कोरोना लॉकडाउन में सरकारों ने ग़रीबों के साथ दोहरा व्यवहार किया?- नज़रिया

कोरोना वायरस

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, संजय कुमार
    • पदनाम, प्रोफेसर, सीएसडीएस

कोरोना वायरस का संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले 24 मार्च को देश भर में लॉकडाउन का ऐलान किया और फिर 14 अप्रैल को इसे तीन मई तक के लिए बढ़ा दिया.

इस बीच, समाज के अलग-अलग हलकों से आ रही ख़बरों पर ग़ौर करने पर लगता है कि देश के मध्य वर्ग ने न सिर्फ़ इस लॉकडाउन का पालन और समर्थन किया है बल्कि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को भी बख़ूबी माना है.

देश के मध्य वर्ग के बारे में यह सच हो सकता है लेकिन क्या देश में कम कमाई वाले लोगों और ग़रीबों की बड़ी आबादी के लिए भी यह है? ऐसा लगता है कि इस आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए ये नियम काग़ज़ों पर रहे होंगे.

देश में हर परिवार में औसतन पाँच सदस्य होते हैं. ग़रीब और कम आय वालों के परिवारों में कुछ ज़्यादा ही लोग रहते हैं. इसके साथ ही 37 फ़ीसदी परिवार एक कमरे के मकान में रहते हैं और 32 फ़ीसदी दो कमरों के मकान में.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

फिर ऐसे में इस बात की कल्पना की जा सकती है कि पिछले छह सप्ताह से लागू लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का किस क़दर पालन हुआ होगा.

इस दौरान हमने सोशल डिस्टेंसिंग में जो कामयाबी हासिल की उस पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि छह-सात सप्ताह के लॉकडाउन ने समाज में एक अलग किस्म की सामाजिक दूरी पैदा कर दी है.

महिला

इमेज स्रोत, Getty Images

सामाजिक विभाजन ज़्यादा पैदा होगा?

यह सामाजिक दूरी पैदा हुई है ग़रीबों और अमीरों के बीच और यह अलग-अलग सरकारों की ओर से मध्य वर्ग कहे जाने वाले एक ख़ास वर्ग के लोगों की मदद के लिए बनाए गए कार्यक्रमों का नतीजा है.

यह लॉकडाउन जितना लंबा चलेगा, वर्ग विभाजन के तौर पर सामने आ रहा यह सामाजिक विभाजन और बढ़ेगा.

न सिर्फ़ आर्थिक वजहों के लिए बल्कि सामाजिक वजहों के लिए ज़रूरी है कि लॉकडाउन को अगर पूरी तरह उठाना संभव न हो तो कम से कम इसमें ढील दी जाए. कई सेक्टरों में लॉकडाउन में छूट देना ज़रूरी है ताकि लोग, ख़ासकर ग़रीब और अपना रोज़गार करने वाले कम आय वर्ग वाली आबादी अपनी रोज़ी-रोटी चला सके.

लॉकडाउन के पहले कुछ दिनों में रोज़ कमाकर खाने वाले लोगों को जिन आर्थिक दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा वो अभी तक थोड़ी भी कम नहीं हुई है. लेकिन लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में अमीरों और ग़रीबों की बीच जो सामाजिक विभाजन था वह अभी की तुलना में कम था. लॉकडाउन अगर और बढ़ता है तो यह विभाजन भी और बढ़ सकता है.

लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में हमने देखा कि मध्य वर्ग के लोग बड़ी तादाद में ग़रीबों की रोज़ी-रोटी बरकरार रखने के लिए आगे आए थे लेकिन अब यह ट्रेंड नदारद है. इसके अलावा अब समाज में वर्ग विभाजन की दूसरी वजहें भी सामने आने लगी हैं.

बच्चे

इमेज स्रोत, Getty Images

सरकार की नीतियों ने पैदा की दरार?

यह विभाजन, सरकार द्वारा अपने राज्यों के बाहर फंसे एक ख़ास वर्ग के लोगों को वापस घर लाने की कोशिशों से पैदा हुआ है. मुझे पक्का लगता है कि बढ़ा हुआ लॉकडाउन अलग-अलग आर्थिक हैसियत वाले लोगों के बीच सामाजिक विभाजन को और गहरा करेगा.

ज़ाहिर तौर पर इस लॉकडाउन से सामाजिक विभाजन तो बढ़ेगा ही. दुर्भाग्य से इस बीच, केंद्र और राज्य सरकारों ने जगह-जगह फंसे लोगों की मदद के लिए जो प्रयास किए हैं, उनसे भी ऐसी स्थिति बनी है. ऐसा इसलिए हुआ कि सरकार के इन प्रयासों ने दिखाया कि उसके क़दम एकतरफ़ा हैं.

जब 24 मार्च की रात को अचानक लॉकडाउन का ऐलान हुआ तो अलग-अलग शहरों में रह रही प्रवासी मज़दूरों, ख़ासकर दिहाड़ी मज़दूरों ने अपने-अपने घरों की ओर लौटने का फ़ैसला किया. उन्हें पता था कि आने वाले दिनों में उनके पास काम नहीं होगा और वे किस मुश्किल में फंस सकते हैं.

