लेकिन संयुक्त सचिव लव अग्रवाल का कहना है कि इस पर आगे कुछ भी कहने से पहले फ़िलहाल थोड़ा रुकना चाहिए.
उन्होंने कहा, "रेमडेसिवियर उन तमाम मेडिकल प्रोटोकॉल में से एक है जिसे दुनियाभर में एक्ज़ामिन किया जा रहा है. कोविड-19 के इलाज के लिए अभी तक कोई तय ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल फ़ॉलो नहीं किया जा रहा है. रेमडेसिवियर भी उन स्टडी में से एक है जो हाल में पब्लिश हुई हैं. स्टडी में अब तक ये साबित नहीं हुआ है कि ये दवा 100 फ़ीसदी मददगार है. हालांकि इस मामले में कोई भी क़दम लेने से पहले अभी हम और एविडेंस का इंतज़ार कर रहे हैं."
भारत में कैसे मिलेगी ये दवा
अगर रेमडेसिवियर दवा जांच में सफल साबित होती है, तो आगे की प्रक्रिया क्या होगी और भारत में ये दवा कैसे पहुंचेगी?
आईसीएमआर के जानकारों ने बीबीसी हिंदी को बताया कि पहले भारतीयों पर इस दवा के असर को देखा जाएगा कि कहीं कोई नेगेटिव असर तो नहीं पड़ रहा. इसके लिए स्टडी की जाती है.
देश में किसी भी नई दवा को ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया अप्रूव करता है. इसके लिए वो आईसीएमआर से टेक्निकल सलाह लेते हैं. ये सब तय क़ानून के तहत होता है.
आईसीएमआर के मुताबिक़, दुनिया भर में कोविड-19 के इलाज को ढूंढने के लिए 300 से ज़्यादा स्टडी चल रही हैं. भारत में भी कई क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं.

दवा का ट्रायल करने वाली अमरीकी कंपनी
रेमडेसिवियर एक एंटीवायरल दवा है, जिसे इबोला के इलाज के लिए बनाया गया था.
अमरीका में कोविड-19 के लिए इस दवा का ट्रायल गिलिएड नाम की कंपनी कर रही है.
भारत की बड़ी अनुसंधान संस्था सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर शेखर मांडे ने बीबीसी हिंदी से कहा, "भारत में ये दवा कैसे आएगी, ये इस कंपनी की बिज़नेस स्ट्रेटेजी पर निर्भर करता है. उनके पास दो-तीन विकल्प हैं. हालांकि उसे पहले अप्रूवल लेना होगा, लेकिन ये पूरी तरह गिलिएड कंपनी का आपसी मामला है कि वो किस तरह इस ड्रग को भारत में लाना चाहेंगे."
लेकिन हाइड्रोक्लोरोक्वीन के मामले में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भारत सरकार से सीधा संपर्क किया था और दवा मंगवा ली थी. तो क्या भारत भी इसी तरह अमरीका से सीधे दवा नहीं मांग सकता?
इस पर डॉ. शेखर कहते हैं कि ये दोनों अलग मामले हैं, "हाइड्रोक्लोरोक्वीन बहुत पुरानी दवा है. इसका कोई पेटेंट नहीं है. लेकिन रेमडेसिवियर नई दवा है, जिसका पेटेंट है. इसलिए हाइड्रोक्लोरोक्वीन जेनरिक कंपनी बना पाती है और किसी को भी बेच पाती है. लेकिन गिलिएड की ये अपनी प्रोपर्टी है. इसीलिए वही तय करेगी कि इसे कौन बना सकता है और कौन बेच सकता है."

