अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका हटा तो क्या तालिबान की होगी वापसी?

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अमरीकी मीडिया के मुताबिक, अमरीकी प्रशासन अफ़ग़ानिस्तान से अपने हज़ारों सैनिकों को हटाने की योजना बना रहा है.
रिपोर्ट में अनाम अधिकारी के मुताबिक, अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद लगभग आधे सैनिक (क़रीब 7,000) अगले कुछ महीनों में अपने घर वापस लौट सकते हैं.
यह रिपोर्ट अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के सीरिया से सैनिकों को हटाने की घोषणा के एक दिन बाद आई है.

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इससे पहले गुरुवार को ट्रंप के रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की.
अपने इस्तीफ़े में जनरल मैटिस ने बेहद दृढ़ता से राष्ट्रपति ट्रंप के साथ नीतिगत मतभेदों का संकेत दिया, लेकिन सैनिकों की वापसी के विषय पर कुछ नहीं कहा.
चुनाव से पहले ट्रंप ने बार बार अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की बात की थी. लेकिन पिछले साल उन्होंने संकेत दिया कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमरीका अपने सैनिकों को वहां अनिश्चित समय तक बरकरार रखेगा.
बड़ी संख्या में अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों की वापसी की रिपोर्ट गुरुवार को आई, लेकिन अमरीकी रक्षा अधिकारियों ने इसकी पुष्टि नहीं की है.
अफ़गान अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि वो अमरीकी सैनिकों की वापसी को लेकर चिंतित नहीं हैं.

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राष्ट्रपति के प्रवक्ता हारुन चुखानसोरी ने बीबीसी अफ़गान सर्विस को बताया, "तथ्य यह है कि ये वो कुछ हज़ार विदेशी सैनिक हैं जिनकी भूमिका मुख्य रूप से सलाहकार और तकनीकी सहायता में रही है वो जाएंगे, इससे सुरक्षा की स्थिति पर असर नहीं पड़ेगा."
उन्होंने कहा, "2014 से ही सुरक्षा मामलों की पूरी ज़िम्मेदारी अफ़गान सुरक्षाबलों की रही है."
हालांकि, अमरीकी सैन्य रिपोर्ट्स से पता चलता है कि अफ़ग़ानिस्ता के एक बड़े भूभाग पर तालिबान का नियंत्रण है- जबकि बीबीसी की स्टडी में पाया गया कि तालिबान देश के 70 फ़ीसदी इलाके में सक्रिय थे.

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अफ़ग़ानिस्तान में क्या है अमरीकी कहानी?
अमरीका 2001 से ही अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद है. 11 सितंबर के हमले के बाद से- अमरीकी इतिहास में सबसे लंबा युद्ध.
जब अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण रखने वाले तालिबान ने इस हमले की ज़िम्मेदारी लेने वाले अल क़ायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को सौंपने से इनकार कर दिया, तब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने वहां एक सैन्य अभियान छेड़ा ताकि बिन लादेन का पता लगाया जा सके. इस हमले में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता गंवा दी.
क़रीब 10 वर्षों के इंतजार के बाद ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में मिला और 2 मई 2011 को जलालाबाद के ऐबटाबाद में लादेन को अमरीकी नेवी सील कमांडो ने मार दिया.

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आधिकारिक तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी नेतृत्व वाले युद्ध अभियान 2014 में समाप्त हो गये थे.
लेकिन इसके बाद से तालिबान की ताक़त में काफ़ी इजाफ़ा हुआ और उनकी पहुंच भी कहीं बढ़ गई. लिहाजा अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता कायम करने के प्रयास के मद्देनज़र अपने सैनिक को वहां रोके रखा.
सितंबर 2017 में डोनल्ड ट्रंप ने यह घोषणा की कि अमरीका वहां 3,000 अतिरिक्त सैनिक भेजेगा, जो उनके पहले दिये गए बयानों से उलट था.

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क्या रही प्रतिक्रिया?
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में बताया गया कि ट्रंप ने यह फ़ैसला कुछ वरिष्ठ कैबिनेट अधिकारियों के विरोध के बावजूद लिया गया, इनमें अमरीकी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जॉन केली और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन भी शामिल थे.
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा कि सैनिकों की वापसी से 9/11 जैसे ख़तरे बढ़ सकते हैं.

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क्या मैटिस ने इसी कारण दिया इस्तीफ़ा?
यह कहना मुश्किल है.
विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया के उपनिदेशक माइकल कगलमैन ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों को हटाना एक कारण हो सकता है, लेकिन संभावना है कि इसका मुख्य कारण सीरिया से सैनिकों को हटाना है.
हालांकि, जनरल के इस्तीफ़े से ट्रंप प्रशासन की अफ़गान नीति पर आगे असर पड़ सकता है.
माइकल कगलमैन ने कहा, "वो ट्रंप प्रशासन में अकेले ऐसे वरिष्ठ अधिकारी थे जो अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति की वकालत करते थे."
"अब जबकि जनरल मैटिस इस्तीफ़ा दे चुके हैं तो ट्रंप को अमरीकी सैनिकों को वापस लाने के अपने फ़ैसले पर विरोध का सामना करना पड़ेगा."

