कोरोना वायरसः अमरीका और चीन के बीच साज़िशों की कहानियां

- Author, शयन सरदारी ज़ादेह और ओल्गा रॉबिन्सन
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
कोरोना वायरस की महामारी की शुरुआत के वक़्त से ही इसके बारे में साज़िश की कहानियां इंटरनेट पर कही-सुनी जा रही हैं.
इन्हीं फ़र्ज़ी दावों में से एक झूठ ये भी था कि कोरोना वायरस चीन के 'गोपनीय जैविक हथियार कार्यक्रम' का हिस्सा था.
एक बेबुनियाद दावा ये भी किया गया कि कनाडा और चीन के जासूसों की एक टीम ने वुहान में कोरोना वायरस को फैलाया था.
कोरोना वायरस को लैब में तैयार किए जाने का दावा तो फ़ेसबुक और ट्विटर से आगे बढ़कर रूस के सरकारी टेलीविज़न चैनल के प्राइम टाइम तक पहुंच गया.
महामारी के महीनों हो चुके हैं लेकिन इसके बावजूद साज़िश की ये कहानियां ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं.
बल्कि अब तो सरकारी अधिकारी, वरिष्ठ राजनेता और अमरीका और चीन के मीडिया आउटलेट्स नए और अपुष्ट दावों को बढ़ावा दे रहे हैं.
महामारी और फ़र्ज़ी ख़बर
चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता शाओ लिजियान ने बार-बार और वो भी बिना किसी सबूत के कहा है कि "हो सकता है कि कोविड-19 की महामारी की शुरुआत अमरीका से हुई हो."
12 मार्च को उन्होंने एक ट्वीट किया, मुमकिन है कि अमरीकी सेना कोरोना वायरस को वुहान ले कर आई हो.
इसके एक दिन बाद शाओ लिजियान ने वेबसाइट 'ग्लोबल रिसर्च' का एक आर्टिकल ट्वीट किया.
इस आर्टिकल की हेडलाइन थी, "कोरोना वायरस अमरीका से शुरू हुआ था, इस बात के और सबूत मिले." उन्होंने लोगों से इस लेख को पढ़ने और शेयर करने की अपील भी की. बाद में वो आर्टिकल डिलीट कर दिया गया.
चीन के अख़बार 'ग्लोबल टाइम्स' ने भी शाओ लिजियान के सुर में सुर मिलाया. अख़बार ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कि झाओ लिजियान ने 'निजी हैसियत' से ये दावा किया था, लिखा, "उन्होंने वही कहा जो चीन के लोग शंका जता रहे हैं."
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लिजियान की छवि
लिजियान के दावे को फैलाने में कई चीनी दूतावासों और दुनिया भर में फैले सोशल मीडिया यूज़र्स ने भी अपनी भूमिका निभाई.
बीबीसी मॉनिटरिंग की टीम में चीन मामलों की जानकार केरी एलेन का कहना है, "लिजियान की छवि एक मुखर व्यक्ति की रही है, ख़ासतौर पर सोशल मीडिया पर. 'मेनलैंड चाइना' (हॉन्ग कॉन्ग और मकाउ को छोड़कर बाक़ी चीन) में उनकी एक अलग छवि रही है. ज़रूरी नहीं है कि वे हमेशा नेतृत्व के नज़रिये से मेल खाने वाली बात ही कहें."
थिंकटैंक 'सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन ग्लोबलाइज़ेशन' की स्थापना कनाडा में साल 2001 में हुई थी. 'ग्लोबल रिसर्च' इसी थिंकटैंक की वेबसाइट है.
फ़ैक्ट चेक करने वाली अमरीकी वेबसाइट 'पॉलिटीफ़ैक्ट' के अनुसार 'ग्लोबल रिसर्च' के पास सितंबर इलेवन, वैक्सीन, ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे मुद्दों पर साज़िश की ज़बर्दस्त कहानियां हैं जो सुनने में आकर्षक लगती हैं.
लैरी रोमानॉफ़ के दावे
शाओ लिजियान ने जो लेख ट्वीट किया था, वो लैरी रोमानॉफ़ का था. लैरी 'ग्लोबल रिसर्च' के लिए नियमित रूप से लिखने वाले लोगों में से हैं.
