काबुल: दुनिया का ‘सबसे ज़्यादा आतंक’ में जीने वाला शहर

काबुल

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    • Author, बेंजामिन ज़ैंड
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) से लौटकर

अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा की घटनाओं के बीच हुए संसदीय चुनाव में इस बार क़रीब 30 लाख लोगों ने मतदान किया.

वोटरों की ये संख्या पहले लगाये गए अनुमान से अधिक है.

तकनीकी दिक्कतों की वजह से जिन मतदान केंद्रों में शनिवार को वोटिंग नहीं हो पाई थी, वहाँ रविवार को वोट डाले गए.

साल 2001 के बाद ये पहला मौक़ा था कि संसदीय चुनाव कराने की कमान पूरी तरह से अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के हाथ में थी.

चुनाव के दौरान कई जगह हिंसा की घटनाएं भी हुईं और इनमें कम से कम 28 लोगों की मौत हो गई.

28 में से 15 लोगों की मौत अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए एक आत्मघाती धमाके में हुई.

चुनाव के दौरान काबुल में हिंसा होगी, इस बात की बहुत ज़्यादा उम्मीद जताई गई थी क्योंकि अकेले इस शहर में साल 2018 में अब तक 20 से ज़्यादा आत्मघाती हमले हो चुके हैं.

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अफ़ग़ानिस्तान एक 'रण-क्षेत्र'

यही वजह है कि अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल को दुनिया का सबसे ज़्यादा आतंकित और चरमपंथ से प्रभावित शहर कहा जाता है.

चुनाव से पहले हमने काबुल शहर का दौरा किया था. इस शहर के लिए चरमपंथ कितनी बड़ी चिंता है, इसका अंदाज़ा शहर में दाख़िल होते ही लग जाता है.

शहर का मुख्य इलाक़ा किसी सैन्य छावनी जैसा है. थोड़ी-थोड़ी दूरी पर चैकपॉइंट हैं. यहाँ बम निरोधी दस्ते हर वक़्त तैनात रहते हैं.

कुछ जगह पर बड़े धमाकों को झेलने की क्षमता रखने वाली दीवारें सड़क के दोनों तरफ बनाई गई हैं.

तथाकथित चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट और तालिबान का ख़तरा यहाँ हर वक़्त बना रहता है.

साल 2001 में अमरीका के इस धरती पर क़दम रखने के बाद से ही अफ़ग़ानिस्तान एक 'रण-क्षेत्र' बना हुआ है. इस देश में कई तरह की फ़ोर्स तैनात हैं.

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सबसे घातक नौकरी

फिर भी वक़्त के साथ काबुल शहर में होने वाले आत्मघाती हमलों की तीव्रता बढ़ी है.

काबुल शहर में जब कोई आत्मघाती हमला होता है या फिर कोई चरमपंथी हमला, तो यहाँ तैनात क्यूआरएफ़ (क्विक रेस्पॉन्स फ़ोर्स) को सबसे पहले घटनास्थल पर भेजा जाता है.

क्यूआरएफ़ के काम को यहाँ के स्थानीय लोग भी 'सबसे घातक नौकरी' कहते हैं.

शहर के हालात इतने नाज़ुक हो चुके हैं कि यहाँ क़रीब हर दो हफ़्ते में एक छोटा या बड़ा बम धमाका होता ही है.

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क्यूआरएफ़ या पुलिस के लोग जिस भी गाड़ी को चैकिंग के लिए रोकते हैं, वो ये मानकर चलते हैं कि उनके लिए वो 'आख़िरी कार' साबित हो सकती है.

एक पुलिसकर्मी ने बीबीसी को बताया कि "जब हम किसी की कार को रोकते हैं और देख लेते हैं कि उसने बम बांध रखे हैं, तो उसके सिर में गोली मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. हम एक सेकेंड का इंतज़ार नहीं करते. क्योंकि अगर उसे शक़ हुआ कि हमें पता चल गया है तो वो विस्फोटक का बटन दबा देगा."

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इमेज कैप्शन, बेंजामिन ज़ैंड के साथ डॉक्टर एलबर्टो कायरो

मस्तमौला अफ़ग़ान

काबुल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में हमारी मुलाक़ात डॉक्टर एलबर्टो कायरो से हुई. वो 28 साल से काबुल में रह रहे हैं.

वो अब तक सवा लाख से ज़्यादा जख़्मी लोगों का इलाज कर चुके हैं. साल 2010 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका नाम मनोनीत किया गया था.