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अफ़ग़ानिस्तान में अब हिंसा की स्थिति क्या है?
अमरीका के स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल फ़ॉर अफ़ग़ानिस्तान रिकंस्ट्रक्शन (सिगार) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण पिछले कुछ महीनों में बढ़ा है.
सिगार की त्रैमासिक रिपोर्ट के अनुसार अफ़गान सरकार का देश के 55.5 फ़ीसदी इलाके पर नियंत्रण है, 2015 से इस डेटा को ट्रैक करने की शुरुआत करने के बाद से यह सबसे अपने निम्नतम स्तर पर है.
माइकल कगलमैन ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा 'ख़तरनाक स्तर' तक पहुंच गई है.
उन्होंने कहा, "हिंसा के बढ़ते स्तर को तेज़ी से बढ़ती तालिबानी हिंसा के रूप में बताया गया है... और अफ़ग़ान सुरक्षाबलों की कमज़ोर स्थिति को दर्शाता है."

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अमरीकी सैनिकों की वापसी का क्या होगा असर?
माइकल कगलमैन कहते हैं कि इसका असर विनाशकारी हो सकता है और वहां बड़े पैमाने पर हिंसा बढ़ सकती है जो तालिबान के लिए बहुत बड़ी फायदे की स्थिति होगी.
वो कहते हैं, "यह तालिबानी प्रोपगैंडा की जीत होगी क्योंकि वो यह दावा कर सकता है कि उसने किसी शांति समझौते के बगैर ही अमरीकी सैनिकों को देश से बाहर करने में कामयाबी हासिल की है."
यह अफ़ग़ान सैनिकों के लिए भी एक मनोवैज्ञानिक झटका होगा, उन्होंने वहां बहुत संघर्ष किया है इसलिए उनके लिए यह फ़ैसला निराशाजनक होगा.
लेकिन वो जो सैनिकों की वापसी का समर्थन करता है, उनके लिए यह विदेशी धरती पर अमरीका के लंबे संघर्ष का अंत होगा. जब से इसकी शुरुआत हुई है, इसमें क़रीब तेईस सौ अमरीकियों की जानें गई हैं.

तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान में उदय
अफ़ग़ानिस्तान के नक़्शे पर सबसे पहले तालिबान 90 के दशक में उभरा था. उस वक़्त देश भयंकर गृह युद्ध की चपेट में था. तमाम ताक़तवर कमांडरों की अपनी-अपनी सेनाएं थीं. सब देश की सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे थे.
अफ़ग़ानिस्तान पर गहरी समझ रखने वाले पत्रकार अहमद रशीद कहते हैं कि जब उन्होंने तालिबान का नाम सुना, तो चौंक गए. उनके ज़हन में सवाल उठा कि अचानक कौन से लोग इतने ताक़तवर हो गए?
रशीद, कई दशक से अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर रिपोर्टिंग करते आए हैं. वो कहते हैं, ''जब मैंने पहली बार नब्बे के दशक में उनका नाम सुना तो चौंक गया. मैं अफ़ग़ानिस्तान के हर लड़ाके को जानता था. पर तालिबान का नाम पहले कभी नहीं सुना था.''
लेकिन, अचानक ही अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान बेहद ताक़तवर हो गया था. देश की सत्ता पर क़ब्ज़े के लिए उन्होंने भी दूसरे लड़ाकों से जंग छेड़ दी थी. उन्हें हर मोर्चे पर जीत मिल रही थी.

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तालिबान ने जनता से वादा किया कि वो देश को ऐसे लड़ाकों से मुक्ति दिलाएंगे. उन्होंने कुछ ही महीनों में दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े हिस्से के लड़ाकों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया.
तालिबान को पाकिस्तान से हथियार मिल रहे थे. तालिबान के बारे में नई बात ये थी कि उनकी जो इस्लामिक विचारधारा थी, वो इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान में नहीं सुनी गई थी. लेकिन, चूंकि वो युद्ध से परेशान अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को शांति और स्थायी हुकूमत दे रहे थे, इसलिए तालिबान को स्थानीय क़बीलों का भी साथ मिलने लगा.
अहमद रशीद बताते हैं कि गांव दर गांव जीतते हुए एक दिन वो तालिबान राजधानी काबुल तक पहुंच गए. दो साल की घेराबंदी के बाद 1996 में उन्होंने राजधानी पर क़ब्ज़ा कर लिया.
सत्ता में आने पर तालिबान ने पहला काम किया कि राष्ट्रपति नज़ीबुल्लाह को सरेआम फांसी दे दी.
अहमद रशीद बताते हैं कि जल्द ही तालिबानी पुलिस ने अपना निज़ाम क़ायम करना शुरू कर दिया था. औरतों के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी गई. उनकी पढ़ाई छुड़वा दी गई. तालिबान ने जल्द ही देश में गीत संगीत, नाच-गाने, पतंगबाज़ी से लेकर दाढ़ी काटने तक पर रोक लगा दी.

नियम तोड़ने वाले को तालिबानी पुलिस सख़्त सज़ा देती थी. कई बार लोगों के हाथ-पैर तक काट दिए जाते थे.
जल्द ही उन्हें लेकर डर और नफ़रत का माहौल देश भर में बन गया. मगर सत्ता पर उनकी पकड़ बेहद मज़बूत थी.
इस सिलसिले में 9/11 के हमले के बाद अमरीका के अफ़ग़ानिस्तान में की गई कार्रवाई के बाद रुकावट आई.
जब अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला बोला तो कुछ ही हफ़्तों के भीतर तालिबान हार गया.
तालिबान ने सत्ता तो गंवा दी लेकिन इससे तालिबान का ख़ात्मा नहीं हुआ.
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