लैरी रोमानॉफ़ ने अपने एक पुराने लेख के निष्कर्ष को ही उस लेख में दोहराया था कि इस वायरस की उत्पत्ति चीन में नहीं हुई है.
लेकिन चीन में हुई रिसर्च और वे जिस 'साइंस' पत्रिका का उल्लेख कर रहे हैं, दोनों ही ये नहीं कह रहे हैं कि चीन ही वह जगह जहां से ये संक्रमण शुरू हुआ बल्कि ये तो कह रहे हैं कि ख़ास तौर पर वुहान की मवेशी मार्केट को ही नए कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जगह नहीं कह सकते.
फ़र्जी ख़बर की बुनियाद
लैरी रोमानॉफ़ ने ये भी दावा किया है कि "जापान और ताइवान के वैज्ञानिकों ने ये पता लगा लिया है कि नए कोरोना वायरस की उत्पत्ति अमरीका में हो सकती" है.
जापान और ताइवान के कुछ चैनलों पर आई रिपोर्ट की बुनियाद पर लैरी रोमानॉफ़ ने अपने लेख में ये निष्कर्ष निकाला होगा.
दरअसल, फ़रवरी में एक जापानी टेलीविज़न चैनल पर ऐसी ही एक रिपोर्ट आई थी और ताइवान के एक चैनल पर एक फ़ार्माकोलॉजी के एक प्रोफ़ेसर ने इस सिलसिले में दावा किया था.
दरअसल, ताइवान के वो प्रोफ़ेसर एक राजनेता हैं और चीन समर्थक माने जाते हैं जबकि लैरी रोमानॉफ़ की नज़र में वे एक शीर्ष स्तर के वायरोलॉजिस्ट (विषाणु विशेषज्ञ) हैं.
एक और ग़लत ख़बर
लैरी रोमानॉफ़ ने बिना किसी सबूत के ये भी दावा किया कि मैरीलैंड के फोर्ट डेट्रिक स्थित अमरीकी सेना की 'जर्म लैबोरेटरी' में कोरोना वायरस तैयार किया गया होगा.
उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए आगे लिखा है, "इसमें हैरत की बात नहीं है क्योंकि रोगाणुओं के रिसाव को रोकने के लिए किसी सुरक्षा मापदंड की कमी के कारण पिछले साल उस लैब को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था."
जब लैरी रोमानॉफ़ ये सब कुछ लिख रहे थे, तभी न्यूयॉर्क टाइम्स में ये ख़बर छपी कि उस 'जर्म लैबोरेटरी' को बंद नहीं किया गया है बल्कि केवल उसकी रिसर्च वर्क रोकी गई है.
लैबोरेटरी की प्रवक्ता ने कहा कि प्रयोगशाला के बाहर किसी भी सामाग्री का कोई ख़तरनाक़ रिसाव नहीं हुआ है.
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चीन से ख़ास लगाव
लैरी रोमानॉफ़ ख़ुद को एक रिटायर्ड मैनेजमेंट कंसल्टेंट और बिज़नेसमैन बताते हैं.
साथ ही उनका कहना है कि वे शंघाई की फुडान यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफ़ेसर भी हैं और उन्होंने एग़्जिक्युटिव एमबीए की सीनियर क्लासेज के लिए अंतरराष्ट्रीय मामलों पर केस स्टडीज भी प्रेजेंट की है.
वॉल स्ट्रीट जनरल के अनुसार फुडान यूनिवर्सिटी के एमबीए प्रोग्राम्स से जुड़े अधिकारियों को लैरी रोमानॉफ़ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.
क्या लैरी रोमानॉफ़ फुडान यूनिवर्सिटी से बतौर विजिटिंग प्रोफ़ेसर जुड़े हुए हैं?
फुडान यूनिवर्सिटी ने बीबीसी न्यूज़ के इस सवाल पर कोई जवाब नहीं दिया.
अमरीका के लिए आलोचना
'ग्लोबल रिसर्च' के लिए नियमित रूप से लिखने वाले लैरी रोमानॉफ़ के ज़्यादातर लेखों में अमरीका के लिए आलोचना और चीन के लिए समर्थन का भाव पढ़ा जा सकता है.