ऐसे हताशा के माहौल में उन्होंने अपनों के बीच लौट जाना बेहतर समझा. और इस मक़सद से कई हज़ार किलोमीटर दूर अपने घरों की ओर पैदल ही चल पड़े. उनके इस क़दम का सरकार के पास फ़ौरी जवाब था और वह उन्हें रोकने में लग लग गई चाहे इसके लिए उसे ताक़त का इस्तेमाल ही क्यों नहीं करना पड़ा हो. कई राज्यों ने इससे गुरेज़ भी नहीं किया.

प्रवासी मज़दूरों की यह हताशा अब भी ख़त्म नहीं हुई है और अब यह सुनने में आ रहा है कि वे अब किसी भी तरह घर लौटना चाहते हैं.

लेकिन सरकार का ज़रा दूसरा रुख़ देखिए. पता चला कि कई राज्य सरकारें कोटा में फंसे अपने-अपने छात्रों को वापस लाने के लिए बसें भेज रही हैं.

पहले यह काम उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ और सरकार ने सिर्फ़ एक-दो नहीं पूरी 250 बसें उन्हें लाने के लिए कोटा भेज दीं. इसके बाद अलग-अलग राज्यों ने ऐसे ही क़दम उठाए. राज्य सरकारों ने लॉकडाउन में सैकड़ों किलोमीटर तक जाने के लिए इन बसों को भेजने के लिए ज़रूरी परमिशन लेने में थोड़ी भी देर नहीं लगाई.

इसके पहले अलग-अलग देशों में फंसे भारतीयों को लाने के लिए सरकार चार्टर्ड फ्लाइट्स भेज ही चुकी थी. सरकार ने मिडिल क्लास भारतीयों को मदद करने और लॉकडाउन के दौरान हर सहूलियत पहुंचाने के लिए ख़ूब मशक्कत की लेकिन जब ग़रीबों को ऐसी ही मदद की ज़रूरत थी तो उसने मुंह फेर लिया.

मज़दूर

इमेज स्रोत, Getty Images

ग़रीबों के लिए की गई थी व्यवस्था फिर भी क्यों नाख़ुश?

यह सही है कि सरकार ने फंसे हुए प्रवासी मज़दूरों के लिए भोजन और दूसरी ज़रूरतों के लिए अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की लेकिन जितनी मदद की ज़रूरत थी उतनी नहीं पहुंच पाई.

ऐसा नहीं था कि कोटा में फंसे छात्रों को खाना नहीं मिल रहा था. उन्हें खाना मिल रहा था लेकिन इस संकट की घड़ी में वे अपनों के साथ रहना चाहते थे.

सरकार ने ग़रीब प्रवासी मज़दूरों के लिए भी खाने का इंतज़ाम किया था. लेकिन कोटा के छात्रों की तरह इस वक़्त वो भी अपने परिवारों के पास लौटना चाहते थे. आख़िर जो इच्छा मीडिल क्लास के लोगों की हो सकती है वो ग़रीबों की क्यों नहीं.

रात-दिन प्रसारित होने वाले टीवी चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स वाले इस दौर में कोटा के छात्रों को उनके राज्यों में भेजने की ख़बर जंगल में आग की तरह फैली. आख़िर छात्रों को अपने घर भेजने की इस ख़बर से ग़रीबों को ठेस पहुंचना लाज़िमी था.

आख़िर वो क्यों न सोचें कि अमीर और मिडिल क्लास के लोग अपना काम करा ले जाते हैं क्योंकि उनकी सरकारी अफ़सरों और नेताओं के बीच 'अच्छे कनेक्शन' होते हैं.

बच्चा

इमेज स्रोत, Getty Images

अब मज़दूरों को लाने की घोषणा क्यों?

अब अचानक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐलान कर दिया है कि वो दूसरे राज्यों में फंसे यूपी के प्रवासी मज़दूरों के लाने की कोशिश कर रहे हैं. मुझे पक्का यकीन है अलग-अलग शहरों में फंसे प्रवासी मज़दूरों में मिडिल क्लास के फंसे लोगों को घर भेजने की कोशिश से पैदा ग़ुस्से का उन्हें बख़ूबी अंदाज़ा हो गया होगा.

मुझे तो इस बात का आश्चर्य है कि यह तब क्यों नहीं सोचा गया जब लॉकडाउन का ऐलान हुआ था. मुझे नहीं पता कि सरकार इन प्रवासी मज़दूरों को वापस लाने के मामले में कितनी गंभीर है, लेकिन अगर हम मानें कि सरकार दिल से ऐसा चाहती है तो भी यह क़दम देर से उठाया हुआ माना जाएगा. कहा जाता है कि देर से मिला इंसाफ़.. इंसाफ़ नहीं होता.

फ़िलहाल, समाज के मिडिल क्लास और ग़रीबों के बीच जो खाई बन गई है, ख़ासकर शहरों में उसे दोबारा भरने में काफ़ी वक़्त लगेगा.

बीमारी और महामारी को काबू करना भले ही कितना भी मुश्किल और ख़तरनाक क्यों न हो यह समाज के अलग-अलग वर्ग के लोगों के बीच विश्वास पैदा करने के काम से ज़्यादा आसान है.

(लेखक सेंटर फ़ार स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी में प्रोफ़ेसर हैं. वो राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार भी हैं. इस लेख में उनके निजी विचार हैं.)

कोरोना वायरस
कोरोना वायरस
कोरोना वायरस हेल्पलाइन

इमेज स्रोत, GoI

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)