'ये तालिबान अफ़ग़ानिस्तान को दूसरा वज़ीरिस्तान बना देगा'

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    • Author, उमर सद्र
    • पदनाम, अफ़ग़ान इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, काबुल

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की मौजूदगी को दो दशक से अधिक समय गुज़र गया है. लेकिन, बहुत से लोग अभी भी उसकी पहचान, उसके एजेंडे, उसके नज़रिये से बेख़बर हैं.

ऐसा लगता है कि तालिबान ने बड़ी चालाकी से लोगों को अपनी पहचान के बारे गुमराह कर रखा है.

तालिबान के तौर-तरीकों और बर्ताव के बारे में कई ऐसी बातें हैं जिन पर एतबार करना मुश्किल लगता है.

हाल ही में तालिबान ने खुद को मानवाधिकार, महिला अधिकार और व्यापक बुनियादी अधिकारों जैसे आधुनिक मूल्यों पर आधारित सरकार के लिए प्रतिबद्ध माना है.

मॉस्को अधिवेशन के बाद जारी अपने घोषणापत्र में भी तालिबान ने कहा है कि वो पवित्र इस्लाम धर्म पर आधारित महिला अधिकारों पर यक़ीन रखता है और इसी तरह अफ़ग़ानिस्तान में एक आज़ाद हुकूमत बनाने की ख्वाहिश रखता है.

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तालिबान का चरमपंथ

तालिबान का लक्ष्य अपने लोगों को यक़ीन दिलाना है कि वो सत्तर के दशक वाली अपनी नीति और व्यवहार में बदलाव लाकर एक उदारवादी संगठन बन गया है.

इसके अलावा तालिबान का एक और मक़सद है, खुद को 'इस्लामिक स्टेट' और 'तहरीक-ए-तालिबान-ए-पाकिस्तान' जैसे संगठनों से अलग साबित करना.

इन दिनों बहुत से लोग ये मानने लगे हैं कि तालिबान एक राजनीतिक संगठन है और 'अल-क़ायदा' और 'इस्लामिक स्टेट' जैसे अन्य कट्टरपंथी संगठनों से जुदा है.

ऐसे लोगों की दलील है कि तालिबान का चरमपंथ राजनीतिक वजहों और घटनाओं से प्रेरित एक 'सियासी चरमपंथ' है.

क्योंकि तालिबान को अमरीका ने सत्ता से हटाया, उसके सदस्यों को बंदी बनाया और सज़ा दिलाई, इसीलिए तालिबान का चरमपंथ असल में अमरीका के ख़िलाफ़ और अफ़ग़ानिस्तान की आज़ादी के पक्ष में है.

ऐसे लोगों के मुताबिक़ इस मसले का हल ये है कि अमरीका तालिबान के साथ सुलह करे और अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय एक राजनीतिक संगठन के तौर पर उसे मान्यता दे.

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इमेज कैप्शन, गज़नी शहर पर तालिबान ने हाल में कई बड़े हमले किए हैं. कुछ समय के लिए इस शहर पर उनका कब्ज़ा भी रहा.

समझौते की अमरीकी कोशिश

पिछले कुछ सालों में तालिबान ने भी खुद को एक सियासी संगठन के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है.

तालिबान के बारे में ऐसी धारणा रखने वाले लोग असल में उसके दूसरे पहलुओं जैसे उसकी विचारधारा, उसकी चरमपंथी गतिविधियों और उसके अपराधों को अनदेखा कर रहे हैं.

ऐसी ही धारणाओं का नतीजा था कि पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में उनके सलाहकार डॉक्टर बार्नेट आर रुबिन ने तालिबान के साथ समझौते की कोशिश की. इससे एक साल पहले अमरीकी डिप्लोमैट रॉबिन रफ़ैल ने तालिबान के साथ शुरुआती संपर्क स्थापित किया था.

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चरमपंथी विचारधारा

लेकिन, हक़ीकत में ये बातें इतनी सीधी भी नहीं हैं और मामला बुरी तरह से उलझा हुआ है.

तालिबान एक ऐसा राजनीतिक संगठन नहीं है जो महज़ अपने राजनीतिक अधिकारों की मांग या अफ़ग़ानिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रहा है. सच तो ये है कि तालिबान मज़हब के नाम पर चरमपंथी विचारधारा वाला एक संगठन है.

अपने दावे के विपरीत वो बुनियादी आज़ादी जैसे धर्म, उपासना, विचार, लैंगिक समानता और विश्व स्तर के मापदंडों पर आधारित मानवाधिकार को स्वीकार नहीं करता है.

तालिबान की सोच के मुताबिक़ ये बातें अमरीकी जीवन मूल्य का हिस्सा हैं.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि इस्लामी मापदंड से तालिबान का क्या मतलब है?

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पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था

पाकिस्तान के इस्लामी दलों से तालिबान के संबंधों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का 'आदर्श' ठीक वही है जो 'तहरीक-ए-तालिबान-ए-पाकिस्तान' और पाकिस्तान के दूसरे इस्लामी दलों का है.

मानवाधिकार के मापदंडों - नागरिक स्वतंत्रता के विचारों और शासन प्रणाली को जिस तरीके से पाकिस्तान के इस्लामी संगठन स्थापित करना चाहते हैं, दरअसल यही मापदंड अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान का भी है.