यहां तक कि उन्होंने अपने एक लेख में साल 1989 के तियानमेन चौराहे पर छात्रों के प्रदर्शन को "अमरीका की शह पर क्रांति की कोशिश" करार दिया था.
उनके कई दावों पर सवाल उठते रहे हैं. एक पॉडकास्ट स्टेशन से इसी महीने उन्होंने कहा, "शुरुआत में कोविड-19 की बीमारी केवल चीनी लोगों को निशाना बना रही थी और दूसरे मूल और नस्ल के लोगों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ रहा था."
बीबीसी न्यूज़ ने लैरी रोमानॉफ़ से उनकी टिप्पणी के लिए संपर्क किया पर उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं मिला.

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बात डब्लूएचओ की फंडिंग तक पहुंच गई
चीन की सरकार से जुड़े लोगों और मीडिया में जब ये ख़बरें चलने लगीं कि कोरोना वायरस की महामारी के पीछे अमरीका का हाथ है तो वॉशिंगटन में भी इसकी प्रतिक्रिया होने लगी.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना वायरस को चाइनीज़ वायरस करार दिया तो विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने चीन से भ्रामक सूचनाओं को रोकने की मांग की.
राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में ये घोषणा की वो विश्व स्वास्थ्य संगठन को अमरीकी फंडिंग रोकने जा रहे हैं. उन्होंने डब्लूएचओ पर चीन परस्त होने का आरोप लगाया.
इसके जवाब में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रॉस एडहानोम गीब्रियेसस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी की फंड कटौती के लिए ये सही समय नहीं है.
वुहान की लैब से कोरोना के निकलने की कहानी
लेकिन अमरीकी राजनेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के एक तबके ने भी कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर अपुष्ट दावे करने का सिलसिला जारी रखा.
फॉक्स न्यूज़ में प्राइम टाइम होस्ट करने वाले टकर कार्लसन ने एक स्टडी का ज़िक्र किया जिसमें ये संभावना जताई गई थी कि वुहान की किसी प्रयोगशाला से कोरोना वायरस दुर्घटनावश फैल गया.
फ़रवरी में ग्वांगज़ू स्थित साउथ चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नॉलॉजी के दो शोधकर्ताओं बोटाओ शियाओ और ली शियाओ ने एक रिसर्च पेपर का शुरुआती ड्राफ्ट जारी किया, जिसका औपचारिक मूल्यांकन होना बाक़ी थी.
उनके रिसर्च में ये निष्कर्ष निकाला गया था कि वुहान की किसी लैब से ये वायकस निकला होगा.

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'वाशिंगटन पोस्ट' की रिपोर्ट
बाद में बोटाओ शियाओ ने 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' को बताया कि उन्होंने अपनी स्टडी वापस ले ली थी.
'वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने शियाओ के हवाले से लिखा, "कोरोना वायरस की उत्पत्ति की संभावना को लेकर हमारा अंदाज़ा अख़बारों और मीडिया में छपी रिपोर्ट के आधार पर था. इसके पक्ष में हमारे पास कोई सीधा सबूत नहीं था."
'वॉशिंगटन पोस्ट' ने अप्रैल में एक रिपोर्ट पब्लिश की जिसमें अमरीकी दूतावास के दो साइंस डिप्लोमैट्स के कई बार वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी जाने का ज़िक्र था.
रिपोर्ट के मुताबिक़ साइंस डिप्लोमैट्स ने अमरीका को आगाह किया था कि "लैब में पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं हैं और वहां चमगादड़ों के कोरोना वायरस पर ख़तरनाक़ रिसर्च किया जा रहा है."
इबोला महामारी के समय अमरीका की रिस्पॉन्स टीम का नेतृत्व करने वाले जेरेमी कोनिंडिक ने लैब से दुर्घटनावश हुई लीक पर कहा है, "लैब में वायरस तैयार होने की बात को विज्ञान ख़ारिज नहीं करता लेकिन वो ये भी कहता कि ऐसा होना नामुमकिन है."

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