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भारत की कंपनियां बना सकती हैं रेमडेसिवियर
अगर रेमडेसिवियर जांच में सफल साबित होती है तो ज़ाहिर है कि दुनियाभर के देश इस दवा को लेना चाहेंगे.
ऐसे में कंपनी के पास ये भी विकल्प है कि वो स्थानीय कंपनियों को अपना पेटेंट देकर वहां दवा बना सकती है.
डॉक्टर शेखर कहते हैं कि कंपनी की ये रणनीति ज़रूर होगी कि वो भारतीय कंपनियों को संपर्क करे, क्योंकि भारतीय कंपनियों की क्षमता काफी अच्छी है.
"अगर अमरीकी कंपनी कुछ भारतीय कंपनियों को पेटेंट देना चाहे तो यहां की बड़ी कंपनियां आराम से दवा बना लेंगी. इसलिए गिलिएड कंपनी पर निर्भर करता है कि उनकी क्या रणनीति है."
इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन के सेकेट्री जनरल धारा पटेल के मुताबिक़, रेमडेसिवियर दवा का पेटेंट 2035 तक है.
उन्होंने बताया कि भारत की तीन दवा कंपनियां इस पर नज़र बनाए हुए हैं और अगर रेमडेसिवियर दवा को कंफ़र्मेशन मिल जाता है तो ये कंपनियां गिलिएड कंपनी के साथ करार कर सकती हैं.
धारा पटेल कहते हैं, सरकार देखेगी की क्या ये कंपनियां किफ़ायती दाम पर दवा बनाने में सक्षम हैं, उसके बाद उन्हें कंपलसरी लाइसेंस दे दिया जाएगा.
वो बताते हैं कि अगर कोई प्रोडक्ट ज़रूरी है, तो देश के स्तर पर फैसला लिया जा सकता था और देश को कंपलसरी लाइसेंस देने का हक़ होता है.

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बीबीसी हेल्थ एवं साइंस संवाददाता जेम्स गेलाघर की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस दवा के क्लिनिकल ट्रायल में ये बात सामने आई है कि दवा के प्रयोग से मरीज़ों में लक्षण 15 दिन की जगह 11 दिन के अंदर दिखने लग जाते हैं.
हालांकि, अब तक इस दवा पर हुई जांच को लेकर पूरी जानकारी सामने नहीं आई है.
लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर इस दवा से जुड़े दावों की पुष्टि होती है तो मौजूदा दौर की एक बेहतरीन ख़बर होगी.
लेकिन उन्होंने ये भी कहा है कि ये दवा इस बीमारी के लिए जादुई पुड़िया की तरह नहीं है.
इस दवा से लोगों की जान बचाने की क्षमता विकसित होगी, अस्पतालों पर बोझ कम किया जा सकेगा और कुछ जगहों पर लॉकडाउन हटाए जा सकेगा.

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कहां से आई है ये दवा?
इस दवा को दरअसल, इबोला के इलाज के लिए विकसित किया गया था. ये एक एंटीवायरल दवा है.
कोई भी वायरस जब इंसानी शरीर में जाता है तो वह अपने आपको मज़बूत करने के लिए ख़ुद को रेप्लीकेट यानी अपनी दूसरी प्रतियां तैयार करता है. और ये इंसान के शरीर की कोशिकाओं में होता है. लेकिन इस प्रक्रिया में वायरस को एक एंजाइम की ज़रूरत होती है.
ये दवा इसी एंजाइम पर हमला करके वायरस के रास्ते में एक तरह का रोड़ा बनती है.
अमरीका में इस दवा का ट्रायल अमरीका के राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान में हुआ है. इस ट्रायल में 1063 लोगों ने भाग लिया था. इनमें से कुछ मरीज़ों को ये ड्रग दिया गया. वहीं, कुछ मरीज़ों को पेलेसिबो दी गई.
दवाओं की दुनिया में प्लेसीबो से आशय उस चीज़ से है जिसमें कोई भी मेडिकल गुण नहीं होते हैं.
इनमें पानी और शक्कर की गोली जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं.