उनके अस्पताल में आत्मघाती हमलों में शरीर का कोई अंग खो चुके मरीज़ों की संख्या सबसे ज़्यादा दिखी.

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डॉक्टर एलबर्टो कहते हैं, "यहाँ 6 साल से लेकर 60 साल की उम्र तक के मरीज़ हैं. इस देश के लोगों ने इतना लंबा युद्धकाल देखा है कि दो तिहाई आबादी को युद्ध के सिवा कुछ याद नहीं है. जो लोग किसी हमले में घायल होकर अपंग हो जाते हैं, वो अब अपनी स्थिति पर हंसने लगे हैं."

डॉक्टर एलबर्टो के अनुसार काबुल शहर में कोई ऐसा परिवार नहीं है जिसका कोई एक सदस्य चरमपंथी हमले में घायल न हुआ हो.

डॉक्टर एलबर्टो कहते हैं, "अफ़ग़ान लोग इतने मस्तमौला हैं कि वो अपनी परेशानियों पर भी हंस लेते हैं."

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लोगों की कुर्बानी

इसी सरकारी अस्पताल में हम एक विकलांग पुलिस अधिकारी से मिले. उनकी दाईं टांग शहर में ही हुए एक बड़े बम विस्फोट में कट गई थी.

इतने ख़राब हालात में नौकरी करते हुए क्या उन्हें डर नहीं लगता? इसके जवाब में उस पुलिस अधिकारी ने कहा, "अगर हम ये कुर्बानी नहीं देंगे, तो तालिबान हमारे शहरों में, हमारे घरों में घुस आएगा. इसलिए लड़ने के सिवा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है."

इसी तरह के जज़्बे वाले कई लोग हमें मिले. यहाँ जिन्हें भी हमलों में नुकसान पहुँचा है, उन सभी को लगता है कि उन्होंने कहीं न कहीं देश के भले के लिए बड़ी ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाई है.

लेकिन यहाँ हमले सिर्फ़ सरकार के लोगों तक या फ़ौजियों तक सीमित नहीं हैं. यहाँ आम लोगों को भी बड़े आत्मघाती हमलों का उसी तरह निशाना बनाया जा रहा है, जैसे सैनिकों को.

इसी साल घटनास्थल पर रिपोर्टिंग करने पहुँचे क़रीब दस पत्रकारों को भी आत्मघाती हमलावरों ने मार दिया. यही वजह है कि अफ़ग़ानिस्तान को पत्रकारों के लिए भी दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश माना जाता है.

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शहर के बहुत से लोग मज़ाक में कहते हैं कि काबुल का चिड़ियाघर, यहाँ का सबसे सुरक्षित स्थान है.

चिड़ियाघर के मैनेजर जमशेद इस बात को सही बताते हैं. वो कहते हैं कि चिड़ियाघर में एक घटना के अलावा कभी कोई हिंसक वारदात नहीं हुई.

उन्होंने बताया, "एक बार दो भाई मर्दानगी दिखाने के लिए शेर के पिंजरे में घुस गये थे. उनमें से एक जाकर शेर से भिड़ गए. लेकिन मरज़ान नाम के शेर ने उसे कुछ ही मिनटों में खा लिया. तो गुस्साए दूसरे भाई ने शेर पर बम से हमला कर दिया. इस कारण वो शेर अंधा हो गया और कुछ वक़्त बाद गुज़र गया. उसकी याद में चिड़ियाघर में एक सुनहरी मूर्ति भी बनाई गई है."

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तालिबान लड़ाकों से तीखे सवाल

अफ़ग़ानिस्तान की सबसे बड़ी पुले-चर्खी जेल में जाकर हमने कुछ तालिबान लड़ाकों और कमांडरों से भी मुलाक़ात की, ताकि उनका पक्ष भी सुना जा सके.

इस जेल में अफ़ग़ानिस्तान के दस हज़ार सबसे खूंखार क़ैदियों को रखा गया है. इनमें आईएस के लड़ाके और तालिबान के लड़ाके भी शामिल हैं.

माना जाता है कि यहाँ के बराबर मज़बूत सिक्योरिटी अफ़ग़ानिस्तान में किसी जगह की नहीं है.

जेल में हमारी मुलाक़ात सीनियर तालिबान कमांडर मोहम्मद यासीन से हुई. उन पर कई बड़े आत्मघाती हमले प्लान करने का आरोप है. उन्हें साल 2008 में सज़ा-ए-मौत दी गई थी.