चरमपंथी इस्लामी संगठन ही असल में पाकिस्तानी समाज और राजनीतिक व्यवस्था में सांप्रदायिक हिंसा, चरमपंथ, और असहिष्णुता के लिए ज़िम्मेदार हैं.

हालांकि, तमाम इस्लामी संगठन पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के तहत ही सक्रिय हैं लेकिन इनका मूल मक़सद पाकिस्तान के जनतांत्रिक ढांचे को बदलकर उसकी जगह इस्लामी धार्मिक रूढ़िवाद, कट्टरपंथ और सामाजिक असहिष्णुता वाली राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना है.

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मॉस्को अधिवेशन

ये इस्लामी संगठन भी इस्लाम की किसी एक व्याख्या पर सहमत नहीं हैं. जिसका नतीजा है कि ये इस्लामी संगठन भी लड़ते रहते हैं और इन संगठनों का पाकिस्तान के विभिन्न मंचों पर अपना असर है.

इन संगठनों का पहला प्रभाव पाकिस्तान की विधायिका और न्यायपालिका में रहा है. इन्हीं संगठनों के दबाव में आकर साल 1974 में अहमदिया अल्पसंख्यकों को 'ग़ैर मुसलमान' घोषित किया गया था.

इन्हीं के दबाव के कारण पाकिस्तान के संविधान और न्याय व्यवस्था में तब्दीली लाई गई थी. फिर साल 1984 और 1986 में ईश निंदा क़ानून को आपराधिक संहिता के साथ जोड़ा गया और बाद में भी इस प्रकार के बहुत से और क़ानून लाए गए.

अफ़ग़ान तालिबान ने अफ़गानिस्तान के संविधान और उसकी राजनीतिक व्यवस्था की लगातार अवहेलना की है.

मॉस्को अधिवेशन में भी तालिबान के प्रतिनिधि ने अपने भाषण में अफ़ग़ानिस्तान के संविधान और राजनीतिक व्यवस्था को 'ग़ैर इस्लामी' बताया है.

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इमेज कैप्शन, मॉस्को बैठक में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्तानाकज़ई

अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत

इन चरमपंथी संगठनों का दूसरा असर ये है कि भले ही पाकिस्तानी क़ानून के मुताबिक़ ये संगठन अपनी अलग सेना नहीं रख सकते हैं लेकिन पाकिस्तान में हथियारबंद गुटों के पैदा होने और बढ़ने में इनकी अप्रत्यक्ष भूमिका रही है.

ख़ासकर इन संगठनों के लिए पैसा जुटाने और इन गुटों और सरकार के बीच मध्यस्था करने में इन संगठनों को और इनकी गतिविधियों को एक प्रकार की वैधता मिली.

वास्तव में अफ़ग़ान तालिबान का ये मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत के साथ शांति समझौते के बावजूद अपनी सैन्य गतिविधियों को जारी रखा जाए.

पाकिस्तान के इस्लामी संगठनों की तरह अफ़ग़ान तालिबान भी अफ़ग़ानिस्तान की शासन प्रणाली और समाज में कट्टरपंथी इस्लामी व्यवस्था लागू करना चाहते हैं.

तालिबान इस समय जैसा व्यवहार कर रहा है, उसे देखते हुए व्यापक बुनियादी अधिकारों पर आधारित हुकूमत, मानवाधिकार और महिला अधिकार को मान्यता देने का दावा बिल्कुल ही सही नहीं है.

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'देवबंदी' और 'अहल-ए-हदीस'

तालिबान एक विशेष विचारधारा पर आधारित राज्य की स्थापना करना चाहता है जहां उनकी परिभाषा के मुताबिक़ विशेष स्वरूप का इस्लाम लागू होगा, भले ही ये काम ज़ोर जबरदस्ती और ताक़त के इस्तेमाल से किया जाए.

ऐसे में तालिबान के साथ किसी भी शांति समझौते में केवल मानवाधिकार और महिला अधिकार को ही ध्यान में न रखा जाए बल्कि नागरिकों की बुनियादी आज़ादी, अधिकार और राज्य की जनतांत्रिक व्यवस्था के मुद्दे को भी स्पष्ट रूप में सामने रखा जाना चाहिए.

तालिबान को ये मानना चाहिए कि 'देवबंदी' और 'अहल-ए-हदीस' पर आधारित इस्लाम अफ़ग़ानिस्तान में कबूल नहीं किया जाएगा. तालिबान के साथ शांति समझौता केवल ऐसी सूरत में संभव हो सकता है जब वह खुले शब्दों में इन (पाकिस्तानी) संगठनों के विचार, इनकी शासन प्रणाली और राजनीतिक व्यवस्था की निंदा करे, नहीं तो तालिबान अफ़ग़ानिस्तान को दूसरा वजीरिस्तान बना देगा.

अफ़ग़ान लोगों की ख्वाहिश और ख्याल तालिबान के ख्वाब और एजेंडे के बिलकुल ख़िलाफ़ है.

हालिया शोध और अध्ययन से पता चला है कि देवबंदी विचारधारा वाले तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में जनता का कोई सहयोग प्राप्त नहीं है.

इसके अलावा अफ़ग़ान लोग जनतांत्रिक व्यवस्था के अंदर स्पष्ट रूप में मानवाधिकार और बुनियादी नागरिक अधिकार चाहते हैं.

तालिबान के साथ शांति समझौते और शांति की प्रक्रिया में जनता की इन सभी ख्वाहिशों को शामिल किया जाना चाहिए.

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(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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