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कितनी कामयाब है ये दवा?
अमरीका के राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान के प्रमुख डॉक्टर एंथनी फाउची ने कहा है कि ट्रायल के आँकड़े बताते हैं कि ये दवा कोविड 19 से जूझ रहे मरीज़ों के ठीक होने में प्रभावी साबित हो रही है.
उन्होंने कहा है कि दवा वायरस को ब्लॉक कर सकती है और ये बता रही थी कि हमारे पास अब वह रास्ता होगा कि हम मरीज़ों का इलाज कर सकते हैं.
हालांकि, इस दवा का कोविड 19 से होने वाली मौतों पर कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं पड़ा है.
वो लोग जिन्हें ये दवा दी गई, उनमें मृत्यु दर 8 फ़ीसदी थी. वहीं, जिन्हें प्लेसीबो दिया गया, उनमें 11.6 फ़ीसदी थी. लेकिन ये नतीजे सांख्यिकीय आधार से अहम नहीं हैं.
इसका मतलब ये हुआ कि वैज्ञानिक ये बताने में सक्षम नहीं हैं कि मृत्यु दर में जो अंतर है, उसका आकलन सही भी है या नहीं.
यह भी स्पष्ट नहीं है कि किसे फ़ायदा हो रहा है.
क्या यह उन लोगों को और जल्दी ठीक होने में मदद कर रहा है, जो कि बिना दवा के भी ठीक हो जाते?
दवा कम या ज़्यादा किस उम्र वर्ग के लोगों में बेहतर काम करती है?
ये बीमारी लोगों को आईसीयू में जाने से बचा रही है?
ये दवा युवाओं और वृद्धों के साथ बेहतर काम करती है?
या फिर ये दवा बीमार या स्वस्थ लोगों में से किस पर अच्छा असर डालती है?
क्या मरीज़ों का शुरुआती स्तर पर ही ध्यान रखना होगा जब वायरस अपने चरम पर होता है?
जब इस दवा से जुड़ी विस्तृत जानकारी जारी की जाएगी, तब इस तरह का विशेष सवालों के जवाब सामने आएंगे.
क्योंकि इस दवा से लोगों की ज़िंदगियां बचाने के साथ-साथ लॉकडाउन हटाए जाने जैसे फ़ायदे हो सकते हैं.
लंदन के यूसीएल कॉलेज में एमआरसी क्लिनिकल ट्रायल यूनिट के निदेशक प्रोफेसर महेश परमार कहते हैं, "इस दवा के व्यापक ढंग से उपलब्ध होने से पहले कई चीज़ें स्पष्ट होना ज़रूरी है. इससे जुड़े डेटा और नतीजों की नियामकों द्वारा समीक्षा की जानी ज़रूरी है ताकि इस ड्रग को लाइसेंस दिया जा सके. इसके साथ ही अलग अलग देशों के स्वास्थ्य विभागों की ओर से भी आकलन ज़रूरी होगा."
"जब ये सब हो रहा है, तब हमें इस ट्रायल और दूसरे ट्रायल्स से ज़्यादा और दीर्घकालिक डेटा मिलेगा जिससे ये तय किया जा ,सकेगा कि ये दवा कोविड 19 भी रोकती है या नहीं.
अगर एक दवा लोगों को आईसीयू में जाने से रोक सकती है तो हमें अस्पतालों पर हद से ज़्यादा काम आने का ख़तरा कम हो जाता है.
क्या फ़ायदा होगा?
इसके साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग की ज़रूरत कम हो सकती है.
ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पीटर हॉर्बी इस समय काफ़ी व्यापक स्तर पर कोविड 19 की दवा खोजने का अभियान चला रहे हैं.
हॉर्बी ने बताया है, "हमें पूरे नतीजे देखने की ज़रूरत है. लेकिन अगर इस दवा को लेकर किए गए दावों की पुष्टि होती है तो ये बहुत बेहतरीन होगा और कोविड 19 के ख़िलाफ़ जारी जंग में एक बहुत अच्छी ख़बर होगी."
"इसके बाद अगले कुछ क़दमों में इससे जुड़ी जानकारियों को साझा किया जाना और इस दवा को सभी के लिए उपलब्ध कराया जाना शामिल है."
अमरीका की ओर से इस दवा को लेकर जब ये जानकारी सामने आई है, तभी चीन में इसी दवा पर किए गए ट्रायल की रिपोर्ट लांसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है जिसके मुताबिक़, ये दवा अप्रभावी साबित हुई है.
हालांकि, चीन में ये ट्रायल अधूरा रह गया था क्योंकि लॉकडाउन की सफलता की वजह से चीन में मरीज़ों की संख्या कम पड़ गई थी.
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ प्रोफेसर बाबक जाविद कहते हैं, "ये आंकड़े काफ़ी बेहतर हैं. लेकिन कोविड 19 के लिए कोई दवा उपलब्ध नहीं होने की वजह से इस दवा को जल्द स्वीकृति मिल सकती है. लेकिन ये नतीजे ये भी बताते हैं कि रेमडेसिवियर कोई जादू की पुड़िया नहीं हैं. ऐसे में इससे लोगों के ठीक होने में कुल फायदा 30 फीसदी है.
इसके साथ ही कोविड 19 को लेकर जिन दूसरी दवाओं की टेस्टिंग चल रही है, उनमें मलेरिया और एचआईवी के लिए प्रयोग की जाने वालीं दवाएं शामिल हैं.
इन दवाओं में वायरस पर हमला करने के साथ साथ वो कंपाउड होते हैं जो कि रोग प्रतिरोधक क्षमता को आराम देते हैं.
हालांकि, एंटीवायरल शुरुआती चरणों में और इम्मूयन दवाएं बीमारी के बाद के चरणों में प्रयोग की जाती हैं.

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