इस जेल में क़ैद कथित आईएस लड़ाकों ने हमारे सामने ये कबूल नहीं किया कि वो इस्लामिक स्टेट के लिए काम करते हैं.

लेकिन तालिबान से जुड़े लोग बड़े गर्व से ये कबूल करते दिखे कि वो कट्टरपंथी संगठन के सदस्य हैं.

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इमेज कैप्शन, सीनियर तालिबान कमांडर मोहम्मद यासीन (सलाखों के सबसे पास, सफ़ेद नमाज़ी टोपी लगाए हुए)

सीनियर तालिबान कमांडर मोहम्मद यासीन ने कहा, "अगर दो अमरीकी मरते हैं, तो उनके साथ भले ही दस अफ़ग़ान मर जाएं. हमें फ़र्क नहीं पड़ता. हम मंत्रियों पर हमला करते हैं. उनके ठिकानों पर हमला करते हैं."

पर इन हमलों में आम स्थानीय लोग भी मारे जा रहे हैं. इसके जवाब में यासीन ने कहा, "ये युद्ध है. यहाँ हम मिठाइयां नहीं बाटेंगे. इसमें कुछ लोगों को तो मरना ही होगा. मुझे मौक़ा मिलेगा उन्हें मारना का तो मैं ख़ुद को भी आत्मघाती हमले में उड़ा सकता हूँ."

पर इस युद्ध का अंत कैसे होगा? इसपर यासीन बोले, "विदेशी लोग हमारी ज़मीन छोड़ें. अमरीकी वापस जाएं. वो जब तक नहीं जाएंगे, हम और हमारे बच्चे उनसे लड़ेंगे. ऐसे लोगों को मारने के लिए अल्लाह ने हमें अनुमति दी हुई है. बाहरी लोग हमें ये न बताएं कि क्या सही है, क्या ग़लत."

इस बातचीत के दौरान कमांडर मोहम्मद यासीन नाराज़ हो गए और उन्होंने बात बीच में ही रोकते हुए कहा, "तुम्हारे सवाल मुझे बुरे लग रहे हैं. बस अब बंद करो."

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कैसे होगी शांति?

काबुल के जैसे हालात हैं, ऐसे में यहाँ शांति बहाल होने की उम्मीद निकट भविष्य में नहीं की जा सकती.

आने वाले वक़्त में अमरीका अपनी सेनाएं अफ़ग़ानिस्तान से नहीं हटाने वाला. वहीं इसी साल यूके ने भी कहा है कि ब्रिटेन के जितने फ़ौजी अफ़ग़ानिस्तान में हैं, वो उनकी संख्या को दोगुना करेगा.

तो हालात कैसे बदलेंगे? इसका जवाब ढूंढने के लिए हमने 120 से ज़्यादा अफ़गान फ़िल्मों में काम कर चुके सलीम शहीन से मुलाक़ात की.

वो काबुल शहर में ही रहते हैं. सुपरस्टार सलीम शहीन को अफ़ग़ानिस्तान का ब्रूस विलिस भी कहा जाता है.

वो अफ़ग़ानिस्तान में किसी भी बड़े राजनेता से ज़्यादा लोकप्रिय हैं. लेकिन यही उनके लिए सबसे बड़े आफ़त भी है क्योंकि बेहद दकियानूसी समाज में वो एक पेशेवर एक्टर और फ़िल्म निर्माता हैं.

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सलीम शहीन कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में फ़िल्म एक्टर होना, एक सिपाही होने के बराबर है क्योंकि हम बहुत ही ख़राब हालात में फ़िल्में बनाते हैं. हम जानते हैं कि हम हर वक़्त कुछ लोगों के निशाने पर हैं."

सलीम बताते हैं कि उनके फ़िल्म स्टूडियो पर एक बार रॉकेट से हमला हो चुका है. उस हमले में उनके 9 सहयोगी कलाकारों की मौत हो गई थी. वो किसी काम से बाहर गए हुए थे, इसलिए बच गए.

वो कहते हैं, "तालिबान कितना भी धमका ले, मैं अपने ख़ूँन की आख़िरी बूंद को भी सिनेमा में लगा दूंगा."

आख़िर में सलीम ने कहा, "इस देश में तोप और बंदूकों से कुछ नहीं बदलने वाला. लोगों को कला से जुड़ने दिया जाए. उन्हें कागज़ और कलम दी जाए. तभी यहाँ शांति हो सकती है."

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